Sunday, April 11, 2010

अंजलि, तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते हैं


निस्तब्ध कोठरी के कोनों से निकलकर अँधेरा बीच आँगन में पसरा हुआ था। दीवारों से सटी चुप्पी से अंदाजा लगाना भी मुश्किल था कि यहाँ पांच लोग बैठे है. उनमे एक ही साम्य था कि वे सभी एक लड़की को जानते थे या उसकी ज़िन्दगी को कहीं से छू गए थे. चमकदार सड़क से होता हुआ गठीले बदन वाला ऑफिसर मद्धम प्रकाश वाली इस बड़ी कोठरी में दाखिल हुआ. दुनिया देख कर घिस चुकी उसकी आँखें छाया प्रकाश की अभ्यस्त थी. ऑफिसर ने कम रोशनी में भी पंक्ति बना कर बैठे लोगों को पहचान लिया. एक पर्दा कोठरी को दो भागो में बाँट रहा था. नीम अँधेरे में ये पर्दा और अधिक भय एवं रहस्य को बुन रहा था. ऑफिसर ने परदे के ठीक आगे, एक बिना हत्थे वाली बाबू कुर्सी रखी. उसपे अपना पांव रखते हुए बोला " कोतवाल साहब, अब रीडर जी और एल सी को बुलाओ." बिना पदचाप के दो साये आये और कोने में एक टेबल के पीछे रखी दो कुर्सियों पर बैठ गए, जबकि ऑफिसर अभी भी उसी मुद्रा में खड़ा हुआ था. सन्नाटा तोड़ने के लिए कोई तिनका भी था, मानो ऑफिसर इसे एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह धार दे रहा हो. कै हो जाने से पहले की हालात में बैठे हुए लोगों के चहरे पर यहाँ से बाहर निकल पाने उम्मीद जगी, जब कुछ क्षणों के बाद बयान दर्ज किये जाने की प्रक्रिया आरंभ हुई.

विनीत श्रीवास्तव यानि दोस्त
पहचान ?
सर, मेरे पिता नहर परियोजना में इंजीनियर है और माँ कालेज में दर्शन शास्त्र पढ़ाती है। मैं बेंगलुरु के एक निजी अभियांत्रिकी कॉलेज में पढ़ता हूँ.
क्या जानते हो लड़की के बारे में ?
मैंने उसे पहली बार घर के बाहर दूब में पानी देते हुए देखा था फिर वह कई बार कॉलेज जाती हुई दिखी. हमारी जान पहचान बढ़ती गयी क्योंकि हम दोनों के पापा एक ही ऑफिस में थे. हमने शाम को पार्क में मिलना शुरू किया. वहां उसके साथ बैठ कर शाम को पंद्रह बीस मिनट रोज बात किया करता था. वह कई बार मुझसे कुछ किताबें मंगाया करती थी. मैं अपने दोस्तों से लाकर उसे दिया करता था. वह पढ़ने में बहुत अच्छी थी, वह देखने में बेहद सुंदर थी. उसके कपड़े पहनने का सलीका भी आधुनिक था. वह किसी से डरती नहीं थी और उसने मुझे दोस्त कहा था इसलिए मैं उसे पसंद करता था.
कितना पसंद ?
विनीत ने बुझी हुई आशंकित निगाह से देखा और कहा। सर पहले करता था मगर बाद में उसका व्यवहार बदलने लगा बहुत देर तक पार्क में बैठी रहने लगी. वह अजीब से सवाल करने भी लगी. मुझे कहती थी कि तुम बदल गए हो. जबकि मैं और वह सिर्फ दोस्त ही थे. हम छोटे से क़स्बे में रहते हैं, वहां लोग कई तरह की बातें बना लिया करते हैं. इस तरह से बागीचों में मिलना अच्छी बात नहीं मानी जाती है. ये मैंने उसे समझाया लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी. एक बार वह मेरा हाथ पकड़ कर बैठी थी तब मेरी मम्मी ने देख लिया और फिर मुझे बहुत डांटा गया. हम दोनों को अलग रहने की हिदायतें दी गयी. उसके बाद भी वह जिद करती थी मगर मैं फिर कभी उससे नहीं मिला.
कभी नहीं ?
जी कभी नहीं.

रमा दीवान यानि सहपाठी
एक रात को कॉलेज होस्टल में हो हल्ला सुन कर मैं अपने रूम से बाहर निकली तब पहली बार उसके नाम पर मेरा ध्यान गया, अंजलि सिंह। होस्टल की कुछ लड़कियों ने वार्डन से शिकायत की थी कि पास के रूम से सिगरेट के धुंए की गंध रही है. उसका रूम खुलवाया गया. उसमे से बहुत तेज गंध रही थी. आप जानते हैं कि बंद कमरे में भले ही एक सिगरेट पी जाये उसमे बहुत देर तक गंध बसी रहती है. अंजलि रूम में रखे हुए लकड़ी के पाट पर चुप बैठी थी और शिकायत करने वाली लड़कियाँ अपनी नाक को इस तरह सिकोड़ रही थी जैसे वे किसी अस्पृश्य बू से नापाक हो गयी हों. कमरे की बालकनी में बहुत सारे सिगरेट के टोटे पड़े हुए थे. वार्डन और उनकी सहायक ने हिकारत भरी निगाह से अंजलि और उसके सामान को देखा. उनकी निगाहें इस अक्षम्य अपराध पर सब कुछ उठा कर बाहर फैंक दिये जाने जैसे भाव दिखा रही थी.
अंजलि को कल सुबह ऑफिस में आने का कह कर वार्डन चली गयी, कुछ लड़कियाँ फुसफुसाती, मंद - मंद हंसती और कुछ चेहरे पर आश्चर्य के भाव बनाती हुई अपने अपने कमरे में चली गयी। मुझे इस तरह एक लड़की को अकेली छोड़ कर आना अच्छा नहीं लगा तो मैं उसके पास रुक गयी. क्या हुआ ? मेरे पूछने पर बोली. क्या हुआ ' सिगरेट ही तो पी है '. उसके चेहरे पर किसी तरह के नए भाव नहीं थे. वह बेहद शांत थी और उसकी आँखें किसी शून्य के मोह में बंधी हुई दीख रही थी. किसने सिखाया तुम्हें सिगरेट पीना ? उसने एक डूबी हुई किन्तु गहराई से उपजी मुस्कान से कहा मेरे दोस्त ने. उस रात के बाद मैं हमेशा उसे अपने साथ रखती थी लेकिन उसका अकेलापन चारों ओर से उसे घेरे रहता था.
उससे घनिष्ठता के बाद के दिनों में, वह शाम होने से पहले होस्टल से निकल जाया करती थी। रात को मालूम नहीं किसी तरीके से अपने रूम में बिना किसी को ख़बर हुए पहुँच जाया करती थी. अंजलि ने एक बार मुझे बताया था कि वह किसी मंदिर जाया करती है. वह सुनसान पहाड़ी के बीच में बना हुआ है. वहां एक बाबा रहता है मगर बड़ा बेकार आदमी है. एक ख़ास बात उसने मुझे बताई थी, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाई हूँ. वह एक शाम बेहद निराश होकर सड़क पर खड़ी थी और उसने एक ओटो रुकवाया था फिर जब ओटो वाले ने पूछा कहाँ जाना है तो उसने कहा था जहाँ चाहो ले चलो... उसने जब ये मुझे बताया तो मैं उसके एकाकीपन से डर गयी थी.

मंडल नाथ यानि पहाड़ी शिव मंदिर के महंत
बम
भोले सबका भला करें. शाम के सात बजने को थे और मैं आरती के लिए नहा कर मंदिर की झुक आई ध्वजा को सही करने के लिए दीवार पर खड़ा हुआ कि मैंने देखा एक लड़का पहाड़ी से कूद कर अपनी जान देना चाहता है. मैंने चिल्लाना उचित नहीं समझा क्योंकि मैं ऐसा करता तो वह निश्चित ही कूद जाता इसलिए मैं बिना आवाज़ किये उस तक पहुंचा और कमर से उसको पकड़ लिया. पहाड़ी के ठीक ऊपर खड़ा देख कर जिसे मैंने लड़का समझा था वह वास्तव में एक लड़की थी. उसने कमीज और पेंट पहनी थी इसलिए मुझे धोखा हो गया था. मैं उसे जबरन अपने साथ मंदिर तक लाया और पूछा बेटी ऐसा गलत काम क्यों करना चाहती हो. साहेबान वह बेहद दुखी लड़की थी. हमारे समाज में स्त्रियों को घनघोर कष्ट दिये जाते हैं कुछ हल्के होते हैं जिन्हें आप शारीरिक कहते हैं और बाकी गंभीर जिन्हें मानसिक कहा जाता है. वह मानसिक कष्टों से घिरी थी. ईश्वर की कृपा से उस बच्ची ने मेरी बात मानी अपने मन के विकारों को प्रकट किया. प्रभु के द्वार पर मैंने उसे चरणामृत दिया, धूणे की चुटकी भर राख उसको दी और फिर वह चली गयी.
और क्या हुआ था उस दिन ?
मैं भगवान का भक्त हूँ, उसकी आराधना में लीन रहता हूँ। उसे सीढियां उतरते हुए देख लेने के बाद में आश्वस्त हो गया था. मेरा मन भी प्रसन्न था कि देव चरणों में बैठने से मैं ये शुभ कार्य कर सका. ईश्वर की लीला अपरम्पार है फिर कभी उसका आगमन उस मंदिर में नहीं हुआ.

बीदा रावत यानि टेक्सी ड्राईवर
नमस्कार साब, सितम्बर का महीना था और शाम को पांच बजे थे तब मैंने उसे पहली बार देखा था. उसने मुझे रुकने का इशारा किया. वह टेक्सी में बैठी और बोली फतेहसागर चलो. मैं उसको वहां ले गया. उसने मुझे पंद्रह रुपये दिये और झील के सामने पहाड़ी पर बने बागीचे की सीढियां चढ़ गयी. मैं वहां से घाटी में अपने घर चला गया. शाम की चाय पीकर जब वापस जा रहा था तब वह सड़क के किनारे आधी बेहोशी जैसी हालात में थी. साहब, मैंने टेक्सी रोकी और अस्पताल ले जाने के लिए उसे सहारा दिया. वह टेक्सी में बैठते ही बोली, मैं यहाँ अकेली हूँ इसलिए मुझे अपने घर ले चलो. साहब में उसको अपने घर ले गया. मेरी बीवी ने उसको एक ग्लास जूस पिलाया, पंखे से हवा की. मैंने इशारा कर बीवी को एक तरफ बुलाया कि पता करे मामला क्या है ? खामखाह हम उलझ बैठें. उसने बताया कि वह यहाँ अकेली रहती है और उसका मन नहीं लगता इसलिए बाहर घूमने चली आया करती है और कमजोरी से चक्कर गया है. उसको अपने परिवार की बहुत याद आती है. जब हम ने देखा कि वह यहाँ आराम से है तो मैंने बोला ' तुम मुझे अपना भाई समझो और जब भी जी करे यहाँ भाभी के पास चली आया करो '.
बड़ी जल्दी रिश्तेदारी हो गयी ?
साब, बच्चों की कसम खा के कहता हूँ कि मैंने उस अकेली लड़की की मदद करने को ही बहन बोला था। वह मेरे राखी बाँध के गई. मेरी बीवी ने उसको अपने हाथों से गरम खाना खिलाया. परदेस में कहीं अपनापन मिल जाये तो बड़ा आसरा होता है. हाँ वो खुश थी, बहुत बार हमारे घर आई. इस बार उसने कहा था, लौट के आएगी तब यहीं रुकेगी.

बादामी
यानि काम वाली बाई
अंजलि बेबी बहुत अच्छी लड़की थी साब, पण उसको संगत सही नहीं मिली. एक सुबह झाडू मारते हुए मैंने फर्श पर गिरी हुई, उसकी पेंट को अलमारी में टांगा. उसमें एक टूटी हुई सिगरेट थी. मुझे उसी समय मालूम हो गया कि कुछ गड़बड़ है. मैं रोज़ उसका ध्यान रखती कि ये जरूर बीडी पीती है. इसी चक्कर में एक दिन मैंने उसके पेट पर लाल निशान देखा तो उसे पकड़ लिया फिर पूछा किसने किया ? वह बहुत देर तक नहीं बोली फिर रोने लगी. उसको दोस्त लोगों ने ख़राब कर दिया था. उसके बदन पर नोच के निशान देख कर मुझे भी अपनी पीठ याद गयी. ऐसा ईज होता है सब औरत के साथ पर उसकी तकलीफ थी कि ये शादी से पहले होने लगा. मैंने उसको बताया कि छोड़ दे सबको, अच्छा अफसर का बेटी है अच्छा काम करो अच्छा से जीयो. वो मेरी सब बात सुनके भी चुप रही.
किसने ख़राब किया ?
साब उसने कभी नाम बताया नहीं, वो बोलती थी कि कौन किसको ख़राब करता है ? सब आप डूबते हैं। मुझे डूबे रहने दो. बाई, तुम बड़ी मूरख बात करती हो.

बादामी देवी के बयान की आखिरी पंक्ति रावत, मंडल नाथ और विनीत को एक मीठा सा सुकून दे गयी. ज्यादा सवाल पूछे जाने से और सख्ती किये जाने के भय से निकल आने के कारण कोठरी का मटमैला अँधियारा कुछ हल्का हो गया था. सब अपने फ़र्ज़ की अदायगी हो जाने के अहसास से कुछ आराम में गए थे. ऑफिसर अभी भी उसी पोजीशन में खड़ा हुआ था जैसे कोई विचारमग्न मूर्ति एक नियत अंतराल से निर्धारित सवाल पूछने के लिए बनाई गयी हों. घड़ी भर की ख़ामोशी के बाद ऑफिसर ने मीता पुरी को आवाज़ लगाई.

मीता पुरी यानि इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर फॉर स्युसाईड केस ऑफ़ अंजलि सिंह
जनाब थाना कोतवाली सिटी में सुबह आठ बजे सूचना मिली कि अशोक सिंह वल्द हनुवंत सिंह की पुत्री अंजली की मौत हो गयी है। मौका मुआयना करने पर पाया गया कि किसी प्रकार के संघर्ष के निशान मर्ग कारित होने के स्थान पर नहीं थे. कमरे में सभी सामान सलामती के साथ था. दरवाजे के अलावा कमरे में आने के स्थान खिड़की से भी किसी आमद का कोई संकेत नहीं पाया गया. लड़की के शरीर के नीला हो जाने के कारण उसको ज़हर दिये जाने की आशंका के चलते परिवारजनों को पोस्ट मार्टम के लिए राजी किया गया. लड़की के चाल - चलन और ताअल्लुकात पर कोई एतराज पडौसियों को नहीं था.

इस जांच के दौरान मुझे यानि मीता पुरी को मृतका की एक निजी डायरी भी मिली है. इसके कुछ पन्ने इस मर्ग को सुलझाने में अहम हैं.
अंजलि ने एक विनीत नामक लड़के के बारे में लिखा है.
तुम मुझे छूते हो तो अच्छा नहीं लगता, मगर तुम्हारी बातें मुझे बहुत अच्छी लगती है. आज की शाम हमेशा की तरह बहुत सुंदर होती अगर तुमने मुझे पार्क के मूर्ति कक्ष के कोने में ले जाकर, जानबूझ कर अपनी सौगंध देकर सिगरेट ना पिलाई होती. तुम कहते हो कि मैं मर जाऊंगा... मगर मैं ऐसा होने नहीं दूंगी. तुम्हारे लिए मैं हज़ार सिगरेट पी सकती हूँ. आई लव यू. लव लव लव यू...
आगे एक महीने के बाद अंजलि ने लिखा है कि विनीत उससे प्यार नहीं करता.
आज की शाम मरी हुई है पर मैं जिन्दा क्यों हूँ. उस राक्षस ने मुझे सिगरेट में जाने क्या पिलाया... उसने मुझे नोच खाया. मेरा बदन दर्द से भरा है मगर उससे ज्यादा मुझे अपमान की तकलीफ है. वो कहता तो मैं कुछ भी करती मगर ... तुम नफ़रत के लायक हो, तुम हर बार बात प्यार से शुरू करते हो और शरीर पर ख़त्म. कितने कमीने हो तुम..
जनाब इन पंक्तियों के आगे एक पीपल के पत्ते जैसा दिल बना हुआ है और उसके कई टुकडे हो गए हैं। पन्ने पर बूँद बूँद टपकता हुआ पानी है जो शायद आंसुओं का चित्रण है. आगे दो तीन जगह विनीत लिख कर उसे काट कर वि नीच - नीच कर दिया गया है.

जनाब
, इस डायरी में होस्टल के बारे में भी लिखा है
आज मुझे लगा कि मेरी सांस फूल रही है. मैं दम घुटने जैसा महसूस करने लगी हूँ इसलिए समझ नहीं आया कि क्या करूं... कितनी उदासियाँ है इस कमरे में और बाहर कितने तनहा साये डोलते हैं... मैंने सिगरेट पी. मुझे बहुत आराम मिला. पता है कि ये थोड़ी देर ही रहेगा मगर है तो सही. वे कमीनी लड़कियाँ शोर मचाती है, तो मचाती रहे. मैं रमा के गले लग कर रोना चाहती हूँ मगर नहीं अब थक गयी हूँ रो रो कर. होस्टल में यही एक सही लड़की है बाकी साली सब की सब मुंह में राम और बगल में कंडोम लिए घूमती है.
आगे कुछ शब्द और उनके अर्थ लिखे गए हैं.
समर्पण - अत्याचार की मौन स्वीकृति, वफ़ा - तूं जो चाहे करने की अनुमति, पतिता - जो साथ सोने से इंकार कर दे, वार्डन - सरकार की ओर से नियुक्त दलाल. इसके बाद ज़िन्दगी लिख कर कई सारे अपमानजनक शब्द लिखे गए हैं.

बीदा रावत का भी इसमें उल्लेख है
शाम से बेचैन हूँ। मुझे नहीं पता कि क्यों पर मैं सड़क पर निकल गयी. कहाँ जाना था ये भी नहीं पता. ये भी मालूम नहीं कि मैं हूँ क्यों ? आज जब टेक्सी में बैठी तो उसने पूछा कहाँ जाना है ? मैं ज़िन्दगी से परेशान थी तो कहा ' कहीं भी ले चलो '. वह ओटो चलाते हुए कुछ देर मौन रहा फिर उसने अपना नाम बीदा रावत बताया और कहा ' बहन परेशान हो '. वह मुझे अपने घर ले गया, शायद वो उसका घर भी नहीं था. उसकी किसी गिरी हुई दोस्त का रहा होगा. मुझे उस घर में मौजूद औरत ने जूस पिलाया फिर कुछ नया नहीं हुआ... नोचो सालों सब नोचो. जिसको मौका मिले वो और जिनको ना मिले वो टेक्सी लेकर घूमों. कहीं कोई अकेली औरत जरूर मिलेगी. इसी समाज के लोगों की सताई हुई और सताए जाने के लिए...

' एक हसीन शाम का भाग दौड़ भरा अंत ' जनाब इस पन्ने पर लिखा है.
पहाड़ी के छोर पर बैठ कर ढलते हुए सूरज को देखना कितना प्रीतिकर होता है। यह तेज चमकता हुआ सूरज जाने कैसे एक सिंदूरी थाली में बदल जाता है. पेड़ों से छन कर जब इसकी किरणे मेरे चेहरे पर गिरती है तो मैं उनको हथेली में लेकर देखती हूँ वे कितनी पवित्र हैं लेकिन ये ढोंगी लोग कहाँ नहीं है. मैं सूरज को देखते हुए सिगरेट पी रही थी कि किसी ने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया. मेरे प्राण सूख गए. उन बलिष्ठ बाँहों के उत्पात से मैं कभी छूट पाती अगर मैंने दिमाग से काम लेकर उन बाबाजी को पटाया ना होता. वह मूर्ख मेरे सहमति भरे संकेतात्मक वाक्य सुन कर सहज हो गया था. मैंने उसका नाम पूछा तो उसने बताया मंडल नाथ फिर कहने लगा कि ज़िन्दगी में बहुत मज़ा है, जितना चाहो ले लो. वह कुदरत के उपहारों का वर्णन करने में खोया हुआ था तभी मैंने सीढ़ियों से भाग लेने का फैसला किया. उसने मेरा वहशी तरीके से पीछा किया. मैं दौड़ कर थक गयी हूँ बहुत ज्यादा... बहुत ज्यादा. ये बाबा से बचने की दौड़ नहीं है वरन ज़िन्दगी के उपहारों से बचने की है.

इस डायरी में बादामी देवी का शुक्रिया अदा किया गया है
उसके चोट खाए बदन और नोची गयी छातियों को देख कर मुझे क्रोध हुआ अपार दुःख हुआ मगर क्या ये मेरी ज़िन्दगी से मिलता जुलता नहीं है ? क्या हर औरत की ज़िन्दगी से मिलता जुलता नहीं है ? आज उसने मुझे गले लगाया, मुझे अच्छा होने की याद दिलाई। उसने अपने दुःख सुनाये जो मेरे से मिलते हैं. वो घर में बर्तन मांजती है झाडू लगाती है. उससे मिले पैसे से उसका पति दारू पीकर, उसी को पीटता है और अपमानित करता है. मैं उसके लिए सिगरेट पीने लगी हूँ और अपमानित होने भी. मैं तुम्हारी आभारी हूँ कि तुमने मुझे शादी यानि समझौते के बाद के सीन भी अभी दिखा दिये हैं. यानि मेरा आगे भी क्या होगा ....

आखिरी पन्ना
सोमेन्द्र से मेरा विवाह होने वाला है, वह जाने कैसा इंसान होगा हालाँकि पढ़ा लिखा तो बहुत है. अभी उसकी पीएच डी भी होने वाली है. ज़िन्दगी अब उतनी अपरिचित नहीं है. रात को सपने आते हैं कि मैं मंडप से गिर कर मर गई हूँ. बादामी कहती है, मरने का सपना अच्छा होता है मगर शादी का नहीं. जाने क्या अच्छा और क्या बुरा होता है. आज एक किताब पढ़ी, राबर्ट लुई स्टीवेंसन की. उसमें किसी के लिए लिखा है कि उसका एकाकीपन किसी हारी हुई पलटन के एकाकीपन से भी बड़ा था तो क्या ये मेरे बारे में लिखा है ?
ज़िन्दगी आज मैं तुम्हारा आभार व्यक्त करना चाहती हूँ। सिगरेट के कड़वे और नशे भरे स्वाद लिए, मुहब्बत के होने और खोने के अहसास को समझाने के लिए, सबको अलग सुख और अलग तरीके की तकलीफ देने के लिए, भेड़ियों के पंजों से भाग जाने का साहस देने के लिए और मनुष्य को इतनी बुद्धि देने के लिए कि वह शुद्ध और पीड़ारहित ज़हर बना सकने में कामयाब हुआ.

मीता पुरी ने बयान के बाद आज्ञा के लिए प्रश्नवाचक दृष्टि से ऑफिसर को देखा, ऑफिसर ने तेज हवा में झुक आई घास की तरह झुके हुए सरों को देखा और फिर ऐसे झुके हुए कई हज़ार और सरों के बारे में सोचा. अपनी जेब पर हाथ रखा लेकिन सिगरेट की डिबिया आज शायद टेबल पर छूट गयी थी.

53 comments:

आनन्द वर्धन ओझा said...

बंधुवर,
आखिर लंबा मौन टूटा ! अभी सिर्फ हाजिरी लगा रहा हूँ ! कथा पढ़कर लौटता हूँ ! इसी कथा की बुनावट में लगे रहने के कारण मेरा पत्र भी अनुत्तरित रहा न ?
सप्रीत--आ.

गिरिजेश राव said...

आज कल समय बड़ा अभिशप्त सा है।
डियर, अवसाद बाँधे जा रहा हूँ। हाजिरी नहीं, डूब कर पढ़ा है मैंने। मेरा अवसाद तुम्हारी सिद्धि है।

Apanatva said...

bada intzar karna pada ise var.....
pooree kahanee jhakjhor gayee.........
manovaigyanik vishleshan man hee man chalta raha....ki aisa kyo ho jata hai......?
kya parvarish kee kamee ise bhatkav ka karan hai ?
filhaal saty ye hai ki manas patal par zordaar asar hai.

Kishore Choudhary said...

आदरणीय ओझा जी, आपका आदेश सिर माथे था और हमेशा रहेगा, मैं नियमित रूप से आपको पढ़ रहा हूँ. आपके लिखे उस संस्मरण ने मेरा असीम मार्गदर्शन किया है. क्षमा प्रार्थी हूँ कि समय पर आपको अपने मन के हाल से अवगत ना कर सका. आप सच कहते हैं कि मेरी ये कहानी उसी का परिणाम है.

Sonal Rastogi said...

लंबा इंतज़ार ,
पर उसका फल बहुत बढिया,सारे पात्र,स्थान आँखों के सामने से गुज़रे ..अंजलि को मनो मैंने सीढियों पर ,होस्टल के कमरे में और ऑटो में बैठे देखा ...कथा शिल्प और वाक्यों की विवेचना करने की ना तो मुझमें योग्यता है ना अनुभव.. समर्पण,वफ़ा और पतिता की परिभाषाओं ने तो झकझोर के रख दिया

दीपक 'मशाल' said...

Kishor bhaai, aap apni qalam ki nonk se jis tarah kore panne kee seelan bhari deewaron se dard ki papdiyaan umech laate hain wo har kisi ke bas ki baat nahin.. fir bhi aapse seekhne ki koshish jari rahegi..
ek aur umda rachna ke liye aabhar(tahedil se)

pratibha said...

वाह!

रचना दीक्षित said...

कभी कभी जिंदगी कम उम्र में भी ऐसे अनुभव करा देती है बहुत सीधी सरल भाषा. एक नारी मन व उसकी व्यथा,साथ ही उसका सच्चा मन, बहुत संवेदनशील रचना और जितनी सुंदर रचना उतना हृदयविदारक अंत बहुत मार्मिक कहानी मन को छू गयीं

neera said...

यदि कलम की गहराई ... आत्मा कि गहराई को छू ले ...उसके लिए कोई शब्द है क्या?
इंतज़ार का फल मीठा होता है इस कहानी ने हमेशा के लिए याददाश्त में अपनी जगह बना ली है...
किन्तु एक और सच है ... अंजली का सच इतना सच्चा है कि सच से उबकाई आती है...

sanjay vyas said...

किसी ईमानदार मुंशी की तरह सच 'जैसा है वैसा लिखा'. बस इस सच से ही दूर भागने को मन करता है जैसा नीरा जी ने लिखा है.

अब इतना गहरा लिखा है कि कुछ न कह पा सकने की स्थिति है, जैसे काठ मार गया है.

डॉ .अनुराग said...

सच तो है हम पीठ कर लेते है सच की ओर से के शायद अगले मोड़ से मुड जायेगा ..... .
वैसे ....एक्सपेरिमेंट शानदार है .....अच्छा है तीन चार लोग अब खुल-कर सामने आ रहे है ...कंप्यूटर से दिलचस्पी बनी रहती है .......एक उपन्यास पढ़ा था इसी थीम पर ....इसी अंदाज़ में ....नाम याद नहीं आ रहा ...किसी पहाड़ी बेक ग्रायुंड में .था ....

Shruti said...

Pehli baar aayi hu aapke blog par
aapne khayaalo ko jaan kar aur unhe pad kar achha laga

-Shruti

प्रकाश पाखी said...

BEHTREEN .SHAANDAAR..ABHI PADHA HAI EK BAAR...ACHCHHA LAGA PAR COMMENT KE LIYE FIR AAUNGAA...YAH KAI BAAR PADHNE LAYK RCHNAA HAI.

Vinod Kumar Nath said...

अजीब इत्तेफाक है ये के हम गुजरे जहाँ से वोह समां बदल गया ,
रास्ते तो वही थे बस कारवां बदल गया .

अफ़सोस ये नहीं कि हम सोये थे कब्र में ,
अफ़सोस ये है कि जगाया नहीं तुमने

another nice one. Keep writing...

रंजना said...

क्या लिखा है..........उप्फ्फ़ ......

कुछ कहने लायक मनःस्थिति नहीं अभी....

रंजना said...

कथा यदि अपने से बाँध कर इसी प्रकार निःशब्द और मौन न कर दे तो वो कथा भी कोई कथा है......

शाबाश भाई...शाबाश..

"Darshan" said...

एक अनजान सा डर भर गया ये कथानक !!
शानदार पेशकश है ..सच्चा कटाक्ष है .. लेखनी कमाल कर गयी मगर समाज का इतना वीभत्स रूप कई अनजाने सवाल छोड़ जाते हैं सबके सामने ..

varsha said...

samay ka keemti dastvez hai kahani...bimbon ke bojh se mukt apne patron ke zariye kabhi chetna ko shoonya karti to kabhi jhakjhorti hui.

Udan Tashtari said...

आपको पढ़कर घंटों सन्न रह जाता हूँ..माँ शारदा का अद्भुत आशीष है आपकी कलम को. सच में!!

अनिल कान्त : said...

आपका लिखा पढना हमेशा सिखा कर जाता है. कहानी के पात्र, दृश्य, शिल्प, संवाद अपना असर इस कदर छोड़ते हैं कि लम्बे समय तक मस्तिष्क पर अंकित रह जाता है वह असर.

कंचन सिंह चौहान said...

जब कोई हमेशा ही अच्छा लिखता है तो समस्या हम से टिप्पणी कारों को होती है। तब लगता है कि नाईस एक अच्छा शब्द है कम से कम नव शब्दावली तलाशने की मुहिम तो नही करनी पड़ती।

आप के साथ कुछ ऐसी ही पश ओ पेश रहती है।

सोचती हूँ कि छोटी सी जिंदगी में इतने चरित्रों से मिलना उन्हे पढ़ना और हमारे लिये पुनः उन्हे शब्दों के साथ गढ़ना......

ओह कितना कठिन कार्य है.....!

आपकी कहानियाँ हमेशा एक नये मनोविज्ञान को समझने मे सहायक होती है।

अधिक शब्द नही हैं....!

sheetal said...

dil ko choo jaane vaali ek karun vyathaa. man badaa udaas ho gaya padhkar. kitni bechani aur chatpatahat thi.

Shekhar kumawat said...

bahut sundar


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

आनन्द वर्धन ओझा said...

बन्धु !
पारंपरिक शब्दावली में कही न जा सकेगी बात ! ये कहानी तो स्तब्ध कर गई है ! जिस अंदाज़ से एक-एक पात्र खड़े किये हैं आपने और उनके दर्ज बयानों से कथा आगे बढ़ी है--वह अंदाज़ अनूठा है ! अंजलि का जीवन और उसकी मौत हतप्रभ करती है और मन खिन्नता से भर आता है !
कुछ शब्दों ने घिस-घिस कर कैसे अपने अर्थ बदल लिए हैं आज के समाज में, आश्चर्य होता है; लेकिन अंजलि ने ठीक ही अर्थ निकले और लिखे हैं अपनी डायरी में... !
अभी चिंता में हूँ ...
सप्रीत-आ.

प्रियदर्शिनी तिवारी said...

MAI IS LAYAK NAHI KI AAP KE LIKHE PAR COMMENT KAR SAKOO... BAHUT ACHCHHA LAGA PADHKAR..

ओम आर्य said...

अंजलि की जो डायरी लिखी है आपने, वो यूँ लगा कि आपने नहीं, अंजलि ने हीं लिखे हैं...जो मरने के बाद ज्यादा जिन्दा हो गयी लगती है.

'अदा' said...

ये डायरियाँ हमेशा किसी के मरने के बाद इतनी जिंदा क्यों हो जाती हैं...?
आपकी तारीफ में, जब इतने बड़े-बड़े धुरंधर कुछ कह नहीं पाते तो हमारी क्या बिसात ...!
नई तस्वीर भी अच्छी लगी...
शुक्रिया...!!

usha rai said...

मैंने सुना था चाहे जितनी भयानक कल्पना हो सच से भयानक कुछ नही !अंजली की डायरी एक अवसाद छोड़ गई ,जो शायद कभी खत्म नहीं होगी ! ऐसे में सिर्फ कबीर याद आते है ...पानी बिच मीन प्यासी ! या फिर ..साधों यह मुर्दों का गाँव !!! बहुत दिनों के बाद आपकी कहानी का अनमोल पल मिला ! आभार ! आगे के लिए शुभ कामनाएं !

dimple said...

अंजलि, तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते हैं
कई बार कहानी का नाम पढ़ पढ़ के लौट गयी.हमेशा की तरह आराम से घूँट घूँट कर पढना चाहती थी.अंजलि के सूक्ष्म मनोभावों को बड़े अच्छे से पिरोया है आपने.चित्र शब्दों द्वारा ऐसा सजीव चित्र उपस्थित किया है की अंजलि का चरित्र सकार हो उठा.कहानी बहुत देर के लिए आँखों के सामने इक चित्र,मन में कसक और इक गूंज छोड़ जाती है..

हिमांशु । Himanshu said...

गज़ब की कहानी !
कई बार कहानी पढ़ने के बाद स्तब्ध रहता हूँ !

यूँ भाषा की असम्भाव्यता को अनेकों बार जाना-पहचाना है, लेकिन यहाँ पढ़कर चुप रह जाने की आदत (यह असम्भाव्यता) इतनी प्रीतिकर कभी नहीं थी ! हमेशा ऐसे किसी मौकों पर अपनी चुप्पी को मैंने टटोला है, उसे भेदने की कोशिश की है.. पर यहाँ अपनी चुप्पी के महत्व को पहचानता हूँ !

कुछ भी न कह पा सकने की असमर्थता/यंत्रणा के असह्य क्षण गुजरने देता हूँ ...किशोर चौधरी पढ़े जाते रहते हैं...उनकी कहानियाँ कहीं बहुत गहरे धँसती जाती रहती हैं...मैं इन असह्य क्षणों की उज्ज्वलता में निमग्न हो जाता हूँ... मैं कहानी छूता हूँ...कहानी के बनते-सँवरते निराकार अंगों को सहलाता हूँ...अपने भीतर उसे साकार करने की कोशिश करता हूँ...पर चुप रह जाता हूँ !

मैं देखता हूँ/महसूस करता हूँ..कुछ न कह पा सकने की स्थिति में/असम्भावना में मेरी कल्पना मुखर हो उठती है !

pratibha said...

कहानी अंजलि, तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते हैं दोगले समाज की मानसिकता का सटीक वर्णन है....सादर।

अपूर्व said...

यहाँ कहानी पर कुछ कहने से पहले बता देना चाहता हूँ कि आपको पढ़ना बहुत मुश्किल होता है..बहुत तक्लीफ़देह..नही यह पोस्ट की लम्बाई की वजह से नही..आपकी पोस्ट्स लम्बी नही वरन्‌ पूर्ण होती हैं!..वजह यह कि यह कहानियाँ किसी खयालों के दलदल सी होती हैं..किनारे पर पाँव रखते ही अंदर खींच लेती हैं..और फिर बाहर निकलने का रास्ता नही देतीं..और उसमे समाते हुए सारे कन्सेप्शन्स, नैतिक बोध, परिभाषाएं आपस मे गड-मड होती जाती हैं..! इस कहानी से भी बचने का प्रयत्न किया..सम्हाल कर पग धरने का..मगर...और कुछ कह पाना तो और भी मुश्किल..
खैर एक विलक्षण शैली..राशोमोन/इन अ ग्रोव के अंदाजेबयाँ जैसा कुछ..जिसे फिर डायरी को इस्तेमाल कर आप अपना ही रंग दे देते हैं..पढते वक्त काफ़ी कुछ याद आता रहा..कभी गुलाल की किरन जेहन मे आयी..सिगरेट के बेचैन धुएँ मे अपना असंतोष, रोष बाहर निकालती हुई, तो कहीं पर मुझे चांद चाहिये की वर्षा भी..मगर इस कहानी की पटरी पर दौड़ती खयालों की रेलगाड़ी ऐसे स्टेशनों से घुमा ले गयी..जिन पर अकेले रह गये इंसान को कोई रिटर्न ट्रेन नही मिलती..सभ्य समाज के मुखौटों को तार्किक तरीके से उघाड़ती कहानी को हालांकि उत्तरार्ध मे डायरी कुछ ज्यादा ही सिम्पलीफ़ाइ कर देती है..मगर इससे उसके असर पर कोई अंतर नही आता.एक प्रवाह है जो पाठको को बहा ले जाता है..मझधार में
अंजलि के बारे मे और कुछ कहना भी अभी बाकी है..सो अभी और चक्कर लगाऊँगा..अभी तो अंजलि की बेचैन आत्मा ने ही जकड़ रखा है..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गज़ब का लिखते हो भाई. बिलकुल अलग तरह की कहानी. लाजवाब!

Sonal Gupta said...

dil chhu lene wali story h.....

Kishore Choudhary said...

@ अपूर्व, अंजलि एक सच्चा नाम है. मुझे अफ़सोस भी है कि ये एक कहानी मात्र नहीं है. उतरार्द्ध के सरल हो जाने की ओर आपने ठीक इशारा किया है. वहां तक पहुंचते - पहुंचते मैं अवसाद से इस कदर घिर गया कि मेरे मन ने हज़ार आवाज़ लगाई अंजलि को कि ' इस बेदम कर देने वाली कहानी से निकल कर बाहर आओ, हम दोनों बैठ कर सिगरेट पिया करेंगे'.
ज़िन्दगी में किसी को कितनी चीजों की जरुरत होती है कहा नहीं सकता मगर सिगरेट के अलावा अंजलि के दिल के करीब दो ही चीजें थी, बच्चन साहब की 'मधुशाला' और किशोर कुमार का गाया एक गीत, जिसे वह हमेशा सुना करती थी ' लहरों की तरह यादें दिल से टकराती है...'
अपनी ड्यूटी के दौरान ये गीत जब भी प्ले करता हूँ, स्टूडियो में उदास आँखों वाली अंजलि साकार हो उठती है. लाइव फोन इन कार्यक्रम के दौरान एक श्रोता की, इसी गीत की फरमाइश के बाद मेरे पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे, पिछले अट्ठारह साल से रेडियो पर बोलने वाला एक शख्स अपनी आवाज़ खो बैठा... सोच वही उलझ गयी कि अंजलि भी कहीं सुनती होगी क्या ?
दुनिया को छोड़ कर गए हुए अभी पांच साल हुए हैं मगर मैं उसे पाता हूँ हर कहीं... मेरा यकीन करो अपूर्व कि यह सब लिखते समय मेरी आँखें भर आई है. जबकि वह मेरी कोई नहीं थी और अब कहीं है भी नहीं, चंद दोस्तों के दिलों के सिवा. उसकी माँ जाने कैसे उसे याद करती होगी ? उसके पिता को अगर इस गीत के बारे में मालूम हो तो इसे सुन कर उन्हें कैसा लगता होगा ? या फिर वही मधुशाला अगर उसके कपबोर्ड में अभी रखी हो तो उसे देख कर क्या सोचते होंगे ?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

so sad!

सागर said...

आपसे बेहतर तो मैं लिखता हूँ कम से कम लोगों के पास कुछ कहने को होता है. भला ऐसा भी क्या लिखना जो सबको निरुत्तर कर दे :)

आपकी लिखी कहानी से उबरना मुश्किल होता है... देखिये ना १२ दिन पहले पढ़ी थी और आज भी कुछ कहते नहीं बन रहा

हिमान्शु मोहन said...

कैसे कहूँ कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं? मैं इस तरह की कहानियाँ पढ़ना बिल्कुल पसन्द नहीं करता। एक तो देर तक टीसती रहती हैं, फाँस सी - जाने कहाँ-कहाँ दर्द होता है! दूसरे शुरू करने के बाद बिना पूरी पढ़े छोड़ते नहीं बनता है इनको।
अजीब मनहूस उदासी सी छा जाती है दिलो-दमाग़ पर और …
बस्स!
सचमुच तुम बहुत बुरा लिखते हो!
जी भर के गाली भी नहीं दे पा रहा किसी को… ख़ुद को भी। कैसे जाए ये बेचैन करती उदासी। बहुत ताक़तवर लिखाई है आपकी किशोर जी! मगर प्रार्थना है कि ऐसा मत लिखा कीजिए, या फिर ऐसा कम लिखा कीजिए। आप बहुत अच्छा लिखते हैं - मगर बहुत हॉण्ट करता है आपका लिखा।

हरकीरत ' हीर' said...

बहुत दिनों बाद आई आपके ब्लॉग पे .....मुआफी चाहती हूँ .....ये नहीं कि याद नहीं आई थी ....पर आपकी ख़ामोशी से यही सोचती रही कि अभी तक कोई नई पोस्ट नहीं आई होगी .....
आपकी ये कहानी पढ़ते पढ़ते अपने हास्टल कि उस लड़की कि याद आ गयी जिसने पिछले साल खुदकुशी कर ली थी ....गोरी चिट्टी खूबसूरत ...उम्र यही कोई १८,२० के आस पास ...बगल के हास्टल में ६ महीने से रह रही थी ....मेरे होस्टल में उसी दिन आई ....आने से पहले कई बार हिदायते दे गयी ...मेरे कमरे में किसी और को सीट मत देना मुझे सिंगल रूम चाहिए ....पर वह अपने साथ सारा मौत का समान लिए आई ....फंदा डालने के लिए रस्सी ...ब्लेड ....नींद की गोलियां ...कागज़ - पेन और डैंडराइट ( आपको पता होगा डैंडराइट से ड्रग्स ली जाती है ) उसकी छत से झूलती हुई लाश आज भी आँखों के आगे तैर जाती है ....जाने आज की युवा पीढ़ी किस और जा रही है .....

कुछ टंकण कि गलतियां लगी इन पंक्तियों में .....देखिएगा .....
कै हो जाने से पहले की हालात में बैठे हुए लोगों के चहरे पर यहाँ से बाहर निकल पाने उम्मीद जगी, जब कुछ क्षणों के बाद बयान दर्ज किये जाने की प्रक्रिया आरंभ हुई.
@बहुत देर तक पार्क में बैठी रहने लगी. वह अजीब से सवाल करने भी लगी
@वह बेहद शांत थी और उसकी आँखें किसी शून्य के मोह में बंधी हुई दीख
@उसे सीढियां उतरते हुए देख लेने के बाद में आश्वस्त हो गया था.
@साहब में उसको अपने घर ले गया

Kishore Choudhary said...

@ हरकीरत हकीर,
आपने जिन टंकण सम्बन्धी गलतियों की ओर इशारा किया है वे वस्तुतः मेरी वाक्य विन्यास सम्बन्धी त्रुटियाँ है. मैं प्रयास करता हूँ कि शब्द सही लिखे जाएँ मगर बीस साल लिखने के बाद भी अगर नुक्ते छूट जाते हैं तो ये मूढ़ता की हद है. मेरी कमअक्ली में, ये बैठ गया है कि दीठ से जुड़ा होने के कारण दीख शब्द सही है फिर भी आज वडनेरकर जी को मेल करता हूँ. आखिरी पंक्ति जिसे आपने सुझाया है, उसमें "मैं" लिखा लिखा जाना था जो गलत लिखा गया है इसे अभी सही करता हूँ. आपका आभार.

Sunita Sharma said...

शब्द नही मिल रहे क्या कमेंट करे कहानी के जरिये यह कैसी तस्वीर दिखायी।

Rahul Singh said...

आपको मेल कर चुका हूं, यहां भी उपस्थिति दर्ज करा रहा हूं. बाकी सब टिप्‍पणियां पढने के बाद बस यही दुहराना है कि अंजलि की डायरी में मुझ जैसे पाठक के लिए कहानी में कथ्‍य के आकर्षण और प्रभाव से ज्‍यादा शैली का सम्‍मोहन है. अभिव्‍यक्तियां, सदैव विवरण, व्‍याख्‍या और स्‍पष्‍टीकरण नहीं बल्कि कई बार स्थिति को अधिक गूढ कर देने वाली पहेली बन जाती है, मेरे एक मित्र ने कहा कि जिसे मूढ आसानी से समझ लेता है.

M.A.Sharma "सेहर" said...

its a pleasure always to read you Kishore....journey deep within you.....Amazing flow !

anjule shyam said...

gahri kahani..jindgi ke uthle pan ko bayan karti hui..............shukriya.......

MUFLIS said...

कथानक के बहाव में ही
बह-सा गया हूँ कहीं
और खामोश भी हूँ ..
मालूम नहीं क्यों ...!?!

अल्पना वर्मा said...

हर बार की तरह सशक्त लेखन.
कहानी का प्रभाव रहेगा अभी ज़हन में!

manu said...

for the first time i have to ur blog n read the story bt honestly i wud like to say that u write in a very gud n attractive manner although i hvnt the whole story bt wht i read i foun it very nice
n my heartiest thanks to u too

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

किशोर भाई, अगर अपूर्व के शब्दो को यूज करू तो आपके शीर्षक के बार्बवायर्स से निकल भागना ही बहुत कठिन है... इस शीर्षक को कई बार पढा था, कहानी को आराम से आहिस्ता आहिस्ता पढना चाहता था.. कल ओफ़िस मे जैसे इस कहानी को शुरु भर किया, इसके चुम्बकत्व मे खिचता चला गया..

अंजलि को पढना जैसे शरतचन्द्र के किसी महिला पात्र को पढना था.. उस तन्ग कोठरी मे से डायरी से सच बाहर आता रहा.. और समाज पर जैसे कोई चमाट पर चमाट मारता रहा... धीरे धीरे वो कोडे की आवाजो मे बदल गये.. कहानी खत्म हुयी.. जैसे मेरे भीतर कुछ ज़िन्दा हो गया.. ५ महीने से सिगरेट छोडी हुयी थी (बीच बीच मे यारो-दोस्तो के साथ २ महीने मे एक बार पी ली) एक अज़ीब सी तलब जगी अंजलि के साथ सिगरेट पीने की... फ़ूक के आया... ये मेरी तरफ़ से अंजलि को श्रद्धान्जलि थी...

कन्टेन्ट और शैली सब जबरदस्त... कोशिश करूगा कि आपकी पुरानी कहानियो को पढू और सीखू... अंजलि की यादे बाटने आता रहूगा...

Manoj K said...

aaj pehli baar aapke blog par aaya aur aapka follower ban gaya...

the style of expression is great and as I get time, just going to read all of your posts

i must thank pankaj for the link on his blog..

Avinash Chandra said...

pahli baar aaya... aur yakin maaniye, bahut sukoon hua ki yahaan aaya.

aata rahunga...likhte rahein

Vivek VK Jain said...

Sir, ek avssad ki sthiti me la khada kiya aapne.....anjali sach si lagti hai aur samaaz gair sa.
ye 'anjali' agar haqiqat hai to bahutbhari hai sach.

गौतम राजरिशी said...

क्या था, नहीं था...नहीं पता, हाँ विगत कुछ महीनों से खुद को किशोर के तिलिस्म से बचाये रखने की कोशिश कर रहा था। हुआ यूं कि आपको पढ़-पढ़ कर जब खुद कहानी लिखने का शौक चर्राया तो देखा कि जब भी लिखने बैठता तो जैसे कलम में किशोर का शिल्प, किशोर की शैली पैवस्त हो जाती....फिर इतने दिनों आज मन नहीं ही माना आखिर तो छुट गयी कहानियां पढ़ने आ गया हूं।

अंजलि की कहानी अपने आस-पास की नहीं होते हुए भी जानी-पहचानी सी लगी। टैक्सी वाले को फतेहपुर सागर ले जाने के हुक्म से जाना कि प्लाट उदयपुर का ही है और बाद में अपूर्व को संबोधित टिप्पणी ने प्लाट के अन्य पर्दे भी खोल ही दिये हैं।

शिल्प अनूठा था इस बार का। पहले किरदारों के बयान के जरिये और बाद में डायरी का पन्नों ने कहानी को कहानी सा बना दिया...वो भी कुछ इस तरह से कि हर पाठक कहीं न कहीं से खुद को अंजलि से जुड़ा महसूस करने लगे।

अफसोस हो रहा है खुद पर कि क्यों इतने दिनों तक खुद को वंचित किये रखा इस तिलिस्म से...अब जा रहा हूं बाकियों को भी पढ़ने।

Jyoti Joshi Mitter said...

Very nice ! Reading the blog after a long time, first I read 'Gali ke chor par Andhere main doobi khidki' and than this .
I am actually stunned ! I never liked many writers writing about women, specially after having read Shivani for a very long time, but this post, simply wonderful......Thought provoking....
Looking forward to read more !

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