Sunday, April 10, 2011

लोहे के घोड़े


सड़क किसी निराश्रित बेवा के फटे ओढ़ने की तरह किनारों से उखड़ी हुई थी और बीच में बेतरतीब गड्ढे बन गए थे. घर की दायीं तरफ एक नया पुल बन रहा था. सारे दिन गर्द से भरे हवा के झोंके आते थे. रोज़ सुबह सुगणी एक हाथ कमर के पीछे रखती हुई घर को बुहार कर भट्टी के पास बैठ जाया करती. पंखे से कोयलों पर हल्की आंच देते हुए सोचती कि इन दिनों घर में कितनी धूल उडी आती है, काश वह दिन में दो तीन बार सफाई कर सकती. वैसे करने को कर लो मगर घर में आये हुए ग्राहक के पीछे झाडू फेरना अपशकुन माना जाता है इसलिए बारदाने के टुकड़े को यहाँ वहां पटकती जाती और फाँ-फूं करती हुई मिट्टी को हटाती रहती. उसने लोहे की हथोड़ी, अगरता, घण और संडासी सहित सारे सामान को साफ कर के रखा हुआ था और तीसरी बार उफनती हुई चाय को फूंक मार कर बाहर की ओर देखने लगी. दूर बड़ी मशीनों के आस पास से बचते हुए लोग चले जा रहे थे लेकिन गोमिन्दा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था.

एक बार तो सुगणी को खुद पर गुस्सा आया कि रात को वह चुप रह जाती तो कितना अच्छा होता, बिना बात के जुबान लड़ाती रही. कुछ एक आंसू थे जो आँखों की कोर के पास अटके हुए थे. वे उसे याद दिला रहे थे कि बीस साल साथ रहने के बाद इतना हक़ तो होता है कि अपने मर्द को भले बुरे में अपनी राय दे सके. एक बार फिर से बैठे बैठे गली के छोर तक नज़र दौड़ाई. गोमिन्दा फिर भी आता हुआ नहीं दिखाई दिया. पड़ौस के छपरों के नीचे लोहे को कूटे जाने की आवाज़ें आ रही थी और भट्टी से उठती चिंगारियां एक-दो फीट उछल कर नीचे गिरती और बुझती जाती. क़स्बे के बढ़ते हुए कोलाहल में भी सुगणी को सन्नाटा घेरता जा रहा था.

सूरज चढ़ आया था. भांत-भांत की आशंकाएं बलवती होती जा रही थी कि दिन उगने से पहले दिसा को निकला गोमिन्दा दस बजे तक लौट कर नहीं आया था. निपटना दस मिनट का काम है. उस पर भी बीडी-ज़र्दा के लिए कहीं रुको तो पंद्रह मिनट और पर अब तो चार घंटे होने को आये हैं. पैंतालीस साल के अधेड़ आदमी से ऐसे बचपने की उम्मीद नहीं होती. सुगणी चाय को छोड़ कर कब की छपरे के बाहर आकर खड़ी हो गई थी. रात बस इत्ती सी बात हुई कि गोमिन्दा ने सरिये मोड़ने और लूप बनाने का काम शुरू करने की बात कही थी और वह अड़ गई कि ऐसा हाड़ तोड़ काम करने की क्या जरुरत है. सुगणी ने छपरे से ऊँची आवाज़ में कह दिया था, आधी से ज्यादा उम्र तो जा चुकी है. रंग ने अपनी जगहें बदल ली हैं. सर सफ़ेद और सूरत काली हो गई है, उस पर घर परिवार और दुनिया के तमाशे देख कर थक गए, फिर ऐसा काम किसलिए ?

हर रात घर के सामने लगे लेम्प पोस्ट की रौशनी छपरे से छन कर उनके आँगन में गोल गोल बिंदियाँ उतारा करती थी. उन बिंदियों के उजास में उदासियाँ भी चमकती हुई जान पड़ती थी. रात घड़ी में बारह बजे थे और नींद का कहीं पता न था. पास की चारपाई पर करवट बदलते हुए गोमिन्दा ने संयत स्वर में कहा था. दुनिया बड़ी कठोर है और साथ जाने कब छूट जाये ? पहले जब भी वह सुगणी के रूप पर मरने की बात करता तो भी वह उसका मुंह अपनी हथेली से ढांप लेती थी. इस अपशकुनी बात को सुन कर वह देर तक झूठा रूसना करती और गोमिन्दा जब उसके गुदगुदी करता तभी मानती थी. रात ऐसी बात सुन कर सुगणी को रूठना याद नहीं आया वरन वह डर गई थी. उस डर की याद इस चमकती हुई धूप में तेज कटार बन कर उसके ह्रदय को बींध गई.

सुगणी इस इंतज़ार में घायल कपोत की तरह धरती की ओर बढती आ रही थी. गिरने से ठीक पहले उसने घर के पक्के कमरे में पांव रखा और भरसक कोशिश करके अपनी सास को कहा. आपके बेटे सुबह छः बजे घर से गए थे अभी आये नहीं... नाक में पहनी हुई सोने की बड़ी सी नथ चमकी. सासू ने उसकी तरफ मुंह किया. नथ के पास से होठ घृणा से टेढ़े होते जा रहे थे और माथे पर सलवटें जल्दी जल्दी बन और बिगड़ रही थी. सुगनी ने उन मुद्राओं को पल में छांट कर अलग कर लिया कि ये टेढ़े तिरस्कार भरे होठ उसके लिए हैं और चेहरे की बाकी चिंता वाली सलवटें गोमिन्दा के लिए.

हाय काऊं व्ह्यो ? कहते हुए सास उठी और लगभग सुगणी को धक्का देते हुए गोमिन्दा के पिता की ओर बढ़ गई. दुत्कारे जा रहे कुत्ते जितने अपमान को ख़ुशी से स्वीकार करते हुए सुगणी हिम्मत जुटा कर सास के पीछे चल पड़ी. पतली धोती बांधे हुए एक हाथ से मोरचंग की तार को सीधा करते हुए गोमिन्दा के पिता लगभग अंतर्ध्यान थे. उन्होंने मोरचंग को होठों से लगाया लेकिन अपनी पत्नी की बात सुनते सुनते उनके दोनों हाथ घुटनों पर आकर टिक गए. पत्नी के पीछे खड़ी बेटे की बहू की उदास आँखों को एक नज़र देखते हुए बोले. हमणे आवी जाविये.

दो तीन बार दायें बाएं देखा और फिर पास रखी लोहे की कुर्सी की टेक लेते हुए गोमिन्दा के पिता उठ खड़े हुए. खूँटी पर टंग रही बंडी को बाँहों में डाल कर उसी सड़क पर चल पड़े जिधर सब दिसा के लिए जाते हैं. उनकी अनुभव भरी चाल की लय को मन की व्यग्रता बिगाड़ रही थी. वे लगभग दौड़ते हुए से जान पड़ रहे थे. रेलवे पटरी के सहारे शौच जाने के इस रास्ते दौड़ते हुए से जाने पर लोग क्या सोचेंगे ? ये सोच कर वे एक दो बार मद्धम हुए किन्तु हर बार किसी आशंका ने उनकी चाल को बढ़ा दिया. उनकी पतली धोती के सिरे हवा में उड़-उड़ जा रहे थे किन्तु उनकी आँखें दूर क्षितिज तक गोमिन्दा का चेहरा खोज रही थी.

गली से उनके ओझल होते ही सास ने गिरगिट की तरह अपनी जीभ फैलाई और सुगणी को उसमें लपेट लिया. "रात काऊं लपर-चपर हती ?" सुगणी उसकी ओर पीठ कर के दूर गली में देख रही थी. सास ने इस दूरी और दिशा के हिसाब से आगे कहना शुरू किया. जिसका सारांश ये था कि इस खोटी स्त्री के इस घर में आने के बाद हमें कोई सुख नसीब नहीं हुआ. इसने अस्पतालों के चक्कर में मेरे बेटे का आधा शरीर घिसवा दिया. सुख चैन की ज़िन्दगी देने की जगह बेटे को अलग झोंपड़ी में लेके बैठ गई.

सुगणी ने अपने ह्रदय पर हाथ रखा और ईश्वर से कहा कि तूं जानता है किसने क्या किया है. मैंने अपनी सांस बाद में ली और इस घर का भला पहले सोचा है. गोमिंदे के लिए मेरा जीव हज़ार बार न्योछावर है. मेरी सब गलतियाँ माफ़ कर. वह मन ही मन और प्रार्थनाएं कहती रही. उसकी नज़र दसों दिशाओं में विराजे हुए तैतीस करोड़ देवी देवताओं और झाड़ू वाले पीर बाबा तक की आशीष का चमत्कार देखने को घूमती रही. दूर तक पुल के लिए खोदे जा रहे गड्ढों से उड़ती हुई धूल छाई थी. ससुर जी अकेले चले आ रहे थे और आशंकाओं की बारीक धूल सुगणी की उम्मीदों पर छाई जा रही थी.

अब तक पड़ौस के के लोगों तक खुसर-पुसर पहुंची तो वे भी बारी बारी से जमा होने लगे. उन सब की बातों में अचरज जरुर था लेकिन एक आश्वस्ति भी थी कि गोमिन्दा ऐसा कुछ नहीं करेंगे. लेकिन सब बातों के बीच एक यही सवाल था कि किसी ने उनको जाते हुए देखा कि नहीं ? यही सवाल एक दूसरे तक पास होता रहा. उदास छपरे के नीचे रखी देगची की चाय पर थरकन जम गई थी. बुहारा-झाडा हुआ घर भी सदियों पुराना दिखने लग गया था. इंसान की महक से ही घर का श्रृंगार रहता है. सुगणी का रूप भी रेत में पानी की तरह चार घंटों में ही लोप हो गया था. वह छपरे में रखे हुए लुहारी के सामान और सोई हुई सी भट्टी के पास बैठी थी.

एकाएक हल्का शोर प्रस्फुटित होने लगा. इसकी आवृति एक निश्चित लय में बढ़ते हुए सम पर आकर रुकी और फिर लुप्त हो गई. ये सब गली में गोमिन्दा के दिखने और उसके घर तक पहुँच जाने की क्रिया के सामानांतर हुआ. सच गोमिन्दा लौट आये थे. उनके चेहरे पर थकान थी. सुगणी ने उठ कर उनका स्वागत करने की जगह दीवार से सहारा लेते हुए निढाल सी हो गई. एक दो लोगों ने पूछा "गोमिन्दा भा कियें गया हता ?" गोमिन्दा ने फीकी मुस्कान भर फैंकी और गहरी चुप्पी ओढ़ ली. कोलाहल समाप्त हो गया. पिताजी ने बिना किसी सवाल जवाब के आधे बने हुए मोरचंग उठा लिए, गोमिन्दा की माँ अपने हिस्से के घर में चली गई.

असहाय, निराश, हताश और आगत की आशंकाओं के बोझ तले दबे हुए किसी जोड़े की तरह गोमिन्दा और सुगणी एक दूसरे को देख रहे थे. उनके बीच ऐसा कोई नहीं था जो सुबह की बासी चाय को फैंक कर ताजे दूध को भट्टी पर रख सके. उसमें पानी, चाय की पत्ती और थोड़ी सी शक्कर डाल दे. किसी के हाथ में सामर्थ्य न था कि धौंकनी के पंखे को घुमा दे या फिर हथोडा हाथ में उठा ले. गोमिन्दा सोच रहा था कि लोहे के घोड़े बनाना भी बुरा काम नहीं है. सुगणी ने सोचा कि लोहे के घोड़े कौनसे जीवित हो कर कुलांचे भरते हुए उसके छपरे में दौड़ लगाने लगेंगे ? अच्छा है कि सरिये मोड़ने और लूप बनाने के काम से पैसा भी हाथों हाथ आएगा.

उन्होंने कोई बात नहीं की. गोमिन्दा ने कल रात को लाये गए सरिये मोड़ने वाले लोहे को छुआ तक नहीं और लोहे के घोड़े बनाने के लिए चद्दर को काटना शुरू किया. सुगणी ने उसका हाथ पकड़ा और बोली. बोली तो क्या थी बस सुगणी के उन हिलते हुए होठों को देख कर गोमिन्दा ने ही अंदाजा लगाया कि ये पूछ रही है, कहा गए थे ? गोमिन्दा ने सुगणी के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा. "अब नए तरीके के कारखाने आ गए हैं और वे काम का पैसा भी ज्यादा और टाइम पर देते हैं. लोहे के घोड़े बनाने से बस दिन ही कटते हैं बचता कुछ नहीं." सुगणी लोहे के बुरादे से भरी रेत पर हाथ फेरती हुई सुन रही थी.

"मैं तेरे लिए बहुत दुखी होता हूँ कि कोई औलाद होती तो उसके सहारे ज़िन्दगी कट जाती... अब अगर गाँठ में पैसा भी न हुआ तो तुम्हारा क्या होगा ?" चाय की केतली के पास से आग की चिणक उठी और सुगणी के ओढ़ने पर जा गिरी. गोमिन्दा ने अपने हाथ की तीन चार थाप मार कर उसे बुझाया. सुगणी की डूबी हुई आवाज़ आई. "आप ही नहीं रहोगे तो ज़िन्दगी का क्या करुँगी..." लोहे के निर्जीव घोड़ों की ओर देखती सुगणी की आँखों से आंसुओं की लड़ियाँ हारे हुए सिपाहियों की कतार की तरह सर झुकाए चली जा रही थी.


26 comments:

रचना दीक्षित said...

किशोर जी काफी समय बाद आपकी पोस्ट आई बहुत अच्छा लगा. आपकी सभी कहांनियों की भाति ही यहाँ भी भावनायों का दरिया बहता सा लगता है शब्दों के तो आप जादूगर हैं और क्या कहूँ. बहुत बधाईयां.

रश्मि प्रभा... said...

bahut achhi dil ke ehsaason ko ubharti kahani

प्रवीण पाण्डेय said...

लोहे के घोड़ों के बीच फंसी जिन्दगी।

monali said...

After long, it was a treat to read u.. aapko padhte waqt lagta nahi k padh rahi hu.. lagta h k us parivesh ko jee rahi hu.. keep writing :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मार्मिक..यथार्त चित्रण। गरीबों के लिए जीना लोहे के चने चबाने जैसा है। मगर इन अभावों के बीच भी एक दूजे के लिए इतना प्रेम यहीं देखने को मिलता है। मानस पटल पर याद रह जाने वाली कहानियों में से एक।
..आभार आपका।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (11-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कैसी आंचलिक महक आ रही है इस कहानी में? जैसे रेणु को पढ रहे हों...परती परी कथा या ऐसा ही कुछ. भाव तो जैसे सारे बंध तोड़ के बहने को तैयार हैं, सुगणी के साथ.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अच्छी कहानी, भावनाओं का सुन्दर चित्रण।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा कहानी...बेहतरीन.

Nisha said...

full of emotion n too touching n ur style is full of magic HATS OFF TO U

कंचन सिंह चौहान said...

एक साधारण कहानी, जिसे शिल्प ने सुंदर बना दिया है... शायद यही आपकी खूबी है।

कुश said...

मैजिक... सिम्पली मैजिक..

कहानी के शिल्प से मैं जितना मंतर मुग्ध हो रहा हूँ.. तक़रीबन उतना ही आनद हैदर को देखकर आ रहा है.. कहानिया के लिए फॉण्ट चयन उत्तम है.. और बीच में लाल डोट.. छा गए हुज़ूर..

Giribala said...

बेहद उम्दा! Superb! I don't have enough words to praise :-)

neera said...

भाषा बांधती है वाक्य गहरी छाप छोड़ते हैं जैसे ....रंग ने अपनी जगहें बदल ली हैं. सर सफ़ेद और सूरत काली हो गई है... ... सुगनी ने उन मुद्राओं को पल में छांट कर अलग कर लिया कि ये टेढ़े तिरस्कार भरे होठ उसके लिए हैं और चेहरे की बाकी चिंता वाली सलवटें गोमिन्दा के लिए....
लेखक ने सुगनी - गोमिन्दा के प्यार के सुख की झलक दिखा उन्हें कितना धनवान बना दिया उन पर दया नहीं रश्क होता है...

Patali-The-Village said...

अच्छी कहानी, भावनाओं का सुन्दर चित्रण। धन्यवाद|

vaishnavi said...

bahoot sundar jivaant chitaran,ek nadi sa pravaah hai aapke shabdo mai, jo sang apne baha le jata hai.

varsha said...

लेखक ने सुगनी - गोमिन्दा के प्यार के सुख की झलक दिखा उन्हें कितना धनवान बना दिया उन पर रश्क होता है....neeraji u hv stolen my words and now i am doing the same.....well loved the story.

डॉ .अनुराग said...

तुम औरतो के दुखो को अच्छी तरह से मापते हो ओर आदमी की आदमियत को.......तुम्हारी कहानी में एक गंवई गंध आती है जिसकी अपनी महक है ....अरसे बाद कंप्यूटर पर आकर कुछ अच्छा पढना सुखद है .....

दीपक बाबा said...

एक सुंदर कहानी.... जो मानव व्यथा को कहीं न कहीं झंझ्कोरती है. ... या ये कहीं .... मानव मनो से शब्द चुराती है.....

sanjay vyas said...

मास्टरपीस.बिला शक.

Manoj K said...

बहुत खूब किशोरजी.
कहानी कैसी कही जाती है और सुनने वाला (पढ़ने वाला नहीं) कैसे उसे अंत तक सुनने की लालसा रखे यह जादू कोई आपसे सीखे.

मनोज

Parul said...

kathay-shilp ka bahut gyaan nahi..par aapki shaili aapko bhinn karti hai..aur padhna rochak hota hai!

नीरज बसलियाल said...

कहानी ने डराया ... एक छोटी सी घटना है ये ... और ऐसी घटनाएं हमेशा डराती हैं ... विशेष तौर उन लोगों को जो इंतज़ार करते हैं |

कहानी कहने की कला का उदहारण है ये |

रचना दीक्षित said...

आपके कहानी कहने का अंदाज़ बिकुल ऐसा है की लगता है कोई कैनवास पर पेंटिंगकर रहा हो. बहुत बधाई.

सारा सच said...

अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

दीपा पाठक said...

आप बहुत सुंदर लिखते हैं किशोर जी यह तो अपने पाठकों की इतनी सुंदर प्रतिक्रियाओं से आप समझ ही जाते होंगे। मैं ब्लॉग की दुनिया में कई-कई महीनों के अंतराल के बाद ही विचरण करती हूं और जब भी आती हूं अपने बहुत ही चुनिंदा ब्लॉग्स का अगला-पिछला बकाया सब पढ़ जाती हूं। आपका ब्लॉग पढ़ कर हमेशा अच्छा लगता है। शुभकामनाएं!

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