Thursday, November 26, 2009

उदास रात में झींगुरों का करुण राग



झींगुर सन्नाटे को तोड़ते थे और बुनते भी थे. ये उसके भीतर के शोर की लय में विघ्न उत्पन्न किया करते थे. उनसे ऊब कम और चिढ़ अधिक हुआ करती थी. चिन-चिन की इस आवाज़ को बंद करने के लिये वह अपने कानों पर हाथ रखती फ़िर उन्हें तकिये से दबा देती. इसके बाद भी जब भीतर का शोर झींगुरों के स्वर के साथ गडमगड होने लगता तो वह चादर तान लिया करती थी. उजला दिन, पीली-सफ़ेद पतंग सा आसमान में टंगा घरों के बाहर कच्ची सड़कों पर हवा को बुहारी देते हुये देखता पर वह सुबह से ही जुट जाया करती अपने काम में. रसोई में छाया अंधेरा हटाने, आईने के उतरते हुये पानी को लंबी उम्र की दुआ देने और केक्टस पर उग आये गुलाबी फ़ूलों को बर्दाश्त करने का हौसला पढा़ने, जब तक कि कांसे के रंग वाली सांझ के आने से पहले दिन सुस्ताने चला जाये. धुंधली-धुंधली सांझ घिरती हुई, मीनारों, बुर्जों, मेहराबों, छतों, दीवारों और सायों को बुझाती चली जाती और उसके भीतर का शोर मुस्कुराता हुआ जागने लगता कि नासमझ झींगुर फ़िर गाने लग जाते.
बहुत सालों से उसकी सुबहें झींगुरों के सो जाने पर ही हुआ करती है.
उसने कोई अपराध नहीं किया था, सिवा इसके कि उसका नाम प्रथमा था. वह अपने मां-बाप की पहली संतान और लिंग से स्त्री थी और शारीरिक विकास की गति बदलते हुये समय के लिहाज से अपेक्षाकृत अधिक थी. ग्यारहवीं कक्षा में टीचर्स डे के पांच दिन बाद आई रात में उसने पहली बार झिंगुरों को बोलते हुए सुना था. कक्षा की एक सहपाठी निधि ने बताया कि हिंदी के टीजीटी सर ने अपनी जेब में उसका साड़ी पहने हुये फ़ोटो रखा हुआ है तब याद आया कि सर ने उसे एक बार अकेले मे कहा था कि तुम सिर्फ़ इंटेलिजेंट ही नहीं गोर्जियस भी हो... " एक ज़रा सी बात समझ नहीं आई मुझे, मैं पागल हूँ". ठीक इसी ज़मीन पर उगी बातें प्रथमा को हर पीरियड में घेरे हुए रही. सोच की कतरनें छितरा गयी, उनके लाल-बैगनी रंगों में अर्धअश्लील नक़्शे बनने लगे, उसने दोनों मुट्ठियाँ कस कर बंद कर ली जैसे दुआ कर रही हों कि आगे के चित्र बनना बंद हो जाये. अच्छे भले मौसम में उसने जब खुद को पसीना पोंछते हुए देखा तो बदन ने सीधा बैठने से जवाब दे दिया. अपनी टेबल पर सर रखने से पहले नीचे देखा कि जूतों से ऊपर कहीं कुछ दिख तो नहीं रहा.

पलक कुछ देर ही बंद रही कि शोरगुल उसे अपने साथ बाहर मैदान में खींच ले गया. दूसरों का खाना छीन कर खाने वाली लड़की के पास उसी का लंच बॉक्स उदास धरा था. पास के पेड़ों की चिड़ियाएँ कभी एक साथ झुण्ड बन कर उड़ जाती तो उसके भीतर पसरता मौन टूटता. प्रेयर स्टेज की सबसे नीचे वाली सीढ़ी पर बैठे हुए प्रथमा ने अपने हाथ फैला कर सलवार को पूरा नीचे किया, स्वेटर की बाजुओं को उँगलियों तक सरकाने से पहले उसने देखा कि कुरते का गला सच में कुछ ज्यादा ही डीप है, माँ सही कहती थी. सामने मैदान में लड़कियाँ खेल रही थी कभी उनकी पिंडलियाँ दीख जाती तो कभी मासूम चेहरे पर छाई, दौड़ के बाद की लाली. उसके हाथ में एक तिनका गया और मिट्टी पर स्वतः आकृतियाँ बनने लगी. पेड़, बादल और चिड़िया के पंख जैसी कुछ आकृतियों के बाद अंग्रेजी के अक्षर आकर लेने लगे. आर... माने रास्कल. यस ही इज ... रास्कल
स्कूल का कोरिडोर जिसे वह चंद कदमों से नाप लिया करती थी, अनंत तक फ़ैल गया, उससे पार ही नहीं होता. उसकी आंखें सूक्ष्मदर्शी मे बदल गई थी. वह कक्षा में आते हुये डस्टर और चाक थामे पुतलों पर उग आये कांटों को देखती. इन्हीं दिनों सह-शैक्षणिक गतिविधियों से प्रथमा ने अपना नाम वापस ले लिया तो स्कूल ने परिवार को आगाह कर दिया कि आपकी बिटिया के साथ कुछ ठीक नहीं है. पापा स्कूल आये, प्रिंसिपल और स्टाफ के साथ बातचीत में कुछ भी ऐसा सामने नहीं आया जो प्रत्यक्षतः चिंतित करनेवाला हो. उन्हें तमाम संवाद में म्यूजिक सर की बात याद रही. बढ़ते हुए बच्चों के मोरल को चेलेंज करने से पहले ये जांच लेना जरूरी है कि वे भावनात्मक रूप से हमें कितना अपने पास फील करते हैं. इसी एक बात ने बढ़ती हुई लड़की के चिंतित पिता के भीतर उठने वाली स्वभाविक खीज का पोषण नहीं किया. वे प्रथमा को अपने साथ ले गए. रात को प्रथमा ने खाने की मेज पर अलग-अलग बरतनों में कई ताजा पके हुये प्रश्न देखे. व्हाट हेप्पन... एनिथिंग रोंग... इज समवन ?
नथिंग पापा, आई एम फ़ाईन, जस्ट नाट फ़ीलिंग गुड. आई कांट एक्स्प्लेन व्हाट इज रोंग ईवन आई डोंट नो... खामोशी...खा़मोशी या झिंगुरों का घर खामोशी...

उदासी के घर की दीवारों से चूना झड़ रहा था, मुंडेरें कई जगहों से टूट चुकी थी. दिन उम्रदराज दीखने लगे, शामों पर भी बीते दिनों का असर आने लगा, स्कूल कब का छूट चुका था. जिन चीजों से सख्त नफ़रत थी अब वे उपेक्षित हो चुकी थी. गर्ल्स कॉलेज और घर के बीच की दूरी में कई सुंदर मोड़ थे, नालियां थी, स्पीड ब्रेकर थे, दवाई की दुकानें थी और कुछ लड़के थे जो ये दावा करते हुए उसके पास से निकलते थे "तैयार रहना, तुम्हें मैं ही ले जाऊंगा... " मुहब्बत जैसी शै अब भी दूर थी उससे फिर भी वह नाराज आँखों से देखती हुई इन लड़कों को कुछ ऐसा इशारा जरूर करती कि वे बने रहें इसी राह में, हमेशा ऐसा ही कुछ करने के लिए. वह सोचती थी कि इन तेज रफ़्तार दिनों में भी हृदय के स्पंदन को शोर भरे बाज़ार मेंसुना जा सके तो ज़िन्दगी का क्या अचार डालेंगे.
कहाँ सब कुछ करीने से होता है, तीन और साल का झाड़-झंखाड़ बीए के दौरान उग आया. स्मॄतियों के तलछ्ट में जमा चेहरों से हूक उठती थी. स्थान परिवर्तन से जड़ता टूटेगी और कुछ बन भी जाऊं ये सोच कर वह घुमावदार अनगढ़ गलियों को छोड़ आई थी. नयी जगह पर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के दौरान कोई अपने को जितना व्यस्त रख सकता है उससे अधिक प्रथमा ने खुद को रखा. अथाह परिश्रम के दिनों में उसने सबकी ज़िंदगी को एक सा ही पाया, अनिश्चित और आशंका से भरा. कोचिंग इंस्टीट्यूटस में शादी टालने की गरज और घर से दूर पर्यटन के प्रयोजन वाली लड़कियों के अतिरिक्त अधिसंख्य अपनी या परिवार की अतृप्त इच्छाओं के लिये रात भर किताबों मे सर खपाया करती थी. उनके दोशीजा ख्वाब उदास टूटे कांच की किरचों में बदल चुके थे, सदी की इस विकराल प्रतियोगिता ने सहज जीवन के आरोहण की सरल रेखा को इतना पेचीदा कर दिया था कि कभी किसी आइसक्रीम पार्लर पर गुस्ताख निगाहें पीछा करती तो उसका रुकने को दिल चाहता था पर इन सब अनुभूतियों के लिए समय कहाँ था.

एक दिन अचानक परिचित चेहरा मिला विनीत, जो उन्ही पुराने दिनों के लिबास में था. सहरा में बरसात जैसा कुछ. लम्बी औपचारिकताओं में भी अहसास की एक चादर थी जो बहुत अपनी सी लगी. मुलाकातों का एक सिलसिला बन गया. विनीत की बातों से प्रथमा को हौसला मिलता था, शहर के रास्ते आसान हो गए थे और हग करने जितना करीब का रिश्ता आकार ले चुका था. मुश्किल होता है ये बताना कि कैसे इस तरह कुछ ही मुलाकातें इतना करीब ले आती है. वैसे वे दोनों उन्हीं दिनों के परिचित थे जब सुंदर मोड़ वाली गलियों में बिना साज़ के बजते हुए इकतारे सुने जाते थे. प्रथमा का दोस्त विनीत उससे फोन पर निवेदन किया करता था कि मैं तुम्हारी पढाई डिस्टर्ब नहीं करना चाहता हूँ फिर भी एक चाय हो जाये या फिर बहुत दिन हुए हैं चलो कहीं बैठते हैं आगे चल कर वे अनुरोध अधिकारपूर्ण संवादों में बदल गए अब वह आदेश किया करता और प्रथमा जाने क्यों उनमे छिपे अर्थों को पहचानते हुए भी अनदेखा किया करती. साल के आख़िरी दिन होने वाली पार्टी में सब ऑफिसर के बीच विनीत अनुपस्थित नहीं रह सकता था इसलिए उसने प्रथमा को प्रपोज किया कि हम इस साल के एक दिन बाक़ी रहते हुए इसे थैंक्स कहेंगे. शहर के पास स्थित पहाडी पर एक खूबसूरत रिसोर्ट में दोनों के बीच सुंदर कार्ड और महकते फूलों के गुलदस्ते ही थे. तुम कॉफी लो तब तक मैं एक कॉल पर डिटेल ले लूं फिर हम दोनों फ्री. वह बाहर चला गया और आधा घंटा नहीं लौटा. प्रथमा को कुछ असामान्य लगा पर वह यकीन करती थी कि विनीत वैसा आदमी नहीं है.

विनीत के बहाने प्रथमा अपने संसार का आंकलन किया करती थी. जरूरी तो नहीं कि हम आने वाली सदी की आधुनिकता में हीर के किस्सों को भूल जाएँ और नए होने का सबूत दें. दोस्ती में मुहब्बत तो होती है चाहे उसमे साँसों की खुशबू का विलियन बनाने पर बंधन हों. परिंदों को कौन बताता है उनके जीवन साथियों के बारे में कोई तो इन बिल्ट इन्सटिक्ट होती ही होगी जिससे वह उस गंध तक पहुंचता होगा. एक पल ऐसा भी होगा जब वह मिस्टर राईट के पहलू में होगी. इससे पहले प्रथमा ने अपनी उदास शामों में बुरा ही सोचा था. प्रथमा ने देखा भी कि जिन्हें बहुत जीने की चाह होती है या फिर वे जो हज़ार झंझावतों के बाद भी खुश दीखते हैं अक्सर मुकम्मल उम्र नहीं पाते हैं. स्वयं को सौंप देने अथवा नहीं के प्रश्न पर उसका निर्णय अटल था कि ये वक्तिगत और बेहद निजी मामला है. विनीत के इंतजार में प्रथमा को बहुत तो नहीं पर जरूर दो चार चेहरे याद हो आये जिनमे एक अजब सी लुनाई थी. वे आमंत्रित करते थे अपनी ओर... तो क्या हुआ कोई अपनी ख़ुशी के लिए बहक भी जाये. समीचीन कुछ नहीं होता, दम ताजा रिश्ते पलों में दम तोड़ते हैं और कई अनजाने बंधन बरसों बाद दीख जाते हैं जैसे रेगिस्तान में उसके घर के बाहर लगे जाळ के पेड़ पर एक किंगफिशर बैठा होता था कभी-कभी. उसने सोचा कि अगर सर आज सामने जाएँ तो वह शायद कोई प्रतिक्रया ही करे क्योंकि आज वही मन किसी सडांध से बदला लेने के स्थान पर बच कर निकाल जाना चाहता है. ख़यालों के कटोरे असीमित गहराई से अनिर्वचनीय तस्वीरें उगल रहे थे. उन्हीं में प्राणों की महक थी जीने की लालसा थी और मर जाने की सहमति भी.
उसे दरवाजा खुलने का स्वर सुनाई दिया, विनीत लौट आया.

जब वह सुइट में लौटा तो क्वाईट नार्मल था. सोफे पर ही उसने हग किया यानि गले लगाया. ये क्या है ? बंद कमरे में इस तरह... प्लीज... प्लीज...
सांझ बहुत अत्याचारी थी उसे रात की बाहों में धकेल रही थी. रात जो कभी अपने ही सितारों को निगल जाया करती है काली घनी और अंधेरी रात. किसी फूल के खिलने की या क़त्ल कर दिए जाने की रात. विनीत की हर एक छुअन से डर का दायरा बढ़ता जाता, जमाने की तूफानी बारिशों में जो कन्दरा उसे आश्वस्त करती थी उसके भीतर नुकीले दांत उग आये थे. उसके आत्मसम्मान को भेदते और निश्छल समर्पण को चुनौती देते हुए दांत. एक दुपट्टा जो हर राह में तनहा या भीड़ में चलते हुए सब ढक लेता था आज संकुचित हो गया था. क्यों आई थी वह यहाँ ? मुहब्बत में, चाहत में, अपनत्व में या फिर कोई दैहिक जरूरत खींच लाई. विनीत की कोशिशें बढ़ती गयी. प्रथमा भौंचक थी कि वह उसकी सुन ही नहीं रहा था, एक ऐसा आदमी जो सिर्फ उसे सुनने के लिए ही पैदा हुआ था, ऐसी कसमों और वादों की लम्बी फेरहिस्त थी... क्या सिर्फ इसी लिए ? और एक बिजली कौंधी, प्रथमा हतप्रभ... विनीत ने उस पर हाथ उठाया और गालियों में भी कोई अगर दर्जा होता है तो निचले स्तर की छांट छांट के दी. तुम क्या मुझे पागल समझती हो ? साली महीनों से चिपकती रही हो और आज नखरे दिखा रही हो...

सवाल देह का नहीं है इसे तो एक दिन मिट्टी में मिल जाना है, सवाल तो मन का है कि किसके छूने से ये कंचन होगा और किसके छूने से मिट्टी का धेला.
प्रथमा वहां से गयी. कैसे ? पता नहीं...

अब कोई लगावट थी जो मॄगतृष्णा सी ही सही पर दूर चमकती तो हो. रात बजती थी पखावज सी, किसी सारंगी के गहरे डूबे स्वरों की आवाज़ में कुत्ते रोते थे रात के तीसरे प्रहर, पता नहीं क्यों एक दोस्त कहा करता था कि सारंगी से ह्यूमन नोट्स बजते हैं. घर, मां, छोटे भाई-बहन पीछे छूट चुके थे. फ़ोन पर मिनट दो मिनट की बात अब उसके पावों को घर की तरफ़ नहीं खींचती थी. वह कुछ करना भी चाहती थी और शायद नहीं भी, ज़िन्दगी एक पल होती है तो दूसरे पल नहीं. ये ऎसा विस्थापन था जिसका हासिल था, मानसिक संत्रास. किसी की पीठ से पीठ मिला कर बैठने के दिन दफ़्न हो चुके थे, बासंती दिनों के मुरझा चुके फ़ूलों के काले-भूरे तिनकों को चिड़ियाएं ले जा चुकी थी, बचे थे विस्मृत समय के अवशेष, जिनमे थे, गाते हुए झींगुर या फिर शायद रोते हुए.

KISHORE CHOUDHARY

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