सख्त पथरीली ज़मीन है. धूप में चमकती है. काले पत्थरों की लड़ियाँ दिखाई देती है. उसे ज़िन्दगी ने दो गलत चीज़ें बख्शी हैं एक तन्हाई और दूसरा समय. वह प्यास से व्याकुल अपने मन की धार को तेज करती हुई इन दो पहाड़ों को हर दिन काटती है. घर में प्यास उसे चारों ओर से घेरती है. ये उसे अच्छा नहीं लगता इसलिए घर के बाहर खेत के सामने मुंह करके बैठ जाती है. ऐसे में प्यास दूर तक पसर जाती है. उसकी सघनता कम होने से सिमली का बोझ हल्का होता सा दिखता है. वह नीचे नज़र किये एकटुक संकरी पगडण्डी को देखती है. वैसे हर घर के आगे से एक पगडण्डी जाती है लेकिन इस प्यास को कहीं जाना नहीं है. ये मायावी है, वर्तुल की तरह घूम कर पूंछ फटकारती हुई दीवारों पर चिपकी रहती है.
बारह मासों में आने वाले छहों मौसमों के दिन रात छोटे-मोटे होते रहते हैं लेकिन सिमली के पास कुल जमा चार काम है. बाखळ में झाड़ू लगाती है, चूल्हे को धुंआती है और लाखेटाली नाडी तक जानवरों को पानी पिलाने ले जाती है. दोपहर सर पर बैठी होती है और भेड़ें सर से सर मिलाएं अबूझ चिंतन में डूबी होती है तब सिमली एक बार पानी में अपनी सूरत जरूर देखती है. चौथा काम है, सौ मीटर के फासले पर खड़े स्कूल की खिड़की को देखना. आध पौन घंटे तक या जब तक वह मास्टर बाहर बरामदे में आकर उसे देख न ले तब तक बैठी रहती है. भेड़ें ऊँघने लगती है, बकरियां चारों दिशाओं में चरने चली जाती है और वह सूनी आँखों से स्कूल को देखती रहती है. कभी सहम जाती है जैसे खुद ने कोई अपवित्र बात कह दी हो. ऐसी बात जिसका ज़िक्र भर किसी को सुन्न कर दे.
मास्टर नहीं आता है तो वह स्कूल चली जाया करती है. दीवार की कोर पर हाथ रख कर उसे देखती है. चुप आँखों से मास्टर को मार गिराती है. एक-दो बार के बाद मास्टर ने ऐसा होने ही नहीं दिया कि सिमली को उठ कर स्कूल तक आना पड़े. पाळ के पास पसरे हुए अजब हरे सीलेपन की गाढी खुशबू में एक हूक उठती है. सिमली वहीं बैठ कर पानी को उलाहने देती है. मेरी प्यास बुझा दे ऐ हरियल पानी वरना ये धूप तुझे उड़ा ले जाएगी मगर नहीं बुझती. वह चिलका बन कर पानी की देह पर दिप-दिप करती रहती है. शरबत से पानी के ठन्डे बदन को छू कर आती हिलोरों से मन भीगता जाये लेकिन ये तो लाखा के पछाड़े भूतों का जादू है.
इस नाडी की भी कहानी है. कई दशक पहले आधी रात बीतने के बाद लाखा को कबड्डी की आवाज़ें सुनाई दी तो उठ कर चल पड़ा जैसे राजा भारमल रात में घुंघरुओं की आवाज़ों के सम्मोहन में अपनी सुध खो बैठता था. चांदनी रात में उसके खेत की कांकड़ पर भूत कबड्डी खेल रहे थे. लाखा भी खुद को रोक नहीं पाया. पहाड़तोड़ बदन वाले खांटी जाट ने भूतों को बहुत छकाया. भोर की पहली किरण के फूटते ही भागते भूतों में से एक की चोटी और दूसरे की सबसे छोटी अंगुली पकड़ ली. भूतों ने उसे राजा बनाने का वादा किया लेकिन लाखा बहुत प्यासा था और उसकी पांच पीढियां सात कोस दूर से पानी लाती थी. लाखा ने भूतों से कहा कल रात यहाँ तालाब खोदना होगा. सिमली इसी कथा में घुमड़ती हुई अचानक उठ बैठी जैसे आखिरी तगारी में भरी रेत, भूत उस पर ही डालने वाले हैं. उसे लगा कि प्यासे लाखा और उसकी प्यास का कोई वास्ता नहीं है. बकरियां दूर चली गई थी.
सिमली ने भोले स्वप्निल ढंग से आह भरी. मानों वह कहीं दूर बहुत दूर अपने बचपन से लौट कर आई हों. गीले पानी में उसको खुद के शुष्क चेहरे पर स्नेह उमड़ आया. पाळ पर बैठ कर काम और कल के बारे में सोचती रही. आम तौर पर वह कभी इतना समय नहीं लेती है मगर आज अकेले बैठे याद करती है कि मास्टर के कित्ती आँखें हैं. दो ही होंगी, खुद जवाब देती है और फिर अगला ख़याल आता है कि मास्टर को प्यास लगती है या वह मद-छके भंवरे की तरह भन्नाता हुआ उसके आँगन की दीवारों से टकराता रहता है. कोई छः महीने पहले भूरकी बकरी स्कूल में चली गई थी, तब उससे बात हुई थी. "चाय बनाने को तेरी बकरी दूह लूं क्या ?" मास्टर के ऐसा पूछने पर वह चुप रही मगर जाते हुए उसकी गहरी आँखों में झाकती कह गई "चाय से क्या प्यास बुझेगी...?" मास्टर ने उसकी उद्विग्न जिज्ञासु आँखों को ताड़ लिया था. वह बिना कुछ कहे रहस्यमय ढंग से मुस्कुरा भर दिया.
सिमली के घर के आँगन में बताशे जैसा चाँद उगा हुआ था. मास्टर और उसने जाने कितने चाँद यहीं बुझा दिये. मास्टर सिगरेट पीता नीम आँखों से उसे देखता. वह अधलेटी पूछती है "तूने बताया नहीं कि मुझे क्या चाहिए ?" मास्टर ने सजीव स्नेहमय नेत्रों की अभिव्यक्ति को समझना सीख लिया था लेकिन उसके इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं था. सिमली फिर कहती है "मास्टर बता न... मुझको क्या चाहिए ? मेरे लिए घरवालों ने एक खसम बनाया. मैंने उसके हाड़ मास की आग में कई रातें फूंक डाली मगर रही प्यासी की प्यासी. अचेत पुकारती रही कोई मेरी बाँह पकड़ो, यहाँ कोई नहीं था. राख में संजोये हुए अंगारों को अपनी आहों से जगाया, हथेलियों से समेटा और फिर देवताओं को धूप चढ़ाया और रो कर सो गई... सुन, मेरे रहने को घर है, खाने को रोटी है, मेरा मर्द भी है. उसके परदेस से लौट आने पर या उसके बिना तेरे यहाँ होते भी... मुझे चैन क्यों नहीं आता. "
मास्टर चुप बैठा था. सिमली ने अपने पांव की ठोकर से उसका ध्यान फिर खींचा. " ओ भणे-पढ़े कुछ तो बता... मुझे क्या चाहिए ?" मास्टर उसके पास सरक आया. उसके सिर को अपनी गोदी में रखते हुए आसमान की ओर देखने लगा. गहरी टीस को उकेरती कुरजां का झुण्ड चला जा रहा था. "बरफ के देशों से आई है, मिलन करेगी, बच्चों को बड़ा करेगी और उनको उसी रास्ते का पता बता देगी. जहां से वे पीढ़ी दर पीढ़ी चली आया करती हैं. तुझे पता है हम कुरजां से थोड़े ज्यादा पागल हैं. मन की हूक को दबाये हुए भटकते रहते हैं." उसने मास्टर की इस बात को ध्यान से सुना लेकिन आस फिर से बुझ गई. "तो क्या बच्चे जनने और उनको बड़ा करने को संसार कहते हैं ? मैं तो इस हिरण-कुलाची वाले मन का पूछती हूँ. ये कहीं टिकता क्यों नहीं..." सिमली के चेहरे पर उदासी बढती गई.
उसके ताम्बई शरीर पर दूध बिछा हुआ था. चाँद के मीठे बताशे से भीगे होठों को तेज सरपत घास काटती जाती. दम भर के कहती है. "मास्टर, तारे थक कर सो जाते है, मन जाने कहां भटकता रहता है. इसका ठीया क्यों नहीं बनता. क्या मैं बुझ जाऊं तो ये प्यास बुझ जाएगी ?" वह चुप रहता है. सिमली एक करवट लेकर उसके ऊपर आते हुए हंसती है. "क्या है रे जिंदगानी... मिट्टी का धेला है जिसमें आग भरी है. घड़े के भार से कोई नार नहीं मरी तो उसकी प्यास भी नहीं बुझी और साला तूं भी गधा है अपनी भणाई के नमक ढ़ोता रह गया है. तुझे पता ही नहीं... ज़िन्दगी का फूल साँवरिये ने क्यों खिलाया है. इस फूल में साँस की आग क्यों लगाई है ?" मास्टर मुस्कुराता है. बाड़ से हवा के कटने की आवाज़ आती है. चाँद सा बताशा डूबने को है.
मास्टर उठ गया.
भोर के पहले पहर कोई देखता तो कहता सिमली पगला गई है. वह टूटे पत्तों पर छप-छप करती निर्बल पांवों से चली जा रही थी. पत्ते पगडण्डी के ठीक पास पंक्तिबद्ध पड़े हुए हैं. बंद दुकानों पर लगी पुरानी झंडियों के बचे हुए चिथड़े हवा में लहरा रहे थे. नाडी का पानी घात लगाये व्याघ्र सा धीर था. विलोप होता चाँद पानी के विरूपित दर्पण में नितांत अकेला था. सिमली ने विचित्र धुंधली छाया देखी तो उसे सहसा ख़याल आया कि उसने श्रृंगार तो किया ही नहीं फिर भला लाखा के पछाड़े हुए भूतों के वंशज कैसे उसके साथ रम्मत करने आयेंगे और वह किस तरह इस प्यास का हल पूछेगी.
नाडी के किनारे छतरियां बनी थी. सामने ही एक ऊँचे शिला स्तम्भ पर ढीले ढाले प्राचीन चोगे में एक देवी अंकित थी. नीचे आधार पर तीन शिला स्तम्भों पर खड़ी उस इमारत के अँधेरे कोनों से आवाज़ें आ रही थी. पहले की भांति ही किनारों के पास एक बैठने की शिला थी. उससे जुड़ा हुआ एक लकड़ी का बड़ा सा तख्ता था. सिमली उस पर खड़ी हो गई. हवा में उसकी लटें खुलने लगी. ओढ़णा फहरा कर वक़्त की सलवटों से मुक्त होने लगा. भूत नहीं आये मगर इस निर्जन में उसने पाया कि वह नितांत अकेली है. चाँद डूब गया है और सूरज के आने में देर है फिर ये कैसा उजास उसके भीतर से फूट रहा है. उसने खुद से कहा. हाँ, इस दुनिया में सब अकेले हैं, बिल्कुल अकेले... अशांत, अप्रसन्न और विह्वल. सिमली ने अपनी बाहें वृताकार फैला दी कि पृथ्वी जैसी किसी चीज को बाहों में समेटना चाहती हों.
[Painting The Gate ~ Image Courtesy : Alcinda Saphira ]
29 comments:
'हाँ, इस दुनिया में सब अकेले हैं, बिल्कुल अकेले... अशांत, अप्रसन्न और विह्वल.'
तलाश किसी जवाब पर खत्म हो जाती है तो बड़ा सुकून आ जाता है, उलझाती हुयी कहानी अनोखे बिम्बों से गुजरती हुए पूरी होती है. पढ़ कर दिल भर सा आया...भटकना कुछ लम्हे के लिए ठहर गया जैसे.
चाँद सा बताशा डूबने को है.
कुछ सवाल के हल तो वाकई हैं आपकी इस कहानी में ! इधर कुछ तथाकथित नामी लेखकों की कहानियाँ पढ़ी है , वो इस स्तर को छूने से वंचित रह जाते हैं ! एक बार ऐसे ही आपकी कहानियों के बारे में किसी से बात हो रही थी मेरे से ज्यादा वो आपकी तारीफ़ किये नहीं थक रही थी ! वाकई स्वक्षता की जो परिपाटी है उस दायरे में कहानियां कह लेना और अपने पाठकों को संतुष्ट करना ख़ुशी की बात है ! ये कहानी भी मुझे पसंद आयी ! नव वर्ष की ढेरो शुभमानाओं के साथ
आपका
अर्श
bahut achhi lagi aapki kahani
is bar mere blog par
"main"
जब ऊर्जा का प्रवाह अदम्य बहने लगता है तो जीवन असाधारण हो जाता है।
किशोर जी,
आपकी कहानी पढने का आनंद ही अलग है, बिलकुल भिन्न अंदाज़, हर चरित्र का चित्रण एक दम अद्भुत और प्रवाह तो ऐसा जैसे नदी बह रही हो, विस्तार भी अत्यंत सधा हुआ. बहुत बहुत बधाई और आपके लेखन को मेरा सलाम. नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ.
रचना
तुम्हारे तीन हिस्से है .....मुझे कच्ची शराब वाला सबसे ज्यादा पसंद है ....निडर ..अजीब सा उदास शख्स जिसके पास ढेरो फलसफे है ...ओर ढेरो अज्ञान भी.....थोडा चौकन्ना .....थोडा लापरवाह .........
दूसरा रूमानी.....
ओर तीसरा ये ......जिसके पास कहानी कहने का हुनर है ......उस हिस्से की जिसकी इन दिनों लोग ज्यादा बात नहीं करते.....
vakai ek gehari talab hai aap mein..jis se koi koi hi gujrta hai shayad!
हाँ, इस दुनिया में सब अकेले हैं, बिल्कुल अकेले... अशांत, अप्रसन्न और विह्वल. सिमली ने अपनी बाहें वृताकार फैला दी कि पृथ्वी जैसी किसी चीज को बाहों में समेटना चाहती हों. .........
सच ......सोलह आने सच .....खुद में डुबो लेने वाली कहानी ....अदभुत ........लाजवाब एक बार फिर से ...सलाम आपकी सोच और कलम को
अकेलेपन के रंग-रूप का ..क्या चित्र खींचा हैं शब्दों ने...अशांत, और विह्वल हर आइना!!
"क्या है रे जिंदगानी... मिट्टी का धेला है जिसमें आग भरी है. घड़े के भार से कोई नार नहीं मरी तो उसकी प्यास भी नहीं बुझी और साला तूं भी गधा है अपनी भणाई के नमक ढ़ोता रह गया है. तुझे पता ही नहीं... ज़िन्दगी का फूल साँवरिये ने क्यों खिलाया है. इस फूल में साँस की आग क्यों लगाई है ?"
बहुत मस्त है भाई.
"उसे ज़िन्दगी ने दो गलत चीज़ें बख्शी हैं एक तन्हाई और दूसरा समय."
"इस प्यास को कहीं जाना नहीं है. ये मायावी है, वर्तुल की तरह घूम कर पूंछ फटकारती हुई दीवारों पर चिपकी रहती है."
"गहरी टीस को उकेरती कुरजां का झुण्ड चला जा रहा था."
"क्या मैं बुझ जाऊं तो ये प्यास बुझ जाएगी ?"
कमाल दर कमाल , मैं क्या कहूँ?
दूसरा अनुच्छेद बहुत ज्यादा पसंद आया.
और... "चाँद सा बताशा डूबने को है"
इसमें बेहिसाब उदासी है, और जाने क्यूँ, इधर ये उदासी खूबसूरत सी जान पड़ती है.
हमेशा की ही तरह, किशोर जी, जादू रचते हैं आप.
आभार इस कहानी का!
mujhe kurjan yani siberian crane bahut pasand hain aur yah panktiyaan bhi.."बरफ के देशों से आई है, मिलन करेगी, बच्चों को बड़ा करेगी और उनको उसी रास्ते का पता बता देगी. जहां से वे पीढ़ी दर पीढ़ी चली आया करती हैं. तुझे पता है हम कुरजां से थोड़े ज्यादा पागल हैं. मन की हूक को दबाये हुए भटकते रहते हैं."
अकेलेपन का राग है बस ... सुनने वाला सुनता है, गुनने वाला जानता है |
कहानी जब बिंबो में लिखी जाती है, तो अच्छा ये होता है कि सब अपने हिसाब से उसे समझ लेते हैं और खुद को उससे जोड़ कर खुश भी हो लेते हैं।
हम भी खुश हुए....!!
और आप बधाई के पात्र इसलिये भी हैं क्योंकि ये कहानी अर्श को समझ में आई है ....! सर्दी ज्यादा पड़ रही है, उसके कान सर्द हो गये हैं और वो ऐसी बाते कर रहा है कि कोई कान उमेठ कर उन्हे गर्म कर दे ...! :) :)
jeevan paryent chalne vaali pyas jisko kabhi koi moukammal kinara nahi milta, avihal nadi sadiyeo se bahti hai.man ko vihal kar dene vali abhivaykti.
आपकी कहानी एक तिक्त एकाकीपन के बंजर और किसी अबुझ प्यास की बेचैनी के दो स्तरों के मध्य चलती है..सिमली अपने निविड़ अकेलेपन मे खुद भले लापता हो मगर उसकी कल्पना की बांहों के बीच इतना स्पेस है कि पूरी पृथ्वी समा सकती है...अनगढ़ इच्छाओं के इस विस्तृत आकाश मे मास्टर चांद की तरह किसी सूर्य का रात भर का स्थानापन्न मात्र है या किसी आभासी साथ की बादलों जैसी मीठी छांव यह शायद सिमली ही बेहतर जानती हो..मगर सिमली के मन का निष्कलुष आकाश जरूर कहानी मे पूरा उभर कर आता है..जहाँ न अतीत का कोई विषाद है, न जमाने के दस्तूरों की ठठरी को बोझ उठाये चलने की बाध्यता, ना अपनी अलभ्य इच्छाओं की अपूर्णता का पछतावा है और न ही अभीप्स को पा लेने की बालातुर व्यग्रता..कथा के बाहर भ सिमली उतनी ही वास्तविक और प्राकृतिक है जितना कि आपकी कुशल कलम के साये तले..
सिमली ,नैना या फिर अंजलि हो सभी किरदार आपकी कलम की ओट पाकर राहत की साँस लेते लगते है मन के भीतर यूँ उतर जाते है जहां अपना एकांत और ख़ामोशी भले बाँट नहीं सकते पर महसूस करा सकते है.ज़िन्दगी के तमाम बिखरे-बिखरे अहसास कहानी की सूरत ले लेते है..
यूँ अपने अपने मुकाम पर हम सब अकेले ही तो है..
कान,मन और मस्तिष्क में एक अजीब सा सन्नाटा गूँज रहा है अभी...इससे उबरने पर ही शायद कुछ शब्द हाथ लगेंगे कहने को....
बहुत सुंदर.
अलग तरह की बहुत सुन्दर कहानी लगी
बधाई
आभार
चाँद डूब गया है और सूरज के आने में देर है फिर ये कैसा उजास उसके भीतर से फूट रहा है. उसने खुद से कहा. हाँ, इस दुनिया में सब अकेले हैं, बिल्कुल अकेले... अशांत, अप्रसन्न और विह्वल. सिमली ने अपनी बाहें वृताकार फैला दी कि पृथ्वी जैसी किसी चीज को बाहों में समेटना चाहती हों
बहुत ही सुंदर.....
...........वह अधलेटी पूछती है "तूने बताया नहीं कि मुझे क्या चाहिए ?"
............उसने खुद से कहा. हाँ, इस दुनिया में सब अकेले हैं, बिल्कुल अकेले... अशांत, अप्रसन्न और विह्वल...
लगा जैसे बड़े सवाल का बड़ा उत्तर दिया हो....
सवाल भी हर एक का...तेरा-मेरा-सब का...
वाह किशोर जी...
भूत नहीं आये मगर इस निर्जन में उसने पाया कि वह नितांत अकेली है. चाँद डूब गया है और सूरज के आने में देर है फिर ये कैसा उजास उसके भीतर से फूट रहा है. उसने खुद से कहा. हाँ, इस दुनिया में सब अकेले हैं, बिल्कुल अकेले... अशांत, अप्रसन्न और विह्वल. सिमली ने अपनी बाहें वृताकार फैला दी कि पृथ्वी जैसी किसी चीज को बाहों में समेटना चाहती हों.
main jab aapki kahani padhti hoon saath hi aapki tippaniyo ko bhi padhti hoon ,kyonki wo bhi utni hi prabhavshaali hoti hai jitni aapki kahani ,main jab yahan aakar aapki kahani padhti hoon tab aesa mahsoos hota hai ki yahan kahne nahi sirf sochne ka kaam rah jata hai .adbhut shaily hai .anokha andaj hai .waah ke siva kuchh aur kahe bhi kya ?apni to akl kaam hi karna band kar deti hai kahani me ghuskar .aap likhte rahe hum padhte rahe .ye silsila yoon hi jaari rahe .
बन्धु,
जनवरी-मार्च तो जान पर आफत-सा गुजरता है, आपकी पिछली कुछ पोस्ट की शक्ल देखकर छोडनी पड़ी ! खेद है ! फुर्सत से पढूंगा, अभी तो बस हाजिरी लगा रहा हूँ !
सप्रीत--आ.
यह दर्द की उलटबांसी भी अजब है।
मोहे सुन सुन आवे हाँसी, जल में मछरी प्यासी (संत कबीर?)
अलग तरह की बहुत सुन्दर कहानी| धन्यवाद|
उसे ज़िन्दगी ने दो गलत चीज़ें बख्शी हैं एक तन्हाई और दूसरा समय
गीले पानी में उसको खुद के शुष्क चेहरे पर स्नेह उमड़ आया
सिमली ने अपनी बाहें वृताकार फैला दी कि पृथ्वी जैसी किसी चीज को बाहों में समेटना चाहती हों
teen panktiyan ne vishesh roop se asar kiya ,ye auraton ke kirdaar ko kiase nikaalte ho apni lekhni se .khud hairaan hain hum .pata karo pichle janam me kahin aurat hi to nahi rahe hoge ................
वाह...
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