Friday, September 1, 2017

एक जोड़ी पुराने जूते

जब कहीं से लौटना होता है
तब दुःख होता कि यहाँ से क्यों जा रहे हैं.
किन्तु कभी-कभी
लौटते समय दुःख होता है कि आये क्यों थे.

रंग रोगन किये जाने और नया फर्श डाल लेने के बाद भी रेलवे स्टेशन में बदला हुआ कुछ नहीं दिख रहा था. वे दोनों आधा घंटा से इंतज़ार कर रहे थे. जिस ट्रेक पर गाड़ी आनी थी. वह खाली पड़ा हुआ था. दूसरे प्लेटफार्म पर लोकल लगी हुई थी. लोकल में बैठी सवारियों में कोई हलचल नहीं थी. खिड़कियों से दिखने वाली सूरतें गाड़ी की ही तरह ठहरी हुई थीं.

“अब लौट जाओ. मैं आराम से बैठ जाउंगी." जैस्मिन ने कहा.

शरद अख़बारों के ठेले को देख रहा था. अख़बारों पर छपे काले अक्षरों के बीच अटकी उसकी निगाह लौट आई. शरद ने कहा- "मैं जाकर क्या करूँगा. घर खाली होगा."

साल के आख़िरी सप्ताह भर जैस्मिन की छुट्टी थी. आज उस छुट्टी का आख़िरी दिन था. ये इस साल का भी आख़िरी दिन था. 'जाकर क्या करूंगा' ये कहकर शरद चुप खड़ा था.

जैस्मिन उल्लास से भरी शरद से मिलने आया करती थी. इस बार आने से पहले उसने सोचा था कि वह हर बार छुट्टी में शरद के पास आने की जगह कभी मम्मा के पास भी चली जाए तो कितना अच्छा हो. लेकिन उसे एक डर था कि शरद से बात किये बिना आना स्थगित करने से उसे बुरा लगेगा. शरद को बुरा लगने से भी अधिक इस बात की चिंता थी कि अब तक उसने जो कुछ इस रिश्ते में बोया है वह बेकार हो जायेगा. वह अगर फ़ोन करके शरद को कुछ भी कहती तो वह यही कहता कि मम्मा के पास कभी भी जा सकती हो, इसलिए उसने कोई फ़ोन न किया. वह मम्मा के पास जाने की जगह शरद के पास आ गई थी.

शरद ने जैस्मिन की अँगुलियों को पकड़ा. ट्रेक पर रेल आ रही थी. जैस्मिन शरद की तरफ मुड़ी. उसे गले लगाया. शरद ने उसके बालों में अंगुलियाँ घुमाते हुए कहा- "हमेशा भरोसे की चीज़ों के साथ ही रहना" जैस्मिन ने शरद से दूर होते हुए कहा- "हाँ"

रेल का एसी कोच उनके ठीक सामने ही रुका. रेल से कोई नहीं उतरा. कुछ लोग जो इंतज़ार में थे, वे रेल में चढ़ गए. स्टेशन खाली हो गया. शरद ने जाते हुए मुड़कर एक बार हाथ हिलाया. रेल के प्लेटफार्म छोड़ने तक जैस्मिन दरवाज़े पर खड़ी रही.

जैस्मिन के पास सामान ज़्यादा नहीं था. एक छोटा पिट्ठू और दो-तीन किताबें रखने जितना एक हैंडबैग. वह अपनी सीट के पास आकर पलभर खड़ी रही. पहले से यात्रा कर रहा एक आदमी लैपटॉप में कुछ काम कर रहा था. जैस्मिन के खड़े रहने को देखकर उस आदमी ने पूछा- "कौनसी सीट?"

"ट्वेंटी फाइव"

“वह सामने वाली लोवर" इतना कहते हुए आदमी ने अपने पैर समेट लिए. उसने लैपटॉप को अपनी सीट पर एक तरफ रख दिया. वह आदमी गैलेरी की तरफ देखने लगा. उसने जानना चाहा कि क्या कोई और भी पीछे आ रहा है. या बहुत सा सामान हो. उस सामान को सीट के नीचे रखना पड़े तो वह मदद कर सकता है.

जैस्मिन ने चादर बिछाई और खिड़की के कांच के पास पालथी लगाकर बैठ गयी.

आदमी ने लैपटॉप को फिर से अपने सामने रख लिया. आदमी ने हल्की निगाह से देखा. उसकी सहयात्री ने आँखें बंद कर ली थीं. वह पुश्त का सहारा लिए थी. उसके दोनों हाथ गोदी में रखे थे.

आदमी लैपटॉप में काम करने लग गया.

कोई दस-पंद्रह मिनट हुए होंगे. आदमी का ध्यान आवाज़ से टूटा. कंडेक्टर खड़ा हुआ था. कंडेक्टर ने पूछा था- "क्या ये पिछले स्टेशन से चढ़ीं हैं?"

उस आदमी ने जवाब दिया.- "जी"

“मैडम... हेलो.." कंडेक्टर की आवाज़ से जागते हुए जैस्मिन ने अपने हैंडबैग से आईडी प्रूफ खोजा और आगे बढ़ा दिया.

“आप अगर सोना चाहें तो ये लाईट ऑफ कर दूँ." आदमी ने ऐसा कहते हुए खिड़की से सरक गए परदे को ठीक किया.

जैस्मिन ने कहा- "नहीं आप काम कीजिये."

किसी के आते ही कितना कुछ बदल जाता है. रेल कोच के इस कूपे में बैठे आदमी ने पाया कि उसके अधिकार का बंटवारा हो गया है. अब तक खाली पड़े कूपे में बैठे उसे लग रहा था कि सबकुछ उसी का है. वे सब खाली सीटें उसी के लिए हैं. अब एक लड़की उसके सामने की शैय्या पर है तो अधिकार जाता रहा.

ऐसा सोचते हुए आदमी को लगा कि लड़की उसे देख रही है. वह भूल गया था कि लड़की कंडक्टर के आने से जाग गयी है. आदमी ने लड़की को अपनी ओर देखते हुए देखकर कहा- “ये कोई इतना ज़रूरी काम नहीं है. मैं यूं ही कुछ लिखता रहता हूँ." आदमी ने अपना लैपटॉप फिर से सीट पर रख दिया. उसने खिड़की के नीचे सीट के कोने में छुपी पानी की बोतल निकाली. जैस्मिन उसे देख रही थी इसलिए आदमी ने शिष्टाचार के नाते पानी के लिए पूछा.

जैस्मिन ने कहा- "थैंक यू. मेरे पास है" आदमी ने दो घूँट भरे और बोतल को उसी जगह रख दिया.

जैस्मिन ने पूछा- "आप यूं ही क्या लिखते हैं?"

"वह जो लोग जानते हैं मगर नहीं लिख पाते"

जैस्मिन ने पूछा- "क्या आप अनपढ़ लोगों के लिए काम करते हैं?"

“ऐसा नहीं है. मैं सबके लिए काम करता हूँ" आदमी ने धैर्य भरा जवाब दिया.

“जैसे पहले ख़त नवीस होते थे. वे जिनसे लोग चिट्ठियां लिखवाते थे" ऐसा कहते हुए जैस्मिन मुस्कुराई.

जैस्मिन को देखते हुए आदमी भी मुस्कुराया. "आपको पता है इस दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं. जिनके पास कहने को बेहिसाब ख़ूबसूरत बातें हैं लेकिन वे कह नहीं पाते. बहुत से लोगों के पास अद्भुत जानकारियां हैं लेकिन सलीके से लिखकर दुनिया के सामने कैसे रखा जाये? ये उनको नहीं आता." आदमी ने अपनी पीठ टिका ली थी. उसकी अँगुलियों से खिड़की का परदा छूट गया था.

जैस्मिन ने पूछा- "तो वे लोग बोलते हैं और आप उनकी बातों को अच्छे से लिखते हैं?"

“मैं उनकी बातें सुनता हूँ. फिर ये भी सुनने की कोशिश करता हूँ कि वे कौनसे शब्द हैं ? जो उन्होंने बोले नहीं. वो कौनसी बात है जो उनके दिमाग में है मगर उन्होंने कही नहीं है"

“मनोविज्ञान?"

आदमी मुस्कुराने लगा- "नहीं. घोस्ट राइटिंग"

जैस्मिन ने हँसते हुए कहा- "घोस्ट राइटिंग कितना भुतहा लगता है न? बचपन में मैंने जब ये शब्द पहली बार सुना था तब बहुत हंसी आई थी कि कोई भूत लिखता होगा"

जैस्मिन जब भी शरद के पास से लौट रही होती थी. रेल बहुत धीरे सरकती थी. बदन में शिथिलता उतर आती थी. मन मर जाता था. वह अपनी सीट पर चुप पड़ी रहती थी. इस यात्रा में एक अजनबी सामने की सीट पर था. जो बात करने में सहज लग रहा था.

कभी हम एक उदास झांक में खोये रहते हैं. एक जगह बैठे रहते हैं. हम कहीं नहीं जाते और इसी खोये रहने में बहुत दूर तक सफ़र हो जाता है. कभी हम जा रहे होते हैं मगर हमारी नज़र ठहरी रहती है. मन के भीतर से लावा की तरह कुछ बहता हुआ दूर तक पसरने लगता है. ऐसा लगता है कि रंग फीके पड़ गए हैं. हम राख़ के रंग में ढलते जा रहे हैं. चारों ओर पसरे सूखे-भुरभुरे, पपड़ीदार या हलके दलदली विस्तार पर निगाहें रुक जाती हैं.

जैस्मिन का ध्यान इस बात से टूटा कि सामने बैठा आदमी चाय लेकर आया था. दो कागज़ के कप थामे खड़ा था. जाने कब स्टेशन आया और कब वह उतरकर चाय लेता हुआ वापस भी आ गया. उसने कहा- "लीजिये"

जैस्मिन ने अपने पाँव सीट से नीचे किये. वह अपलक उस आदमी के चेहरे को देखती रही. आदमी ने कहा- "घोस्ट राइटिंग ही करता हूँ. ज़हरखुरानी का काम शुरू नहीं किया है."

"क्या भरोसा? ऐसे कैसे मान लूँ?" ऐसा कहते हुए जैस्मिन ने सोचा कि दोनों कप में कुछ मिलाया हुआ नहीं हो सकता है. एक में ही होगा. कितना अच्छा है कि नशीली चीज़ से कोई लूटना चाहे और हमारे पास तक़दीर जैसी चीज़ को आजमाने का अवसर हो.

जैस्मिन रेल में थी मगर उसे लग रहा था कि वह अब भी अपने ही चुने हुए रस्ते से ऐसी जगह गिर पड़ी है जहाँ केवल चिकनाई है. जैसे कोई चींटी किसी तेल लगी कड़ाही में गिर पड़ी हो. कुछ चीज़ें लौट कर क्यों नहीं आती. जैसे फैसला करने की घड़ी. जिसे हम लौटते ही बदल सकें. नया फैसला कर लें. जैस्मिन अपनी ज़िन्दगी की जेबें टटोलती तो याद करने लगती कि क्या वे दिन ऐसे ही थे. यकीन के लिए ख़ुद से बार-बार पूछती. कहो क्या सचमुच ऐसे ही? कहीं-कहीं बची हुई शिनाख्त से उड़कर गुज़रा मौसम लौटता कि वह टीनएज से बाहर आई एक लड़की है, जो खुल जीना चाहती है. वह अपनी पसंद के लोगों के साथ होने का सोचती है. वह सोचती है कि अब हर काम करने के लिए किसी की अनुमति न लेनी पड़ेगी. उसने शरद को चुना था. अपने आज़ाद होने के पहले ख़्वाब की तरह मगर वह एक चिपचिपे रिश्ते में गिर पड़ी थी. आज एक अजनबी आदमी के साथ इस तरह सहज हो जाने को उसे कौन धकेल रहा था. शायद टीनएज के बाद आज़ाद होने के ख़्वाब की याद धेकेल रही थी. 

अपने उलझे ख़यालों में वह देख रही थी कि दोनों हाथों में दो प्याले थे. जैसे वह शरद के पास लौट रही है या जैसे वह हमेशा के लिए शरद को छोड़कर जा रही है. आदमी की आवाज़ आई- "लीजिये घबराइए नहीं."

जैस्मिन ने कहा- "अच्छा सुनिए. आप सोचिये कि आपने किसी एक प्याले में कुछ मिला दिया है. किसी एक प्याले को सोच लीजिये." आदमी हैरत से मुस्कुराया. उसने कहा- "ठीक है सोच लिया" जैस्मिन ने अपना हाथ आगे बढाया. तर्जनी को एक कप की तरफ किया. फिर दूसरे की तरफ. फिर वापस. अचानक एक कप को छू दिया.

कप को छूने के समय जैस्मिन ने अपनी नज़रें उस आदमी के चेहरे पर जमाये रखी. वह देख लेना चाहती थी कि वहां क्या भाव आते हैं. आदमी का चेहरा भाव शून्य था. उसने कुछ प्रतिक्रिया न की. जैस्मिन ने इशारे से पूछा कि कौनसा कप सोचा था?

आदमी सीट पर बैठ चुका था. उसने मुस्कुराते हुए कहा- "मैं जो जवाब दूंगा. उस पर आप कैसे भरोसा करेंगी?"

जैस्मिन ने कहा- "हाँ ये बात तो है." चाय का घूँट भरते हुए उसने पूछा- "तो क्या जिन चीज़ों का लिखित प्रमाण न हों, उनके बारे में हमें हर बार अगले व्यक्ति की कही बात पर भरोसा ही करना होगा."

आदमी खिड़की से बाहर देख रहा था. उसने अपना चेहरा जैस्मिन की ओर घुमाया. "किसी भी बात के बारे में पक्का और स्थायी कुछ नहीं कहा जा सकता."

जैस्मिन के पास शरद की दुनिया की बातें थी. वे बातें अक्सर उसे परेशान करती थी. उसे लगता था कि शरद एकतरफा सोचता है. इससे भी ज़्यादा वह जो सोचता है उसमें कोई नयी चीज़ शामिल ही नहीं हो पाती. वह बेहद तनहा होती है. तब शरद से कहती है कि यहाँ रहा नहीं जा रहा. तो शरद के पास एक ही जवाब होता है. अगली छुट्टी में कितने दिन बचे हैं. यूं भी हमको कुछ होने वाला नहीं है. ऐसे जवाब सुनकर जैस्मिन को लगता कि शरद को उसकी उदासी और उदासी से आया दुःख समझ नहीं आता. या वह समझना नहीं चाहता.

जैस्मिन ने आदमी से पूछा- "जब आप किसी के दुःख लिखते हैं तब आपको दुःख नहीं होता?"

आदमी ने कहा- "नहीं, ये एक अवस्था है. कुछ सोचते हुए खो जाने की अवस्था. आपको पता है कि ऐसी अवस्था में पंछी और जानवर दुःख नहीं करते. वे इसे भोगते हुए टाल देते हैं. मैं कई बार उनको देखता हूँ. लगभग सांस रोके पड़े हुए जानवर मृत दिखाई देते हैं. जैसे जीवन विदा ले चुका हो और नष्ट होने के इंतज़ार में देह पड़ी हो. उनको देखते हुए मैं ठहर जाता हूँ. फिर मैं अचानक देखता हूँ कि पंछी उड़ जाता है. जानवर खड़ा हो जाता है. इसी तरह मैं भी किसी के दुःख लिख देने के बाद बाहर आ जाता हूँ."

रेल इंजन और पहियों का मद्धम शोर कोच के भीतर तक आ रहा था. खिड़की के बाहर कहीं-कहीं बादलों की छाँव के टुकड़े दीखते थे. सूनी बंजर ज़मीन के फैलाव के बीच खड़े कुछ आधे सूखे से पेड़ पीछे छूटते जा रहे थे. उन पेड़ों को देखते हुए फिर से शरद की याद आई. क्या वह भी कभी इसी तरह पीछे छूट जायेगा. क्या मैं कभी रेलगाड़ी की तरह सम्बन्ध के इस बंजर के पार गुज़र सकूंगी? ऐसा सोचते हुए जैस्मिन ने कहा- "क्या किसी इन्सान को सुनना, उसको जीना नहीं होता.?"

“हाँ होता है. लेकिन मैं ख़ुद को याद दिलाता रहता हूँ कि ये उसका जीवन है."

“तो जब आप किसी के साथ रहते हैं तब उससे ज़रा भी नहीं जुड़ते?"

आदमी ने जैस्मिन से पूछा- "आप अकेली हैं या किसी रिलेशन में हैं?"

जैस्मिन इस सवाल में उलझ गयी. उसने टालते हुए पूछा- "इससे क्या हमारे जुड़ने न जुड़ने में फर्क आता है?"

“नहीं कोई फर्क नहीं आता. मगर आप ब्लड रिलेशन के बाहर किसी रिश्ते में रही होती तो आसानी से समझ पाती."

जैस्मिन ने कहा- "आप बताएं मैं समझ जाउंगी"

“देखिये हम जिससे प्रेम करते हैं. उसके दुःख-सुख से जुड़ जाते हैं. लेकिन आप अगर कभी ध्यान से सोचे तो पाएंगे कि आप उसके लिए कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं. आप उसके दुखों में रोने और सुख में ख़ुश होने के समानांतर जीवन में लग जाते हैं. ऐसा करने की जगह उस व्यक्ति की ख़ुशी और दुःख को समझना ज्यादा अच्छा होता है. इस तरह आप उसका साथ अच्छे से दे पाते हैं. लेकिन हम या तो उसके साथ दुखी-सुखी होते हैं या उसकी परवाह ही नहीं करते." इतना कहकर आदमी गैलेरी में झांकने लगा.

शरद और जैस्मिन कई महीनों से साथ थे. पहली बार जैस्मिन को तब अजीब लगा जब शरद ने कहा था कि जीवन में नयापन, एक नयी तकलीफ है. जैस्मिन ने इस पर सवाल पूछा कि ऐसा कैसे? शरद ने कहा- "मैं नयी बातें, चीज़ें और जगहें नहीं चाहता हूँ. बस."

उस शाम जैस्मिन ने कहा- "ये तुम कैसे कर सकते हो. असल में हर पल नया है."

उसी शाम की याद हमेशा उदास करती थी. जैस्मिन को लगता था कि शरद सचमुच बहुत ठहर गया है. उसके जीवन में कोई उत्साह नहीं बचा है. शायद इसीलिए उन दोनों के बीच का रिश्ता बेहद करीब का होते हुए भी अक्सर रुखा-ठंडा और बेजान सा लगता है.

जैस्मिन ने सामने चुप बैठे आदमी से कहा- "अच्छा अपने लिखने की कोई ऐसी बात बताओ जो आपको बहुत पसंद हो."

आदमी ने कहा- "मुझे बहुत सी बातें पसंद हैं. जैसे एक बार मुझे एक जोड़े ने अपनी कहानी लिखने को बुलाया था. वे दोनों अपनी कहानी लिखना चाहते थे. उनको किसी ऐसे व्यक्ति की ही तलाश थी जो उनकी कहानी लिखकर उको दे और वे उसे अपने नाम से छपवा सकें. आदमी की उम्र चालीस के आस पास थी और उसकी पत्नी शायद चार-पांच साल छोटी रही होगी. मैं उनके साथ सिटिंग्स लेता था. हम कोई चालीस दिन मिले. फिर मैंने उनकी कहानी लिख दी. वे असल में अपना जीवन लिखवाना चाहते थे. उनको यकीन था कि ऐसा बुरा किसी के जीवन में नहीं हुआ है. इसे लोग पढ़ें और उनके दुःख के बारे में जानें. उन्होंने ये भी तय किया हुआ था कि वे इस किताब को लिख लेने के बाद जीवन का ज़रूरी फैसला लेंगे."

ये बताते हुए आदमी की आँखें किसी पुरानी याद से चमक उठी- "उस लम्बी कहानी में गहरा दुःख था. उन्होंने जो कुछ खोया था, वह अविश्वसनीय था. मैंने उनकी कहानी लिखकर दे दी. इसके बाद उन्होंने मुझसे यही बात पूछी जो आपने पूछी है कि कोई ऐसी कहानी बताओ जो आपने लिखी हो और आपको खूब पसंद हो."

“तो मैंने एक बेहद सरल सी बात यानी ऐसी सामान्य घटना जो हम रोज़ देखते हैं. उस घटना को उनके मेल पर भेज दिया. मैंने उनसे कहा था कि ये आप आराम से पढना." ऐसा कहते हुए घोस्ट राइटर ने जैस्मिन से पूछा आपको सुनाऊँ?

जैस्मिन ने कहा- "कितना अच्छा है न कि लोग कहानियां पढ़ते हुए यात्राएँ करते हैं और मुझे कहानी सुनाने वाला सहयात्री मिल गया है. आप सुनाइए. मुझे अच्छा लगेगा."

आदमी कहानी सुनाने लगा- “मेरे दफ़्तर के एक कमरे में कबूतर का एक जोड़ा रहता था. कमरे के रोशनदान में उन्होंने घरोंदा बना रखा था. वहां से उनको उड़ाने के खूब जतन किये जाते थे. वे कबूतर किसी न किसी तरीके से लौट आते. एक रोज़ मेरा ध्यान उधर गया. जहाँ कबूतर बैठे रहते थे. वह जगह सूनी पड़ी थी. आँगन पर कितना कचरा है? ये देखने के लिए मैं उधर गया. देखा तो पाया कि वहाँ एक अंडा फूटा पड़ा है. कुछ एक तिनके बिखरे हैं मगर कबूतरों की गंदगी लगभग नहीं है.

रोशनदान खाली पड़ा था. उस जगह जब कबूतरों को नहीं देखा तो निगाहें इधर-उधर कबूतरों को खोजने लगी. बाहर पास ही के एक छज्जे पर दो जोड़े बैठे थे. उनको देखकर मैं कभी नहीं कह सकता कि ये वही कबूतर हैं. जो जिद्दी थे और उस जगह को नहीं छोड़ते थे. लेकिन अब वह जगह खाली पड़ी हुई थी.

ऐसा क्या हुआ? मैंने कई सारी बातें सोची. वजहें तलाशी.

क्या कबूतरों ने उस जगह को दुःख के कारण छोड़ दिया था? क्या कबूतर समझते हैं कि जब तक वे फिर से अंडे न दे सकें तब तक अंडे के फूट जाने के दुःख से दूर हो जाएँ. वे कबूतर अगर दो-एक रोज़ वहां रुकते तो उनकी गंदगी से फूटे हुए अंडे की छवि ढक जाती. वे अपनी प्रिय जगह पर रह सकते थे.

क्या सचमुच पंछी दुखी होते हैं? क्या वे ये भी समझते हैं कि दुखों का इलाज सिर्फ दुखों का त्याग है. कबूतरों के जीवन में जो सीलापन आया, उसे छोड़कर उन्होंने नयी जगह चुनी. या कोई और वजह थी. मैं कभी समझ नहीं पाया. मगर इतना तो था ही कि कबूतर अपने दुःख को छोड़ गए थे."

आदमी ने ये बात सुनाने के बाद कहा- "मेरी लिखी ये बात उन्होंने मालूम नहीं कब पढ़ी. उन्होंने मुझे तीन महीने बाद फोन किया. हम फिर से उसी जगह मिले. उन्होंने कहा कि उनके घर में नया बेबी आने वाला है. वे अपने असमय के दुखों को स्वीकार ही नहीं पाए थे. लेकिन मेरी कबूतरों वाली कहानी पढने के बाद उन्होंने कई बार जीवन के बारे में नए सिरे से सोचा था. आख़िर उन्होंने तय किया कि जीवन नित नए हो जाने का नाम है. पुराने दुखों को गले लगाये जीने का कोई अर्थ नहीं होता. वे दुःख केवल एक सीख भर हो सकते हैं"

जैस्मिन ने कहा- "क्या नई चीज़ें और नयी जगहें दुखों से बाहर आने में मदद करती है?"

उस आदमी ने कहा- "मैं नहीं जानता. लेकिन मैं कई बार उदास होता हूँ. मेरी समझ ठहर जाती है. मुझ में उदासी के प्रति समर्पण करने की हताशा जागती है. फिर मैं कई बार उन कबूतरों को याद करता हूँ. मुझे नहीं मालूम कि मैंने उनके बारे में जो सोचा वह एक कल्पना भर है या किसी वास्तविकता के आस-पास की बात है. लेकिन ये मुझे थोड़ा हौसला देता है. मैं ख़ुद को याद दिलाता हूँ कि तुम एक मनुष्य हो. मनुष्य चिंतनशील हो सकते हैं. उदासी और दुखों के बारे में ये सोचकर तय क्यों नहीं करते कि तुम जिसके साथ हो वह दुःख से दूर उड़कर कहीं तुम्हारे साथ जा बैठता है या फिर दुखों के सीलेपन पर परदे डालता रहता है."

“अच्छा एक सवाल पूछूं?" जैस्मिन ने कहा.

आदमी ने कहा- "हाँ पूछो."

“हम कितनी भी कोशिश करें लेकिन जीवन का नष्ट हो जाना तय है. तो हम कोशिश करने की तकलीफ क्यों उठाते जाते हैं. इन नाकाम कोशिशों से हम उदास, निराश और फिर हताश होते रहते हैं."

आदमी हंसने लगा- "मैं दूसरों के लिए लिखने का काम करता हूँ. ऐसे सवालों के जवाब दे सकता तो अच्छा प्रवचनकर्ता बन जाता."

“हाँ वह दुनिया का सबसे अधिक फलदायी कार्य है लेकिन प्लीज़ आप बताइए न. क्या सचमुच जीवन जब नष्ट होना ही हो, तो हमें कुछ न करना चाहिए?"

आदमी ने बड़े स्नेह से जैस्मिन को देखते हुए कहा- "मैं अपने आप से कहता हूँ कि चीज़ों का नष्ट होना, उनकी चाहना और नियति है. जैसे फल को खाया जा सकता है. फल को कुदरत ने खाए जाने के लिए ही बनाया है. आदमी खायेगा, जानवर खायेगा, पंछी खायेंगे. इनमें से किसी ने नहीं खाया तो कुदरत कीड़ों को मौका देगी. वह एक आखिरी मौका होगा. इसी तरह चीज़ें बनी होती हैं. वे अपनी और बुलाती हैं. ये उनकी प्रकृति है. वे बुलाये बिना रह नहीं सकती. उनकी पूर्णता इन्हीं बुलावों में छिपी हैं. हम क्यों दुःख मनाएं? क्या कोई ऐसी चीज़ हमने इस दुनिया में देखी है. जो अपने आपको बचाए हुए हो? ऐसा कुछ नहीं है. बदलाव में ही जीवन है. चीज़ों को गिरने दो. उनको नष्ट होने दो. उनका लोभ त्याग दो. उनके भले की जो तुम कामना करते हो असल में वह उनकी आंतरिक प्रवृति का विरोध है. उन्हें नष्ट होने के लिए कोई माध्यम चाहिए ही."

आदमी ने इतना कहते हुए सीट के नीचे से अपना बैकपैक बाहर खींचा. उसने कहा- "मेरा स्टेशन आने को है. आपसे बातें करते हुए समय का मालूम ही न हुआ." जैस्मिन ने अचरज से बाहर देखा. ये तो उसी का स्टॉप था.

जैस्मिन ने अपना सामान उठाते हुए उस आदमी को कहा- "थैंक यू" फिर दूर जा रहे आदमी से पूछा क्या आप इसी शहर में रहते हैं?" आदमी ने कहा- "अभी सात दिन पहले ही इस शहर में आया हूँ. आप अपना ख़याल रखना. बाय" दूर जाते हुए आदमी ने मुड़कर दो-तीन बार देखा.

जैस्मिन प्लेटफार्म पर खड़ी थी.

भीड़ का रेला गुज़र गया था. तीन-चार सूटकेस उठाये कुली ने पास से गुज़रते हुए कहा-"संभलना मैडम" जैस्मिन चौंक कर बेख़याली से बाहर आई. वह शरद को सोच रही थी. शरद ने कहा था- "नए साल में पुराने जूते पहन कर जाना." ये सुनकर जैस्मिन ने हँसते हुए पूछा था- "इसका क्या मतलब है?"

शरद ने कहा- "पुराने दुखों के साथ रहना अच्छा है कि नए दुःख जाने कैसे निकलें."

जैस्मिन और शरद की बातें एक धावक और उसकी बाधाओं जैसी थी. जैस्मिन जीवन के प्रति लालायित होकर भागती थी. शरद उसकी राह में बाधाएं खड़ी करता था. शरद का कहना था कि कुछ न करो. कुछ नया करना भी नष्ट होने को ही होगा.

जैस्मिन के भीतर एक सीलापन उतरता था. उसे एक बासी गंध घेर लेती थी. वह इस सब से उकता गयी थी. जैस्मिन को लगा कि वह आदमी सही कर रहा था. शरद एक फूटे हुए अंडे के पास बैठ गया था. उसने दुखों को त्यागने का कभी सोचा ही नहीं. या उसने जीवन को जीने के बारे में सोचा ही नहीं था. वह उसे एक ही तरीके से घसीट रहा था. जैस्मिन इसी से परेशान थी.

शायद इसलिए ही इस बार लौटते हुए जैस्मिन को लगा कि उसने शरद के पास आकर गलती की है. वह उसके लिए या उसके जैसा नहीं है. इस रिश्ते को केवल ढोया जा सकता है.

एक बारिश की फुहार आई. अचानक और तेज़ बारिश आने लगी. प्लेटफार्म पर बचे लोग शेड्स के नीचे सिकुड़ने लगे. जैस्मिन भीगने लगी. उसने अपनी चाल धीमे कर दी. वह भीगती हुई आहिस्ता बाहर आई. स्टेशन के बाहर सड़क पर पानी बह रहा था.

जैस्मिन ने चाहा कि पांव से बहते हुए पानी को छूकर देखे. उसने अपना एक जूता उतारा. जूता खुलते ही तेज़ बहाव में बह गया. उसने जूते को पानी में डूबते तैरते हुए देखा. जूता बहुत दूर जा चुका था. वह मुस्कुराई और दूसरा जूता भी खोल दिया.

बारिश में भीगते हुए उसने सोचा कि नए जूते खरीद ले लेकिन बिना जूतों के उसे अच्छा लग रहा था. कैब के आते ही वह नंगे पाँव कैब में बैठ गयी.

पंद्रह मिनट लगातार वह कैब की खिड़की से बाहर देखती रही. जिस शहर में पिछले पांच साल से रह रही थी, उसे उसने बहुत कम देखा था. सोसाइटी तक के पूरे रास्ते में जगमग दुकानें थी. वह नए बच्चे की जिज्ञासा भरी आँखों से देख रही थी. इससे पहले वह जब भी आई उसने कार के कभी बाहर नहीं देखा था. वह जीपीएस पर रास्ते को ट्रेक करती या आँखें मूंदे हुए फ्लेट तक पहुँचने का इंतज़ार करती थी.

कैब सोसाइटी के गेट पर आई तब जैस्मिन ने हड़बड़ी में कहा- "भैया रोकना."

सोसायटी के संकरे वाले गेट से एक स्कूटर निकला. स्कूटर पर वही आदमी था. वो जो रेलगाड़ी में सामने की सीट पर था. कैब रुकी तब तक वो गेट से बाहर जा चुका था. जैस्मिन ने कैब वाले से कहा- "बस यहीं तक"

सोसाइटी के गेट के बाहर से ही कैब वापस मुड़ गयी. सड़क खाली थी. स्कूटर पर सामने से गुज़रा आदमी पल भर में एक याद बनकर रह गया था. अभी-अभी उसके यहाँ से गुजरने की याद. जैस्मिन ने कुछ देर सड़क पर दूर तक देखा.

जैस्मिन अन्दर आ गयी. वह सिक्योरिटी के पास पलभर को रुकी. उसने चाहा कि पूछे. अभी जो स्कूटर वाला गया उसका नाम क्या है? क्या यहीं रहता है? लेकिन उसने नहीं पूछा. वह नंगे पाँव अपने फ्लेट की तरफ जजाने लगी. उसने ये पहली बार देखा कि सीमेंट के ब्लॉक्स से बने रास्ते में हर ब्लॉक के बीच छूटी हुई जगह में कोमल घास उगी हुई है.

जैस्मिन ने ख़ुद से पूछा कि तुमने इतनी जल्दबाज़ी में कैब क्यों रुकवाई. तुम सिक्योरिटी वालों से उस आदमी के बारे में जानने को उतावली क्यों हो? इसका जवाब ख़ुद ही देती मगर उसके पांवों में घास से गुदगुदी हो रही थी. उसे अपने कमरे के बिस्तर तक पहुँच जाने को जल्दी होने लगी थी.

* * *

[Paintin image courtesy ; Pintrest account of Katy Koloman]

Tuesday, April 19, 2016

सुरिन तुम्हें याद है, वहां एक नन्हा गुलमोहर था.



[जब इस कहानी को पढना शुरू करें तब घर से बाहर निकल आयें. सूनी सड़क से होते हुए धूप का लिबास ओढ़े एक कैफ़े में घुस जाएँ. वहीँ बैठें और चुप कहानी को देखते रहें.]


तुम कब से बैठी हो? 


चालीस मिनट से. 

सब मेज खाली पड़ी हुई थीं. बिना खिड़की वाली इकलौती साबुत दीवार के बीच टंगे टीवी पर क्रिकेट मैच का प्रसारण दिख रहा था. उसे देखने वाला कोई नहीं था. दुनिया के किसी कोने में खिलाड़ी अपने खेल में मग्न थे. एक उड़ती निग़ाह उस तरफ डाल लेने के बाद जतिन ने सामने की कुर्सी को थोड़ा पीछे खींचा. मेज पर कोहनियाँ टिका कर बैठ गया. 

चालीस मिनट? 

"हाँ" कहते हुए सुरिन ने जतिन की आँखों में देखा. आँखों में झाँक से नीचे उतरते हुए सुरिन ने देखा कि जतिन की आँखों के नीचे हलकी स्याही थी. स्याही के नीचे गालों पर कुछ बेहद छोटी लाल फुंसियाँ निकली हुईं थी. बाल लम्बे थे और कलमें बेतरतीब थीं. 

वह उसे देख रही थी तभी उसका ध्यान टूटा. जतिन कह रहा था- तुम्हारे ब्रेसलेट के सुरमई पत्थर अच्छे हैं. तुम्हें सलेटी रंग पसंद है न ? 

हाँ. मगर हल्का सलेटी. 


काउंटर पर एक लड़का बैठा हुआ था. बाकी कोई दिख नहीं रहा था. प्रीपेड था सबकुछ. वे वहां आराम से बैठ सकते थे. जब तक कि बहुत से लोग न आ जाएँ और मेजें खाली न बचें. काउंटर वाला लड़का क्रिकेट मैच से अनजान ऊँचे स्टूल पर दीवार का सहारा लिए बैठा था. जतिन और सुरिन ने एक-आध बार उसकी तरफ निगाह डाली और फिर वे दोनों लम्बे शीशे के बाहर पसरी हुई दुपहरी को देखने लगे. 

"ये चुभता है" 

जतिन ने कहा- क्या? 

समय. 

जतिन का मन अचानक किसी छोटे बच्चे की तरह एक सीढ़ी से गिर पड़ा.- "क्या हुआ है?" 

"कुछ नहीं." 

"क्या कुछ नहीं?" 

उस शहर में बेहिसाब कबूतर थे मगर सब रोशनदानों और छज्जों पर चुप बैठे थे. 

जतिन ने फिर से कहा- "बताओ !!" 

सुरिन ने जाने किस से मुंह फेर रखा था, जतिन से या अपने आप से. मगर उसके मुंह से एक शब्द निकला- "ज़िन्दगी." 

बाहर सड़क पर पड़े कागज़ के खाली कप को हवा उड़ाकर अपने साथ ले गयी. 

[हवा के झोंके से उड़ा पत्ता जाने कहाँ गिरे, तुम हैरत करना, दुःख न करना]


सुरिन टेबल की तरफ नज़र किये चुप बैठी थी. जतिन उठकर कुछ लेने गया. सुरिन ने जब नज़र उठाई जतिन उसके सामने बैठा था. जतिन ने दोनों प्यालों की ओर देखते हुए सुरिन से पूछा- “बोलो कौनसा?”

सुरिन ने दोनों प्यालों को नहीं देखा. वह जतिन की आँखों में देखते हुए हलके से मुस्कुराई. जतिन ने कहा- “चुन लो, फिर कहोगी तुम्हारे कारण पीना पड़ा.”

“दोनों में क्या है?”

“कॉफ़ी”

“इसमें कौनसी”

“फ्लेट वाइट”

“और इसमें”

“फ्लेट वाइट”

अचानक से सुरिन की आँखों से मुस्कराहट खो गयी- “क्या तुम कभी थोड़े से बड़े हो जाओगे? मुझे तुम्हारी कुछ चीज़ें जो अच्छी लगती थी, अब उनका न बदलना अच्छा नहीं लगता.”

जतिन ने पूछा- “तुम्हारा हाथ छू लूँ?”

सुरिन की आँखें से खोई मुस्कान से बनी खाली जगह को भरने के लिए दो बूंदें चली आई. “मुझे मालूम है. मेरे हाँ कहने पर तुम कहोगे कि छूना थोड़े ही था, पूछना था”

गरम रुत थी. हवा बुहारने के काम पर लगी थी. बड़े शीशे के पार कुछ एक कागज़ के टुकड़े उड़ते जा रहे थे. कबूतरों ने आकाश के सूनेपन को बिखेरने के लिए एक फेरा दिया. वे लयबद्ध कलाबाज़ी खाते हुए खिड़कियों, छज्जों, मुंडेरों और तारों पर बैठ गए.

“वो पहली बार इस तरह घर आया जैसे वहां पहले बहुत बार आ चुका हो. वह सोफे पर इस तरह बैठा जैसे हमेशा से वहीँ बैठता रहा हो. मेरे घर वाले बहुत कुछ औपचारिक सी तैयारी करके बैठे थे. चाय की पूछताछ हुई तो वह खड़ा होकर रसोई कहाँ है ? पूछता हुआ मम्मा के पीछे चल दिया. मम्मा हैरत से देख रही थी. वह अचानक मुस्कुराई और कहा- “आइये.” मम्मा आगे और वह पीछे. उसने पूछा- “अदरक कहाँ रखी है.” जवाब मिलने से पहले ही वो फ्रीज़ खोलकर अदरक निकाल चुका था और उसे कूटने के लिए कुछ खोजने लगा.” सुरिन की आँखों में एक चेहरा था. वह उसी को देखते हुए जतिन को कह रही थी.

जतिन को बस इतना भर मालूम था कि सुरिन का होने वाला था. हो गया था. और है. वो उसके बारे में कुछ नहीं जानता था. जतिन ने कहा- “हाँ आज भी अगर तुम हां कहती तो भी मैं तुम्हारे हाथ नहीं छूता... वैसे वो कैसे छूता है?”

"शटअप"

"क्या?"

“कुछ नहीं... मालूम है सब चौंक गए थे. चाय पीने के ठीक बाद उसने कहा- “अब चलते हैं.” उसके साथ उसके भाई और भाभी थे. वे अचकचाए किन्तु वह खड़ा हो गया था. मेरे पापा कुछ न बोले. मम्मा बोली थी- “खाना खाकर जाइए.” वह हँसते हुए कहने लगा- “मेरी खाना बनाने की इच्छा नहीं है.” अपनी बात को बीच में रोक कर सुरिन ने प्याले की ओर देखते हुए कहा- “चीनी तुम डालोगे या मैं डालूं?”

जतिन ने कहा- “चख लो”

कॉफी मीठी थी. सुरिन से जतिन ने कहा- “तुमको कैसा लगा था?”

“मुझे अजीब लगा था. अव्वल तो ये ही अजीब है कि कोई किसी लड़की को देखने आये. फिर ये सब तमाशा करना. मगर जब हम सब बाहर आये न तब उसने मुझे कहा- “एक मिनट इधर आना तो...” मैंने देखा कि मम्मी और पापा हम दोनों को देखना छोड़कर उसके भैया भाभी के सामने देखने लगे थे. उन्होंने हमसे नज़रें फेर ली थी. जैसे कह रहे हों, जाओ बात कर लो.  मैं उसकी तरफ गयी. उसने कहा- “सॉरी, ये सब मुझे अच्छा नहीं लगता. मैंने पहले ही हाँ कर दी थी. मगर घरवाले माने ही नहीं. कहते रहे जाओ देखकर आओ. फिर मैंने सोचा देखने के बहाने तुमसे पूछ लूँगा कि क्या मैं तुमको पसंद हूँ.”

जतिन ने कहा- “वो बेहद अच्छा आदमी है”

सुरिन ने जतिन के होठ पर लगे कॉफ़ी के छोटे से झाग को अपनी अंगुली से मिटाते हुए कहा-“हाँ वो बेहद अच्छा आदमी है”

[मुस्कुराते हुए होठ कई बार एक ठहरी हुई छवि भी हो सकते हैं, अक्सर समय बह चुका होता है और चीज़ें बदल चुकी होती हैं]

एक बार उसने सुरिन से कहा था- “हम कॉफ़ी पीने के लिए आते हैं या कोई और वजह है?” सवाल सुनकर सुरिन के बंद होठों पर हंसी ठहर गयी थी. सुरिन ने कहा- “पगले ये उबला हुआ पानी पीने कौन आता है? ये कॉफ़ी तो बहाना है. असल में तुम्हारे साथ बैठने में मजा आता है. मैं बहुत सी बातें भूल जाती हूँ. जब तक हम साथ होते हैं मन जाने क्यों सब सवालों को एक तरफ रख देता है.” 

ये सुनकर जतिन ने पीठ से कुर्सी की टेक ले ली थी. उसे ऐसे देखकर सुरिन मुस्कुराई थी. जतिन ने पूछा- “अब किस बात की मुस्कान है?” सुरिन ने टेबल पर रखे सेल फोन को गोल घुमाते हुए कहा- “कभी बताउंगी तुमको” जतिन टेक छोड़कर सीधा हो गया- “अभी बताओ” सुरिन फिर से मुस्कुराई. जतिन ने फिर से कहा- “प्लीज अभी बताओ” सुरिन ने उसे कुछ न बताया- “तुम अभी ये समझने के लायक ही नहीं हो” 

जतिन ने उसकी अँगुलियों के बीच गोल घूम रहे फोन को उठा लिया. “अब ये नहीं मिलेगा. जब तक नहीं बताओगी, मैं दूंगा ही नहीं.” 

“है क्या तुमको... गधे कहीं के” सुरिन ने लगभग झल्लाते हुए उसके पास से फोन छीन लेना चाहा. जतिन ने कुछ देर हाथ पीछे किये रखे मगर उसे लगा कि सुरिन लगभग रोने जैसी होने वाली है. “ये क्या? तुम मजाक करो तो कुछ नहीं. मैं करूँ तो पल में रुआंसा.” 

सुरिन चुप बैठी रही. वह कुछ न बोली. जतिन ने फिर से कहा- “अरे ऐसे ही लिया था, सचमुच का ले थोड़े ही जाता.”

जतिन ने कई बार कहा और फिर वह चुप हो गया. सुरिन उदास बैठी रही. उसने सामने रखे फोन को नहीं छुआ. 

भरी गरमी के मौसम में बाहर सडक पर कोई छाँव का टुकड़ा आया. कोई राह भूला हुआ बादल हवा की मद्धम लय से इस तरह बह रहा था, जैसे रुका हुआ हो. वे दोनों बाहर उसी छाँव को देख रहे थे. छाँव धीरे-धीरे उनसे दूर जा रही थी. 

“चलते हैं” ऐसा कहते हुए सुरिन ने अपने थैले में पानी की बोतल रखी. फोन को अगली जेब में रखा. छोटा वाला पर्स बाहर निकाल कर हाथ में ले लिए. सुरिन बिना इंतजार किये रवाना हो गयी. जतिन उसके पीछे था. वे बाहर जाने के पतले से, नीम अँधेरे वाले रास्ते में फोम पर बिछे हुए कारपेट पर चल रहे थे. ऐसा लगता था जैसे कोई रुई के फाहों से बना रास्ता है. छोटे दरवाज़े तक आते ही सुरिन रुकी. उसने पीछे देखा. जतिन उसके पास ही खड़ा था. वह जतिन को देखने लगी और जतिन चुप खड़ा रहा. कुछ पल देखने के बाद सुरिन मुड़ी और चल पड़ी. 

वे सड़क तक आये. जतिन ने कुछ न बोला. सुरिन ने एक ऑटो वाले को रुकवाया. उसने पूछा कहाँ जाना है. सुरिन ने जतिन को कहा- “अब बताओ इसको कहाँ जाना है?” जतिन ने कहा- “मुझे क्या मालूम. बिना बताये तुम उठकर आई हो.” 

“कोई ऐसी जगह मालूम है जहाँ अच्छी कॉफ़ी मिलती हो?” 

“हाँ” 

वे दोनों ऑटो में बैठे हुए थे. सुरिन ने कहा- “एक बार मम्मा ने पापा से कहा कि आज शाम को बाहर चलते हैं. पापा ने बिना किसी भाव के कहा- हाँ चलो. हम तीनों बाहर गए. अजीब सा हाल था. न मम्मा ने पापा से कुछ कहा, न उन्होंने कुछ पूछा. हम जहाँ गए थे, वहां बड़ा सुन्दर माहौल था. बहुत से लोग थे. आपस में हंसते हुए, एक दूजे से सटकर खड़े कुछ खाते पीते हुए. हमने भी वहीँ कुछ खाया. मम्मा जो खुद अपने मन से बाहर जाना चाहती थी, वह खुश नहीं दिखी. मुझे इतना दुःख हुआ कि मैं सोचती रही कि काश मैं साथ न आती. पापा नार्मल थे. हम लोग घर लौट आये. मैं अपने कमरे में चली गयी. मैं बहुत देर तक सोचती रही. काश पापा ने थोड़ा गर्मजोशी से कहा होता- हाँ बाहर चलते हैं.” 

[ठंडी हवा जब लोहे को छूकर गुजरती है तब वह भी शीतल हो जाता है. आदमी मगर ये बात नहीं समझता.]


उस दिन जब वे दोनों एक नयी जगह पर बैठे हुए दूसरी बार कॉफ़ी पी रहे थे तभी सुरिन ने पूछा- “मैं जब भी बुलाऊं तब क्या तुम हर बार इस तरह कॉफ़ी पीने आ सकोगे?” 


जतिन ने कहा- “हाँ अगर मैं कहीं नौकर न हो गया तो...” 
“तो क्या अब जिस तरह हम मिलते हैं वैसे हमेशा मिलना नहीं होगा?”
“नहीं होगा”
“क्यों नहीं होगा?” 
“इसलिए कि हमारे पास हमेशा मिलने की इच्छा से भरा ये आज का मन नहीं बचेगा” 

सुरिन को उस दिन इस बात पर यकीन नहीं हुआ था. मगर आज वह सचमुच तीन साल बाद जतिन के साथ बैठकर कॉफ़ी पी रही थी. कैसे न? सबकुछ बदल जाता है. इस पल लगता है कि जीवन स्थिरता से भरा है. मन जो चाहता है वही हो रहा है. हम कल फिर से इसी तरह मिलने की अकाट्य आशा कर सकते हैं. और अचानक.... 

जतिन कुछ खाने को लेकर आया. इस बार वह चुनने को नहीं कह सकता था. उसने कहा- “फिर आगे क्या हुआ?”

“हम मिले थे. कई-कई बार मिले. शादी का दिन बहुत दूर था. वह फोन करता था. आ जाओ कहीं घूमने चलते हैं. मैं जाने क्यों डरती ही न थी. किस तरह ये विश्वास मेरे भीतर आया कि वह मुझे ऐसी किसी जगह न ले जायेगा जहाँ कुछ गलत हो. वह सचमुच कभी न ले गया. बस वह अपने स्कूटर पर अगली सीट पर होता और मैं पीछे. हम शहर भर का लम्बा चक्कर लगाते हुए बातें करते थे. वह बीच-बीच में पूछता था. कुल्फी वाला आ रहा है. चाट वाला आया. चाय की दूकान है. मैं कहती- मुझे कुछ नहीं खाना. फिर भी वह कहीं न कहीं रुकता और कुछ खिला देता था. बस फिर घर पर ड्राप करता और कहता फिर मिलते हैं” सुरिन के चेहरे पर शांति थी. 

“प्यार नहीं करता था?” 
“करता था.”
“अच्छा... कैसे?”


“एक बार मैंने अपना पर्स उसके स्कूटर की डिक्की में रख दिया था. फिर उसे लेना भूल गयी. घर आने के बाद याद आया. कई बार सोचा मम्मा के फोन से उसके फोन पर फोन करूँ और कहूँ कि मेरा पर्स रह गया है. उसमें मेरा फोन भी है. मैं नहीं कर सकी. लेकिन रात को जब हम लोग खाना खा रहे थे तब डोरबेल बजी. वह खड़ा था. मालूम है क्या बोला?”
“क्या?” 
“तेरे से तो ये फोन ही अच्छा है, जो मेरे पास रहना चाहता है.” 

जतिन ने देखा कि सुरिन के होठों के पास ज़रा सा केचअप लगा रह गया है. उसने सोचा कि क्या वह अपनी अंगुली से इसे मिटा दे. उसे सचमुच समझ न आया कि क्या करे. उसने कहा- “ऐसे अच्छे आदमी से मैं कभी मिलूँगा” 

“जिससे से भी मिलो, उसे उसी की नज़र से देखना”

बहुत देर से मैच देख रहे सर्विस बॉय के मुंह से निकला- “यस, यस... यस” टीवी के स्क्रीन पर स्लो मोशन में एक गेंद विकेट को छूकर जा रही थी और गिल्ली हवा में कलाबाजी खाती हुई आहिस्ता से ज़मीन की ओर जा रही थी. 

[जीवन किसी ख़राब साधू का दिया हुआ शाप है जो कभी फलता नहीं मगर हमेशा डराता रहता है] 

उस खाली-खाली से पड़े रेस्तरां में अलसाया लड़का क्रिकेट मैच देख रहा था. वहीँ पास ही बैठे हुए जतिन और सुरिन की दुनिया अलग थी. लड़का किसी एकांत से उपजे खालीपन में खेल भर रहा था. सुरिन इतनी ज्यादा भरी हुई थी कि कुछ खालीपन जुटाना चाहती थी. जतिन ने खालीपन और भरे होने के भावों को स्थगित कर रखा था. उसके ठीक सामने तीन साल बाद सुरिन थी और वह इन लम्हों को सलीके जीना और स्मृति में बचा लेना चाहता था. जब सुरिन उसके जीवन वृत्त से बाहर कदम रख चुकी थी तब जतिन ये याद करने की कोशिश करता था कि सुरिन के इस वृत्त में होने से क्या था और न होने से क्या नहीं है?

“तुम” सुरिन ने कहा.

“मैं क्या?” जतिन ने पूछा.

“क्या सोच रहे हो?”

“मैं सोच रहा हूँ कि हम जो कुछ करते हैं उसकी कोई पक्की वजह होती है.”

“जैसे?”

“जैसे हम मिलते थे. फिर हम सालों नहीं मिले. जैसे अभी एक दूजे के सामने बैठे हैं और शायद..."

जतिन ने कांच के पार देखा. वो जो बादल चला गया था, उसकी स्मृति भर बची थी. सड़क धूप से भरी थी. दोपहर का रंग वैसा ही था. जैसा बादल के आने से पहले था.

जतिन को इस तरह बाहर देखते हुए देखकर सुरिन ने कहा- “ये पीले पत्थरों से बनी सड़कें कितनी अच्छी लगती है न”

“हाँ बहुत अच्छी”

“क्यों?”

“पीले पत्थरों से बनी सड़कें इसलिए अच्छी लगती है कि हमने सडकों के बारे में जो सोच रखा है उससे अलग हैं.”

“अगर हमने ये पहले से न सोच रखा होता कि सड़क कोलतार से बनी होती है. उसका रंग काला होता है. वह दूर तक अनगिनत मोड़ों और हादसों से भरी होती हैं. तो क्या ये पीले पत्थर वाली सड़क अच्छी न लगती?”

“हाँ”

“तो अगर हमने जीवन के बारे में पहले से कुछ न सोच रखा होता तो भी वह हमें अच्छा लगता?”

प्रश्न सिर्फ शब्दों में नहीं था. प्रश्न स्वर में था. प्रश्न सुरिन की आँखों में भी था. हर प्रश्न का उत्तर नहीं होता है. कुछ प्रश्नों के उत्तर केवल प्रश्न ही हो सकते हैं. इसलिए जतिन ने प्रतिप्रश्न किया- “तुमने जीवन के बारे में क्या सोच रखा था?”

“मैं उस घर में गयी, जहाँ मुझे उम्र भर होना था. वहां बुजुर्ग नहीं थे. वे आशीर्वाद देने आये थे और देकर लौट गए. उनका तय था कि वे उसी क़स्बे में रहेंगे जहाँ पुश्तैनी घर है. एक बड़े भैया और उनका परिवार था. वह बराबर के मकान में रहता था. उनके वहां आना-जाना और बोलना न बोलना कुछ भी नियमों में नहीं बांधा हुआ था. मन हो तो आओ, न हो न आओ. अकेले नहीं रहना तो जब तक चाहो दोनों उसी घर में रह लो. क्या पहनना-ओढना है सब अपने मन का चुनो. कब सोना-जागना है, तुम स्वयं समझदार हो.”

“कितना अच्छा घर है न?”

“हाँ.”

“फिर...”

“क्या तुमने कभी फूल को डाली से टूटकर गिरते देखा है?”

“हाँ”

“क्या कभी पत्ते झड़ते हुए देखे हैं?”

“हाँ”

“बस ऐसा ही है.”

“माने?”

“जहाँ प्रसन्नता पर प्रसन्नता न हो और दुःख पर दुःख... ऐसा साधा हुआ जीवन.”

“लोग यही चाहते हैं”

“चाहने के बाद?” एक चटकता हुआ रूखापन जाने कहाँ से सुरिन के स्वर में घुलकर गिरा. 


सुरिन ने जतिन को छुआ. जैसे बरसात की पहली बूँद अचानक ललाट पर गिरती हो. जैसे नंगी पीठ पर पंख फिसलता हो. जैसे पानी में रखे पैर के तलवे को कोई गुदगुदा दे. जतिन की अंगुलियाँ सुरिन की अँगुलियों से बाहर आ रही थी. जतिन की हथेलियाँ भीग चुकी थीं. वह जिस अनुभूति से भर गया था, उसका कोई उपचार नहीं था.

उसने कांपते स्वर में अधूरा प्रश्न किया- “क्या तुम...?”

सुरिन ने अधूरे प्रश्न को बिना समझे कहा- “नहीं”

[टूटती पत्ती के पीछे एक कोंपल खिल रही होती है, दुःख के पीछे...]

सुरिन ने जतिन को कहा कि मैं कुछ लेकर आती हूँ. वह तेज़ी से उठी और बिल काउंटर तक चली गयी. बिल काउंटर पर बैठे लड़के से सुरिन ने पूछा- “यहाँ फ्लेट वाइट के अलावा कोई दूसरा फ्लेवर है ?” काउन्टर के अंदर की तरफ खड़े लड़के ने अपनी पीठ की ओर संकेत किया. वहां एक लम्बी सूची थी.

सुरिन कॉफ़ी लेकर आई तो जतिन ने कहा- “कैफ़े लात्ते...”
“तुम्हें कैसे मालूम?”
“जाने दो. मैं तुम्हें एक बात याद दिलाता हूँ शायद तुम भूल गयी हो.”

सुरिन अचरज से देखने लगी. उसने अपने होठों पर लम्बी मुस्कान रखी. वे दोनों जीवन की अबूझ बातें करते हुए थक गए थे. उनके पास यही रास्ता था कि वे कोई ख़ुशी की बात करें. अक्सर ख़ुशी को लालच देना होता है. जैसे आप बड़ी मछली को फांसने के लिए छोटी मछली को चारे की तरह कांटे में फंसाते हैं न वैसे ही बड़ी हंसी तक पहुँचने के लिए एक छोटी मुस्कान खुद बनानी पड़ती है. फिर ये छोटी मुस्कान बड़ी मुस्कान को खींच लाती है. इसलिए सुरिन ने अपने चेहरे पर एक लम्बी मुस्कान रखी. “हाँ बताओ वो बात जो शायद मैं भूल गयी हूँ”

“वो बी ब्लॉक वाला शोपिंग काम्प्लेक्स याद है?”
“जहाँ हम पहली बार मिले थे”
“अच्छा तुम्हें तो खूब याद है सब. मैंने समझा तुम भूल गयी हो. तो सुरिन तुम्हें ये भी याद होगा कि वहां एक नन्हा गुलमोहर था.”

सुरिन का फोन बजने लगा. उसने फोन उठाया और स्क्रीन देखने लगी. उसने फोन पर बात नहीं की. फोन को थैले में रखा और जतिन से कहा.- “अब चलना होगा.”

“पांच मिनट और रुको”
“फिर क्या हुआ ये बताती जाओ”
“एक दिन वो चक्कर खाकर गिर पडा. हम उसे अस्पताल लेकर गए. वहां पहुँचते ही वह काफी नार्मल हो गया. लेकिन ये सिलसिला बढ़ता ही गया. वह लगातार कमजोर होता गया. आखिरकार बोन मेरो ट्रांसप्लांट हुआ. और एक रोज़ डॉक्टर्स ने कहा कि आप इनको घर ले जाइए. अब हम एक बंद कमरे में रहते हैं. वह काफी अच्छा है. अपना काम खुद कर लेता है.”

ये सुनकर जतिन बहुत उदास हो गया.

सुरिन ने कहा- “मालूम है वह पिछले एक साल से मुझे कह रहा था कि तुम बाहर जाया करो. हमेशा मेरे पास बैठी हुई बोर नहीं हो जाती हो. मैं उसे कहती- तुम पागल हो क्या. मुझे यहीं अच्छा लगता है. फिर कुछ रोज़ पहले उसने कहा कि मुझे गिल्ट होने लगी है. तुम बाहर नहीं जाती हो तो मुझे लगता है कि मैंने तुम्हें क़ैद कर लिया है. मुझे सचमुच अच्छा नहीं लगता. मैंने कहा- जाती तो हूँ. इतना सारा सामन ले आती हूँ. वह बोला कि ऐसे नहीं तुम सिर्फ अपने खुद के लिए बाहर जाओ. तुमको लगे कि तुम्ह सिर्फ इस घर में क़ैद रहने के लिए नहीं हो.”

एक और मुस्कान होठों पर रखकर सुरिन ने कहा- “मुझे कभी समझ नहीं आता कि क्या करूँ. मुझे उदासी नहीं है. मेरे पास तन्हाई नहीं है. मेरे पास एक दुबले से आदमी के दो हाथ हैं. जिनको मैं अक्सर चूमती रहती हूँ. उन हथेलियों में कई सारे रास्ते बन गए हैं. मैं उन रास्तों पर चलती हूँ. कुछ छोटे पहाड़ हैं. कुछ कम गहरी खाइयाँ हैं. दो एक सरल रास्ते हैं...” अचानक सुरिन की ऑंखें चमकी और उसने कहा- “तुम्हें मालूम है अगर ये सब न होता तो मैं उसकी हथेलियों को कभी इस तरह न देख पाती”

कांच के पार धूप कम हो गयी थी. लम्बी छायाओं ने सड़क को ढक लिया था. तीन चार बच्चे गेंद और बल्ला लिए आ गए थे. वे इस तरह बैठे और खड़े थे कि लगता था, पक्का कुछ और दोस्तों का इंतज़ार कर रहे थे. सुरिन ने अपना थैला उठाया. जतिन ने अपना चश्मा लिया. दोनों बाहर निकल पड़े. रेस्तरां से बाहर आते ही जतिन ने कहा- “बी ब्लाक की तरफ से होते हुए चलें.?”

वे चलते हुए काफी दूर आ गए थे. सड़क खाली थी. शोपिंग कॉम्प्लेक्स के आगे मोड़ था मगर गुलमोहर नहीं था. जतिन रुक कर उस जगह को देखने लगा. जहाँ वे पहली बार मिले थे. कुछ एक पल वहीँ खड़े रहने के बाद उसे सुरिन का खयाल आया. जतिन ने देखा कि सुरिन बिना रुके बहुत दूर जा चुकी थी. बहुत दूर सड़क पर एक सुर्ख रंग का छोटा स्कार्फ था. जो कभी जतिन को दिखता और कभी उसकी निगाह से खो जाता.

[याद, एक अमरबेल है.]

Painting Koil street, courtesy : Alexraj GD


Thursday, June 4, 2015

एक घटिया सोच वाले आदमी की सलाह


लड़की ने अपने पिता के बारे में सोचा और इस सोचने को तुरंत ख़ारिज किया कि देखेंगे.

लड़का हथियारों के सौदागर देश में मामूली तरह का नौकर था. एक कमरे में दो और लड़कों के साथ रह रहा था. उसके दिन सिर्फ इसी आस में गुज़रते थे कि कलेंडर में पंद्रह दिन आगे के किसी दिन पर एक जामुनी घेरा था. उसके आगे एक नीला और एक लाल दिन प्रिंटेड था.

सुबह दूध का बचा हुआ प्याला रखा था. एक ब्रेड थी. जिस पर जबरन क्रीम की परत चढ़ाई हुई थी. उसे मालूम था कि क्रीम लगी ब्रेड को दूध के साथ खाना मुश्किल है. वह कभी भी उलटी कर सकता था. इतनी चिकनाई कि खाने की याद में सिर्फ यही बचा था. पांच सौ रुपये का एक परांठा खाए हुए सप्ताह भर हो चुका था. लड़के ने अपने दोस्तों के साथ कई बार प्लान किया कि वे इस बेचलर रूम में गैस का उपयोग हिटिंग के सिवा कुछ पकाने के लिए करने की जुगत लगायेंगे. लेकिन खाकी पेंट और आसमानी नीले रंग का कमीज पहने हुए उनकी सुबहें, शाम से होती हुई रात में ढल जाती थी.

जब वो जामुनी घेरे वाला दिन आता उस दिन वह लड़की को फोन करता था.

लड़की को वकीलों से नफ़रत थी और वह वकीलों वाली पढ़ाई कर रही थी. उसे कोई सात साल हो गए थे. वह लगातार पहले दर्ज़े में पास होती और इसी वजह से उसकी पढ़ाई की लकीर खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी. वह किसी खानदानी वकील के घर रात तीन बजे किसी पीये हुए आदमी की जिंदा लाश के साथ सोकर सुबह आठ बजे एक कार में सवार होकर क्रमशः बुजुर्ग, वरिष्ठ और कनिष्ठ वकीलों के साथ कोर्ट जाने का सोच रही होती. उसे यही सोच कर पसीना आता और वह अपने एलएलएम से आगे के किसी और कोर्स के बारे में सोचने लगती.

ये दो ज़िंदगियाँ इस कदर घिरी थीं और एक ही ख्वाब देखती थी, मुक्ति. बंधन टूट कर बिखर रहे हैं. जैसे जंग लगे लोहे पर ज़रा सी आंच लगते ही पपड़ियाँ गिरती हैं. परिवार जैसी संस्था के आदिम तरीकों को कोसते हुए लड़का व्यंग्य से पूर्ण हास करता था. लड़की उसका समर्थन करती थी. लड़की को दिखाई देता कि रात ढल चुकी है. नौकर काम करके जा चुके हैं. माँ एक खिड़की के पास बिस्तर पर लेटी हुई सोने का स्वांग कर रही है. पिताजी ऊपर के कमरे में नीम अँधेरे में कुछ फाइलों के बीच बैठे हुए. सौ में नब्बे बार वे वहीं सो जाते थे. माँ और पिताजी के बीच पिछले कई सालों से यही सम्बन्ध था.

दो जोंकें थी. एक दूसरे की पीठ पर अपने दांत गडाए. उन दांतों से पीठ सहलाई नहीं जा सकती थी. सिर्फ खरोंचें बनायीं जा सकती थी. पीठें इन खरोंचों की अभ्यस्त थीं.

लड़का आईआईटी पढ़कर जिस ख़ुशी में था उसी एवज में ज़िन्दगी पर लतीफे बनाया करता था. वे लतीफे हथियारों के सौदागर देश में रहने वाले एशियाई लोगों के बारे में जायदा होते थे. इस ज्यादा में से जो बच जाता था वह उघड़े नितम्बों वाली देसी औरतों के बारे में होता था. वे औरतें भी एशियाई कही जा सकती थी किन्तु लड़के को लगता था औरतों का कोई देश कोई महाद्वीप नहीं होता. इसलिए उसे बचे हुए लतीफे सिर्फ औरत कहते हुए गढ़ने होते थे.

एक रोज़ बेहद उदास हाल में लड़की ने कहा- इस बार की परीक्षाओं तक सिर्फ पंद्रह दिन मेरे हाथ में हैं. इसके बाद मैं कुछ न कर सकूंगी. तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो पंद्रह दिन के बाद की तारीख पर एक जामुनी घेरा बनाओ.

लड़के ने देखा कि उसके कपडे सुखाने के हीटर पर टंगे उसके अंडरवीयर में सीलन भरी थी. वहा गरम था मगर भीगने का असर पूरा बचा हुआ था. बाहर बर्फ थी. पहली गाड़ी के छूटने में सिर्फ चालीस मिनट बचे थे. उसने जींस पहनी और पोखरों में नहाने की बचपन की आदत को सराहा और अंडरवीयर को दुनिया की सबसे गैर ज़रूरी चीज़ बताने वाला लतीफा बनाया और कमरे से बाहर निकल गया.

लड़की ने पहला परचा दिया तब तक दोबारा लड़के से बात न हुई. शामें बेहद उदास और स्याह थी. लड़की को लगा कि कविता करके इस बुरे हाल को चुनौती दी जा सकती है. लड़की ने पिछले नौ साल से कोई कविता नहीं पढ़ी थी. उसे कुछ एक लोगों के नाम याद थे जिनको कविता के लिए जाना जाता था. लड़की ने खुद को यकीन दिलाया कि कविता करने के लिए एक उदास गहरी शाम की ज़रूरत होती है न कि कविता पढने की. उसने अपने दिल का हाल लिखकर डायरी को बंद कर दिया.

सुबह तीन बजे लड़के का फोन आया. कविता सुनकर लड़के ने उसे एक लतीफा सुनाया जो किसी कविता के बारे में था.

सुनो, मैं बेहद घबरा रही हूँ.

लड़के ने कहा- कोई घबराने की बात नहीं है. मैं पहले अपने घर में बात करूँगा और उसके बाद तुम्हारे घर पर.

लड़की ने सोचा कि लड़का उसके पापा से बात कर रहा है. ये सोचते हुए उसे पसीना आ गया.

तभी उधर से लड़के की आवाज़ आई- हेलो, कहाँ हो? क्या मेरी आवाज़ सुन पा रही हो?

हाँ

ढें टेन तें... आई एम कमिंग

लड़की ख़ुशी से भर कर बिस्तर पर गिर गयी.

लड़के ने पूछा क्या हुआ?

लड़की ने कहा- मैं ख़ुशी से बिस्तर पर गिर गयी हूँ.

लड़के ने आवाज़ को किसी पौराणिक कथा के पात्र सा बनाकर कहा- ब्रह्म मुहूर्त में सोने वाले गधे होते हैं. जागती रहो... मैं आ रहा हूँ.

दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर हथियारों के सौदागर देश में काम करने वाला लड़का उतरने वाला था उसके पहले दिन लड़की ने अपनी सहेली को फोन किया. “सुनो वह आ रहा है, मैं क्या करूँ?”

सहेली ने कहा सुन फोन चालू रख मैं मेरे वाले को कोंफ्रेंस पर लेती हूँ. तुम म्यूट हो जाना.

सहेली वाले ने जब फोन उठाया. फोन के उस पार आवाज़ आ रही थी. झूमती चली हवा कि याद आ गया कोई... मुकेश की आवाज़ रात को रात होने की सजा दे रही थी. सहेली ने कहा कुछ बोलो भी. उधर से आवाज़ आई कोई बोले तो.

सुनो मेरी एक सहेली है. वह जिससे प्यार कर रही है वो कल आ रहा है. उसे क्या करना चाहिए?

सामने वाले कहा- उसे प्यार करना चाहिए.

सहेली ने कहा- दोनों शादी करना चाहते हैं.

सामनेवाले ने कहा- कोई एक बात कहो. प्यार करते हैं या शादी करना चाहते हैं

सहेली ने कहा- मजाक न बनाओ यार वह और मैं दोनों सीरियस हैं.

सामने वाले ने कहा- उसको कहो कि आने वाले को बाँहों में भरना. खूब चूमना. मकान मालिक से नहीं डरना और उसे घर ले आना. और रात भर में उसे पढ़ लेना. साथ सोयेंगे तो अच्छा लगेगा दोनों को...

इसी बीच फोन पर तीसरी आवाज़ आई- छी... इस छी के आगे सुबकने की आवाज़ के कुछ टुकड़े थे.

लड़की ने किसी ग्लानि में म्यूट रहने का वादा तोड़ते हुए दुखी मन से फोन पटक दिया. उसकी सहेली ने फोन किया. उसने फोन नहीं उठाया. दोबारा फोन किया तो उसने उठा लिया.

क्या हुआ मेरी जान

वह एक घटिया आदमी है. मेरी बात मानों तो तुम उसे छोड़ दो.

अरे ऐसी बात नहीं है. वह बस ऐसा ही है

तुम ऐसा क्यों नहीं कहती कि वह एक घटिया सोच वाला आदमी है.

दोनों सहेलियों ने इसके बाद खूब बातें की. रात गहरी होती गयी. इधर लड़की को इसलिए नींद न आ रही थी कि कल वह आने वाला था और सहेली इसलिए फोन पर थी कि एक प्यारी सहेली को हुए दुःख का अपराधबोध थोड़ा हल्का हो जाये.

इस बीच वक़्त की पैमाइश के नियमों के अनुसार पच्चीस-तीस महीने बीत गए थे. लड़की की सहेली ने अपने वाले को फोन पर कहा कि आज शाम वह लेडीज संगीत में जा रही है. उसके वाले ने पूछा- किसके यहाँ ख़ुशी आने को है? सहेली के मुंह से निकला अरे वही...

सहेली वाला सोचते हुए बोला- बड़ा वक़्त लगा. सचमुच प्यार की राह बड़ी कठिन है. सहेली ने कहा- नहीं! उसकी शादी तो वह जब आया था, उसके तीन महीने बाद ही किसी से हो गयी थी. मेरी सहेली की परसों है.
* * *


[Painting : Mimi Torchia Boothby]

Tuesday, May 26, 2015

गुलजान, देखो परिंदे!

हवेली के बंद दरवाज़े से चर्र की आवाज़ आई। बरसों से बंदी होने से दरवाज़ों के कब्ज़े ये भूल गए थे कि उनका काम बंदी होकर बैठे रहना नहीं वरन् खुलना और बंद होना आसान करना है। दरवाज़े से पहले हल्की रोशनी की पतली फाँक झाँकी और उसके बाद एक कमसिन चेहरा दिखाई दिया। दो मासूम आँखें। बायाँ कंधा आहिस्ता से चौखट और दरवाज़े के पल्ले को छुए बिना तिरछा होकर बाहर की ओर आ गया। इसी बाहर आने के दौरान आँखों ने पहले क़रीब और फिर दूर तक का फेरा दिया।

दोपहर के दो बजना चाहते थे।

ऊपर के कमरे में लगी पेंडुलम वाली घड़ी नियमित अंतराल से घंटे बजाती थी। जब वह घड़ी आई थी तो अचानक बजने वाला घंटा सबका ध्यान खींचता था। कुछ महीनों बाद घड़ी, समय और उस घर में रहने वाले लोग घुल-मिल गए। 

गुलजान ने क़दमों को फूलों का पाठ पढ़ाया। बदन को बिल्ली का लचीलापन दिया। हौसले को चील के पंखों पर रखा। उसकी हवेली के पास एक टेकरी थी। टेकरी पर एक टूटी हुई अकेली मीनार थी। गुलजान ने हवेली और टेकरी पर खड़ी मीनार के बीच की ज़मीन को काटकर दूरी को छोटा कर लिया। ज़मीन का वह लंबा-सा टुकड़ा प्रेम की छोटी-सी कतरन में समा गया। 

नहीं खुलना, ओ मालिक नहीं खुलना। सबकी दोपहर की नींदें सलामत रखना।

टेकरी पर हवा ने अपना दुपट्टा दूर तक फैला रखा था। हवा आहिस्ता चलती हुई अपने दुपट्टे में कुछ नयी सलवटें भर रही थी। हवा जब एक नयी सलवट बनाती तो एक पुरानी सलवट मिट जाती। हवा के दुपट्टे के भीतर खड़ी हुई गुलजान आँख मूँदकर हवा की कोई किनारी पकड़ती। उसे तह करती। हवा रुकने लगती।

गुलजान की आँखों ने फिर से खोज की। रास्ते को दूर तक देखा। हल्की ढलान थी, मैदान में जाकर खो जाती थी। कुछ पत्थरों के बीच से दिखती हुई ज़मीन ही रास्ता थी।

उधर कुछ न था। नज़र गिरती तो लुढ़कती हुई कहीं धूसर सलेटी रंग के बीच जाकर खो जाती। जैसे कंचे खो जाते थे। वहीं आस-पास ही पड़े होते मगर रंगों के छलावे में ख़ुद को ऐसे छिपा लेते कि दिखाई नहीं देते।

उसकी निगाहें इंतज़ार में इस तरह तेज़ी से से घूम रही थीं जैसे बचपन की कोई ताज़ा और छोटी याद।

जिसमें रेत किसी जलपरी की शक्ल ओढ़कर अपनी एक टाँग पर नाचती थी। धूप के बीच नाचता हुआ रेत का साया, आस-पास की हल्की चीज़ों को हवा में उठाए हुए, भारी चीज़ों के कान में फूँक मारता हुआ; उड़ा करो, तन से न सही, मन से उड़ा करो। 

ऐसे साये कभी अचानक आते थे, जैसे कोई रूह आसमान से उतरी हो। रूह ने किया हो रेत का स्नान। कई बार कुछ छोटे साये, जैसे नयी जन्मी हुई नन्ही रूहों की अठखेली। ऐसे छोटे वर्तुलों के बीच दफ़अतन गुलजान की साँस थम जाती थी। साइकिल पर सवार लड़का नीचे ढलान में गुज़र रहा होता। गुलजान ऊपर टेकरी पर सूनी पड़ी मीनार के भग्नावशेष की एक दीवार पर बैठी हुई सोचती, रूह बन जाये। चील के पंख ओढ़े और लड़के की साइकिल पर छाया कर दे। अपने पंखों की परछाईं से छाँव बुनकर साइकिल के साथ-साथ चले। लड़के को सोचते हुए, वह अपने हाथों को देखती। उसके हाथों के नाज़ुक भूरे रोयें खड़े हो रहे होते। जैसे ज़मीन से कच्ची कोंपलें फूट रही हों। वह फिर नीचे देखती तब तक साइकिल पर सवार नादान लड़का खो चुका होता। गुलजान के भूरे रोयें फिर से गुलाबी रंग के होकर उसके हाथों के भीतर दुबक जाते।

हवा ने जो दुपट्टा बनाया है, उसका रंग कैसा है?

उस लड़के का नाम दिबांग था। वह ढलान का पूरा चक्कर लगाकर ऊपर की ओर आता।

दिबांग थक जाता। उससे चढ़ाई नहीं चढ़ी जाती। वह आहिस्ता से आँख मूँदकर देखती। हाँ, वह आ रहा है। थका हुआ। झुका हुआ। कई बार रुककर उसी को देखता हुआ। वह एक ही तरफ से आता। उस तरफ जिधर गुलजान होती। धूप दिबांग में रंग भरती। पसीना उगाती। हवा धूप के उगाए इस नए रंग पर नाज़ुक अंगुली घुमाती। उसका पसीना सुखाती।

गुलजान साँस रोके बैठ जाती। जैसे आख़िरी घड़ी आई। जीना मुकम्मल हुआ। दिबांग उसके पास बैठा हुआ। उसके माथे पर किसी ने गुलाब जल छिड़का हो। अनेक बूँदें ललाट पर चमकती हुईं। बूँदें, दूसरी बूँदों से मिलकर भौहों के पास से गालों पर लुढ़कती हुई।

गुलजान दुनिया की सबसे छोटी मछली बन जाती। वह तुरंत एक नन्ही बूँद में समा जाती। वहाँ से वह फिसलती हुई बहती। भौहों के श्याम रंग को चूमती, गाल पर गुदगुदी करती। आखिर दिबांग अपना पसीना पोंछता। नन्ही मछली बनी हुई गुलजान उसकी हथेली में आ जाती। वह अपनी अँगुलियों से छिटक देता नन्ही बूँदें।

गुलजान घास पर से उठती और नन्ही मछली से फिर लड़की बन जाती। वह हँसने लगती। दिबांग देखता। किसलिए हँस रही है। वह फिर हँसती। उसे अच्छा लगता कि दिबांग को मालूम न चल सका कि वह थोड़ी देर पहले क्या थी।

वे धूप और हवा के हवाले रहते। सूख रहे दरख़्तों के तले छाँव नहीं होती।

गुलजान कहती- “आज तुम यहीं रहना मेरे पास, हिलना नहीं। आज मैं पता लगाऊँगी कि वह साइकिल सवार लड़का तुम ही हो या कोई और है। क्या घाटी में से होकर और भी कोई लड़का इधर आता है?”

दिबांग कहता- “और कोई नहीं आता। और किसी को तुम दिखती हो?”

“अच्छा, मैं नहीं दिखती मगर तुम ढलान के नीचे बड़े काले पत्थर की ओट से आकर आगे बूढ़े दरख़्त वाले मोड़ पर कहाँ खो जाते हो?”

“तुम्हारे पास आने को खो जाता हूँ।”

मीनार के भग्नावशेष सूने होते। कई दिनों से परिंदे गायब। उन दोनों ने जाने कितने दिनों से परिंदों को देखा ही नहीं।

दिबांग के आते ही हवा चुप हो जाती। गुलजान हवा के रंग पढ़ना और किनारी पकड़कर तह करना भूल जाती। हवा उन दोनों से रूठकर टूटी मीनार के आँगन में दुबक जाती। हवा चुप बैठी हुई, हल्की छाँव में ज़मीन पर लिखती। एक मिलता है तो दूजा खो जाता है।

साँवरे क्या मैं करूँ इनका
जो ये बाजे में तार हज़ार
नाम एक तेरा याद मुझको

गुलजान गा रही होती। दिबांग खोया हुआ सुन रहा होता। मन के कागज़ पर गीले रंगों से तस्वीर बनने लगती। हवा इस गीत से मुग्ध हो जाती। वह रूठना छोड़कर मंदिर के बाहर बैठे हुए दिबांग और गुलजान तक आती। वह देखती कि लड़के के मन पर रंगों ने आकार लिया है। हवा उन रंगों को आहिस्ता से पंखा झलती। सूखें रंग जल्दी से। जल्दी-जल्दी ये लड़का रंगों से भर जाए। रंग इसमें अटखेलियाँ करें। रंग इससे छलक-छलक जाएँ। रंग उड़ें मेरे साथ। मैं चूनर बन जाऊँ गुलजान की। इन दोनों को ढँक लूँ।

हवा एक गहरी साँस भरती। ओ लड़कियो, तुम जब भी पसंद करती हो, कैसे इतना पसंद करती हो!

हवा इस ठहरे दृश्य को तोड़ देना चाहती। वह गा रही लड़की की कमर से कुर्ते को ज़रा-सा उड़ाती और घास बनकर गुदगुदी करती। गुलजान की आवाज़ की गिरह में एक हँसी का छींटा पड़ता। दिबांग मुस्कुरा उठता।

वह गुलजान की अंगुलियाँ अपनी हथेली में रखता। भूरी चिकनी हथेली में कुछ पंखुडियाँ गुलाब की। लज्जा से भीगी हुई। लरज़ से भरी हुई। इस कंपन में गाना कुछ टुकड़ों में बँटकर हवा में खो जाता। हवा उस गाने को बुगची में रखकर स्थिर हो जाती। लड़के के कंधे के पास कोई साया आता। उस साये की गंध, हवा के बिना फैलने लगती। लड़का आँखें मूँद लेता।

एक गहरी तपिश गर्दन के पास उतरती। पाँवों की पिंडलियों में कसमसाहट जागने लगती। भीगे होंठों में दबे हुए होंठ। तड़प और तड़प। बाँहों की कसमसाहट में बेक़ाबू साँस के बीच अचानक वे दोनों एक-दूजे के चेहरे को देखते। विस्मय से भरी हुई आँखें।

वे दोनों एक-दूजे के चेहरे को थामे हुए फिर से आँखें बंद कर लेते।

दो बुत बियाबान में। टूटी मीनार के अवशेषों की छाँव तले। टेकरी के ऊपर। हवेली से दूर। आग, पानी, मिट्टी, कुछ भी नहीं।

दिबांग से बिछड़ने के बाद लड़की घर आकर छत पर टहलती। गली में कोई पदचाप सुनाई पड़ती। मोहब्बत, मोहब्बत, मोहब्बत। एक अनछुई नई पाकीजा गंध। किताबों से झाँकते हुए अक्षरों से। अतीत की स्याही से। कपड़ों में भरे हुए बियाबान से। टूटी दीवार के पास पड़े बड़े पत्थर से। बदन की छुअन, सिहरन, डर,और साँसों के आलोड़न से।

खिड़की का पल्ला चुप बैठा हुआ। मन की असंख्य खिड़कियाँ प्रतीक्षा से भरी हुईं। दिबांग, दिबांग, ओ दिबांग। आओ, इन खिड़कियों से नहीं; सचमुच की खिड़की से आओ। इस पल्ले के झूले पर सवार होकर आओ। देखो, मन एक समंदर हुआ। भारीपन बढ़ता जा रहा है। ये ठहर एक दबिश है। इस दबिश में साँस गायब हुई जा रही है। इसे तोड़ डालो दिबांग।

हर वक़्त, दिल बेताब, धड़कनें बेक़ाबू।

तुम कम हो। हर जगह कम हो। हर मिलन में कम हो। तुम हो ही नहीं, इतने कम हो। 

चैन के दरख़्तों की शाखों से उड़े हुए सुकून के परिंदों का कोई निशाँ नहीं। दूर आसमान में एक हूक फैली हुई। कहीं किसी ख़ालीपन में गुम होती हुई। कहीं नहीं टकराती। ख़ाली आसमान और बे-आवाज़ हूक।

रात गुज़र जाती। सुबह के बाद ऊपर के कमरे की घड़ी का घंटा बजता। ठीक वही घंटा जिसका लड़की को इंतज़ार होता। लड़की उसी टेकरी की तरफ चल देती।

टेकरी पर पहुँचने के बाद कुछ ही देर में दिबांग उसे आता हुआ दिखाई देता। वैसे ही हाँफता मगर मुस्कुराता हुआ। दिबांग उसके पास आकर बैठता। हवा का करिश्मा शुरू होने से पहले गुलजान पूछती- “कल रात तुमने क्या किया?”

“मैंने तुमको याद किया। तुमने क्या किया।”
“मैं, कुछ नहीं किया बस सो गई।” ऐसा कहकर गुलजान उससे पूछती- “एक बात सुनोगे।?”
वह कहता- “हाँ सुनूँगा।”
“मगर उसे सुनने के बाद तुमको एक सवाल का जवाब देना होगा। ये जवाब मेरे लिए ज़रूरी होगा।

वह हामी भरता।

“अगर जवाब नहीं दिया तो तुमको पाप लगेगा।”
“मैं जवाब दूँगा।”
“मैं ये बात जीवन में किसी से एक ही बार कहूँगी। तुम्हें पक्का जवाब देना होगा वर्ना मेरी बात को मेरे साथ ही दफ़न होना पड़ेगा।”
दिबांग प्यार से उसके हाथ को थाम लेता। दो बार सिर हिलाकर हामी भरता।

गुलजान उसे बात बताती।

दूर पुरानी बस्ती का एक लड़का था। वह रोज़ घर से भाग जाता था। एक दिन जब वह घर पहुँचा उसके बड़े भाई ने पूछा- “क्यों रे, क्यों इतना उदास हाल। बोल तो। कहाँ लुट गया। किधर चोट लगी?”

लड़का कहता- “मैं इसलिए उदास हूँ कि वह तकिये पर आँसुओं से इबारतें क्यों लिखती है। उसके आँसू बे-आवाज़ क्यों बहते हैं?”

लड़के का गला पकड़े हुए उसका बड़ा भाई दोनों हाथों से कॉलर खींचता है- “कहाँ जाता है तू आजकल। क्या कुम्हारों के श्मशान गया था?” लड़का मुस्कुराता। उसकी हँसी में केसरिया रंग घुलता जाता। लड़के के कॉलर फंदा बनकर उसका गला कसते जाते। भाई पूछता- “बोल किसी से वादा किया है वहाँ? कोई आवाज़ सुनी और हाँ भरी तूने?” कॉलर की गाँठ से घुटन बढ़ी और लड़के की आँखें फैलने लगीं। एक बड़ी हाँफ हुई। उसने पूरा जोर लगाया और वे दोनों अलग होकर गिर पड़े।

“वह कुछ रोज़ पहले दिखी थी। बूढ़े दरख़्त वाले मोड़ से ऊपर टेकरी पर देखो तो सबको दिखती है। मैंने उसे देखा तो उसने ऊपर बुला लिया। उसने हाथ से इशारा किया, उधर से आओ। जिस तरफ इशारा किया उसी तरफ आसान चढ़ाई थी। मैं उधर गया तो हवा मुझे धकेल कर ऊपर ले गई।”

लड़के का भाई तेज़ी से भागा। उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया। सीढ़ियों पर बदहवास उतरते हुए सीधा मंदिर वाले आले तक पहुँचा, घुटनों के बल बैठ गया। उसके हाथ काँप रहे थे। माँ और बाबा दौड़े हुए आए। लड़के की भाभी भी आई। मंदिर वाले आले के आगे लड़के का भाई उसके पीछे तीन लोग। अचानक लड़के के बड़े भाई के बदन में भयानक मरोड़ उठी और वह आँगन पर गिर पड़ा। उसके पाँव से लेकर सिर तक तड़प भरी लहरें दौड़ने लगीं। उसने हाथ से ऊपर की ओर इशारा किया। माँ तुरंत ऊपर की ओर भागी। बंद दरवाज़े की कुंडी पर हाथ रखा तो वह बर्फ-सी ठंडी थी। माँ ने दरवाज़ा खोला। लड़का एक कोने में बैठा था। उसके चेहरे पर हल्की हँसी आई। माँ ने मुड़कर नीचे आँगन में देखा। लड़के का भाई शांत हो गया था। वह ठहरी हुई आँखों से माँ को देख रहा था। माँ ने अपने मुँह को पल्लू से ढँका।

दरवाज़ा खुला छोड़कर माँ नीचे चली आई। लड़के का भाई सहमकर घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने हाथ घुटनों के मोड़ों पर रख लिए। वह दीवार का पूरा सहारा लिए हुए था।

लड़के के गले पर हल्की खरोंच थी। उसने तर्जनी से आँगन पर कुछ लिखा। सो गया।

अगली दोपहर लड़का हवा की तरह घर से गायब। उसे घर से निकलते हुए कोई न देख पाया। वह अदृश्य था। उसका पीछा करना बेकार था। मील भर रफ़्तार से चलने के बाद उस घाटी के शुरू होते ही उसकी चाल मद्धम हो गई। वह सड़क पर तैर रहा था, जैसे मौज में कोई तिनका बहता हो। उसने घाटी से ऊपर टेकरी की तरफ नहीं देखा। वह बूढ़े दरख़्त तक पहुँचा और फिर पहाड़ी की छाया वाले हिस्से में मुड़ गया। उसने गहरी साँस ली।

साँस जो कल रात से गायब थी।

कोई आवाज़ उसके क़रीब से गुज़री। जैसे कोई सरसराहट थी। उसे गहरा सुकून आने लगा। एक हवा का झोंका छूकर लिपट गया। वह बोझ से आज़ाद होने लगा। उसके चारों तरफ हल्कापन था। उसकी आँखों की पलकों पर रखे भारी फाहे उड़ने लगे। उसके चहरे पर पुता हुआ चूना झड़ने लगा।

टेकरी पर टूटी सूनी मीनार के पास वाले बड़े पत्थर पर लड़की चुपचाप बैठी रही। हवा उसे इसी तरह बैठे देखकर सिहर उठी। ख़ामोशी के घने जंगल में स्याह साए।

लड़के, ओ लड़के।

वह लौटकर घर आया। भाई दरवाज़े पर ही मिल गया।

“कहाँ गए थे?” लड़के की हँसी झड़ने लगी, जैसे लोहे के फूल गिर रहे हों। लोहे के गिरने की आवाज़ घर भर में फैल गई। भाई चुप खड़ा रहा और लड़का घर में चला गया।

एक बड़ा पंछी कर्कश आवाज़ में चीखता हुआ घर के ऊपर से निकला।

शाम आलू के खेतों से होती हुई घर के दरवाज़े आई। हल्की मादक शाम। माँ और भाभी रसोई के आगे मुस्कुराए। बाबा थोड़े दूर बैठे थे। लड़के का भाई वहाँ न था। लड़का एक बेंच पर लेटा हुआ था। उसके पास किताबें रखी थीं। सब किताबों पर लाल रंग के कागज़ के खोल थे।

उधर उस लड़की ने बासी दोपहर को बदन से रगड़कर उतारा। दोपहर के वे छिलके रात की नमी से भीगे हुए थे। वे वहीं पड़े रहे। बिस्तर से नीचे हाथ लटकाए हुए लड़की सोचती रही कि उसे लड़के से क्या चाहिए।

एक हवा बजती। एक पत्थर गुनगुनाता। टूटी दीवारों से कोई झाँक आती। मन के ख़ाली बरतन में हवा का बाजा। गुनगुनाहट की चमक। झाँक का विस्मय। लड़के की सोच के साथ ये सब चीजें ज़िंदा हो जातीं। जैसे खोयी हुई ज़िंदगी लौट आई हो। जब ऐसा नहीं होता तब वह लड़की छत पर फैली रात की स्याह चादर पर चोर कदमों से चलती। उसे लगता जैसे काले फूल बिछे हैं।

लड़की ने अपने हाथ को आँगन से छत की तरफ किया। उसने दोनों हाथ ऊपर किए कहा- “आओ, मेरे क़रीब आओ। मुझे उठा लो यहाँ से। ये ज़िंदगी नहीं है। ये एक शाप है। ये रूह का पहना हुआ तकलीफ़ का पैरहन है। आओ लड़के। ओ लड़के। ओ मेरे प्रिय लड़के।”

घर में सोये हुए लड़के को कुछ हुआ। उसे लगा कि कोई मुसीबत बढ़ रही है। वह कुछ ही दूर है। वह बिस्तर से उठा। उसने दरवाज़ा खोला। नीचे आंगन में देखा। सब कुछ स्थिर। रात के सम्मोहन में क़ैद चीज़ें। पहाड़ी टेकरी का रास्ता याद किया। उसने मीनार की टूटी हुई दीवार को सोचा। उसने हवा की आवाज़ को सुना। उसने लड़की को याद किया।

सुबह लड़का दो घंटे तक आँगन की उसी बेंच पर बैठा किताब पढ़ता रहा। इसके बाद उसने खाना खाया और अपने कमरे में आ गया। दोपहर होने से पहले जब वह अपने कमरे से बाहर जाने के लिए दरवाज़े तक आया तो पाया कि दरवाज़ा बाहर से बंद है। उसने हत्थी को पकड़कर खींचा मगर वह न खुला। लड़के ने आवाज़ दी। माँ को पुकारा। कोई जवाब न आया। बाबा को पुकारा, कोई जवाब न आया। भाई को आवाज़ दी, उसका भी जवाब न आया।

लड़के के पाँवों पर अंसख्य मकोड़े चढ़ने लगे। वह दोनों हाथों से अंदर लगी हत्थियाँ खींचने लगा। दरवाज़ा मजबूती से बंद था। उसने पुकारा। बेहिसाब पुकारा। घर से दूर-दूर तक लड़के की आवाज़ बिखरती रही। दरवाज़े की कुंडी हिलती थी मगर टूटती नहीं। लड़का कमरे के अंदर दौड़ने लगा। उसने खिड़की के पास जाकर आवाज़ लगाई।

दो घंटे तक दरवाज़ा हिलता रहा। आख़िर घर ख़ामोश हो गया। दोपहर ढल चुकी थी।

भाई ने आहिस्ता से दरवाज़ा खोला। अंदर से कोई हलचल न हुई। भाई के पीछे बाबा खड़े थे। माँ भी थी। भाई ने अपने हाथ में लिए हुए सरसों के बीज दरवाज़े के आगे फैलाए। हाथ में लिए लोटे से दरवाज़े के दोनों तरफ जल छिड़का। काँपते क़दमों से भीतर गया। लड़का बिस्तर पर सो रहा था। भाई ने आवाज़ दी- “उठो।”

वह अचरज से उठा।
उसने कहा- “हाँ भैया।”
“कब से सो रहे हो?”
“पता नहीं। शायद अभी सोया।”
“आओ, नीचे चलो।”

वे सब नीचे चले आये। वहाँ एक तीसरा आदमी था। उस आदमी ने पूछा- “पहाड़ी की टेकरी पर गए थे?”

लड़के को याद आने लगा कि आज वह कमरे में बंद हो गया था। वह उदास होने लगा। उस आदमी ने कहा- “क्या तुम टूटी मीनार के पास बड़े पत्थर पर बैठे थे। क्या तुमने हवा में कोई गीत सुना। किसी सोलह साल की लड़की जैसी आवाज़ में। क्या तुमने देखा कि वहाँ घास के तिनके हवा के साथ गोल-गोल उड़ते रहते हैं?”

लड़के ने कहा- “नहीं।”

उस आदमी ने लंबी राहत की साँस ली। सबके चेहरों पर चिंता की रेखाएँ मिटने लगीं। उस तीसरे आदमी ने तेज़ी से कहा- “अपने हाथ दिखाओ।” लड़के ने अपने हाथ आगे किए। वह आदमी हथेलियों को देखकर आराम की मुद्रा में आ गया। उसने लड़के के हाथ छोड़ दिए उन हाथों में कुछ न था। एक भी लाल रेशा नहीं।

तीसरा आदमी उठा, कुछ बुदबुदाया और सुख भरे क़दमों से चला गया।

उसके जाते ही घर में हवा की साँय-साँय शुरू हो गई। हवा हर तरफ से आ रही थी। बस्ती में ज़रा ऊँचाई पर बसे हुए इस मकान के अलावा सब मकानों को हवा भेद रही थी। सिर्फ हवा बज रही थी बाकी ख़ामोशी थी।

उस रात लड़के का भाई उसके कमरे में आया। उसने कहा कि तुमको कुछ बताना है।

भाई उसके पास बैठ गया- “असल में हम डर गए थे। हमें लगा तुमको कुछ हो गया है। वह जो मीनार की टेकरी है, वहाँ कोई साया है। वहाँ पर जाने वालों को कुछ हो जाता है। अब तक जो भी गया, उसे हवा ने छुआ। हवा में गीत सुने। उसने हवा का नाच देखा। हवा ख़ुद वहाँ लोगों को ऊपर खींच लेती है।”

अपने भाई की बात सुनते हुए लड़का दीवार का सहारा लिए चुप बैठा रहा।

वह जो लड़की थी, उसे भी दोपहर को हवेली में क़ैद कर दिया गया। उसने दरवाज़ों को आवाज़ नहीं दी। उसने हत्थियाँ पकड़कर नहीं खींचीं। वह चुप रही। जिस तरह लड़का एक दिन के लिए बंद किया गया था उसके उलट लड़की को अनेक दिनों तक बंद रखा गया।

इसके बाद एक दोपहर उस लड़के और लड़की को किसी ने घाटी से देखा। वे दोनों एक साथ इसी टेकरी पर थे। जब लोग उनको खोजने आए तब वे यहाँ नहीं मिले। वे दोनों गायब हो गए थे। फिर कभी किसी को नहीं मिले।

गुलजान ने अपनी बात पूरी कर दी। दिबांग सोच में गुम था।

गुलजान ने उसे याद दिलाया कि अब तुमको जवाब देना होगा। दिबांग ने कहा- “पूछो, क्या सवाल है?”

गुलजान ने पूछा- “बताओ वे दोनों कहाँ गए।”

दिबांग ने महसूस किया कि इस सवाल के बाद हवा अचानक रुक गई है। ख़ामोशी गहरी होती जा रही है। मीनार की टूटी दीवार के पास से कोई झाँक हुई। वहाँ कोई सरसराया। सब चीज़ें गहरे मौन में किंतु लगता है, सब बोल रही हों। पत्थर, घास, रेत, हवा, सूखे दरख़्त, हर कोई उसको कुछ कहना चाह रहे हों।

दिबांग ने कहा- “वह लड़का ये मीनार हो गया और लड़की हवा हो गई।”

गुलजान ने फुर्ती से दिबांग को बाँहों में भर लिया। वह रोने लगी। “तुम कैसे मेरे मन को पढ़ लेते हो। बताओ कहाँ से सीखा मन को पढ़ना?” वे दोनों एक-दूजे की बाँहों में टूटी मीनार के पास वाले बड़े पत्थर पर पड़े हुए थे। उनके मन भीगे हुए थे। वे एक-दूजे को चूम चुके थे। अचानक बहुत से परिंदे टूटी मीनार के पास हवा में तैरने लगे। दिबांग ने गुलजान से कहा- “अपनी आँखें खोलो और देखो।” गुलजान ने कहा- “ऊँ हूँ।”

“गुलजान, देखो परिंदे”!
* * * 

Short story collection- Jadu Bhari Ladki; Publisher HindYugm; Year 2015; Rs 100

[Sketch : Manish Solanki]