ईश्वर ने अपने परिखाने को सजाने के लिए सारी हरियाली चुरा ली थी. लोगों से कहा तुम अपने लिए सड़कें बना लो. उन्होंने ऐसा ही किया. एक बड़े रास्ते के बराबर दो छोटे रास्ते पैदल चलने के लिए बना लिए. उन रास्तों के बीच घने नीम खड़े थे. वे आगे निकल गए लोगों को याद करने या फिर किसी के आने की उम्मीद में सुस्ता लेने के लिए थे. धूप का आईना दूर तक फैला था. उस पर पेड़ों की छाँव हथेली में रची मेंहदी की बिंदियों सी दिख रही थी. लड़के को वहां से गुजरते हुए ख़याल आया कि पीले फूलों की बहार है. जबकि दूर तक कोई बागीचा कोई खेत नहीं था. उसने टूटते हुए बदन का बोझा उतार कर एक पत्थर पर रखा. बरसों से अपने कंधे पर लटकी हुई छाया को देखा, कमर पर बंधी सलवटों से भरी समय की पेटी को छुआ और कबीर को याद करते हुए इस सारे असबाब के खो जाने की दुआ की.
नीम लड़के से बतियाने लगा.
इधर क्यों बैठे हो ?
मुझे कई दिनों से बुखार है और मैं ज्यादा चल नहीं सकता हूँ.
यहाँ से कहां जाओगे ?
मालूम नहीं.
फिर भी ?
महबूब के घर
महबूब का घर तो दिल में होता है ?
मैं उसी दिल को खोज रहा हूँ.
मैं कौन ?
नीम बंद करो अपने सवालात... मुझे घड़ी भर छाँव में बैठने दो .
लड़का रोने लगा.
नीम ने ऐसी कई उदासियाँ देखी थी. उसने पास के घर में खड़े हुए गुलमोहर से कहा. आसेबज़दा इंसान अक्सर इसी तरह चलते हुए थक कर बैठ जाते हैं और फिर रोने लगते हैं. नीम की बात सुन कर लड़का बेतहाशा भागने लगा. सामने एक रंगीन लिबास में छुप गया. लड़की ने पूछा, अब तक कहां थे ? मैं तुम्हें हर जगह देख कर आई. लड़का कुछ बोला नहीं. लड़की ने उसकी नम आँखों को दुपट्टे के पल्लू से पोंछते हुए कहा. इतना मत सोचो. नीम के पेड़ सठिया गए हैं. वे मोहब्बत में भटके हुए लोगों को प्रेतात्माओं से पीड़ित समझते हैं.
लड़के ने कहा. वे सही कहते हैं वरना कैसे तुम इस तरह हर बार याद करते ही मिल जाती हो. लड़के ने अपना सर झुका कर लड़की की छातियों के पास रख दिया और कहने लगा. तुम कुछ भी हो पर मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता हूँ. लड़की के लिए ये कोई नई बात नहीं थी. वह उसके मुंह से ऐसा सैंकड़ों बार सुन चुकी थी फिर भी उसे हर बार सुनना अच्छा लगता था. उसने लड़के के बाएं हाथ को बीच से पकड़ा और कहा चलो. उसका हाथ पकड़े हुए लड़की अंदर से रोने लगी. वह चाहती थी कि लड़का उससे कहे, तुम मत रोओ. लड़का चलते हुए एकाएक ठिठका और लड़की की आँखों में देख कर बोला. तुम रो रही हो ? नहीं मैं खुश हूँ, देखो कितने पीले फूल खिले हैं. दूर तक रास्ते के सभी घरों के दरवाज़े बंद थे और सड़कें सूनी थी.
फरवरी का आधा महीना बीत चुका था. नीम पर कच्ची कलियाँ फूट रही थी. तने के पास पत्थरों के घेरे के बीच लकड़ी के बक्से रखे थे. लकड़ी के बक्सों के किनारों पर चमड़े के पैबंद लगे थे. मोची, मुसाफिर के जूतों से धूल झाड़ रहा था. हवा में ठंडक थी फिर भी मुसाफिर पानी की दीवड़ी को हसरत से देखते हुए बोला. ज़रा और मजबूत कर दो जूते कि महबूब का घर उम्र के उस पार है.
[Painting image courtesy : fineatramerica.com ]

33 comments:
waah kishore ji
bahut khub
achha laga
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (17-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com/
ऐसा लगा जैसे कोई ईरानी फिल्म देख रहा हूँ.. You Rock..!!!
'महबूब के घर'
'महबूब का घर तो दिल में होता है ?'
'मैं उसी दिल को खोज रहा हूँ. '
'मैं कौन ?'
---सबसे बेहतरीन
"आसेबज़दा इंसान अक्सर इसी तरह चलते हुए थक कर बैठ जाते हैं और फिर रोने लगते हैं."
'वे मोहब्बत में भटके हुए लोगों को प्रेतात्माओं से पीड़ित समझते हैं. '
आखिर में यह
"ज़रा और मजबूत कर दो जूते कि महबूब का घर, उम्र के उस पार है "
वाह ! लगा जैसे खुद से ही बात कर रहा होऊं.... मैं लम्बी पोस्ट नहीं पढ़ पाता, आँखें जवाब दे जाती हैं, आँखें अभी भी कुछ कह रही हैं लेकिन अबकी बातें जुदा हैं.
आप जियो हजारों साल.
और हाँ कुछ दिनों पहले 'परिचय' वाला भी पेज देखा था, कितना सुन्दर तो था. अपने तरीके से लिखा हुआ.
कहानी में कहीं भुला आई हूँ खुद को...जाने नीम मुझे वापस आने का रास्ता बताएगा भी कि नहीं.
कई सारे रास्ते खोलती और उनमें नए तिलिस्म बुनती कहानी में गज़ब सम्मोहन है. किसी लोककथा जैसे...संगीत के सुरों जैसे.
Cheers!!!
जादू जैसा है
आसेबज़दा इंसान अक्सर इसी तरह चलते हुए थक कर बैठ जाते हैं और फिर रोने लगते हैं...अद्भुत!
पेड़ रास्ता बनाने के लिये सदा ही खड़े हैं, हम ही पूछना भूल गये हैं।
*बताने
ओह..गद्यात्मक नज्म....
लाजवाब !!!!
बस लाजवाब...
great job kishore ji,
उम्र यूँही गुजर जाएगी तन्हा, कि महबूब का घर दूर है कहीं ,
न कर सके हिम्मत कदम उठाने की, कि महबूब का घर दूर है कहीं,
बंद पलकें हि हैं मेरे सच्चे साथी,
इन्हें बंद करते हि ये लगता हैं ,कि महबूब का घर है यहीं|
अजीब होती ना प्रेम कहानिया ........... भीतर फतांसी भी असल सी लगती है .....
उम्र ठहर जाती है प्यार में ..
उदासिया भी ......
बड़ी मोहक कहानी है जूतों की इल्तजा और रूमानियत में घुमड़-घुमड़ बरसता प्रेम... चोंका देता है...
अद्भुत रूप से मंत्रमुग्ध करती है यह कहानी ! सागर सी अथाह गहराई और आकाश सा अनंत विस्तार लिये लगता है जैसे समूचे बृह्मांड में व्याप्त है ! बहुत सुन्दर !
और मुझे इतना सब पढ़ के लगा कि कबीर का कोई एक दोहा या मीरा के पद की कोई एक पंक्ति पढ़ी है.....!!
ज़रा और मजबूत कर दो जूते कि महबूब का घर उम्र के उस पार है...is pankti ne mujhe bhi majboot kiya hai... joote to kas hi rakhe hain.aap lambi umra tak yoon hi likhte rahen.
ईश्वर ने दुनिया हरी भरी बनाई थी ..तब रेगिस्तान नहीं थे...बोले जो दुनिया में कोई किसी को दुःख देगा रेत का एक कण गिरा देंगे...
समझ में नहीं आता कि आपको उदास लिखना पसंद है कि उदास रहना पर जिस रंग की स्याही से भी लिखते है जंचता है...
ज़रा और मजबूत कर दो जूते कि महबूब का घर उम्र के उस पार है और बड़ा लम्बा सफ़र...
एकदम कुश जी की तरह ही...पढते हुए लगा जैसे अरेबियन कथाओं के बीच पहुंच गई...पता नहीं किन किन रंगों में लिख लेते हैं आप..और मज़ा ये कि हर रंग में पाठकों को रंग भी देते हैं. बहुत सुन्दर लघु-कथा.
aapki rachna ne to ek jadu sa faila diya hai... bahut achha laga aapko padhna
kuch racha hai, kuch basa hai in shabd bayaaron mai,sheetal sa man ko sukoon deta hai,hum mantrmugadh se kahin door nikal jata hai vapas na aane ke liye.
मोह पैदा करती. दिलकश.
शैली में पाओलो कोएलो की याद दिलाती.
masterstroke as always.. stunning and amazing
Manoj K
"हवा में ठंडक थी फिर भी मुसाफिर पानी की दीवड़ी को हसरत से देखते हुए बोला. ज़रा और मजबूत कर दो जूते कि महबूब का घर उम्र के उस पार है."
जादू रचते हैं आप!
मैं इतने दिनों से सोचता रहा कि इस बार कुछ और कहूँगा, लेकिन... कुछ और रह ही नहीं जाता मंत्रमुग्ध होने के बाद.
bahut khoob sa .. as usual you do. keep rocking.
mohak
बहुत अच्छी कहानी..... कहानी में नयापन है ...आपको बहुत-बहुत बधाई !
धूप के आईने में खुद को देखकर आंखें चौंधिया गई हैं। क्यों रोना आ रहा है खुद पर? क्योंकि आसेबज़दा इंसान अक्सर इसी तरह चलते हुए थक कर बैठ जाते हैं और फिर रोने लगते हैं...
रोचक वर्णन!
dost pehli baar parh raha hu apko sach main bahut gazab likha hai apne. sach kaho to asli zindgi udasion main hi dharhakti hai.
ek sukhad anubhati hoti hai padhkar ,aapko rang parv ki dhero badhai ,
.. मुझे घड़ी भर छाँव में बैठने दो .
कहाँ नसीब होती है ये छाँव...... आप तो दुखती रग पर हाथ रख देते हैं.
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