Wednesday, August 24, 2016

उस मौसम के दिन

रेगिस्तान के इस छोर पर कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही है. ऐसे बारिश के मौसम पर लिखी अपनी एक कहानी याद आई है- उस मौसम के दिन. सोचा आपसे बाँट लूँ. ये कहानी हिन्द युग्म से प्रकाशित कहानी संग्रह "जादू भरी लड़की" में संकलित है. 

* * *

वो ऑयल हाई कंपनी में काम कर रही थी. यहीं त्यागी से उसका मिलना हुआ था. जब वह यहाँ आई थी तब ऑफिस की बिल्डिंग और अधिकारियों के फ्लेट्स नए बने थे. दीवारों की पुताई की गंध भी न गयी थी. नए फ्लेट्स में जो भी आया कोरा था. अनछुआ.

यहाँ आने से पहले माँ ने जब प्रगति की पोस्टिंग का आर्डर देखा तो आँखें भर ली. वह आहिस्ता से चलकर बिस्तर तक आई. प्रगति अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी. माँ पास आकर खड़ी हुई जैसे कुछ अनचाहा घट गया हो.- “अब तू जायेगी तो गई फ़िर गयी एक साल की. जैसे पहले पढाई ज़रूरी थी और वेकेशन कम थे, उसी तरह अब नौकरी है तो न आने का पक्का बंधन भी हो गया.”

प्रगति ने माँ के हाथ से लिफाफा लिया.- “क्या है माँ?” लिफाफा खोलती हुई कहती है- “सबको तो सब मालूम है. ये एक औपचारिक पत्र भर है. और ये ड्रामा... मुझे मालूम है मेरी माँ को खूब प्यार है. वह चाहे तो सहेज कर अपनी कमर पर टांग ले. क्या करोगी घर बिठाकर?”

माँ कुछ अचरज से मुंह बनाती है- “अरे कौन रोक रहा है. बस जी भर आया... कल तू चली जाएगी.”

“कल नहीं, अभी बीस दिन का जोइनिंग टाइम दिया है” ऐसा कहते हुए प्रगति उठी और माँ के गाल खींच कर बाहर ड्राइंग हाल की तरफ बढ़ गयी.

रिश्तेदार पूछते हैं. सुंदर सी लड़की है. अच्छी भली नौकरी मिल गयी है. फ़िर देरी किस बात की है. आपको नही मिलता तो हम बताते हैं लड़के, एक से बढ़ कर एक. “अब तू जाने से पहले पक्का कर के जा. मैं तेरे झांसे में नही आने वाली या तो इंदौर वाला या फ़िर बंगलोर वाला या कहीं भी वाला फाइनल कर दूंगी.”

प्रगति ने माँ को हाँ बोला- “इस बार पक्का जहाँ तू कहे. मेरी माँ जो बताएगी वही... ओ के न ... अब तो शांत हो जाओ.” ये उसकी परमानेंट स्टाईल थी माँ को मनाने की.

कुछ दिनों में ही दिन बीत गए, प्रगति ने नौकरी ज्वाइन कर ली.

वह अकेली रहने की अभ्यस्त थी मगर यहाँ अकेलापन न था. जाने क्या चीज़ें थीं जिनसे वह घिरी हुई रहती. वह जान ही नहीं पाई कि कब दिन बीता कब रात ढली.

वहां उसके लिए सब लोग नए थे. केतकर और सुनीता तीन साल से इसी कम्पनी में थे और पुराने ऑफिस से ट्रांसफर होकर इस जगह आये थे. एक दोपहर प्रगति केन्टीन में सुनीता और केतकर के साथ बैठी थी. केतकर ने बताया कि त्यागी के पापा की तबियत ठीक नही है. उसने जैसे ही ज्वाइन किया महीने भर बाद छुट्टी पर जाना पड़ा. वह अभी तक अवकाश पर है. वह और प्रगति एक साथ ही ग्रेज्युएट हुए थे. वे हमउम्र थे.

प्रगति को लगा कि त्यागी को फोन करना चाहिए. इस कम्पनी के नए ऑफिस में उसके सबसे करीब वही थी. इसलिए कि वे दोनों नए थे, बाकी सब अलग जगहों से आये थे. यहाँ आने के बाद, कुछ दिनों दफ़्तर में हुई मुलाक़ात के अतिरिक्त उन दोनों में कभी ख़ास बात नही हो पाई थी.

प्रगति ने त्यागी को फोन किया. 

उस एक औपचारिक फोन के बाद कुछ घर के हाल के बहाने और कुछ ऑफिस में क्या चल रहा है, इसके बहाने बातें होती रहीं. वह जब छुट्टी से लौटकर आया तो अचानक करीबी बढ़ गयी. इसके बढ़ जाने की वजह थी. वो बेहद परेशान था. एक बहन है. उसके पति नहीं रहे. दो साल पहले एक दुर्घटना में चल बसे. माँ तो बचपन में ही चली गई थी. पिता ने बच्चों के लिए सब कुछ किया और फ़िर अब वे भी लकवे की चपेट में आ गए थे. वह अपने पिताजी को यहाँ नहीं ला सकता था. ये उसकी सबसे बड़ी तकलीफ थी. लकवा एक ऐसी बीमारी थी, जो संभव नुकसान कर के स्थिर हो गयी थी.

प्रगति ने त्यागी से कहा कि वे रात का खाना खाने के लिये कहीं बाहर चलते हैं. वे दोनों एक साथ गए. उनके एक साथ होने में कोई ऐसा भाव नहीं दिखा कि किसी ने इसे कोई सम्बन्ध बढाने का प्रपोजल समझा हो. वे दोनों इजी थे और अपनी बातों में खोये हुए. उन दोनों के इस जगह साथ होने में कोई खास फर्क दिखा नहीं कि डिनर करना दफ़्तर आने से अलग काम हुआ है.

वे लोग खाना खाने से पहले बैठे हुए बातें कर रहे थे तब त्यागी ने कहा- “प्रगति ये कहना कितना आसान होता है कि माँ-बाप भगवान होते हैं. उनकी सेवा में कोई खुद को खर्च कर दे तो भी कम है. ये कितना कठिन होता है कि कोई ये समझे कि हर किसी का मन होता है. उसी तरह बुजुर्ग लोगों का मन सबसे अधिक अभिलाषी हो जाता है.”

प्रगति उसके चहरे को देख रही थी. वह सीधा आदमी लग रहा था. ऐसा सीधा आदमी जो किसी के लिए कुछ भी करे तो पूरे दिल से करे. 

ये बुजुर्ग सूखते जा रहे गहरी घनी छाँव वाले पेड़ की तरह ठूंठ में ढल रहे होते हैं. उसकी शाखाओं से लोच उड़ जाता है. वे हर दम अकड़े हुए और टूट जाने के भाव से भरे रहते हैं. त्यागी के पिताजी भी बूढ़े हुए थे मगर लकवे ने उनको अपनी नज़र में लाचार मनुष्य ठहरा दिया था. वे अपने अतीत में एक हष्टपुष्ट नौजवान थे. वे इस वक़्त टूटे लाचार बूढ़े थे.

त्यागी ने कहा- “गाँव में हर आदमी यही सोचता है कि जिसका बेटा कमाऊ हुआ वह अपने बाउजी को बेटा साथ ले ही जायेगा. मैं भी यही सोचता हूँ कि अपने साथ ही रखूं. जब मैंने उनसे ये कहा तो बाउजी आधे लकवे वाले मुंह से बोले कम और गुस्सा जाहिर ज्यादा किया. मैं उनके सुख के लिए सोच रहा था. फिर मैंने बहन से कहा तुम यहाँ आकर रह लो बाउजी के पास. वह कहती है भाई ऐसा न हो पायेगा.”

त्यागी को बाद में चाचा लोगों ने समझाया कि कहाँ बंद कमरों में जी पाएंगे भाई. और तुम कितनी सेवा करोगे. तुम अपनी नौकरी करो. जो लड़के नौकरी नहीं करते उनके माँ-बाप चाहते हैं कहीं नौकरी मिल जाये. तुम यहाँ चिंता में घिरे बैठे हो.

वे लोग डिनर करके लौट रहे थे तब भी त्यागी के पास एक ही चिंता और एक ही बात थी. उसने बताया कि उसे इस बात का खूब दुःख है कि पिताजी इस शारीरिक अवस्था में अकेले हैं. वह चाह कर भी उनके पास रुकना चाहे तो ये घर में किसी को मंजूर नहीं. त्यागी ने प्रगति को कहा- एक दोस्त कंधे पर हाथ रखकर कहता है भाई बुझते हुए दीये हैं, दुखी होना मगर अपना बिगाड़ न करना. मैं इस सारे झमेले में किसी भी सवाल का सही उत्तर नहीं पाता हूँ.

प्रगति को लगता था त्यागी सच में इन दुखों के आगे अकेला था. अपनी बहन के सामने सदा मुस्कुराता था. उसने लगभग अपने हर परिचित को खोजा कि बहन का फ़िर से घर बस जाए. जितने भी रिश्ते मिले सब अनुपयुक्त थे. उससे बेहतर था वह अपनी बहन को अकेले ही जीने दे. यही ज़िद त्यागी की बहन की भी थी. ज़िन्दगी एक ही बात बार-बार बोलती. भाग्य को कौन बदल सकता है. त्यागी का दिल एक ही बात बोलता. माँ रहती, जीजा रहते, पिताजी को लकवा न होता, ये सब कोई असम्भव तो था नहीं मगर रहा असम्भव.

उन दोनों की मित्रता के पहले महीने दफ़्तर के नए माहौल, काम के सुख की जल्दबाजी में बीत गए. अचानक एक दिन त्यागी के लिए संदेसा आ गया. उसके पापा गंभीर बीमार थे. सबको लगा कि ज़रूर जा ही चुके होंगे. वह घर चला गया. उसके जाते ही प्रगति को भी घर की याद आई. ये एक साथ क्यों हुआ ये उसे खुद समझ न आया.

प्रगति अपने घर आई.

वहां जाते ही स्थायी प्रश्नों ने घेर लिया. इस बार वह अन्दर से दुखी थी या कहीं जुडी हुई थी कि उसने माँ को साफ़ मना कर दिया. शादी नहीं करनी. माँ ने कहा- “नहीं करनी क्या होता है. समाज में बैठे हैं लोग पूछते हैं. जवाब देना होता है.” प्रगति ने कहा- “जवाब दो कि लड़की शादी नहीं करना चाहती.” प्रगति ऐसा रूखा व्यवहार क्यों कर रही ये माँ को समझ न आया. उसने पूछा- “कोई पसंद आ गया है लड़का? जिसके साथ रहना है, शादी करनी है तो यह भी बता दे.”

“कोई पसंद नहीं और शादी नहीं करनी है” प्रगति ने ऐसा कहने के बाद की चुप्पी में सोचा कि वह क्यों एकाएक इस तरह के सख्त जवाबों पर आ गयी है. क्या सचमुच उसे त्यागी से कोई लगावट है. ऐसा उनके बीच कभी कुछ न हुआ था. जिससे ये समझा जा सके कि वे करीब या प्रेम में हैं.

वह जब तक लौटकर गयी घर में सबसे ज्यादा माँ ने तमाशे किये. जिनके माँ नाम लेती थी, वे कुछ न कहते थे. बस माँ ही कहती थी कि उनका ये कहना है, इनका ये कहना है. वह अपनी ओर से मनाती रही कि कोई फैसला हो जाये. फैसला ये हुआ कि मैं जा रही हूँ और मुझे जब शादी करनी होगी आप दोनों को बता दूंगी.

त्यागी लौटकर आया. ऑफिस में ही एक अनौपचारिक शोक सभा हुई. सबने त्यागी को गले लगाकर ढाढस बंधाया. जब प्रगति ने उसे गले लगाया तब वह रो पड़ा. पिता होते ही ऐसे हैं कि उनकी याद में रो पड़ना कोई बड़ी बात नहीं होती. फिर भावनाएं वहीँ सबसे ज्यादा कमजोर करती हैं जहाँ सबसे अधिक अपनापन हो. प्रगति के कंधे पर त्यागी के दो आंसू थे.

कभी-कभी हम जिसके करीब जी रहे होते हैं, उसके मन तक पहुँच चुके होते हैं. हमारा मिलना कितना है इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता. उन दोनों का मिलना भी कितना करीबी हो चुका था, ये किसी ने सोचा न था. उन दोनों ने भी नहीं. उनके बीच से जो वक़्त गुज़र रहा था वह बीच की दूरी को कम करता जा रहा था. जिस तरह दो आंसू प्रगति के कंधे पर गिरे, वह उनका अचानक गिरना न था.

ऑफिस में त्यागी और प्रगति साथ बने रहे.

शाम को प्रगति ने कहा- “अपने घर में अकेले बैठे क्या करोगे? मेरे पास आ जाओ वहीँ खाना खायेंगे.” त्यागी ने सर हिलाकर हामी भर दी.

वे दोनों शाम के बाद भी एक साथ थे.

हॉटकेस से त्यागी रोटी निकाल कर प्रगति को देता. वे दोनों छोटे टुकड़े तोड़ते हुए खाना खाते रहे. उनके एक साथ खाने में सामंजस्य था. जैसे वे दोनों बरसों से एक ही साथ थे. खाने की छोटी मेज पर कोई औपचारिकता न थी. प्रगति ने एक कटोरी में दही डाला और कहा- “तुम रात को दही खाते हो?” त्यागी ने छोटी कटोरी अपनी ओर खींच ली. जैसे प्रगति पहले से ही जानती थी कि त्यागी को रात में दही खाने से एतराज़ नहीं है. त्यागी ने प्रगति की प्लेट में थोड़ा और साग रख दिया. जैसे वह जानता था कि प्रगति को और चाहिए.

खाना खा चुकने के बाद वे दोनों कुर्सियों की पीठ का सहारा लिए बैठे रहे. जैसे बहुत ज्यादा थके हुए थे और अब आराम आया है. वे एक दूजे के सामने बैठे थे. वे एक दूजे को देख सकते थे. त्यागी की आँखों में ज़रूर दुःख रहा होगा किन्तु उस पर समय की धूल गिर रही थी.

प्रगति उस दुःख को पूरी तरह ढक देना चाहती थी.

वे दोनों उठे. वाशबेसिन तक गए, उन्होंने एक दूजे के पास खड़े हुए बारी बारी से हाथ धोये. वे छोटे रुमाल से हाथ पौंछ चुके थे. एक दूजे के करीब आये. त्यागी ने कहा- “अच्छा मैं जाऊं” वे दोनों एक दूजे को हलके से गले मिले थे. प्रगति ने कहा- “न जाओ” उन दोनों की बाहें एक दूजे को कसती गयी. 

कोई घना दुःख चाहिए था. या चाहिए थी साथ जीने की समझ. त्यागी के पास जो दुःख थे वे छीज चुकते उससे पहले ही प्रगति और त्यागी के जीवन में ये अनूठी रात आ गयी. एक मुकम्मल रात. वे तीन थे. रात थी, प्रगति थी और त्यागी था.


अगली सुबह

पहले की तरह बिना शंका के नहीं वरन चोरों की तरह दोनों बारी-बारी से प्रगति के घर से बाहर निकले. दिन भर दफ़्तर में खोये-खोये बैठे रहे. क्या हमने सही किया. इससे भी बड़ा सवाल था कि जो रिश्ता बिना कोई सवाल जवाब किये सामने आ गया हो उसका आगे क्या किया जाये.

वे लौटकर फिर से प्रगति के घर आये.

प्रगति ने शाम को कहा- “क्या आज तुम यहाँ रुकने की सोच रहे हो”

प्रगति और त्यागी के बीच रखी चाय बेमतलब रखी रह गयी. प्रगति की चुप्पी में ये अफ़सोस रहा होगा कि उसने रात को किस कारण ऐसा होने दिया. लेकिन ऐसा कोई अफ़सोस न था.

त्यागी ने कहा- “मैं अभी आता हूँ.”

प्रगति उसके जाते ही टहलने लगी. वह त्यागी के अभी आने का इंतज़ार करने लगी. उसने खुद से कहा कि क्या वह इसी सबको मान अपमान और जीवन समझती है? उसके पास इसका साफ़ जवाब था कि वह त्यागी को पसंद करती है. उसके साथ जो कुछ भी हुआ वह सोच समझ कर किया गया है. वह ऐसी भोली बच्ची नहीं है कि किसी अन्य पुरुष के साथ एक ही घर में होने का अर्थ न समझे.


त्यागी लौटकर आया. उसके पास रसोई का बहुत सारा सामान था. सामान को रसोई में रखने के बाद त्यागी खाना बनाने का काम शुरू होने के बारे में सोचने लगा. प्रगति ने कहा- “दो मिनट बात कर लेते हैं”

त्यागी ने कहा- “हाँ”

प्रगति रसोई के स्टेंड से सहारा लेकर खड़ी थी. त्यागी दीवार के सहारे से. प्रगति ने सोचा कि कितना अच्छा हो कि इस बातचीत के बाद वे दोनों एक दूजे का सहारा लिए हों.- “मुझे कल रात की कोई बात नहीं करनी. तुमसे ये जानना है कि आज तुम यहाँ क्यों हो?”

“हम रह सकते हैं एक साथ मगर इसके आगे का कुछ सोचा नहीं मैंने.”

प्रगति ने कहा- “ठीक है जब हम दोनों समझ लें तब फिर से साथ होंगे... अगर साथ होने लायक वक़्त बचा तो.”

त्यागी दीवार के पास से स्टेंड की तरफ आया. उसने प्रगति के हाथ की अंगुलियाँ पकड़ी. प्रगति ने अपनी अंगुलियाँ वापस खींच ली. “जहाँ कहने लायक बात न हो वहां आगे न बढ़ो. कल की रात ऐसी क्यों थी इस बात को मैं अपने किन्हीं निजी कारणों के नीचे दबा सकती हूँ. वह कोई भूल न थी. मैंने उसे होने दिया था, मैंने उसका होना चाहा था.”

त्यागी ने कहा- “मैं घर के आखिरी सहारे के जाने से दुःख में था. मुझे माफ़ कर दो.”

“तुमको माफ़ी माँगने की ज़रूरत नहीं है. मेरी सहमती की बात थी. उसके बिना कोई मुझे छू भी नहीं सकता.”

“क्या मुझे चले जाना चाहिए?”

“हाँ अपने आपको किसी रिश्ते में धकेलने की जगह तो चले जाना अच्छा होता है”

उस रात उनका खाना साझा न हुआ. त्यागी चला गया था, प्रगति को भूख न थी.

उसने इस बारे में विचार न किया था कि त्यागी रुकेगा या चला जायेगा. जो कुछ उनके बीच घटित हुआ था, वह प्रायोजित भी न था. समय, परिस्थिति और मन के संयोग से हुआ था. प्रगति किन्हीं सामाजिक रिवाजों को तोड़ने या क्रांति लाने की पक्षधर न थी. वह बस होना था और हो गया.

पिछली रात बेहद छोटी थी. ये रात खूब लम्बी.

सुबह प्रगति ऑफिस आई. धूप गायब थी. ऐसा लग रहा था कि बारिश आएगी. आसमान पर हलके बादल थे. ऐसे बादल जैसे कोई पानी के रंगों से खेलने वाला चित्रकार आसमान को रंगना शुरू करता हो. अपने केबिन के सामने ही उसे केतकर दिखाई दिए. “हाय, प्रगति आज मौसम खूब ठंडा होने को है. कई दिनों की उमस से लग रहा था कि बारिशें कभी भी शुरू हो सकती हैं.”

प्रगति ने हामी भरी और केतकर के हिस्से का कोई बकाया काम था उसकी याद दिलाई. कुछ देर वे दोनों टेबल पर रखे हुए कुछ पन्ने पलटते रहे. दोपहर की चाय लेकर आने वाला चपरासी सब केबिन के अन्दर आता-जाता चाय रख रहा था. उसी समय प्रगति ने त्यागी को देखा. वह कुछ बाहर के काम भी देखता है. इसलिए दफ़्तर उसका आधा दिन ही होता है. त्यागी केतकर के केबिन में गया. वहां वह मुश्किल से दो मिनट रुका और अपनी सीट पर चला गया.

दोपहर बाद चार बजे के आस-पास सुनीता और केतकर एक साथ बैठे थे. उन्होंने वहीँ से प्रगति को आवाज़ दी. कुछ काम न था किसी के पास. केतकर और सुनीता कुर्सियों पर बैठे, प्रगति वहीँ जाकर पार्टीशन का सहारा लेकर खड़ी हो गयी. मौसम और मौसम की बात. पिछले बरस क्या हुआ था जब बारिशें शुरू हुई थी. किस तरह से पानी भर गया था. एक सडक पार करके कॉलोनी तक जाना भी मुश्किल हो गया था. इन्हीं बातों में बारिश के दिनों में घर में क्या क्या ज़रूर रख लेना चाहिए की भी बात आई. सुनीता ने अपनी पूरी लिस्ट सुना दी. क्या लाना है और क्या इन दिनों में नहीं लाना है. बारिश के मौसम में चीज़ें जल्दी ख़राब भी होती है.

इस गप के सिलसिले से बाहर आने का मन हुआ तो प्रगति ने कहा- “कुछ काम बाकी है कर लेती हूँ.” दफ़्तर में अँधेरा हो गया था हालाँकि शाम होने में अभी दो घंटे बाकी थे. मुड़कर जाती हुई प्रगति को केतकर ने कहा- “आज शाम को कहीं बीजी हो?”

“नहीं”

“फिर हमारे यहाँ आ जाओ” प्रगति को केतकर इसी तरह बुलाते थे. वह जाती थी. वहां उनकी दो साल की बेटी के साथ खूब मजे आते थे. उनकी पत्नी भी खूब स्नेहिल थी. उम्र में ज्यादा फर्क न था मगर प्रगति दफ़्तर में उनको मिस्टर केतकर और उनके घर पर बड़े भैया ही कहती थी.

शाम हो चुकी थी. कॉलोनी की सड़कें सूनी थी. एक स्याह अँधेरा बादलों से छनकर आ रहा था.सड़क के किनारों पर सूखी घास के तिनके बचे हुए थे. कहीं कहीं उखड़ आई ईंटों की जगह सूखी दूब उगी हुई थी. वह कुछ देर सड़क पर टहलती रही. यूं भी उसे कहीं दूर न जाना था. वे सब एक ही केम्पस में रहते थे.

ये खूब अच्छा रहा कि आज का दिन जिस ख़ुशी से बीतना ज़रूरी था, उसी तरीके से बीता. उसने कोई भूल न की थी. त्यागी उसे पसंद था. हालाँकि इस तरह किसी का दुःख थोड़े ही बांटा जाता है. ये दुःख तो एक अवसर था जिसने उसकी चाहत को खोल दिया था. क्या वह इस तरह की बातों की परवाह करेगी. क्या ये कोई और तय करेगा कि उसके जीवन में क्या होना चाहिए और क्या नहीं.

वह खुश थी.

प्रगति ने डोरबेल बजाई. केतकर भाभी ने दरवाज़ा खोला. साथ में वही छुटकी. गोदी में चढ़ी हुई. प्रगति ने उसे लेने के हाथ बढ़ाया तो वह मम्मा से और ज्यादा चिपक गयी. हेलो. आईये-आईये, कहते-सुनते वे लोग घर के अन्दर आये.

वह ठिठकी. त्यागी वहीँ बैठा हुआ था. केतकर भैया ने कहा- “आओ प्रगति.” वह मुस्कुराती हुई सोफे पर बैठ गयी. छुटकी प्रगति के पास जाना भी चाहती है और शर्माती भी है. वे दोनों धीरे-धीरे कुछ दिन पुरानी दोस्ती को फिर से आगे बढाते हैं. एक-दो बार की हल्की गुदगुदी के बाद प्रगति कहती है– “ये चोकलेट कौन खायेगा”

छुटकी ख़ुशी की चमक से भरी आँखों से चोकलेट को देखती है. वह जैसे ही हाथ बढ़ाती है प्रगति उसे अपनी गोदी में ले लेती है. उनकी दोस्ती नई हो जाती है. छुटकी प्रगति की गोदी में आकर उसके बालों से खेलने लगती है. प्रगति उसके पेट में अपने नाक से गुदगुदी करती है.

केतकर भाभी उठती हैं और किचन की ओर चल देती हैं. छुटकी और प्रगति भी पीछे-पीछे. प्रगति बातें भाभी से करती है, खेलती छुटकी के साथ है मगर दिमाग में सिर्फ एक ही बात अटकी हुई कि त्यागी यहाँ क्यों है. ऐसा नहीं है कि वे चारों पहली बार साथ बैठें हों. कल की रात जो बीती उसके बाद अचानक इस तरह बुलाया जाना और त्यागी का यहाँ होना. कोई तो बात ज़रूर है.

चाय बनकर आई तो सब फिर से सोफों पर सेंटर टेबल के चारों तरफ एकत्र हो गए.

केतकर भाभी ने कहा- “मुझे समझ नहीं आ रहा मगर इन दोनों का कहना है मैं कहूं.. और वह भी सबके सामने.. तुम दोनों शादी क्यों नहीं कर लेते?”

प्रगति अवाक्. उसके चाय का कप एक लरज़ से भर उठा. उसकी आँखें स्थिर हो गयी. उसको देखते हुए केतकर चौंक गए. उनको लगा कि बात गलत हो गयी. भाभी प्रगति को देखकर अचानक बचाव जैसी मुद्रा में आई.- “अरे ये मेरा सुझाव भरा है”

प्रगति लाख कोशिश करके भी सामान्य न हो सकी. उसने कुछ जवाब न दिया. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोली- “मैं चलूंगी”

प्रगति वहां से चली आई.

केतकर भाभी को सबसे अधिक अफ़सोस हुआ. उनका कहना था कि सबके सामने ये पूछने के लिए त्यागी और छुटकी के पापा की जिद बेमानी थी. उन्होंने समझाया भी था कि ऐसे सवाल अकेले में ही ठीक होते हैं.

रात के नौ बजे का आस पास प्रगति ने फोन किया.- “भाभी सॉरी. मैं अचानक से इस तरह...”

उधर से जवाब आया- “न न प्रगति तुम्हारी कोई गलती नहीं है, मुझे इस तरह सबके सामने ये बात नहीं कहनी चाहिए थी.”

“वैसे एक बात पूछ रही हूँ. ये त्यागी ने आपको कहा था...?”

केतकर भाभी असमंजस में फोन की तरफ देख रही थी. वे इस वक़्त केतकर को पूछ भी नहीं सकती थी कि इसका जवाब क्या देना है. इसी पल भर के असमंजस में उन्होंने गोल सा जवाब बनाना चाहा- “ऐसा कुछ न कहा था बस कहीं से बात आई थी...”

प्रगति को अब और बुरा लगा. उसने इस बुरे लगने को छिपाते हुए कहा – “अच्छा भाभी गुड नाइट”

उसके फोन रखते ही त्यागी का फोन आया.

“क्या मैं मिलने आ जाऊं?”

प्रगति फोन को पकड़े हुए बैठी रही. काश उसने कल रात को जवाब दिया होता. क्या लोगों के सलाह मशविरे से घर बसाएगा और चलाएगा. प्रगति ने फोन पर फिर से त्यागी की आवाज़ सुनी. हेलो हेलो

प्रगति ने कहा- “यहीं कह दो फोन पर”

“सॉरी...”

“वो बात हम कल ही ख़त्म कर चुके.”

उन्होंने फोन रख दिया.

अगले दिन त्यागी छुट्टी लेकर चला गया. शनिवार और रविवार फिर आगे कोई जयंती. फिर आगे प्रगति ने ये किसी से न पूछा कि वह कितने दिन की छुट्टी गया है.

प्रगति के कमरे की खिड़की के शीशे के पार पानी की हल्की परत थी.

कमरे की पीली दीवारें ऊपर जहाँ खत्म होती थी वहीँ से एक सफ़ेद लकीर छत और दीवार को अलग करती थी. बारिश शुरू होते ही लगता कि इस बार फुहार के बाद सब साफ़ होने लगेगा. सीलापन उड़ने से पहले ही फिर से फुहारें शुरू होती. वह देखती हुई उदास होने लगती. बारिश की आवाज़ जब आना बंद होती तो वह फिर से खिड़की की ओर देखती. खिड़की में लगे लम्बे कांच के पार एक पतली परत जमी थी. उसमें से पेड़ की धुंधली सी एक टहनी दिख रही थी. उसका हिलना न होता था. वह टहनी स्थिर रहती. उस पर गिरती हुई बारिश नहीं दिख रही थी. खिड़की को अंदर से हथेली से पोंछने पर धुंधलापन कम होता मगर बाहर की ओर जमा पानी फिर भी नज़र को रोक रहा था. चीज़ें अपनी शक्ल को खोती हुई जान पड़ रही थी. जैसे पेड़ की शाख और पत्तियां पानी के साथ घुल रहे थे.

बारिश की फुहारों से ज्यादा झड़ी लगने से डर लग रहा था. अक्सर इसके बाद मौसम ठहर जाता था. धूप की आशा करना बेकार हो जाता. दो दिन इसी तरह सीलापन हर जगह उतरता. वह सब चीज़ों को इस तरह पानी से भर देता कि ज़िन्दगी कुछ एक चीज़ों तक आकर सिमट जाती. चाय बनाने और बिस्तर के भीतर की खुद की गर्मी में दुबके रहने के सिवा कोई काम न होता. भीतर की इस सीली गरमी में लगता कि आहिस्ता से चमड़ी को उतारा जा रहा है. जहाँ से बदन को छू लो वहीँ लगे कि सब कुछ कच्चा हो गया है.

वो दस तारीख को गया था. आज तेरह तारीख थी.

दो महीने पहले त्यागी को पंद्रह दिन के टूर पर जाना था. प्रगति जब उसके घर पहुंची तब वह अपना सामान पैक कर रहा था. वह कह रहा था- “नई जगह हो तो उसकेलिए कितनी भी दूर जाना मुश्किल नही लगता. मुझे ख़ुशी होती है दुनिया की अलग जगहों पर जाना और वहां कुछ साल रह कर काम करना. मैं अपनी कुल उम्र में कोई बीस एक जगहें देख लेना चाहता हूँ.”

उसके लम्बे बड़े सूटकेस में चीज़ें अपनी जगह तलाश कर फिट हो रही थी. ज़रूरी अंडर गारमेंट से लेकर चश्मे तक सब सामन बिस्तर पर पैक करने के लिए इस तरह रखे हुए थे कि कुछ भी पीछे नहीं छूटा है. उसने अपनी सारे चीज़ें इस तरह समेट ली, जैसे यहाँ कुछ न बचना चाहिए. क्या वह लौटकर आने के बारे में निश्चित नहीं था? इस तरह जाने का दृश्य प्रगति को खुश नहीं करता. उसे देखते हुये प्रगति उदास आँखों से समय का बीतना सुनती रही.

“ये दुनिया कोई पक्का ठिकाना थोड़े ही है. इस दुनिया में भी सबके के अलग ठिकाने हैं. वैसे भी हर कोई पढ़ लिख कर नौकरी और फ़िर घर बनाने के सपने को लेकर ही जीता है.” परफ्यूम की शीशी का ढक्कन उठाते हुए हल्के से स्प्रे को दबाया. “मैं मगर कहीं इस तरह के जाम में फंसना नहीं चाहता हूँ”

उन दिनों भी प्रगति को इंतज़ार बना रहा कि वह जल्दी लौट आये. इन तीन दिनों पानी बरसता रहा और त्यागी की याद आती रही. जो आदमी नयी जगहों पर जाने और कुछ समय के लिए वहीँ बस जाने की बातें करता हो उसको क्यों सोचना. फिर ये प्रगति का अपना निर्णय था कि उसे किस हद तक बढ़ना है.

क्या एक इस तरह का अनुभव असल में गुज़र चुके वक़्त की स्मृति भर है. हम जब किसी को अपना सबकुछ सौंप देने का निर्णय करते हैं तब कोई आशा भी रखते है? हमारी चाहना जब किसी को रात भर के लिए देह के पास रखे. उसके बाद वह चला जाये. तो क्या इसका अफ़सोस होना चाहिए? असल में क्या देह के पास होने और दूर हो जाने का अफ़सोस होता है या देह एक पहचान भर है. जो भी होता है वह सिर्फ हमारे मन के करीब होता है.


सोचो ये हादसा कितना बड़ा ठहरे किसी के जाने के जिस दुःख को हम असहनीय समझते हैं. उसकी जगह वह हमारे साथ किसी अजनबी की तरह जी रहा हो. अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए उम्र भर का बोझा उठाना. ऐसा जिसे उतारा न जा सके.

तीन रात दो दिन पानी बरसता रहा. सीलन बढती ही गयी. एक चाहना थी, पूरी हुई. उस बीज से उग आई कई-कई चीज़ें. जैसे खालीपन. इसी फ्लेट में इतनी अकेली कभी न थी. कोई आहट न होती. कोई आवाज़ न आती. दफ़्तर बंद. इस घर से बाहर और कोई जान पहचान का नहीं. कहीं कोई ठिकाना नहीं. हाँ उसे क्या फर्क पड़ेगा. लड़की मिली न. ख़ुशी से मिली. अपनी इच्छा से मिली. कोई और मिल जाएगी.

सीले मौसम में प्रगति के दिल से आवाज़ उठी. उसने एक मुश्किल काम कर लिया है. ऐसा सोचना अलग बात है और ऐसा निभाना बहुत अलग बात. इसी सोच में वह सो गयी.

सुबह प्रगति को लगा कि डोरबेल बज रही है. वही इत्र की गंध आ रही है. पानी में भीग कर और ज्यादा गहरी हुई गंध. तीन दिन की बेहिसाब थकन और नींद न आने से बदन हरारत से भरा था. आँखें लाल थी. उसे फिर से डोरबेल की आवाज़ सुनाई दी. सुबह के नौ बजे थे. वह अलसाई उठी. दरवाज़ा खोला.

सामने त्यागी खड़ा था.

“तुम कब तक तैयार हो जाओगी. मेरी बहन सुधा आई है. वह तुमसे मिलना चाहती है.”


प्रगति ने कुछ सुना, कुछ समझा और फिर ठहर कर कहा- “तुम पागल आदमी हो क्या?”

“मिल तो लेना प्लीज... भले मना कर देना”

बरसात की हल्की झड़ी अब भी लगी हुई थी. दरवाज़े के आगे बने हुए शेड के नीचे खड़ा त्यागी भीग नहीं रहा था. प्रगति को जाने क्यों लगा कि घर के अन्दर खड़ी हुई वह भीग रही है.

“उस दिन कहा नहीं जा रहा था?”
त्यागी ने कहा- “कोई तरीका होना चाहिए न कहने का..”

“बेवकूफ”

“दो घंटे में तो तैयार हो ही जाओगी” ये कहता हुआ त्यागी चला गया.

* * *

वो हम जिससे मिले थे, वो उससे मिलना न था. मुलाकातों के ब्योरे सबने अलग-अलग दर्ज़ किये हैं. मौन रहना अच्छी बात है मगर कभी कभी बोलना भी चाहिए. हर किसी के पास ऐसी तीन छुट्टियाँ और बरसता हुआ मौसम हो ज़रूरी नहीं है. किसी के पास इतना वक़्त भी नहीं है कि वह इंतज़ार में बने रहे.

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Painting Image Courtesy : Sikander http://www.imgrum.net/media/1074958288003306743_1458684900