तुम्हें मेरी आँखों में क्या दीखता है ...
कुछ खोजती हुई सी आँखों से उसने अनिमेष को देखा. पुराने दिनों की याद हो आई, धुंधली और संक्षिप्त यादें. जिनमें रेत के उड़ते हुए बगुले थे, धूप में साए थे मगर बहुत छोटे, नौजवान लड़के थे अपनी बाईक पर गरम हवा को पछाड़ते, दोस्ती को ज़िन्दा रखने के लिए स्कूल की लड़कियों को फोलो करते हुए, वे लड़के गोरे बने रहना चाहते थे मगर धूप उनका रंग गहरा कर दिया करती थी. वे अपनी खुशबू को बचाए रखना चाहते थे मगर पसीना सर से पाँव तक उनको भिगो दिया करता, वे पसीने से डरते न थे उसे छोड़ देते थे धूप और हवा के हवाले, सूख रहे बबूल के पेड़ों तले छाँव न थी फिर भी वहां किसी आस में जानवर बैठते थे और लड़के गलियों में खो जाने वाली लड़कियों की एक झलक देखने के लिए उन के बीच अपने लिए जगह बना लिया करते थे. वे आवारा किस्म के लड़के जब इतना कष्ट उठाते हुए कई दिनों तक पाए जाते तो लड़कियों का दिल पसीज ही जाया करता था, वे उनको इग्नोर करती हुई अपने-अपने घरों में घुस जाती मगर शाम तक उनकी भीगी हुई तस्वीर नम हवा के झोंकों सी उनके आस-पास मंडराया करती. वे लड़कियां जिसे पसंद करती थी उसी की सबसे ज्यादा मजाक बनाया करती थी, बस उन दिनों मुहब्बत के आगाज़ का यही सलीका था सबके पास. वे दोस्ती के दिन अल्पसंख्यक थे, उनकी उम्र छोटी मगर अंजाम बहुत बड़े थे. छत पर टहलती दोस्ती जल्द ही गलियों में पहुँच कर मुहब्बत में बदल जाया करती थी. उस नए रिश्ते की पाकीजा गंध किताबों और कपड़ों में समा जाया करती, दीवारों पर हाथ रखो तो लगता था कि उसी दोस्त के बदन को छू लिया है. दीवार से सटते हुए डर लगता था और रहा भी नहीं जाता था. कमरे की एक खिड़की से मन की कई खिड़कियाँ खुलती थी. एक झलक दिखने के वक़्त दिल की बेताब धड़कनें कुछ इस तरह हो जाती कि याद ही नहीं रहता उसे देखा या नहीं.
चैन और सुकून छीन लेने वाले उन्हीं कमसिन दिनों ने स्मिता के तकियों पर कई इबारतें आंसुओं से लिखी थी, वे आंसू बेआवाज़ बहते थे, उन आंसुओं को किसी कि गरज न थी. उन्हीं आंसुओं से उठता था एक हौसला जो दुनिया से लड़ने की जिद किया करता और कभी सब कुछ मिटा देना चाहता था. जिसे चार दिन की मुहब्बत कहते हैं उसकी कहानी सिर्फ इतनी है कि पुनीत की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा जाहिर ख्वाब था उससे दोस्ती करना तो वह एक दिन अपने बड़े भाई से कार मांग कर लाया और रास्ते में बड़े ही इम्प्रेसिव अंदाज में, अपने दोस्त की फ्रेंड को बिचोलिया बना कर, स्मिता को रुकवाया और कहा, प्लीज एक बार मेरी बात सुन लो. पांच शब्दों में उसने प्रपोज किया, सिर्फ दोस्ती और कुछ नहीं. अगली मुलाक़ात सिर्फ शेक हेंड और कुछ नहीं, तीसरी बार डोंट सिट अवे और दो सप्ताह बाद उसने कहा धूप में साईकिल चला कर कॉलेज मत जाओ... क्यों ? तुम्हारा चेहरा जल जाता है. जबकि पहले हमेशा यही चाहता था कि ऑटो में मत जाओ, साईकिल पर जाया करो... क्यों ? मैं भी बाईक पर कुछ दूर साथ चलूँगा. उन दिनों को ढलने की तहजीब नहीं रही, समय अपनी चाल भूल चुका था, कभी वह तेज कदम होता तो कभी बाहर सूरज भी थक कर आसमान में टंग जाया करता. घर के आँगन के बीच टूटी हुई सीमेंट में पड़ी रेत को वह किसी तिनके से कुरेदती और उछालती जाती फिर उसी को अपनी कोमल अँगुलियों से एकत्र कर उसी जगह भर दिया करती. तिपाई पर रखी पानी की मटकी से टपकती बूंदों से उसे जलतरंग के बजने का आभास हुआ करता था. उसके भीतर भी कई प्याले रखे थे, वे सिर्फ तभी बजते थे जब वह फर्श पर लेट जाती बिना किसी बिछावन के. अपने हाथों को फैला देती आँगन के बराबर जैसे अभी आसमान से टपकेगा पुनीत और उसकी बाँहों में समा जायेगा.
एक स्कूल मास्टर की बेटी के लिए आसमान से टपकने वाली चीजों के लिए मनाही होती है. वे चीजें सिर्फ रूमानी कहानियों का पोषण कर सकती हैं इसलिए पिता रोज उस छत को मजबूत करवाते और स्मिता उस नामुराद छत को कोसा करती लेकिन कुछ ख़त, गुलदस्ते, कलाई की घडियां, गले के लोकेट और पैन जैसे उपहार उसके घर तक आना चाहते थे पर वह मना कर आती, बिना देखे लौटा देती. पुनीत हर बार बेहतर उपहार लाने के प्रयास करता और हर बार स्मिता ऐसी मुलाकातों पर देर तक रोती रहती. वह रूठ जाता, अपने आप को कोसता, मुहब्बत कि दुहाई देता और अपने हारे हुए दिल के आगे निरुपाय होने से तमाशा न बनाने की कहता हुआ चला जाया करता बिना मुड़ कर देखे और अगले दिन उसी दुकान के बाहर इंतजार कर रहा होता जहाँ पहली बार दोनों ने एक दूसरे को देखा था. मोम की बिसात क्या होती है और उसका मुकद्दर क्या होता है , रात को किसी के लिए जलना है और धूप में पिघल जाना है. स्मिता ने एक दिन उससे कहा मैं तुमसे बहुत बातें करना चाहती हूँ, कहीं मिलोगे? वे एक रिसोर्ट में मिले दोस्त की बर्थडे पार्टी के बहाने, दिन की धूप से पेड़ों के चमकते पत्तों के नीचे आकाश के विस्तार जितने व्यापक सपने थे. उन्होंने पेड़ कि टहनियों को हिलाया, फूलों की प्रशंसा की, दूब पर नंगे पाँव चल कर देखा. पेड़ की डाल पकड़ने को स्मिता ने दो बार छलाँग लगाई पर वह दूर थी, पुनीत ने उसे अपनी बाँहों से सहारा देकर ऊपर कर दिया. वह न पेड़ की हुई न जमीन की रही क्षण असहज होते गए स्मिता कांपती गयी. बेहद दर्द भरे अनुरोध पुनीत के कानों ने नहीं सुने, प्लीज, लीव मी नाऊ... का पिच इतना ऊँचा था कि सब दोस्त चौंक गए, देर बाद हालात संभले तो स्मिता ने खुद पुनीत को अपनी गोद में सुला लिया. तुम समझते हो कि मैं क्या फील करती हूँ तुम्हारे लिए, क्या मेरी ख़ुशी उन बाज़ार से खरीदी गयी चीजों से है जो तुम मेरे लिए लाते हो, न जाने क्यों पर मैं तुमसे इतना प्यार करती हूं कि तुम मुझमे हर कहीं समाये हो. तुम्हें मेरे लिए क्या करना चाहिए ये मैं समझाना चाहती हूँ पर नहीं... मैं चाहती हूँ तुम भी अपने भीतर मुझे फील करो पर नहीं... तुम कर नहीं सकते, चंद आंसू थे जो छलक गए.
बवंडर में पुनीत और स्मिता बिछड़ गए उनके माथे पर मुहब्बत के नाजुक कदमों से उडी धूल अभी भी चिपकी हुई थी चोटिल मन पर कई चोटों के निशाँ थे. परिवारों के बीच संभव युद्ध और सामाजिक प्रतिष्ठा का खेला पूर्ण हो चुका था. स्मिता के कमरे में अब कोई ख़ुशी न थी जो खिड़कियों के रास्ते आती कोई गम भी न थे जो छत से टपकते, उसने सब सहा और बी ए में टॉप रेंक हासिल की थी. ऐसा सिर्फ कहानियों में होता है कि मुहब्बत जैसे लफडे में पड़ के कोई टॉप आ जाये पर उसने कर दिखाया था. माँ मान गयी थी, पिता फिर से उदार हो चले थे और वह अपने क़स्बे से नए शहर में चली आई. यहीं पर मिला था उसे अनिमेष जो हर बात पर पूछा करता तुम इतनी उदास क्यों हो ? वह चुप रहती और फिर हंस के कहती मुझे कई सवाल परेशां करते हैं इसलिए. अनिमेष के एक हाथ में आईसक्रीम हुआ करती और दूसरे हाथ में जवाब कि हमसे पूछो सवाल, हम एनसाईक्लोपीडिया है स्वीट गर्ल... दोनों हंसते हुए विदा होते तब भी उनके हाथ में आईसक्रीम होती और उसी सवाल का वही उत्तर का वही उत्तर होता. स्मिता होस्टल में रहती थी अनिमेष का घर उसी शहर में था. दो तीन सप्ताह में एक आध बार उनका मिलना घर पे भी होता क्योंकि अनिमेष हर बार कहता था तुम मेरे घर को पराया समझती हो और मेरी माँ को भी, इसलिए नहीं आना चाहती हो. एक दिन अनिमेष ने जिद करके पूछा कि बताओ क्या सवाल है? स्मिता ने कहा बहुत सारे हैं जिनका जवाब तुम नहीं दे पाओगे.
"अरे पूछ के तो देखो." अनिमेष ने कहा.
स्मिता ने थोड़ा सा मुस्काते हुए पूछा " हमें दुःख क्यों होता है ?"
"दुःख, अपेक्षाओं के कारण होता है, बालिके..." अनिमेष के इस उत्तर के साथ दोनों हंस पड़े. ये प्रश्न पुल बनते गए, वे दोनों निकट होते गए.
दूर से किसी कोठी सा दिखने वाला अनिमेष का घर भीतर से बेहद निर्जीव था. पिता राज्य सेवा के अधिकारी थे तो पोस्टिंग बाहर ही रहती बहन प्राईवेट बैंक में अधिकारी थी और घर पर कम ही दीखती थी. ममा के पास कई सामाजिक काम थे, उनका अपना सर्कल था जो उनका समय खा जाया करता था. घर में सिर्फ हाय हलो हुआ करती थी, साल में कुछ ही मौकों पर सब एक साथ बैठते थे जैसे जन्म दिन या त्यौहार. ऐसे अवसरों पर भी सब को उनकी मित्र मंडली घेरे रहती. स्मिता ने कई बार महसूस किया था कि सामाजिक स्तर में अनिमेष का परिवार जितना ऊपर था रिश्तों के मामले में उतना ही निचले पायदान पर था. पुनीत से संबंधों के हाहाकार के दिनों में उसने हमेशा पाया कि ममा ने एक पल भी उसे अपने से दूर नहीं होने दिया, ममा जितना डांटती थी उससे दुगना सीने से लगाया करती थी, स्मिता के एक आंसू के बदले ममा के दो गिरा करते थे. उन्ही स्मृतियों में अनिमेष के अकेलेपन ने स्मिता के मन में सहानुभूति का पोषण किया था. घर के एकांत में नजदीकियों के बीच आखिर वह सवाल भी जुबान पर आ ही गया. स्मिता ने पूछा "क्या सच में सब प्यार करते हैं और सबका अंजाम वही होता है ?" वह उदास थी और थकी हुई भी. कोई तीन बरस पुराने ज़ख्म को उसने खुद उधेड़ दिया. अनिमेष कृत्रिम रिश्तों में पला था और मानवीय भावनाओं के अकाल का सामना होश संभालने के बाद से करता आ रहा था. उसे पहली बार कोई अपना लगा. भावावेश में अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया. उसे अपने मन में स्मिता के प्रति मीठी और मादक अनुभूति हुई. धीरे धीरे वह उसके हाथ को थपथपाने लगा. उसने पाया कि दोनों के हाथों में कितना फर्क है उसका हाथ पतला और लम्बी अँगुलियों वाला जबकि स्मिता का मांसल और छोटा ठीक बच्चों के तकिये सा आभास देता हुआ. स्मिता उसे पुनीत का किस्सा सुनाती रही और उसे पुनीत समझ कर सवाल पूछती रही. अनिमेष ने झुक कर हाथ को चूम लिया. उसने कब उसको क्या कहा था, ये लाख कोशिशों के बाद भी कभी याद नहीं रखा जा सका. वे शब्द सिर्फ उसी समय सुनाई दिए, आलिंगन के प्रगाढ़ बंधन में दुनिया के बारे में सोचने कि समय नहीं होता था.
ये कृत्य विचित्र और उद्विग्न करने वाले समय में यथार्थ और कल्पना का ऐसा संगम था कि कुछ भी अलग कर पाना संभव नहीं था. ये स्वयं के प्रति घृणा और तिरस्कार का वक़्त था. भयंकर थकान और मनोवेगों की उथल-पुथल के कारण आखिरकार वह सो गयी. उसके बेचैन मस्तिष्क ने नींद में कई दृश्य बुने, वह खुद को कभी नन्ही बच्ची की तरह आँगन में मिट्टी का घर बनाते हुए देखती, कभी उसे लगता कि वह दौड़ी जा रही है एक अनन्त की ओर. करवटें बदलते हुए उसने पाया कि वह एक बावड़ी पर आ गयी है जिसमे हज़ार सीढियां उतरती है बेहद खूबसूरत, नक्काशीदार, पानी के पुराने निशानों से सजी हुई. सांझ का सूरज डूबने को है. उसकी सिंदूरी आभा में एक लड़का अपने दोनों हाथ फैलाए उसे बुला रहा है. वह चार सीढीयाँ चढ़ने के लिए अपने पाँव बढाती है, हर बार सीढी से पाँव फिसल जाता है. वह चौंक के उचक जाती है. अनिमेष उसे अपनी बाँहों का सहारा फिर से देता है. आधी नींद में रुलाई फूट पड़ती है, वह जी भर के रोना चाहती है पर अनिमेष का सहारा नहीं चाहती. भावनाओं से भरे आलोड़ित कर देने वाले क्षणों में अतीत के पन्ने मुरझा गए थे, सारे दुःख अब एक दम नए थे तरो ताजा मुस्कुराते हुए. स्मिता लेटी हुई छत की ओर देखती हुई अपनी बात कह रही थी. अनिमेष अधलेटा सुनता था, एक नाकाम मुहब्बत के इंतजार भरे दिनों के किस्से. स्मिता को आराम मिलता, अनिमेष को वे नश्तर जैसे नुकीले और पाषाणों जैसे सख्त लगते किन्तु फिर भी थाम लेने वाले लगते.
उस घटना के बाद वे दोनों मिलते थे पर सवाल जवाब नहीं होते. स्मिता सीधे किस्से सुनाया करती और उनसे उपजे प्रश्नों को पूछा करती. अनिमेष उसे प्यार से हग करता और घृणा, स्वार्थ और धोखों से भरी दुनिया के जवाब दिया करता.स्नातकोत्तर की उपाधि इन्हीं सवाल जवाब के दिनों के साथ पूरी हो गयी. अनिमेष को दूसरे शहर जाना था जाब के लिए. स्मिता ने पुनीत का एक और किस्सा सुनाया और सवाल पूछा "अनिमेष, जब मैं पुनीत के बारे में कुछ कहती हूँ तब तुम्हें मेरी आँखों में कौन दीखता है ?" क्षणिक अन्तराल से अनिमेष ने कहा "तुम्हारी आँखों में तो मैं खुद को ही देखता हूँ..." पर जवाब अधूरा था और वह चला गया. इस नए एकांत में स्मिता ने खुद को टूटता हुआ पाया तो उसने नया और पथरीला रास्ता चुना. सब अपनों को पीछे छोड़ देने का, बोझा उतार देने का, संबंधों का भार ख़त्म कर देने का, परिचित गलियों को अलविदा कहने का किन्तु कुछ फिर भी बचा रहा गया. वही आज सामने खडा था अनिमेष. बस का सफ़र कर के फोन पर रास्ता पूछते हुए हवेलियों की नगरी तक आया, पसीने से भरा एम ऍन सी का एक्जिक्यूटिव. बहुत खुश.. उसने कॉलेज की विद्वान प्रोफेसर के कमरे में अपना छोटा सा बैग रखा और पूछ कर हाथ मुंह धोने बाथ रूम में चला गया. बाहर आया तो चाय तैयार थी. खिड़की से दूर हवेलियाँ दिखाई देती थी, लाल रंग से पुती दीवारों में निकली खिड़कियों के छज्जों पर कबूतरों के बसरे थे. भूरे रंग की छतों पर सन्नाटा पसरा हुआ था. स्मिता ने बाहर झांकते हुए कहा "आसमान में उड़ना कितना सुखद है वहां कोई बेरियर नहीं होते." अनिमेष मुस्कुराया और उसकी तरह दूर आसमान की कोर को देखता हुआ बोला. "आसमान सिर्फ दिखने में ही साफ़ है, ये एक ऐसा श्वेत बीहड़ है जिसमे हज़ार अंदेशे घात लगाये बैठे होते हैं, कभी नन्हीं जान कबूतर से पूछना कि ऊंचा उड़ने के सबब क्या हैं?." बड़ा ही बेहूदा उत्तर था, स्मिता ने कहा चाय पी लो. अनिमेष की दृष्टि अन्दर लौट आई, कमरे की गंध से परिचय का भाव गायब था. सिर्फ दिवार पर लगे एक ग्रीटिंग कार्ड के सिवा. कोने में आडियो प्लेयर के पास एक एल्बम रखा था, उसकी सांसों में बसने वाला फ़रहत शहजाद की ग़ज़लों और नज्मों का, मेहदी हसन का गाया हुआ. जयपुर की सड़कों पर ख़ाक छानने के बाद उसे ये आडियो कंपनी के शो रूम में मिला था. अनिमेष उसे हर रात सुना करता था फिर एक दिन स्मिता उसे ले गयी थी. उसी आडियो के पीछे टेबल पर रखी थी स्मिता की सुंदर सी तस्वीर, चहरे का साईड पोज...
ये ?
राज ने खींचा..
कौन राज ?
वो जो मेरे साथ था डिपार्टमेंट में...हमारे टूर के दौरान... है न अच्छा ?
अनिमेष के बदन पर जैसे मकडियां रेंग गयी हो.
पल भर की खामोशी के बाद स्मिता ने उस फोटो के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और अपनी ही हथेली में रख कर आग लगा दी.
चैन और सुकून छीन लेने वाले उन्हीं कमसिन दिनों ने स्मिता के तकियों पर कई इबारतें आंसुओं से लिखी थी, वे आंसू बेआवाज़ बहते थे, उन आंसुओं को किसी कि गरज न थी. उन्हीं आंसुओं से उठता था एक हौसला जो दुनिया से लड़ने की जिद किया करता और कभी सब कुछ मिटा देना चाहता था. जिसे चार दिन की मुहब्बत कहते हैं उसकी कहानी सिर्फ इतनी है कि पुनीत की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा जाहिर ख्वाब था उससे दोस्ती करना तो वह एक दिन अपने बड़े भाई से कार मांग कर लाया और रास्ते में बड़े ही इम्प्रेसिव अंदाज में, अपने दोस्त की फ्रेंड को बिचोलिया बना कर, स्मिता को रुकवाया और कहा, प्लीज एक बार मेरी बात सुन लो. पांच शब्दों में उसने प्रपोज किया, सिर्फ दोस्ती और कुछ नहीं. अगली मुलाक़ात सिर्फ शेक हेंड और कुछ नहीं, तीसरी बार डोंट सिट अवे और दो सप्ताह बाद उसने कहा धूप में साईकिल चला कर कॉलेज मत जाओ... क्यों ? तुम्हारा चेहरा जल जाता है. जबकि पहले हमेशा यही चाहता था कि ऑटो में मत जाओ, साईकिल पर जाया करो... क्यों ? मैं भी बाईक पर कुछ दूर साथ चलूँगा. उन दिनों को ढलने की तहजीब नहीं रही, समय अपनी चाल भूल चुका था, कभी वह तेज कदम होता तो कभी बाहर सूरज भी थक कर आसमान में टंग जाया करता. घर के आँगन के बीच टूटी हुई सीमेंट में पड़ी रेत को वह किसी तिनके से कुरेदती और उछालती जाती फिर उसी को अपनी कोमल अँगुलियों से एकत्र कर उसी जगह भर दिया करती. तिपाई पर रखी पानी की मटकी से टपकती बूंदों से उसे जलतरंग के बजने का आभास हुआ करता था. उसके भीतर भी कई प्याले रखे थे, वे सिर्फ तभी बजते थे जब वह फर्श पर लेट जाती बिना किसी बिछावन के. अपने हाथों को फैला देती आँगन के बराबर जैसे अभी आसमान से टपकेगा पुनीत और उसकी बाँहों में समा जायेगा.
एक स्कूल मास्टर की बेटी के लिए आसमान से टपकने वाली चीजों के लिए मनाही होती है. वे चीजें सिर्फ रूमानी कहानियों का पोषण कर सकती हैं इसलिए पिता रोज उस छत को मजबूत करवाते और स्मिता उस नामुराद छत को कोसा करती लेकिन कुछ ख़त, गुलदस्ते, कलाई की घडियां, गले के लोकेट और पैन जैसे उपहार उसके घर तक आना चाहते थे पर वह मना कर आती, बिना देखे लौटा देती. पुनीत हर बार बेहतर उपहार लाने के प्रयास करता और हर बार स्मिता ऐसी मुलाकातों पर देर तक रोती रहती. वह रूठ जाता, अपने आप को कोसता, मुहब्बत कि दुहाई देता और अपने हारे हुए दिल के आगे निरुपाय होने से तमाशा न बनाने की कहता हुआ चला जाया करता बिना मुड़ कर देखे और अगले दिन उसी दुकान के बाहर इंतजार कर रहा होता जहाँ पहली बार दोनों ने एक दूसरे को देखा था. मोम की बिसात क्या होती है और उसका मुकद्दर क्या होता है , रात को किसी के लिए जलना है और धूप में पिघल जाना है. स्मिता ने एक दिन उससे कहा मैं तुमसे बहुत बातें करना चाहती हूँ, कहीं मिलोगे? वे एक रिसोर्ट में मिले दोस्त की बर्थडे पार्टी के बहाने, दिन की धूप से पेड़ों के चमकते पत्तों के नीचे आकाश के विस्तार जितने व्यापक सपने थे. उन्होंने पेड़ कि टहनियों को हिलाया, फूलों की प्रशंसा की, दूब पर नंगे पाँव चल कर देखा. पेड़ की डाल पकड़ने को स्मिता ने दो बार छलाँग लगाई पर वह दूर थी, पुनीत ने उसे अपनी बाँहों से सहारा देकर ऊपर कर दिया. वह न पेड़ की हुई न जमीन की रही क्षण असहज होते गए स्मिता कांपती गयी. बेहद दर्द भरे अनुरोध पुनीत के कानों ने नहीं सुने, प्लीज, लीव मी नाऊ... का पिच इतना ऊँचा था कि सब दोस्त चौंक गए, देर बाद हालात संभले तो स्मिता ने खुद पुनीत को अपनी गोद में सुला लिया. तुम समझते हो कि मैं क्या फील करती हूँ तुम्हारे लिए, क्या मेरी ख़ुशी उन बाज़ार से खरीदी गयी चीजों से है जो तुम मेरे लिए लाते हो, न जाने क्यों पर मैं तुमसे इतना प्यार करती हूं कि तुम मुझमे हर कहीं समाये हो. तुम्हें मेरे लिए क्या करना चाहिए ये मैं समझाना चाहती हूँ पर नहीं... मैं चाहती हूँ तुम भी अपने भीतर मुझे फील करो पर नहीं... तुम कर नहीं सकते, चंद आंसू थे जो छलक गए.
बवंडर में पुनीत और स्मिता बिछड़ गए उनके माथे पर मुहब्बत के नाजुक कदमों से उडी धूल अभी भी चिपकी हुई थी चोटिल मन पर कई चोटों के निशाँ थे. परिवारों के बीच संभव युद्ध और सामाजिक प्रतिष्ठा का खेला पूर्ण हो चुका था. स्मिता के कमरे में अब कोई ख़ुशी न थी जो खिड़कियों के रास्ते आती कोई गम भी न थे जो छत से टपकते, उसने सब सहा और बी ए में टॉप रेंक हासिल की थी. ऐसा सिर्फ कहानियों में होता है कि मुहब्बत जैसे लफडे में पड़ के कोई टॉप आ जाये पर उसने कर दिखाया था. माँ मान गयी थी, पिता फिर से उदार हो चले थे और वह अपने क़स्बे से नए शहर में चली आई. यहीं पर मिला था उसे अनिमेष जो हर बात पर पूछा करता तुम इतनी उदास क्यों हो ? वह चुप रहती और फिर हंस के कहती मुझे कई सवाल परेशां करते हैं इसलिए. अनिमेष के एक हाथ में आईसक्रीम हुआ करती और दूसरे हाथ में जवाब कि हमसे पूछो सवाल, हम एनसाईक्लोपीडिया है स्वीट गर्ल... दोनों हंसते हुए विदा होते तब भी उनके हाथ में आईसक्रीम होती और उसी सवाल का वही उत्तर का वही उत्तर होता. स्मिता होस्टल में रहती थी अनिमेष का घर उसी शहर में था. दो तीन सप्ताह में एक आध बार उनका मिलना घर पे भी होता क्योंकि अनिमेष हर बार कहता था तुम मेरे घर को पराया समझती हो और मेरी माँ को भी, इसलिए नहीं आना चाहती हो. एक दिन अनिमेष ने जिद करके पूछा कि बताओ क्या सवाल है? स्मिता ने कहा बहुत सारे हैं जिनका जवाब तुम नहीं दे पाओगे.
"अरे पूछ के तो देखो." अनिमेष ने कहा.
स्मिता ने थोड़ा सा मुस्काते हुए पूछा " हमें दुःख क्यों होता है ?"
"दुःख, अपेक्षाओं के कारण होता है, बालिके..." अनिमेष के इस उत्तर के साथ दोनों हंस पड़े. ये प्रश्न पुल बनते गए, वे दोनों निकट होते गए.
दूर से किसी कोठी सा दिखने वाला अनिमेष का घर भीतर से बेहद निर्जीव था. पिता राज्य सेवा के अधिकारी थे तो पोस्टिंग बाहर ही रहती बहन प्राईवेट बैंक में अधिकारी थी और घर पर कम ही दीखती थी. ममा के पास कई सामाजिक काम थे, उनका अपना सर्कल था जो उनका समय खा जाया करता था. घर में सिर्फ हाय हलो हुआ करती थी, साल में कुछ ही मौकों पर सब एक साथ बैठते थे जैसे जन्म दिन या त्यौहार. ऐसे अवसरों पर भी सब को उनकी मित्र मंडली घेरे रहती. स्मिता ने कई बार महसूस किया था कि सामाजिक स्तर में अनिमेष का परिवार जितना ऊपर था रिश्तों के मामले में उतना ही निचले पायदान पर था. पुनीत से संबंधों के हाहाकार के दिनों में उसने हमेशा पाया कि ममा ने एक पल भी उसे अपने से दूर नहीं होने दिया, ममा जितना डांटती थी उससे दुगना सीने से लगाया करती थी, स्मिता के एक आंसू के बदले ममा के दो गिरा करते थे. उन्ही स्मृतियों में अनिमेष के अकेलेपन ने स्मिता के मन में सहानुभूति का पोषण किया था. घर के एकांत में नजदीकियों के बीच आखिर वह सवाल भी जुबान पर आ ही गया. स्मिता ने पूछा "क्या सच में सब प्यार करते हैं और सबका अंजाम वही होता है ?" वह उदास थी और थकी हुई भी. कोई तीन बरस पुराने ज़ख्म को उसने खुद उधेड़ दिया. अनिमेष कृत्रिम रिश्तों में पला था और मानवीय भावनाओं के अकाल का सामना होश संभालने के बाद से करता आ रहा था. उसे पहली बार कोई अपना लगा. भावावेश में अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया. उसे अपने मन में स्मिता के प्रति मीठी और मादक अनुभूति हुई. धीरे धीरे वह उसके हाथ को थपथपाने लगा. उसने पाया कि दोनों के हाथों में कितना फर्क है उसका हाथ पतला और लम्बी अँगुलियों वाला जबकि स्मिता का मांसल और छोटा ठीक बच्चों के तकिये सा आभास देता हुआ. स्मिता उसे पुनीत का किस्सा सुनाती रही और उसे पुनीत समझ कर सवाल पूछती रही. अनिमेष ने झुक कर हाथ को चूम लिया. उसने कब उसको क्या कहा था, ये लाख कोशिशों के बाद भी कभी याद नहीं रखा जा सका. वे शब्द सिर्फ उसी समय सुनाई दिए, आलिंगन के प्रगाढ़ बंधन में दुनिया के बारे में सोचने कि समय नहीं होता था.
ये कृत्य विचित्र और उद्विग्न करने वाले समय में यथार्थ और कल्पना का ऐसा संगम था कि कुछ भी अलग कर पाना संभव नहीं था. ये स्वयं के प्रति घृणा और तिरस्कार का वक़्त था. भयंकर थकान और मनोवेगों की उथल-पुथल के कारण आखिरकार वह सो गयी. उसके बेचैन मस्तिष्क ने नींद में कई दृश्य बुने, वह खुद को कभी नन्ही बच्ची की तरह आँगन में मिट्टी का घर बनाते हुए देखती, कभी उसे लगता कि वह दौड़ी जा रही है एक अनन्त की ओर. करवटें बदलते हुए उसने पाया कि वह एक बावड़ी पर आ गयी है जिसमे हज़ार सीढियां उतरती है बेहद खूबसूरत, नक्काशीदार, पानी के पुराने निशानों से सजी हुई. सांझ का सूरज डूबने को है. उसकी सिंदूरी आभा में एक लड़का अपने दोनों हाथ फैलाए उसे बुला रहा है. वह चार सीढीयाँ चढ़ने के लिए अपने पाँव बढाती है, हर बार सीढी से पाँव फिसल जाता है. वह चौंक के उचक जाती है. अनिमेष उसे अपनी बाँहों का सहारा फिर से देता है. आधी नींद में रुलाई फूट पड़ती है, वह जी भर के रोना चाहती है पर अनिमेष का सहारा नहीं चाहती. भावनाओं से भरे आलोड़ित कर देने वाले क्षणों में अतीत के पन्ने मुरझा गए थे, सारे दुःख अब एक दम नए थे तरो ताजा मुस्कुराते हुए. स्मिता लेटी हुई छत की ओर देखती हुई अपनी बात कह रही थी. अनिमेष अधलेटा सुनता था, एक नाकाम मुहब्बत के इंतजार भरे दिनों के किस्से. स्मिता को आराम मिलता, अनिमेष को वे नश्तर जैसे नुकीले और पाषाणों जैसे सख्त लगते किन्तु फिर भी थाम लेने वाले लगते.
उस घटना के बाद वे दोनों मिलते थे पर सवाल जवाब नहीं होते. स्मिता सीधे किस्से सुनाया करती और उनसे उपजे प्रश्नों को पूछा करती. अनिमेष उसे प्यार से हग करता और घृणा, स्वार्थ और धोखों से भरी दुनिया के जवाब दिया करता.स्नातकोत्तर की उपाधि इन्हीं सवाल जवाब के दिनों के साथ पूरी हो गयी. अनिमेष को दूसरे शहर जाना था जाब के लिए. स्मिता ने पुनीत का एक और किस्सा सुनाया और सवाल पूछा "अनिमेष, जब मैं पुनीत के बारे में कुछ कहती हूँ तब तुम्हें मेरी आँखों में कौन दीखता है ?" क्षणिक अन्तराल से अनिमेष ने कहा "तुम्हारी आँखों में तो मैं खुद को ही देखता हूँ..." पर जवाब अधूरा था और वह चला गया. इस नए एकांत में स्मिता ने खुद को टूटता हुआ पाया तो उसने नया और पथरीला रास्ता चुना. सब अपनों को पीछे छोड़ देने का, बोझा उतार देने का, संबंधों का भार ख़त्म कर देने का, परिचित गलियों को अलविदा कहने का किन्तु कुछ फिर भी बचा रहा गया. वही आज सामने खडा था अनिमेष. बस का सफ़र कर के फोन पर रास्ता पूछते हुए हवेलियों की नगरी तक आया, पसीने से भरा एम ऍन सी का एक्जिक्यूटिव. बहुत खुश.. उसने कॉलेज की विद्वान प्रोफेसर के कमरे में अपना छोटा सा बैग रखा और पूछ कर हाथ मुंह धोने बाथ रूम में चला गया. बाहर आया तो चाय तैयार थी. खिड़की से दूर हवेलियाँ दिखाई देती थी, लाल रंग से पुती दीवारों में निकली खिड़कियों के छज्जों पर कबूतरों के बसरे थे. भूरे रंग की छतों पर सन्नाटा पसरा हुआ था. स्मिता ने बाहर झांकते हुए कहा "आसमान में उड़ना कितना सुखद है वहां कोई बेरियर नहीं होते." अनिमेष मुस्कुराया और उसकी तरह दूर आसमान की कोर को देखता हुआ बोला. "आसमान सिर्फ दिखने में ही साफ़ है, ये एक ऐसा श्वेत बीहड़ है जिसमे हज़ार अंदेशे घात लगाये बैठे होते हैं, कभी नन्हीं जान कबूतर से पूछना कि ऊंचा उड़ने के सबब क्या हैं?." बड़ा ही बेहूदा उत्तर था, स्मिता ने कहा चाय पी लो. अनिमेष की दृष्टि अन्दर लौट आई, कमरे की गंध से परिचय का भाव गायब था. सिर्फ दिवार पर लगे एक ग्रीटिंग कार्ड के सिवा. कोने में आडियो प्लेयर के पास एक एल्बम रखा था, उसकी सांसों में बसने वाला फ़रहत शहजाद की ग़ज़लों और नज्मों का, मेहदी हसन का गाया हुआ. जयपुर की सड़कों पर ख़ाक छानने के बाद उसे ये आडियो कंपनी के शो रूम में मिला था. अनिमेष उसे हर रात सुना करता था फिर एक दिन स्मिता उसे ले गयी थी. उसी आडियो के पीछे टेबल पर रखी थी स्मिता की सुंदर सी तस्वीर, चहरे का साईड पोज...
ये ?
राज ने खींचा..
कौन राज ?
वो जो मेरे साथ था डिपार्टमेंट में...हमारे टूर के दौरान... है न अच्छा ?
अनिमेष के बदन पर जैसे मकडियां रेंग गयी हो.
पल भर की खामोशी के बाद स्मिता ने उस फोटो के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और अपनी ही हथेली में रख कर आग लगा दी.


