Friday, April 22, 2011

मार्च महीने की एक सुबह में प्रेम


ये चिपचिपी गरमी वाला मौसम था और रात के दो बज रहे थे.चौथे माले के फ्लेट की खिड़की के पास का मौसम कुछ ठीक जान पड़ता था लेकिन वंहा भी हवा जैसा कुछ न था. गहरे सलेटी रंग के लोअर की पिछली जेब में हाथ डाले हुए उसने सोचा कि वह अपना एक पैर अगर खिड़की पर रख कर खड़ा हो सके तो शायद आराम आएगा.

उसने अपने मन में कहा कि वह क्या कर सकता है ? उसके पास अपने प्रश्नों के उत्तर थे ही नहीं. प्रेम जैसे विषय पर उत्तर किसी के पास कभी नहीं रहे, बड़े सूफी संत भी प्रेम को समझाते हुए स्मृतिशेष हो गए और प्रेम अनचीन्हा रह गया. दूर रौशनी में शहर की भव्यता टिमटिमा रही थी. तीन साल पहले तक इसी टिमटिमाहट ने दिल में घर बना रखा था. वह खिड़की के बीच बैठा हुआ इस खूबसूरत दुनिया के छोटे से आले में खुद पर सम्मोहित हो जाया करता था. आज नींद गायब थी. सिगरेट की तलब में उसने बायीं तरफ हाथ घुमाया लेकिन रेक पर कुछ नहीं था. लकड़ी की उस उर्ध्वगामी रेक के सब कोनों में सिर्फ़ सीलन भरी थी. वैसे भी वह बिस्तर की सीलन से ऊब कर ही यहाँ खड़ा था. अक्सर वे चीज़ें ही हमसे टकराती रहती है जिनसे हम बच के रहना चाहते हैं.

वह मुड़ा और खिड़की से दूर सात कदम चलते ही किसी दोराहे पर आ गया. एक तरफ दिन में दीवार से सट कर खड़ा रहने वाला डबल बेड बिछा था और दूसरी तरफ वह कोना था जहां कॉफ़ी बनायी जा सकती थी. उसे बचपन से ही सिखाया गया था कि ज़िन्दगी में बीच एक रास्ते चुनने चाहिए. उसे भी ठीक ही लगता था क्योंकि कोर्स की किताबों में भी शहीदों के पन्ने छोटे और उद्योगपतियों पन्ने के बड़े हो गए थे. यानि न उसे बेहद सख्त होना है और ना ही हद से अधिक नरम. दो सेकंड से भी कम अवधि में उसके दिमाग ने तय कर लिया कि सिगरेट पी जाये.

धुंएँ के बेतरतीब आकार को देखते हुए, उसे अक्टूबर की एक हल्की ठंडी रात याद आई.
उस रात भी इसी सिंगल रूम फ्लेट के ठीक बीच में बिछे हुए बेड के दायें किनारे पर बैठते हुए उसने माचिस की तीली जलाई. आग की इस रौशनी में नमिता की दो आँखें चमक रही थी.
"नींद नहीं आई ?" ऐसा पूछते हुए वह उठ गया. जब तक नमिता ने 'नहीं' कहा, तब तक वह खिड़की के पास पहुँच चुका था. उसके मन में फिर से एक सवाल कौंधा. वह क्यों उठ कर चला आया ? इसलिए कि नमिता को सिगरेट पसंद नहीं है.
अक्टूबर की उस हल्की ठंडी शाम में इसी खिड़की के पास खड़े हुए नमिता ने कहा था कि सिगरेट मत पिया करो. उसकी आँखों में किसी शरारत के साथ झांकते हुए उसने पूछा था. "क्यों ". नमिता ने कहा. "मैं सिगरेट की गंध को पसंद नहीं करती हूँ." उसने पलटते हुए नमिता को बाँहों में भर लिया. "एक मिनट... मुझे छोडिये." कहते हुए नमिता ने बाँहों से दूर जाना चाहा. उसने अपनी पकड़ को वैसा ही बना रहने दिया. "तुमने मेरी बात सुनी." नमिता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा. वह थोड़े असमंजस में रहा किन्तु नमिता ने उसके हाथों को झटक दिया.

वह नमिता के पीछे आया और हाथ पकड़ कर बोला. "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ." नमिता ने कहा. "मुझसे प्रेम करने और सिगरेट पीने में क्या तालमेल है." वे देर तक चुप बैठे रहे फिर उसने कहा कि क्या तुम मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकती ? नमिता ने थोड़ा धीमे किन्तु पूरे धैर्य के साथ कहा. " तुम सिगरेट पीते हो इससे मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मैं तुम्हें इसलिए नहीं रोकती हूँ कि तुम खुद एक समझदार आदमी हो और तुम्हे अपना भला बुरा मालूम होना चाहिए." ऐसा सुनते हुए उसने नमिता को चूम लेना चाहा. नमिता ने उसे जोर से धक्का दिया. "ये बदतमीजी है, मेरे पास आना है तो जाओ मुंह साफ़ करके आओ." उसने उसका हाथ मरोड़ दिया. "ऐसी क्या जान जा रही है" नमिता ने कहा. "जान, जाने कि बात नहीं है, ये तुम्हारी बदसलूकी है."

वह तिलमिला सा गया. "जन्नत की हूर..." ऐसा कहते हुए उसने नमिता को धक्का दे दिया. नमिता ने कहा. "मुझे अफ़सोस है तुम अहंकार से भरे हो और एक झूठे सम्मान के लिए तड़प रहे हो. तुम मुझसे अपेक्षा करते हो कि मैं छी-छी करती हुए तुमसे अपना मुंह दूर ले जाऊ और फिर खुद को तुम्हारे सीने में छुपा लूं... तुम इसे प्रेम समझते हो और मैं इसे प्रेम का अपमान " उसने अपने दुपट्टे को चादर की तरह ओढा और सो गई.

कुछ सुबहें बहुत अलग हुआ करती है. उसके लिए भी अक्टूबर की उस हल्की ठंडी रात के बाद की सुबह बड़ी ताजा और बिल्कुल अजनबी थी. नमिता ने उसे गर्म चाय देते हुए कहा. "इंसान सिर्फ़ टांगों में टाँगें डाल कर सोने, सिगरेट पी कर जबरन चूमने, सर झुकाए हुए नौकरी करने और नगर निगम की नालियों को कोसने के लिए दुनिया में नहीं आता है."

उस दिन नमिता चली गई थी. कब लौटेगी मालूम नहीं था. वह अकेला था. उसे लगता कि आराम है. फ्लेट में जगह उग आई है. वह अपने पांव को बेड के दूसरे छोर तक फैला कर सो सकता था. नई चीज़ें आहिस्ता धुंधली होती है लेकिन नमिता के चले जाने से घर में पसरा एकांत बहुत जल्द बासी हो गया. वह उसे काटने दौड़ता था.
नमिता के साथ यादों की रेल का पहला स्टेशन भगत सिंह चौक था. नन्हे बच्चे, एक नुक्कड़ नाटक खेल रहे थे. नाटक के लेखक शिवराम उसे देख रहे होते तो जरुर मुस्कुरा रहे होते. वे तुरंत अपने नाटक के संदेश को भूल जाते और बच्चों की वेशभूषा और संवाद अदायगी से अभिभूत हो जाते. फिर पता नहीं वे मुस्कुराते या उदास हो जाते कि बच्चों ने उस क्रांतिकारी नाटक को एक मासूम व्यंग्य में बदल दिया था.

उस नाटक को देखते हुए मन में उपज रहे इस तरह के कई ख़यालों को नमिता की आवाज़ ने ही तोड़ा था. "शिक्षा के अधिकार का कानून लागू होना चाहिए और सार्वजनिक सेवाएं राज्य का दायित्व है कोई अहसान नहीं... " एक पेम्पलेट उसके हाथ में देते हुए नमिता ने कहा. "आप भी हमारा समर्थन कीजिये." वह अगले नुक्कड़ नाटक के मंचन स्थान पर भी गया. इस तरह प्राइवेट कम्पनी का डाटा ओपरेटर हर सप्ताह के आखिरी दिन शहर के अलग अलग चौराहों पर पेम्पलेट बांट रहा होता. कभी बच्चों से घुल मिल कर बातें करता. उनकी बहुत सी तारीफ करता फिर साल भर बाद जब आँख खुली तो वह और नमिता एक ही छत के नीचे सो रहे थे.

सड़क पर कुछ क्रेश होने की आवाज़ आई और उसने देखा कि रात के तीन बज चुके हैं. उठ कर रसोई की तरफ गया. कॉफ़ी की खुशबू में भी अजब सी उत्तेजना होती है. पीने से पहले ही उसे सूंघते हुए वह अपने अंदर एनर्जी फील करने लगता है. उसने मग लिया और बाहर झांकने लगा. आखिर ये खिड़की ही उसे बाहर की दुनिया से जोड़ती थी. उसने सोचा कि क्या नमिता सो गई होगी ? नमिता ने उसे आज फिर कहा कि वह जब चाहे फोन कर सकता है."

मोबाईल उसके हाथ से दूर नहीं था. वह चाह रहा था कि फोन कर ले लेकिन दिन की मुलाकात के बारे में सोचता रहा. वह आज भी नमिता से मिल कर आया था. उसने नमिता को नहीं कहा कि वह लौट आये. ना ही नमिता ने कहा कि तुम्हारे बिना कितना अकेला लगता है. एक बेहद साधारण से कॉफ़ी हाउस में बैठे हुए, नमिता ने कॉफ़ी लेने से पहले कहा कि मैं तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ. "एक पांच साल के लड़के का बाप मर जाता है. उसकी माँ चाचा से शादी कर लेती है. उसके पांच और भाई बहन हो जाते हैं. वह अपने घर का खर्च उठाने के लिए माँ और नए पिता के साथ दस साल की उम्र से मजदूरी करना शुरू करता है. मजदूरी करने के साथ ही स्कूल भी जाता है. वह चाहता है कि उसकी बहन विश्वविध्यालय तक पढने जाये क्योंकि वह नहीं जा पाया. ऐसे सपनों को दिल में लिए गलियों में फेरी लगा कर सामान बेचते हुए वह बाईस साल का हो गया. एक सुबह एक महिला ऑफ़िसर उसे गैर कानूनी काम करते हुए कह कर रोक लेती है. एक महीने के कुल घर खर्च से भी अधिक की राशि में उधार लाये गए सामान को जब्त कर लेती है और उसे नपुंसक कहते हुए थप्पड़ मार देती है."

नमिता ने कहा तुम कॉफ़ी पीते रहो मैं कहानी पूरी कर के लूंगी." वह लड़का सबसे बड़े स्थानीय अधिकारी को शिकायत करने जाता है लेकिन उसकी कोई शिकायत नहीं सुनता. उसे लताड़ते हुए बाहर धकेल दिया जाता है. उसके पास जीने का कोई रास्ता नहीं होता है तो रेल के आगे कूद कर कट जाता है या फिर तालाब में कूद जाता है या फिर फाँसी खा लेता है." नमिता ने पाया कि उसका स्वर काफी ऊँचा हो गया है और लोग उसे नोटिस कर रहे हैं. नमिता ने सांस ली और पूछा ये किस शहर की कहानी हो सकती है ?"
अहमदाबाद की ?
उसने कहा हाँ हो सकती है.
जोधपुर की...मुदरई, सतना, भागलपुर, जेपोर.... और ऐसे बीसियों नाम बोलने के बाद नमिता उसकी ओर देखने लगी.
हाँ हर शहर की... और हो क्या सकती है ऐसा ही होता है. नमिता ने कॉफ़ी का मग उठाया और पीने लगी. उसकी आँखों में किसी सहमति से कोई आशा उभर रही थी.

कॉफ़ी पी कर बाहर सड़क पर आते ही नमिता उसके बेहद करीब आ गई. उसे बाँहों में भर, सिर के पीछे बालों में अंगुलियाँ घुमाते हुए कहा. "मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ लेकिन तुम्हारे साथ इसलिए नहीं रहती कि तुम्हें अभी तक इंसान का सम्मान करना नहीं आता..." उसकी आवाज़ में भारीपन था और वाक्य टूट रहे थे फिर भी जाते हुए उसने कहा. "हालाँकि उस लड़के का नाम तारेक अल तैय्यब मुहम्मद बाऊज़िज़ी था... लेकिन मेरे भाई भी पिछले साठ सालों से ऐसे ही मर रहे हैं इसलिए मैं चुप नहीं बैठ सकती..." नमिता ने अपने जूट के थेले से लाल रंग का सूती स्कार्फ निकाल कर सर पर बाँधा और धूप में ओझल हो गई.

रात जागते हुए कटी. मग में आधी कॉफी छूट गई थी. सुबह की आवाज़ें बीस मंजिला इमारतों की छत तक चढ़ आई थी. वह घर से बाहर जाने को तैयार बैठा था. दो एक बार उसने ब्रेड पेकेट की ओर देखा फिर एकाएक उठा और लिफ्ट से नीचे उतर आया. आज की सुबह भी कुछ अलग थी. वह सबसे पहले ऑफिस पहुंचा. सोचा आधे दिन का काम करके फिर छुट्टी लूँगा लेकिन सीट पर बैठते ही कोई चीज़ उसे रॉकेट की तरह धकेलने लगी. वह उठ कर बाहर आ गया. उसने नमिता को फोन लगाया. शोर शराबे के बीच उसे सिर्फ़ इतना सुनाई दिया, कमीश्नर ऑफिस. यहाँ से आयुक्त का कार्यालय बीस मिनट के फासले पर था. ट्रेफिक के बीच से स्पाईडर मैन की तरह निकलता हुआ दौड़ने लगा. सोच रहा था कि काश उड़ सकने का हुनर भी इंसान के पास होता.

कमीश्नर कार्यालय के बाहर कचहरी के खुले मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी हज़ारों तख्तियां हवा में लहरा रही थी. बड़े-बूढ़े, नौजवान-नवयुवतियां और स्कूलों के बच्चे अपने गणवेश में कतारबद्ध बैठे थे. भोंपुओं की आवाज़ें ट्रेफिक के शोर को पछाड़ रही थी. हवा में लहराती हुई मुट्ठियाँ अराजक किलों को तोड़ देने के लिए उठे हुए लोह हथोडों की तरह दिख रही थी. वह बहुत बेचैन था और उसकी नज़रें नमिता को खोज रही थी किन्तु असंख्य महिलाओं ने लाल रंग के स्कार्फ बांधे हुए थे.

19 comments:

रश्मि प्रभा... said...

bahut achhi kahani ... sach ke libaas me skarf bandhe hue

Pratibha Katiyar said...

शुक्र है शिल्प ने कथ्य का अतिक्रमण न करते हुए उसे खुलकर सांस लेने दी.कहानी बेहतरीन है...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बेहतरीन लगी यह कहानी ....क्या और कमेन्ट करूँ सभी समझ नहीं आ रहा है .....बाद में बात करते हैं

प्रवीण पाण्डेय said...

स्तब्ध अँधेरे में बनती कहानी।

वन्दना said...

कहानी ने सब कह दिया।

Manoj K said...

सुन्दर कहानी, कोफी और सिगरेट के धुंए से लेकर स्कार्फ़ तक. कहानी एकदम ताज़ा है और तेज भी.

ज्योति सिंह said...

अक्सर वे चीज़ें ही हमसे टकराती रहती है जिनसे हम बच के रहना चाहते हैं.
kya baat kahi hai pate ki bilkul ,na bhulne waali umra bhar jo hum bhi jaante hai magar aapki kahani ise adhik dohraayegi .

monali said...

Namita ka character maano soch ko naye aayam deta h... aur aapko padhna to hamesha se hi ek learning jaisa raha h mere lie... ummeed h k aage bhi rahega... keep writing :)

डिम्पल मल्होत्रा said...

कोर्स की किताबों में भी शहीदों के पन्ने छोटे और उद्योगपतियों पन्ने के बड़े हो गए थे.शुक्र है की कुछ पन्ने बचे है...atleast जब तक आप जैसे लिखने वाले है
बात अगर पसंद की हो दो सेकंड से भी कम अवधि में उसके दिमाग तय कर लेता है की उसे क्या करना है...खिड़की से देखने पे दुनिया सुंदर ही दिखती है..खिड़की के बाहर हकीकत घात लगाये बैठी रहती है..

इस्मत ज़ैदी said...

बहुत ख़ूबसूरत कहानी !
कहानी की शुरुआत में ऐसा लगा ही नहीं कि अंत ऐसे होगा
बेहद ख़ूबसूरती और सहजता से कहानी ने टर्न लिया और बेह्तरीन अंत हुआ
बधाई !

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बेहतरीन कहानी ...कॉफ़ी और स्कार्फ इसे अनायास ही आज के दौर से जोड़ रहे हैं..... अच्छा लगा पढ़कर

Patali-The-Village said...

बेहतरीन लगी यह कहानी| धन्यवाद|

pallavi trivedi said...

shuru se ant tak lajawaab...

कंचन सिंह चौहान said...

सोच रही हूँ कि कहानी इससे आगे भी तो नही......!!

neera said...

संवेदनशीलता की नदी सी है... भिगो जाति है सर से पाँव तक ...और कई सत्य मुट्ठी में थमा ... जैसे
कोर्स की किताबों में भी शहीदों के पन्ने छोटे और उद्योगपतियों पन्ने के बड़े हो गए थे.
अक्सर वे चीज़ें ही हमसे टकराती रहती है जिनसे हम बच के रहना चाहते हैं.

Parul said...

very nice !

varsha said...

a beautiful gift on may day !!!
sukhad sanyog ki maine aaj hi ise padha.

kamal prakash ravi said...

aapki rachnaayein padh kar sukhad mahsoos hota hai...please likhte rahiye!!

neelam said...

किन्तु असंख्य महिलाओं ने लाल रंग के स्कार्फ बांधे हुए थे.
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