Friday, December 3, 2010

रंग उड़े होर्डिंग पर नीलकंठ

बरसों धूप में जलने और जाड़े में ठिठुरने के बाद अनमनी उदास खड़ी रहने वाली सीढियाँ एक दिन हमारे बरामदे से अलग होकर बाहर की ओर निकल पड़ी. इन सीढियों पर जूते पोलिश करने का काला ब्रश रखा रहता और इनके नीचे माँ सब बच्चों के जूते रखती थी. सीढ़ियों पर कई बार उड़ सकने वाली चिड़ियाएँ भी ख़ुशी से फुदकते हुए चढ़ना पसंद करती थी. बातों का असली स्वाद इन्ही सीढ़ियों पर बैठने से ही आता था. सीढ़ियों ने जब दीवार से बाहें छुड़ाई तो माँ रसोई से बाहर निकल आई, ब्रश मिट्टी में गिर गया और जूतों पर धूप आ गई. पिता ने झाग लगे गालों के अधबीच में रोक लिया रेजर, दादा ने खद्दर की मुलायम धोती से अपना चश्मा पौंछा.

रास्तों को इससे गरज नहीं थी कि इन दिनों कैसा स्टफ उनका उपयोग करता है. वे रोज बुहारे जाने से उकता गए थे. कचरे और गंदे पानी की नालियों की गंध उनके लिए रोमन सभ्यताओं के विकास की कहानी से अधिक जिज्ञासा नहीं जगा पाती थी. उन्होंने सीढियों को घर से बाहर आते देखा तो मगरमच्छ सी गुलाची खाई. सारा कूड़ा करकट किनारों पर जाकर सिमट गया. रास्तों और सीढियों में सदियों पुरानी निकट की रिश्तेदारी थी. जहां सीढियाँ ख़त्म होती वहां रास्ते शुरू हुआ करते थे. रास्तों से थके लोग सीढ़ियों पर बैठ जाते थे. सीढियाँ रास्तों की गोदी में सर रख कर सो जाया करती थी.

हर मौसम में सीढ़ियों का अपना एक अलग रंग हुआ करता था. गर्मियों में सीढियाँ किसी पंखे की तरह हवा दिया करती थी. सर्दियों में धूप की बाटियां सेकती. बारिशों में चमकती हुई आँखे मटकाती रहती. रास्ते ने जाती हुई सीढ़ियों के चेहरे पर आज कोई ख़ुशी कोई अफ़सोस नहीं देखा. रास्ता न मुस्कुराया, न रोया. उसकी आँखें भी पनियल नहीं हुई. वह सम्मोहन की मुद्रा में उलटे पड़े घड़ियाल की तरह आसमां को अपना पेट दिखाता रहा.

चौराहा भीड़ से ऊबा हुआ था. चिल्लपों से थक कर उसने अपने कानों में घने बाल उगा लिए थे. वह किसी स्थिर व्हेल मछली की तरह था. सम्भव है कि उसे सब रास्तों का सच मालूम हो गया था और वह सन्यस्थ जीवन जी रहा था. इस सन्यास में देह को कष्ट दिये जाने का भाव नहीं दिखाई पड़ता था. कई बार ऐसा लगता था कि चौराहा वलय में घूर्णन कर रहे मसखरों और कमसिन लड़कियों की कलाबाजियां देखने जैसा जीवन जी रहा था. उसको किसी नवीन और अप्रत्याशित घटना की आशा नहीं थी. सीढ़ियों को अपनी ओर आते देख कर भी कौतुहल नहीं जगा.

चौराहे ने एक लम्बी साँस भरी और खुद का पेट सीने में छुपा लिया. चौराहों और सीढ़ियों का भी सदियों पुराना रिश्ता था. चौराहों के माथे को खुजाने के लिए कनखजूरे इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ कर आया करते थे.
चौराहे ने पीपल की ओर देखा. पीपल ने दलदल के पानी सोखू युक्लीप्टिस पेड़ों की ओर देखा. युक्लीप्टिस ने कौवों के पांखों में खुजली की. कौवों ने देखा कि बिना सीढ़ियों की छतें बहुत सुरक्षित दिखने लगी थी. मुंडेरों तक पहुँचने के लिए अब आदमी को आदमी के ऊपर खड़ा होना होगा.

सीढ़ियों के घर से निकलते ही सही कद के आदमियों कि गिनती होने लगी थी. बांस से छत की ऊँचाई नापी जा रही थी. बूढ़े होते सठियाये हुए नपारों के चेहरों के समर्थन में दादा ने अपना चेहरा कठोर कर लिया था. वे इस बात पर अडिग थे कि घर अपने लिए सीढियाँ बनाता है. सीढियों का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है. सीढ़ियों की उपयोगिता घर के मन पर निर्भर है और मनोरंजन के तरफदार एक दिन तबाह हो जाते हैं.

पिता जी तिरस्कार भरी निगाह से नाप तौल करते लोगों को देख रहे थे. उन्होंने कई सप्ताह पहले ही सबके सामने कह दिया था कि घर और सीढियाँ एक दूसरे की पूरक है. सीढियाँ सिर्फ कब्रों के लिए नहीं होती. वे उस समय जरुर कुछ चिंतित थे मगर उन्होंने दादा की परवाह किये बिना कहा था "सीढ़ियाँ खुद अपनी इच्छा से मुड़ सकती हैं."

घर बहुत खाली हो गया था. पाबंदियां लगी हुई थी लेकिन फिर भी माँ ने सीढ़ियों के नीचे रखे जूते उठा लिए और छोटे चाचा ब्रश पर फूंक मार कर धूल झाड़ रहे थे. ऐसा करना समाज के विरुद्ध जाने जैसा था लेकिन चाचा दूर शहर के एक आदमी का पता जानते थे. उनके पास एक ऐसी तलवार थी जिसमें से आग निकला करती थी.

घर के भीतरी कोने से दादी ने आवाज़ दी "धरती को पलटो, उसे साँस लेने दो... हल चलने में सीना फटता नहीं, कोख फलती है."
ऐसी आवाज़ें सदियों सुनी गई थी और नियम से अनसुनी कर दी गई थी.

चौराहे के पार लोग साँसें रोके खड़े थे. पीपल के पत्ते सिहरने से डर रहे रहे थे. कौवों ने शोक गीत की तैयारियां शुरू कर दी थी.
मौसम, रास्ते, चौराहे, संकरी गलियां और पेड़ चुप थे. इक्कीसवीं सदी के रंग उड़े एक होर्डिंग पर नीलकंठ बैठा था. मौसम चिंतित था कि सीढियाँ क्या करने जा रही है कि औचक सबका ध्यान प्रेम पनवाड़ी की आवाज़ से टूटा " सीढ़ियां और मुहब्बत पददलित होने के सिवा जो दूसरा काम कर सकती है, वह है बावड़ियों में डूब कर आत्महत्या करना... "

क्षणिक आवेश में कही इस बात से गुस्साए हुए पनवाड़ी ने मुंह में तेज चूने वाला पान रख कर अपनी ही जीभ को काट दिया.
कौवों ने युक्लीप्टिस पेड़ों पर बैठ कर अपनी पांखें अकड़ से फैला दी. उन्हें पता था कि कल बिना सीढ़ियों वाले घर से कॉगोळ के लिए बुलावा आएगा.

( कौवे द्वारा भोजन ग्रहण किये जाने से मान लिया जाता है कि मृत आत्मा स्वेच्छा से अपनी मुक्ति चाहती है. राजस्थान में इस परंपरा को कॉगोळ कहते हैं ) 


[ Painting Image Courtesy : Craig Kosak ]

29 comments:

सागर said...

दृश्य जाना सा, देखा सा, सत्य सा
जादुगाई शब्दों की, कला परोसने की, निर्वाह बताने की

नीरज बसलियाल said...

कोई तुम्हारी कहानी अगर सिर्फ एक बार पढ़कर समझ जाता हो तो उसे मेरा प्रणाम|

'एक सीढ़ी की जीवनी'
सही में, मुझे नहीं पता कि तुम्हे सीढ़ियों जैसी छोटी छोटी चीजों से एक पूरी कहानी गढ़ना कैसे आता है, और वो भी इस तरह कि कुछ लोगों को उसके शब्द चमत्कृत कर दें, कुछ को उनका अभिप्राय|

मैं फिर कहता हूँ , कि तुम्हें एक बार पढ़कर कम से कम मैं तो नहीं समझ पाता हूँ|

कुश said...

बहुत गहरे तक उतरी है ये सीढिया.. शब्द जैसे जादू कर रहे है..

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

मानो शब्दों ने चिमटा उठा लिया हो ....... दिल के अंगारों को कुरेदने के लिए....... कि थोड़ी मधम मधम आंच निकलेगी... कालचक्र मानिंद बाजरे की रोटी सेकने के लिए....


नमन

डॉ .अनुराग said...

बहुत दिनों बाद अपनी रौ में लौटे हो.......शायद बेस्ट फॉर्म में ......पूरी पोस्ट एक नज़्म सी है.......किसी एक हिस्से को कोट करूँ तो दूसरा छूटा सा लगेगा ....इस फॉर्म को बनाये रखना .......
i consider it one of your best ....

Manoj K said...

MASTERSTROKE, I WOULD SAY.

AS ALWAYS, WORDS SURRENDER UNDER YOUR PEN TO MAKE THEM FEEL GREAT, YOU HAVE DONE IT AGAIN. A VERY WELL KNITTED WRITE.

REGARDS,
MANOJ K

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी ही सधी शब्द-रचना में प्रस्तुत किया है यह कथानक।

Sonal Rastogi said...

"जहां सीढियाँ ख़त्म होती वहां रास्ते शुरू हुआ करते थे. रास्तों से थके लोग सीढ़ियों पर बैठ जाते थे. सीढियाँ रास्तों की गोदी में सर रख कर सो जाया करती थी"

अभी भी भौचक्की सी सीढियों को निहार रही हूँ ..इन्होने या तो कभी मुझसे कुछ कहा नहीं अगर कहा भी होगा तो शायद मैं सुन नहीं पाई

"चौराहों के माथे को खुजाने के लिए कनखजूरे इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ कर आया करते थे."

आज चौराहे भी जीवंत लगेंगे
"हल चलने में सीना फटता नहीं, कोख फलती है."

मास्टर stroke ... मुग्ध हूँ
@ नीरज जी से सहमत ..एक बार में तो नहीं समझ सकती अभी तो वाक्यविन्यास में उलझी हूँ ....भावार्थ के लिए फिर आउंगी

सागर said...

"हल चलने में सीना फटता नहीं, कोख फलती है."

Is line par to main bhi behosh hoon Kishor da.

varsha said...

अगर ये सीढियां स्त्री या फिर मोहब्बत हैं तो आप इन- इन जगहों पर कमाल हैं
-बरसों धूप में जलने और जाड़े में ठिठुरने के बाद अनमनी उदास खड़ी रहने वाली सीढियाँ एक दिन हमारे बरामदे से अलग होकर बाहर की ओर निकल पड़ी.
-हर मौसम में सीढ़ियों का अपना एक अलग रंग हुआ करता था. गर्मियों में सीढियाँ किसी पंखे की तरह हवा दिया करती थी.
-सीढ़ियों के घर से निकलते ही सही कद के आदमियों कि गिनती होने लगी थी.
-माँ ने सीढ़ियों के नीचे रखे जूते उठा लिए और छोटे चाचा ब्रश पर फूंक मार कर धूल झाड़ रहे थे.
-सीढ़ियां और मुहब्बत पददलित होने के सिवा जो दूसरा काम कर सकती है, वह है बावड़ियों में डूब कर आत्महत्या करना...
-कल बिना सीढ़ियों वाले घर से कॉगोळ के लिए बुलावा आएगा.

पारुल "पुखराज" said...

संन्यास……ज़रा सी पर्दा उठने की कसर भर रहती है :)

जो बंजर ना थी धरती जो बंजर न था सीना तो दर्द फलना ही था

और फिर

बिना सीढ़ियों की छतें सुरक्षित भी दिखती हैं और अकेली भी

shikha varshney said...

रास्तों को इससे गरज नहीं थी कि इन दिनों कैसा स्टफ उनका उपयोग करता है. वे रोज बुहारे जाने से उकता गए थे. कचरे और गंदे पानी की नालियों की गंध उनके लिए रोमन सभ्यताओं के विकास की कहानी से अधिक जिज्ञासा नहीं जगा पाती थी
Intelligent Writing.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

"धरती को पलटो, उसे साँस लेने दो... हल चलने में सीना फटता नहीं, कोख फलती है.
घर और सीढियाँ एक दूसरे की पूरक है.
सीढ़ियाँ खुद अपनी इच्छा से मुड़ सकती हैं."
सीढियों का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है. सीढ़ियों की उपयोगिता घर के मन पर निर्भर है और मनोरंजन के तरफदार एक दिन तबाह हो जाते हैं.
लाजवाब कर देने वाला लिखते हैं आप ....यह पंक्तियाँ बहुत समय तक याद रहने वाली है ..आप कैसे लिख लेते हैं .लिखा हुआ हर शब्द एक चित्र सा बन कर सामने आता जाता है ......
मुझे तो इस पर सही ढंग से टिप्पणी करनी भी नहीं आ रही है ...बहुत कुछ कहना चाहती हूँ ...

आज और कल की बात नहीं है ,सदियों का इतिहास यही है
हर आँगन में ख्वाब है लेकिन ,चंद घरों में ताबीरें हैं ...

monali said...

Main to shayad aapki kisi bhi rachna ko aasani se samajh nahi sakti magar fir bhi har baar inhe padhne ka lobh sanvaran nahi kar paati.. abhipraya samajh na aane k bavajud ye panktiyaan baandhti hain aur meri soch ko vikasit hone ka mauka bhi deti hain shayad... :)

रचना दीक्षित said...

एक बार फिर से शब्दों की जादूगिरी और फिर फंस गए हम उन्हीं सीढियों को चढ़ने उतरने में

रंजना said...

दो बार पढ़ डाला है...पर इसपर कहूँ क्या जो सटीक हो,मतलब की जो महसूस हुआ उसे शब्दों में बाँध कैसे कहूँ...एकदम बुझा नहीं रहा....

neera said...

परिवार की व्यथा जहाँ सीढ़ी और चौराह की आँखों से खून टपकता दिखाई दिया...
चंद शब्दों में मनो भर दर्द कोई जादूगर ही छुपा सकता है...

सारिका सक्सेना said...

पढ़ तो लिया . पर .....कुछ कहने लायक अभी समझ नहीं आया,...फिर आयेंगे .

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

एक बेहतरीन पोस्ट .... कमाल के शब्द चुने हैं प्रस्तुति के लिए......

sanjay vyas said...

बेहतरीन काव्य.शीर्षक भी अपने आप में एक कविता है.अर्थ ढूँढने से अलग ले जाती है ये,महसूसने की ओर.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुन्दर, मार्मिक। उडने वाली चिडियाँ अब रास्तों की गर्द में लोटती हैं, तपते सिर और हाथ गन्धाते रास्तों पर बेपांव चलते हैं। सीढीविहीन बस्ती हो तो नहीं सकती मगर होती रही है।

Puja Upadhyay said...

सीढ़ियों की ये कहानी गोल गोल घूमती सीढ़ियों की तरह मन के चारों ओर घूमने लगी हैं. कहानी में डूबना उतराना अजीब सुकून दे रहा है...इस तरह बरबस भीग कर आखिरी सीढ़ी पर थक पर बैठी हूँ, जब वापस जायेगी सीढियां तो शायद मेरा घर भी आ जाएगा.
आपकी हर कहानी एक नए संसार का सृजन कर लेती है, किसी भी छोटी या बिना सोची हुयी चीज़ से. एक एक पंक्ति कोट करने के लिए...एक एक पंक्ति एक कहानी अपने आप में सम्पूर्ण.
जाने आप ऐसा जादू कैसे रच लेते हैं.

केवल राम said...

कथानक बहुत जबरदस्त है ..बांधे रखता है ...दो बार पढ़ा और यहीं रुक गया मैं ....आपके अनुसरण के लिए ...बन गया १८५ ...अनुसरणकर्ता...शुक्रिया
कभी चलते -चलते पर भी दस्तक दीजिये ...आपका स्वागत है

कंचन सिंह चौहान said...

अद्भुत.....!!!!

अभी इतना ही....!

फिर आ पाई तो आऊँगी....! इस माला के मनकों के बहाने अपने मन का कुछ कहने..!!

फिलहाल अभी कुछ देर इस कंपट को मुँह मे घुले रहने देना चहाती हूँ।

अपूर्व said...

दुनिया के सारे रास्ते भी किसी न किसी सीढ़ी के कदमों तले ही अपना दम तोड़ देते हैं..!
प्रथमदृष्ट्या एक मुखर फ़ेमिनिस्ट सी पोस्ट नजर आयी मुझे..मगर फिर मुझे यह सीढियाँ दो अलग समयों की संधिरेखा पर भी रखी नजर आती हैं..जिनका अपनी जगह से विचलन इतिहास की किन्ही परिभाषाओं को तहस-नहस करने की ताकत रखता है..जो समय को और उसकी स्रष्टि को अपनी धुरी से हटा सकता है..जब तक सीढ़ियां रास्तों का रास्ता नही काटती हैं..जब तक सीढियाँ अपनी जगह हैं..तब तक मौसम हैं..व्यवस्था है..बाते हैं..घर है..धरती है!

..खैर जब बड़े-बड़े लोग यहाँ अपना धनुष रख कर खड़े हैं तो फिर हमारा क्या वजूद..:-)

sheetal said...

bahut accha laga padhkar.mujhe yeh post pasand aayi aur anjali waali post behad pasand aayi thi.uske baad pakki jamanat bhi theek thi.jaise ki kuch log ne tippani di he ki ek baar main aapki kahani ko samajhna aasan nahi hain to wo theek hi kehte hain.
ek baar fir aapki is post ke liye aapko dhnywaad dungi

Avinash Chandra said...

बचा के रखा था इसे, आज या आज जैसे ही किसी दिन पढने को...
आज कुछ नहीं चुनना है, जादूगर हैं आप, जादूगरी को सलाम.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कमाल है!!! अभी तक केवल प्रकृति का ही पढा था, अब सीढियों का मानवीकरण!!! एक दम नया प्रयोग. सुन्दर. बहुत दिनों के बाद आई हूं, क्षमा.

राजेश चड्ढ़ा said...

...बहुत-बहुत अच्छा....कुछ अच्छा पढ़ना हो तो यहां आना ही चाहिए....भाई.....काव्य में कथा का मिश्रण होता है या कथा में काव्य का...तय नहीं कर पा रहा हूं...एक बात और.......कभी-कभी लगता है....लिखते नहीं हो...कहते हो....जो स्वतः होता है.....शुभकामनाएं

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...