इन दिनों उसे जो भी मिलता, प्रेम के बारे में बड़े गंभीर प्रश्न करता. जबकि वह कहीं दूर भाग जाने की अविश्वसनीय कार्ययोजना के बारे में सोच रहा होता. उसकी कल्पना की धुंध में गुलदानों से सजी खिड़कियाँ, समंदर के नम किनारे, कहवा की गंध से भरी दोपहरें और पश्चिम के तंग लिबास में बलखाती हुई खवातीनें नहीं होती. एकांत का कोना होता, जिसमें कच्ची फेनी की गंध पसरी रहती. उस जगह न तो बिछाने के लिए देह गंध की केंचुलियाँ होती ना ही ख़्वाबों की उतरनें. ना वह साहिब होता, ना गुलाम. ना वह किसी से मुहब्बत करता और ना ही नफ़रत हालाँकि अब भी एक हसीन विवाहित स्त्री के बदन से उठते मादक वर्तुल उसे लुभाते रहते.
ऐसा सोचते हुए उसे यकीन होने लगता कि वह कभी प्रेम में था ही नहीं. इन बीते तमाम सालों में जब कभी दुःख से घिरता तो गुलाम फरीद को पढता, जब इच्छाएं सताने लगती तो बुल्ले शाह के बागीचे की छाँव में जाता, जब मन उपहास चाहता तो अमीर खुसरो को खोजने लगता. इस तरह कुछ बुनियादी बातें उसके आस पास अटक जाती कि प्रेम सरल होता है. उसमें गांठें नहीं होती. वह एक वन वे सीढ़ी की तरह है और कुंडलियों खोलता हुआ केंद्र की ओर बढ़ता जाता है. प्रेम अपने मकसद तक पहुँचता मगर वह वहीं पर उसी एक औरत को छू लेने भर के निम्नतम विचार पर अटका रह जाता.
बालकनी के बाहर एक निर्जीव क़स्बा आने वाले किसी धूल भरे बवंडर से घबराया हुआ दड़बे जैसे घरों में दुबका रहता. दिन के सबसे गए-गुजरे वक़्त यानि भरी दोपहर में बेचैनी जागा करती. रास्ते तन्हाईयों से लिपटे हुए और दुकानदार ज़िन्दगी से हारे हुए से पड़े रहते. कोई ठोर-ठिकाना सूझता ही नहीं. केसेट प्लेयर के आले के सामने खड़े हुए आईने में गुसलखाने का खुला हुआ दरवाजा दिखता. उसमे लगी खिड़की के पार दूर एक लाल और सफ़ेद रंग का टावर दिखता तो ख़याल आता कि रात इस जगह वह अपने जूड़े की पिन को मिट्टी में रोप कर भूल गई हो.
उन दिनों की स्मृतियां बुझने लगती तो वह और अधिक उकताने लगता. खुद से सवाल करता. ऐसा तो नहीं होना चाहिए कि तुम से जुड़ी बातें जब तक साथ दे, मैं सुकून में रहूँ. ऐसा हमारे बीच था ही क्या ? दीवारों पर बैठे रहे और पीठ की तरफ छाँव बुझती गई. हाथ थाम कर उठे और अँगुलियों में अंगुलियाँ डाले सो गए. घुटने निकली जींस की जगह तुमने क्रीम कलर की साड़ी बाँधी और कॉलेज चली गई. मैं वैसी ही जींस में सफ़ेद शर्ट पहने हुए बस में चढ़ गया. आस्तीनों के बटन खोले और उनको ऊपर की ओर मोड़ता गया जैसे देर तक हथेली की गरदन को चूमते रहने के बाद आस्तीन के कफ़ सांस लेने के लिए जा रहे हों.
खिड़की के पास की मेज पर पांव रखे हुए तीसरी बार ग्लास को ठीक से रखने की कोशिश में बची हुई शराब कागज पर फ़ैल गई. उसने गीले कागज को बल खायी तलवार की तरह हाथ में उठाया और कहा कि प्रेम-व्रेम कुछ नहीं होता. सबसे अच्छा होता है हम दोनों का सट कर बैठना. फिर कागज से उतर रही बूंदों के नीचे अपना मुंह किसी चातक की तरह खोल दिया. वे नाकाफी बूँदें होठों तक नहीं पहुंची नाक और गालों पर ही दम तोड़ गई.
अपनी भोहों पर अंगूठा घुमाते हुए फिर कहना शुरू किया. तुम्हें मालूम है ना कि मुझे कविताएं कहना नहीं आता फिर आज दो मई की रात मैं इतनी तो पी ही चुका हूँ कि मेरा अपने दिल का हाल हर कविता से अव्वल होगा.
"...धुंध में डूबे हुए शहरों की चौड़ी सड़कों पर हाथ थाम कर चलते हुए लोग प्रेम में नहीं होते, वे अतीत की भूलों को दूर छोड़ आने के लिए अक्सर एक दूजे का हाथ पकड़े हुए निकला करते हैं. दोपहरों में गरम देशों के लोग बंद दरवाजों के पीछे आँगन पर पड़े हुए शाम का इंतज़ार करते हैं ताकि रोटियां बेलते हुए बचपन में पीछे छूट गए पड़ौस के लड़के की और शराब पीते समय सर्द दिनों में धूप सेकती गुलाबी लड़कियों की जुगाली कर सकें.
सीले और चिपचिपे मौसम वाले महानगरों में रहने वाले लोग टायलेट पेपर के इस्तेमाल के बावजूद नहीं निकाल पाते हैं समय, प्रेम के लिए. उनके पर्स में टिकटें साबुत पड़ी रह जाती है, अपनी थकान को कूल्हों से थोड़ा नीचे सरका कर सोने का ख़्वाब लिए शोर्ट पहने हुए मर जाते हैं... धुंध के पार कुछ ही गरम होठ होते हैं, जिन पर मौसम की नमी नहीं होती. प्रेम मगर फिर भी कहीं नहीं होता..."
कविता सुनाने के बाद वह उदास हो गया. ये उदासी बहुत पुरानी थी कि ज़िन्दगी की संकरी गलियाँ नमक के देश वाले प्रेम भरे बिछोड़ों जैसी होती है. उनका कोई आगाज़ नहीं होता और कोई अंजाम भी नहीं दिखाई देता. वे धूप में ओढ़नी के सितारों सी झिलमिलाती हुई कभी दिखाई देती है और कभी खो जाती है. ऐसे ही रेस्तरां जैसे होटल की बालकनी में बैठे हुए उसने कहा था. "एक दिन तुम खो जाओगी." लड़की ने हल्के असमंजस से देखा और मुंह फेरने से पहले चेहरे पर ऐसा भाव बनाया जिसका आशय था कि तुमसे यही अपेक्षा थी. उसने फिर अपनी नज़र आसमान की ओर कर ली जैसे वहां से कोई इशारा होगा और वह अपनी बात आगे शुरू करेगा.
"मैंने जब तुमको पहली बार देखा था, तब तुम मुझे बहुत मासूम लगी थी. तुम्हारा छोटा सा गोल स्वीट चेहरा दुनिया के सबसे पवित्र चेहरों में एक लग रहा था. वैसे मैंने पहले भी कई लड़कियों के चेहरे इतने ही गौर से देखे थे किन्तु वे लम्बोतर चेहरे मुझे अधिकार जताते हुए लगते थे. वे हर बात को पत्थर की लकीर बनाने की ज़िद से भरे होते थे. मैंने उसमें से किसी को छुआ नहीं. वे मुझे अपनी ओर आकर्षित करते थे लेकिन जाने क्यों वे कभी मेरे पास आये ही नहीं." उसने बात कहते हुए लड़की की ओर नहीं देखा. लड़की क्या सोच या कर रही थी, उसने इसकी परवाह नहीं की. वह अपनी बात कहता रहा.
"तुम्हें मालूम है कि हमें कुछ भी मिलता और खोता नहीं है. वह हम खुद रचते हैं. तुम जब मेरे पास नहीं होती ना तब हर शाम को मैं छत पर बैठ कर तुम्हारे पास होने के ख़्वाब देखता हूँ. मैं बेहद उदास हो जाता हूँ. मैं तुम्हें छू लेने के लिए तड़पने लगता हूँ. मुझे एक ही डर बार-बार सताता है कि कोई तुम्हें छू न ले. ये ख़याल आते ही मैं पागल होने लगता हूँ और मेरा रक्त तेजी से दिमाग के आस पास दौड़ने लगता है. उसी समय तुम्हारे सब परिचित मेरे दुश्मन हो जाते हैं. मैं देखता हूँ तुम उनसे बोल रही हो. तुम्हारा बोलना या मुस्कुराना, मुझे और अधिक डराता है. फिर मैं रोने लगता हूँ."
सांझ बहुत तेजी से घिर रही थी. उतनी ही तेजी से लड़की निरपेक्ष होती जा रही थी. वह अपनी कुर्सी पर लगभग स्थिर हो चुकी थी. उसने लड़की का हाथ प्यार से थामा. वह नदी के पत्थर सा चिकना किन्तु फूल जैसा हल्का ना था शायद लड़की का हाथ टूट कर उसके हाथ में रह गया था.
उस रात लड़की ने शिकायत की "कई बार तुम मेरे पास नहीं होते हो ना तब मेरी सांसें उखड़ने लगती है. मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूं ? मैं बदहवास सी अपने कमरे से बाहर भीतर होती रहती हूँ. दौड़ती सी सड़क तक जाती हूँ. दुकानों की रोशनियों से खुद को बहलाना चाहती हूँ. वहां कुछ नहीं होता. तुम नहीं होते तो सब खाली हो जाता है. फिर रात को सोचती हूँ कि तुम्हें हमेशा के लिए छोड़ दूं ताकि ये दुःख बार-बार लौट कर न आये..." लड़की की आँखों से आंसू बहने लगे. वह उन्हें अपने होठों पर समेटता गया.
उस रात के बाद वे जब भी मिलते लड़की रात को अपने संदूक में छिपा कर मुंह फेर लेती. चार महीनों में लड़की ने उस संदूक को भी गायब कर दिया. उसके पास अगर रात होती तो लड़की नहीं होती, लड़की होती तो रात नहीं होती. उसने रात को काटने के लिए नए औज़ार अपना लिए. अब भी उन्हीं औज़ारों के साथ जी रहा था.
उसके गाल पर एक पसीने की लकीर खिंच गई. उसने गुसलखाने की खिड़की से देखा कि वह लाल सफ़ेद रंग की पिन किसी ने उखाड़ कर अपने जूड़े में खोंस ली है. बवंडरों से डर से बंद पड़े रहने वाले घर केंचुओं की तरह धूल में खो गए हैं. दूर तक ज़मीन समतल हो गई है. दुकानें, सरकारी दफ्तर, मुसाफिर खाने, पुरानी हवेली की टूटी हुई मेहराबें और सब कुछ गायब हो गया है.
दीवार के सहारे को हाथ बढाया तो वहां दीवार नहीं थी. नीचे देखा तो गुसलखाना भी नहीं था. उसने धरती को टटोलने के लिए पैर के अंगूठे की नोक से कुछ छूना चाहा किन्तु अंगूठा सिर्फ़ हवा में लहरा कर रह गया. उसने खुद के सीने पर हाथ रखना चाहा ताकि देख सके कि वह धड़क रहा है या नहीं ? लेकिन वहां कुछ नहीं था. उसने अपने पसीने की ओर हाथ बढाया तो सिर भी गायब था. वह लगभग गश खाकर गिरने को ही था लेकिन उसने कलम की नोक को बचा लिया ताकि दोबारा ये लिख सके कि वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता, सबसे अच्छा होता है तुम्हारे पास सट कर बैठना.
ऐसा सोचते हुए उसे यकीन होने लगता कि वह कभी प्रेम में था ही नहीं. इन बीते तमाम सालों में जब कभी दुःख से घिरता तो गुलाम फरीद को पढता, जब इच्छाएं सताने लगती तो बुल्ले शाह के बागीचे की छाँव में जाता, जब मन उपहास चाहता तो अमीर खुसरो को खोजने लगता. इस तरह कुछ बुनियादी बातें उसके आस पास अटक जाती कि प्रेम सरल होता है. उसमें गांठें नहीं होती. वह एक वन वे सीढ़ी की तरह है और कुंडलियों खोलता हुआ केंद्र की ओर बढ़ता जाता है. प्रेम अपने मकसद तक पहुँचता मगर वह वहीं पर उसी एक औरत को छू लेने भर के निम्नतम विचार पर अटका रह जाता.
बालकनी के बाहर एक निर्जीव क़स्बा आने वाले किसी धूल भरे बवंडर से घबराया हुआ दड़बे जैसे घरों में दुबका रहता. दिन के सबसे गए-गुजरे वक़्त यानि भरी दोपहर में बेचैनी जागा करती. रास्ते तन्हाईयों से लिपटे हुए और दुकानदार ज़िन्दगी से हारे हुए से पड़े रहते. कोई ठोर-ठिकाना सूझता ही नहीं. केसेट प्लेयर के आले के सामने खड़े हुए आईने में गुसलखाने का खुला हुआ दरवाजा दिखता. उसमे लगी खिड़की के पार दूर एक लाल और सफ़ेद रंग का टावर दिखता तो ख़याल आता कि रात इस जगह वह अपने जूड़े की पिन को मिट्टी में रोप कर भूल गई हो.
उन दिनों की स्मृतियां बुझने लगती तो वह और अधिक उकताने लगता. खुद से सवाल करता. ऐसा तो नहीं होना चाहिए कि तुम से जुड़ी बातें जब तक साथ दे, मैं सुकून में रहूँ. ऐसा हमारे बीच था ही क्या ? दीवारों पर बैठे रहे और पीठ की तरफ छाँव बुझती गई. हाथ थाम कर उठे और अँगुलियों में अंगुलियाँ डाले सो गए. घुटने निकली जींस की जगह तुमने क्रीम कलर की साड़ी बाँधी और कॉलेज चली गई. मैं वैसी ही जींस में सफ़ेद शर्ट पहने हुए बस में चढ़ गया. आस्तीनों के बटन खोले और उनको ऊपर की ओर मोड़ता गया जैसे देर तक हथेली की गरदन को चूमते रहने के बाद आस्तीन के कफ़ सांस लेने के लिए जा रहे हों.
खिड़की के पास की मेज पर पांव रखे हुए तीसरी बार ग्लास को ठीक से रखने की कोशिश में बची हुई शराब कागज पर फ़ैल गई. उसने गीले कागज को बल खायी तलवार की तरह हाथ में उठाया और कहा कि प्रेम-व्रेम कुछ नहीं होता. सबसे अच्छा होता है हम दोनों का सट कर बैठना. फिर कागज से उतर रही बूंदों के नीचे अपना मुंह किसी चातक की तरह खोल दिया. वे नाकाफी बूँदें होठों तक नहीं पहुंची नाक और गालों पर ही दम तोड़ गई.
अपनी भोहों पर अंगूठा घुमाते हुए फिर कहना शुरू किया. तुम्हें मालूम है ना कि मुझे कविताएं कहना नहीं आता फिर आज दो मई की रात मैं इतनी तो पी ही चुका हूँ कि मेरा अपने दिल का हाल हर कविता से अव्वल होगा.
"...धुंध में डूबे हुए शहरों की चौड़ी सड़कों पर हाथ थाम कर चलते हुए लोग प्रेम में नहीं होते, वे अतीत की भूलों को दूर छोड़ आने के लिए अक्सर एक दूजे का हाथ पकड़े हुए निकला करते हैं. दोपहरों में गरम देशों के लोग बंद दरवाजों के पीछे आँगन पर पड़े हुए शाम का इंतज़ार करते हैं ताकि रोटियां बेलते हुए बचपन में पीछे छूट गए पड़ौस के लड़के की और शराब पीते समय सर्द दिनों में धूप सेकती गुलाबी लड़कियों की जुगाली कर सकें.
सीले और चिपचिपे मौसम वाले महानगरों में रहने वाले लोग टायलेट पेपर के इस्तेमाल के बावजूद नहीं निकाल पाते हैं समय, प्रेम के लिए. उनके पर्स में टिकटें साबुत पड़ी रह जाती है, अपनी थकान को कूल्हों से थोड़ा नीचे सरका कर सोने का ख़्वाब लिए शोर्ट पहने हुए मर जाते हैं... धुंध के पार कुछ ही गरम होठ होते हैं, जिन पर मौसम की नमी नहीं होती. प्रेम मगर फिर भी कहीं नहीं होता..."
कविता सुनाने के बाद वह उदास हो गया. ये उदासी बहुत पुरानी थी कि ज़िन्दगी की संकरी गलियाँ नमक के देश वाले प्रेम भरे बिछोड़ों जैसी होती है. उनका कोई आगाज़ नहीं होता और कोई अंजाम भी नहीं दिखाई देता. वे धूप में ओढ़नी के सितारों सी झिलमिलाती हुई कभी दिखाई देती है और कभी खो जाती है. ऐसे ही रेस्तरां जैसे होटल की बालकनी में बैठे हुए उसने कहा था. "एक दिन तुम खो जाओगी." लड़की ने हल्के असमंजस से देखा और मुंह फेरने से पहले चेहरे पर ऐसा भाव बनाया जिसका आशय था कि तुमसे यही अपेक्षा थी. उसने फिर अपनी नज़र आसमान की ओर कर ली जैसे वहां से कोई इशारा होगा और वह अपनी बात आगे शुरू करेगा.
"मैंने जब तुमको पहली बार देखा था, तब तुम मुझे बहुत मासूम लगी थी. तुम्हारा छोटा सा गोल स्वीट चेहरा दुनिया के सबसे पवित्र चेहरों में एक लग रहा था. वैसे मैंने पहले भी कई लड़कियों के चेहरे इतने ही गौर से देखे थे किन्तु वे लम्बोतर चेहरे मुझे अधिकार जताते हुए लगते थे. वे हर बात को पत्थर की लकीर बनाने की ज़िद से भरे होते थे. मैंने उसमें से किसी को छुआ नहीं. वे मुझे अपनी ओर आकर्षित करते थे लेकिन जाने क्यों वे कभी मेरे पास आये ही नहीं." उसने बात कहते हुए लड़की की ओर नहीं देखा. लड़की क्या सोच या कर रही थी, उसने इसकी परवाह नहीं की. वह अपनी बात कहता रहा.
"तुम्हें मालूम है कि हमें कुछ भी मिलता और खोता नहीं है. वह हम खुद रचते हैं. तुम जब मेरे पास नहीं होती ना तब हर शाम को मैं छत पर बैठ कर तुम्हारे पास होने के ख़्वाब देखता हूँ. मैं बेहद उदास हो जाता हूँ. मैं तुम्हें छू लेने के लिए तड़पने लगता हूँ. मुझे एक ही डर बार-बार सताता है कि कोई तुम्हें छू न ले. ये ख़याल आते ही मैं पागल होने लगता हूँ और मेरा रक्त तेजी से दिमाग के आस पास दौड़ने लगता है. उसी समय तुम्हारे सब परिचित मेरे दुश्मन हो जाते हैं. मैं देखता हूँ तुम उनसे बोल रही हो. तुम्हारा बोलना या मुस्कुराना, मुझे और अधिक डराता है. फिर मैं रोने लगता हूँ."
सांझ बहुत तेजी से घिर रही थी. उतनी ही तेजी से लड़की निरपेक्ष होती जा रही थी. वह अपनी कुर्सी पर लगभग स्थिर हो चुकी थी. उसने लड़की का हाथ प्यार से थामा. वह नदी के पत्थर सा चिकना किन्तु फूल जैसा हल्का ना था शायद लड़की का हाथ टूट कर उसके हाथ में रह गया था.
उस रात लड़की ने शिकायत की "कई बार तुम मेरे पास नहीं होते हो ना तब मेरी सांसें उखड़ने लगती है. मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूं ? मैं बदहवास सी अपने कमरे से बाहर भीतर होती रहती हूँ. दौड़ती सी सड़क तक जाती हूँ. दुकानों की रोशनियों से खुद को बहलाना चाहती हूँ. वहां कुछ नहीं होता. तुम नहीं होते तो सब खाली हो जाता है. फिर रात को सोचती हूँ कि तुम्हें हमेशा के लिए छोड़ दूं ताकि ये दुःख बार-बार लौट कर न आये..." लड़की की आँखों से आंसू बहने लगे. वह उन्हें अपने होठों पर समेटता गया.
उस रात के बाद वे जब भी मिलते लड़की रात को अपने संदूक में छिपा कर मुंह फेर लेती. चार महीनों में लड़की ने उस संदूक को भी गायब कर दिया. उसके पास अगर रात होती तो लड़की नहीं होती, लड़की होती तो रात नहीं होती. उसने रात को काटने के लिए नए औज़ार अपना लिए. अब भी उन्हीं औज़ारों के साथ जी रहा था.
उसके गाल पर एक पसीने की लकीर खिंच गई. उसने गुसलखाने की खिड़की से देखा कि वह लाल सफ़ेद रंग की पिन किसी ने उखाड़ कर अपने जूड़े में खोंस ली है. बवंडरों से डर से बंद पड़े रहने वाले घर केंचुओं की तरह धूल में खो गए हैं. दूर तक ज़मीन समतल हो गई है. दुकानें, सरकारी दफ्तर, मुसाफिर खाने, पुरानी हवेली की टूटी हुई मेहराबें और सब कुछ गायब हो गया है.
दीवार के सहारे को हाथ बढाया तो वहां दीवार नहीं थी. नीचे देखा तो गुसलखाना भी नहीं था. उसने धरती को टटोलने के लिए पैर के अंगूठे की नोक से कुछ छूना चाहा किन्तु अंगूठा सिर्फ़ हवा में लहरा कर रह गया. उसने खुद के सीने पर हाथ रखना चाहा ताकि देख सके कि वह धड़क रहा है या नहीं ? लेकिन वहां कुछ नहीं था. उसने अपने पसीने की ओर हाथ बढाया तो सिर भी गायब था. वह लगभग गश खाकर गिरने को ही था लेकिन उसने कलम की नोक को बचा लिया ताकि दोबारा ये लिख सके कि वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता, सबसे अच्छा होता है तुम्हारे पास सट कर बैठना.
44 comments:
बहुत अच्छा...
Complicated, raw, and evocative like all your other stories!
you have been giving word to the simplest thoughts that come to one's mind, whether its the beautiful portrayal of the town in the afternoon or the girl's behaviour when she is alone or the boy's mindset.... the list is endless
once again a fantastic read.
प्यार की प्यारी विवेचना, दार्शनिक धरातलों से पार कर मन की गहराईयों तक।
ye bhee ek nazriyahee hai.......
jiskee jaisee soch vaisa hee aankna ......
बढ़िया है यह भी दार्शनिक फलसफा है यह
ek sundar canvas......jahan kirdar khil rahe hai!
just magnificent
सच तो ये है हम प्यार भी अपनी आवश्यकता अनुसार करते है फिर उसे याद भी अपनी जरुरत अनुसार ...पुरुष के लिए प्यार भी एक "नीड़ "होती है जिसका देह से सम्बन्ध हो ये जरूरी नहीं ....ऐसे बौद्धिक प्यार वक़्त जरुरत किसी देर रात चढ़ने के बाद "रेलिशता से याद भी किये जाते है ......
प्यार दुनिया का सबसे कठिन शब्द है जिसकी अनेको परिभाषाये है .अनेको व्याख्याए ....ओर कमाल है .केवल स्त्री ही इन व्याख्याओं को सच मानती है !
kya zaroori hai kuch kaha jaye...kuch nahin !!! kabhi pathak ki samajh choti bhi to pad sakti hai.
इस प्रेम के आईने में झाक़ा ...सौरमंडल मुस्कुराता नज़र आया
...:-)
वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता, सबसे अच्छा होता है तुम्हारे पास सट कर बैठना.. इस पंक्ति में पाश की खुशबू आती है.. कहानी की तरह पढ़ने से अच्छा लगता है इसे कविता की तरह पढा जाए. कहानी का मजा दोगुना हो हो जायेगा. खांटी 'केसी' मार्का. ..
:-)
Intense and beautiful ,as always !
ओह....
अद्भुद !!!!
और तो कुछ क्या कहूँ...सूझ ही नहीं रहा...
è claro que nao entendi nada,
mas passei para te desejar
um dia iluminado
um abbraccio
देखा कई दिन पहले लेकिन किसी जुम्मे की शाम को फुर्सत में पढने के लिये रख छोडा था। एक-एक शब्द को ध्यान से पढा। बात पूरी होने तक इतना समझ आ गया कि अब कविता की दो पंक्तियाँ पढने को दिल क्यों नहीं करता। जिसने खुद को खोया नहीं उसने क्या खाक़ प्रेम किया।
@Smart Indian- जिसने खुद को खोया नहीं उसने क्या खाक़ प्रेम किया।
TRUE...
सबसे हटकर..,अलग हि शैली है आपकी..सच कहूं..तो थोडी टफ़ है...मुझ जैसे नौसिखिये को एक-एक शब्द ध्यान से पढना होता है...बेहद खूबसूरत
वाह ... बेहतरीन !!!
खूबसूरत
http://shayaridays.blogspot.com
Bahut khub...
very nice blog yaha bhi aaye
क्या बात है आनन्द आ गया..बहुत बेहतरीन...
बहुत सुंदर
हर लफ़्ज़ प्रेम था .. फिर प्रेम नहीं था. सुन्दर!
किशोर चौधरी जी ,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगपोस्ट डाट काम"के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|
@वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता, सबसे अच्छा होता है तुम्हारे पास सट कर बैठना.
क्या प्रेम नजदीकी चाहता है........ मेरे ख्याल से प्रेम चाहे कहीं भी शुरू हो ...... चिट्ठी से मिस कॉल तक...... पर सट कर बैठने की चाहत ही सदा बनी रहती है
किशोर - तुम एक नए फल्फसे से प्रेम लिखते हो ... एकांत को भरने वाला...... अकेलेपन की आदत डालने वाला.
कल शनिवार २७-०८-११ को आपकी किसी पोस्ट की चर्चा नयी-पुराणी हलचल पर है ...कृपया अवश्य पधारें और अपने सुझाव भी दें |आभार.
कथा-कर्म निपुण ! मैं तो बस आपका रचा पढ़कर एक मौन गुफा मे पहुंचता हूँ, निष्काम भाव से निरखता हूँ इस रचना-सम्मोहन को जो मुझ पर छा जाया करता है | मौन ही मौन वाह! वाह! करने में वही रस पाता हूँ जो तुतलाते बालक को बारंबार 'माँ-माँ' दुहराने में !
एक बात और कहूँ - यहाँ ब्लॉग जगत के अनगिन योगियों को जो रस परा, पश्यंती, मध्यमा की भूलभुलैया पार कर वैखरी पर अधिकार कर लेने में आता है न, मुझे उससे कहीं अधिक रस इन रचनाओं को पढ़कर मौन की ध्यानस्थ गुफाओं में पहुँचने पर आता है |
बुरा न मानिएगा, रचना-कर्म पर कुछ नहीं कहता, यूं ही बकता हूँ इसलिए ! साहस आया और प्रवृत्ति भी तो किशोर चौधरी की जितनी कहानियाँ छाप कर राखी हैं न अपनी मेज में, सब पर कुछ लिखना चाहूँगा।
मेरे कई दिनों के मौन के लिए, यह कुछ बातें | आभार ।
कहानी का तो खैर कहना ही क्या?
:).. just to mark dat i read it :)
अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से 1 ब्लॉग सबका
"वास्तव में प्रेम कुछ नहीं होता, सबसे अच्छा होता है तुम्हारे पास सट कर बैठना." -------- :|
वाह जी वाह, बडी मेहनत की इस लेख में,
badhiyaa...
I would like to say thanks for the efforts you have made compiling this article. You have been an inspiration for me. I’ve forwarded this to a friend of mine.
From everything is canvas
आपका पोस्ट मन को प्रभावित करने में सार्थक रहा । बहुत अच्छी प्रस्तुति । मेर नए पोस्ट 'खुशवंत सिंह' पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं । धन्यवाद ।
bahut sundar
Behtarin post.
Hi
sir thank you so much for your story...
Nice, heart touching story
Good morning sir
ab agli story kab padne ko milegi..
Hi
sir thank you so much for your story...
Nice, heart touching story
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