जहाँ भी जाता, उसे लगता कि मैं यहाँ पहले भी आया हूँ. वह चंद किताबें पढ़ कर पगला गया था और सारे दोष उनके सर मढ़ कर सो जाना चाहता. किताबों में लिखा था कि पहलू बदल बदल कर सोना, मोर पंखों को चुनते हुए उदास रहना, मुसाफिर खानों में बेवजह बैठना, नए दरख्तों की भीनी छाँव को ओढ़ना, पराई औरतों को एकटुक देखना और ओक से पानी पीते हुए गुलाबी गर्दनों में नीली नसों को चूम लेने की ख्वाहिश रखना अपराध है. तुझे दोज़ख मिलेगा.
अपने अक्स को खो देना ही दोज़ख है. जिस वक्त रास्ता मुड़ जाता है, उसी पल बीते लम्हे का वजूद खोने लगता है. विस्मृत होती गंध हवाओं में बिखर जाती है. स्पर्श के छींटें आहिस्ता से छूटते जाते हैं. सुबह खिली नई कोंपलों को बेसबब देखते हुए किसी को सोचते हैं मगर कोई सूरत ओस के मोतियों से बन कर नहीं खिलती. याद के धुंधले चश्मों पर आलिंगनों की केंचुलियाँ समय की कतरनों को चूमती हुई चमकती रहती है. जाते हुए मौसम जो करवटें छोड़ गए थे, वे सब सूखे हुए लम्हों सी दीवारों से टकराती हुई आँगन को शोर देती फिरती है. लोग कहते थे बड़ी गलती करी, दरवाजे के ठीक सामने दरवाजा बनाया. भाग, घर के पार हो जायेगा. चिड़ियाएँ उडती ही आती और उडती चली जाया करती थी. किसके भाग का चुग्गा होता था और जाने कौन चुगता फिरता था. आशाएं नर्म फरों सी नाजुक और आसमान से अधिक चौड़ी थी कि जिस सुबह घर की नीवं में पहले पत्थर के नीचे दूब रखी थी तब सही सलामत रही थी जनेऊ.
घड़ी की सुइयां घूमती रही और उसकी शक्ल बदलती गई लेकिन स्मृतियों का लोप नहीं हुआ था.
अपने अक्स को खो देना ही दोज़ख है. जिस वक्त रास्ता मुड़ जाता है, उसी पल बीते लम्हे का वजूद खोने लगता है. विस्मृत होती गंध हवाओं में बिखर जाती है. स्पर्श के छींटें आहिस्ता से छूटते जाते हैं. सुबह खिली नई कोंपलों को बेसबब देखते हुए किसी को सोचते हैं मगर कोई सूरत ओस के मोतियों से बन कर नहीं खिलती. याद के धुंधले चश्मों पर आलिंगनों की केंचुलियाँ समय की कतरनों को चूमती हुई चमकती रहती है. जाते हुए मौसम जो करवटें छोड़ गए थे, वे सब सूखे हुए लम्हों सी दीवारों से टकराती हुई आँगन को शोर देती फिरती है. लोग कहते थे बड़ी गलती करी, दरवाजे के ठीक सामने दरवाजा बनाया. भाग, घर के पार हो जायेगा. चिड़ियाएँ उडती ही आती और उडती चली जाया करती थी. किसके भाग का चुग्गा होता था और जाने कौन चुगता फिरता था. आशाएं नर्म फरों सी नाजुक और आसमान से अधिक चौड़ी थी कि जिस सुबह घर की नीवं में पहले पत्थर के नीचे दूब रखी थी तब सही सलामत रही थी जनेऊ.
घड़ी की सुइयां घूमती रही और उसकी शक्ल बदलती गई लेकिन स्मृतियों का लोप नहीं हुआ था. इन स्मृतियों से बाहर आने की छटपटाहट से जो छींटे उछलते उनमे कुछ एक घर, कुछ गलियां और रहस्य भरी उदास शामों की धड़कनें हुआ करती.
उन सालों में खपरैलों के उड़ जाने जितनी आंधियां नहीं आया करती थी.
उन सालों में खपरैलों के उड़ जाने जितनी आंधियां नहीं आया करती थी.
केसरिया झोली वाले फ़कीर एक कटोरी आटे के बदले बसे रहने की दुआ दिया करते थे. कार्तिक मास के एक छोटे से दिन ड्योढ़ी के आगे छीण पत्थरों से बनी हथाई पर बैठे छोटी काठी वाले बाबा ने जरा देर को आँखें बंद की और अपने झोले से गिल्टी का एक कटोरा निकाल कर आगे बढाया. "बेटा पानी..." मंगते आते थे लेकिन कोई इतने अधिकार से नहीं बैठता था. उसके माथे के तेज से सब खींचे चले आये. बाबा है, सच्चा हुआ तो जरूर दुनिया-जहान की बातें पता होगी. सिर के पल्लू को आहिस्ता सरकाते हुए भविष्य के गर्भ में छुपे हुए सुखों की टोह में, वे गोल घेरे में चुप खड़ी हो गई. सलवटों से भरी आँखों से देखते सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा ने कहा. "बेटा, कैसे भी कटो ज़िन्दगी कट ही जाएगी." औरतों ने सुख की सांस ली. अपने हाथों के बीच सर के पल्ले को पकड़ा और उन्हें आपस में जोड़ कर अभिवादन किया.
इस घड़ी झाड़ू बुहारी के साथ सुबह चली गई थी. एक अलसाई हुए दोपहर छपरे के नीचे सो जाने को बाट जोह रही थी. अपने कटोरे में बचे पानी को सर पर बंधी पगड़ी पर डाला और उठते हुए चार घरों से आई पांच औरतों को कहा "मेरे बच्चों जब भी दुःख आये, मन उदास हो और पंछी समय से पहले लौटने लगे तो अपनी रसोई की आग के पास बैठना, उसे तवे से ढकना और गहरे मन से इस आँगन के पंछियों को बुलाना सब सही सलामत लौट आयेंगे. कुदरत कृपा करेगी..." आशीष सुन कर औरतें कर्जदार हो गई थी. वे झुक कर अभिवादन करते हुए कुछ उपकार इसी समय चुका देना चाहती थी.
चाची हाथ पकड़ कर खींच लाई. "इसको कुछ कहो बाबा..."
वो एक दम लड्डू जैसा हाथ था गोल मटोल. बाबा ने सर पर फेरा " एक जगह एक छलकता हुआ कुआ देखा था, बेटी उसमें से पानी आप बाहर को उछलता था... कुदरत... कुदरत "
उसके कदमों की आवाज़ भी नहीं सुनाई दी. समय की एक फांक नियम से कट कर एक तरफ गिर गई.
एक ज़िद में सब छूटता गया
ज़िन्दगी को उसी के सलीके पर छोड़ देने का विचार उसका नहीं था लेकिन हर बार चाहे से कुछ हुआ नहीं. उसने सींची हुई सिसकियों के साथ सब कुछ अपना लिया था. दूर गाते हुए लोग खेती काटते थे. उन बीजों की ढेरियाँ बनती, गाड़ियों में लादे जाते फिर बोलियाँ लगती और वे एक दिन काम आ जाते. उसने खुद को परिवार का बीज माना और मुलाजिम हो गया. चार पैसा लाया तो उसे खर्च करने के लिए भी किसी की जरुरत थी तो वह भी आई. ईमानदारी से घर बनाने में जुट गया. घर के नक़्शे में कुछ एक पुराने घर आकर बैठ जाते.
फिर कई सालों बाद भी घर बनाने की समझ के आड़े पुराने घर आते रहे
ऐसे घर जिनके गुसलखानों के छत नहीं हुआ करती थी. वे उन दिनों बने थे जब बच्चों को घरों और पानी के कुओं में झांकना मना था. पल्लू से हाथ मुंह पौंछ कर माएं उनको बाहर धकेल देती थी इसलिए कई नीम के पेड़ थे. वे हमेशा बुलाते रहते. पेड़ों से थोड़ा आगे सरकारी गोदाम का बाड़ा उदास खड़ा रहता था. वहां रात को भूत बीड़ी पिया करते और सुबह होने से पहले बड़े हाल के अँधेरे कोने में छत पर चमगादड़ बन कर उलटे लटक जाया करते थे. कोलतार के डिब्बों से आने वाली जादुई गंध बच्चो को और अंदर खींचती जाती फिर एकाएक शोर करते हुए बच्चे अपने घरों को भाग जाते. अकेले किसी के लौटने की हिम्मत नहीं होती थी लेकिन मन होता था. मन मुड़-मुड़ कर देखता. उसके सूनेपन को दुआएं देता. बंद मुट्ठी को उल्टा कर के एक फूंक से कोई नाजुक बाल उड़ाते हुए निशब्द अर्जियां आसमान की ओर जाती कि ऐसी सूनी जगहें बची रहें.
घर को कभी गौर से देखा ही नहीं था. घर में रखी हुई चीजें कैसी दिखती है ऐसे उनको पढ़ा नहीं था. एक रोज़ खिड़की से कोई हवा का झोंका गुजरा. बित्ते भर की खिड़की इतनी कि अपना चेहरा बाहर निकल सके. उसी में एक पुरानी कीचट भरी कंघी और मिट्टी के तेल की ढिबरी रखी थी. चीजें उतनी ही पुरानी थी जितनी दूर स्मृतियां दौड़ सकती थी. माँ गारा बनाती और पिताजी उसे सांचे में डाल कर सूखने के लिए छोड़ते जाते. वे ईंटें आहिस्ता आहिस्ता घर में बदल गई. ये खिड़की तब से ही थी लेकिन पहली बार भीतर खुली थी. खिड़की से कोई गुजर गया था.
एकांत में उपजे शब्दों और कोर्स की किताबों में मेल नहीं था. स्कूल और घर के बीच का फासला मिटा नहीं.
इतवार की छुट्टी में घर पर बस्ता खुलता था. इस हफ्तावार पढाई में कई सारे ख़त जमा होते गए मगर उन पर लिखने के लिए कोई पता नहीं था. बस कुछ एक ही मुकम्मल ख़त और दुरस्त पते इस दुनिया में बांटे गए थे. जो छू कर चला जाये, उस झोंके को ख़त लिखने की ख्वाहिश होना लाजमी था. अनाम लिखे गए ख़तों के साथ नाउम्मीदी जुड़ी रहती कि उनके वापस लौटने का कोई पता नहीं होता. एक दिन सबको अपने ख़त कहीं न कहीं पहुँचाने होते हैं आखिर उन्हें छुपाये रखने का सब्र चुक जाया करता है.
ढिबरी के बुझने के बाद रौशनी सिमट कर सो जाती और घास तेल की गंध फेरे लगाती रहती.
सीने में एक दाह को लहकाने वाली ये कैसी किताबें, जो छुपे हुए अहसासों को जगाती रही, प्यास को बढाती रही. ऐसी प्यास जो सब हदों को छू लेने को बेताब हो जाएँ. उस छोर पर पहुँच जाये जहाँ से दोज़ख का रास्ता शुरू होता है, जहाँ एक स्पर्श आदमी को आग के गोले में बदल देता है, जहाँ आदमी रुई का फाहा बन जाया करता है, जहाँ आदमी वस्ल के इंतजार में धूप घड़ी बन जाया करता है, जहाँ सब खुशबुएँ एक होकर नामी इत्रफरोशों को नाकाम कर देती है.
रुपहले पंख उग आये. दोपहर का भेस धर कर एक लड़की उन पंखों को अपनी आँखों में समेटने को आया करती. धूप चिलमिलाती आँखों को औचक छू जाती थी. वह गुनगुनी लड़की ससुराल जैसे किसी देश के बारे में सोचती थी. कब से इस गोदाम में आना शरू किया याद नहीं था. भय के भूत भगाए और खुद को थोड़ा बड़ा किया. बड़े हाल के पीछे भी एक नीम का दरख़्त था. उसके नीचे पत्थर की बेंच लगी थी. किसी रोज उसके पेट में छिपी कस्तूरी ने करवट ली होगी कि खुशबू फूट पड़ी. धूप और पत्तों की बाजीगरी में उसका उसका पेट, नदी में गिरे चमकीले जवाहरातों से भरे चांदी के बक्से सा चमकता था. एक किताब में लिखा था, नसीब और धैर्य का करीब का रिश्ता है. एक लम्बे आलाप सा वांछित धैर्य उसकी मुंदती आँखों में खो गया. सांसों के ज्वार में कस्तूरी गंध हिचकोले खाती खो गई. इस दिशाभ्रम में लहरों पर उछलती किस्मत कभी डूबती कभी तैरती हुई होठों को कम्पास बनाये हुए भटकती रही.
कुंआरे पसीने की गंध और पलकों के पास नम रोयों पर ठहर आई भीनी गंध के सिवा कुछ नहीं था. देह में सैंकड़ों नदियाँ बहते हुए सीने के ठीक पास से फूट पड़ने को दस्तक देने लगी. आदमी होने से पहले एक ज्वालामुखी में बदलने लगा था. एक किताब में ये भी लिखा था कि ये माँ बनने जैसा अनुभव है. अपने भीतर खिलता हुआ सा कुछ आहिस्ता से सरक कर पहलू में आ जाये इससे पहले हज़ार तूफानों में उड़ते हुए नश्तर आते हैं. देह की पहचान ख़त्म होने के कगार पर पहुँचती हुई सब नसों के एक साथ फूट पड़ने जैसा कोहराम मचाती है. कभी समझ नहीं आया कि सिमट रहा था या बिखरने लगा था. स्मृतियां जवाब देने लगी, जो याद आ सका वह नाकाफी था कि उस किताब के पीले पन्नों पर कई गुलाबी फूल थे.
बाँहों से फिसली लड़की उसी दिन सपनों के ससुराल वाले देश की दिशा का अंदाजा करते हुए न लौटने के लिए दूर खो गई.
टूटे ज़र्द पत्ते, हर जगह, हर पल... सांस घुटती हुई
* * *
आज घनी अँधेरी रात है. हाकिमों के हरकारों का कहना है कि सब आदमी बुत की तरह जम जाएंगे. खानाबदोशों को अभी सही जगहों पर इमदाद के लिए पहुँच जाना चाहिए. सब अपनी अपनी आग को चूल्हों में सहेज लें. कल दुनिया बरफ हो जाएगी. बढ़ते आ रहे घने कोहरे में वह सीढियों तक पहुँचने में कामयाब हो जाना चाह रहा था. एक होड़ में दुनिया हांफती हुई भाग रही थी. वह एक अरसे से मुक्त होने के लिए चढ़ता जा रहा था. सीढियों पार वाले इस घर में एक औरत अपने बाजूबंद से आग को बाँध कर रखती है.
अग्नि... अग्नि... रहम करो.
सुखा दो इस छलकते हुए कुंए को सोख लो इस नाभि का अमृत, तोड़ दो ये पानी का आईना कि आईनों से टकरा कर सवाल असंख्य हो जाते हैं. वायु जबकि थाम रखा है तुमने बावजूद इसके एक लम्हें में टूट कर ज़मीन पर गिर जाने को क्यों जी चाहता है. जल उठो अमावस के दीयों, जाने क्यों ये अँधेरा घिरा चला आता है. पर्वतों लुढका दो सब पत्थरों को कि उनके शोर में खो जाये सब आवाजें कि अब भी सवाल सुनाई देते है... उस फूल की उम्र क्या होगी ? वो रास्ता किस देश को जाता था.
इस घड़ी झाड़ू बुहारी के साथ सुबह चली गई थी. एक अलसाई हुए दोपहर छपरे के नीचे सो जाने को बाट जोह रही थी. अपने कटोरे में बचे पानी को सर पर बंधी पगड़ी पर डाला और उठते हुए चार घरों से आई पांच औरतों को कहा "मेरे बच्चों जब भी दुःख आये, मन उदास हो और पंछी समय से पहले लौटने लगे तो अपनी रसोई की आग के पास बैठना, उसे तवे से ढकना और गहरे मन से इस आँगन के पंछियों को बुलाना सब सही सलामत लौट आयेंगे. कुदरत कृपा करेगी..." आशीष सुन कर औरतें कर्जदार हो गई थी. वे झुक कर अभिवादन करते हुए कुछ उपकार इसी समय चुका देना चाहती थी.
चाची हाथ पकड़ कर खींच लाई. "इसको कुछ कहो बाबा..."
वो एक दम लड्डू जैसा हाथ था गोल मटोल. बाबा ने सर पर फेरा " एक जगह एक छलकता हुआ कुआ देखा था, बेटी उसमें से पानी आप बाहर को उछलता था... कुदरत... कुदरत "
उसके कदमों की आवाज़ भी नहीं सुनाई दी. समय की एक फांक नियम से कट कर एक तरफ गिर गई.
एक ज़िद में सब छूटता गया
ज़िन्दगी को उसी के सलीके पर छोड़ देने का विचार उसका नहीं था लेकिन हर बार चाहे से कुछ हुआ नहीं. उसने सींची हुई सिसकियों के साथ सब कुछ अपना लिया था. दूर गाते हुए लोग खेती काटते थे. उन बीजों की ढेरियाँ बनती, गाड़ियों में लादे जाते फिर बोलियाँ लगती और वे एक दिन काम आ जाते. उसने खुद को परिवार का बीज माना और मुलाजिम हो गया. चार पैसा लाया तो उसे खर्च करने के लिए भी किसी की जरुरत थी तो वह भी आई. ईमानदारी से घर बनाने में जुट गया. घर के नक़्शे में कुछ एक पुराने घर आकर बैठ जाते.
फिर कई सालों बाद भी घर बनाने की समझ के आड़े पुराने घर आते रहे
ऐसे घर जिनके गुसलखानों के छत नहीं हुआ करती थी. वे उन दिनों बने थे जब बच्चों को घरों और पानी के कुओं में झांकना मना था. पल्लू से हाथ मुंह पौंछ कर माएं उनको बाहर धकेल देती थी इसलिए कई नीम के पेड़ थे. वे हमेशा बुलाते रहते. पेड़ों से थोड़ा आगे सरकारी गोदाम का बाड़ा उदास खड़ा रहता था. वहां रात को भूत बीड़ी पिया करते और सुबह होने से पहले बड़े हाल के अँधेरे कोने में छत पर चमगादड़ बन कर उलटे लटक जाया करते थे. कोलतार के डिब्बों से आने वाली जादुई गंध बच्चो को और अंदर खींचती जाती फिर एकाएक शोर करते हुए बच्चे अपने घरों को भाग जाते. अकेले किसी के लौटने की हिम्मत नहीं होती थी लेकिन मन होता था. मन मुड़-मुड़ कर देखता. उसके सूनेपन को दुआएं देता. बंद मुट्ठी को उल्टा कर के एक फूंक से कोई नाजुक बाल उड़ाते हुए निशब्द अर्जियां आसमान की ओर जाती कि ऐसी सूनी जगहें बची रहें.
घर को कभी गौर से देखा ही नहीं था. घर में रखी हुई चीजें कैसी दिखती है ऐसे उनको पढ़ा नहीं था. एक रोज़ खिड़की से कोई हवा का झोंका गुजरा. बित्ते भर की खिड़की इतनी कि अपना चेहरा बाहर निकल सके. उसी में एक पुरानी कीचट भरी कंघी और मिट्टी के तेल की ढिबरी रखी थी. चीजें उतनी ही पुरानी थी जितनी दूर स्मृतियां दौड़ सकती थी. माँ गारा बनाती और पिताजी उसे सांचे में डाल कर सूखने के लिए छोड़ते जाते. वे ईंटें आहिस्ता आहिस्ता घर में बदल गई. ये खिड़की तब से ही थी लेकिन पहली बार भीतर खुली थी. खिड़की से कोई गुजर गया था.
एकांत में उपजे शब्दों और कोर्स की किताबों में मेल नहीं था. स्कूल और घर के बीच का फासला मिटा नहीं.
इतवार की छुट्टी में घर पर बस्ता खुलता था. इस हफ्तावार पढाई में कई सारे ख़त जमा होते गए मगर उन पर लिखने के लिए कोई पता नहीं था. बस कुछ एक ही मुकम्मल ख़त और दुरस्त पते इस दुनिया में बांटे गए थे. जो छू कर चला जाये, उस झोंके को ख़त लिखने की ख्वाहिश होना लाजमी था. अनाम लिखे गए ख़तों के साथ नाउम्मीदी जुड़ी रहती कि उनके वापस लौटने का कोई पता नहीं होता. एक दिन सबको अपने ख़त कहीं न कहीं पहुँचाने होते हैं आखिर उन्हें छुपाये रखने का सब्र चुक जाया करता है.
ढिबरी के बुझने के बाद रौशनी सिमट कर सो जाती और घास तेल की गंध फेरे लगाती रहती.
सीने में एक दाह को लहकाने वाली ये कैसी किताबें, जो छुपे हुए अहसासों को जगाती रही, प्यास को बढाती रही. ऐसी प्यास जो सब हदों को छू लेने को बेताब हो जाएँ. उस छोर पर पहुँच जाये जहाँ से दोज़ख का रास्ता शुरू होता है, जहाँ एक स्पर्श आदमी को आग के गोले में बदल देता है, जहाँ आदमी रुई का फाहा बन जाया करता है, जहाँ आदमी वस्ल के इंतजार में धूप घड़ी बन जाया करता है, जहाँ सब खुशबुएँ एक होकर नामी इत्रफरोशों को नाकाम कर देती है.
रुपहले पंख उग आये. दोपहर का भेस धर कर एक लड़की उन पंखों को अपनी आँखों में समेटने को आया करती. धूप चिलमिलाती आँखों को औचक छू जाती थी. वह गुनगुनी लड़की ससुराल जैसे किसी देश के बारे में सोचती थी. कब से इस गोदाम में आना शरू किया याद नहीं था. भय के भूत भगाए और खुद को थोड़ा बड़ा किया. बड़े हाल के पीछे भी एक नीम का दरख़्त था. उसके नीचे पत्थर की बेंच लगी थी. किसी रोज उसके पेट में छिपी कस्तूरी ने करवट ली होगी कि खुशबू फूट पड़ी. धूप और पत्तों की बाजीगरी में उसका उसका पेट, नदी में गिरे चमकीले जवाहरातों से भरे चांदी के बक्से सा चमकता था. एक किताब में लिखा था, नसीब और धैर्य का करीब का रिश्ता है. एक लम्बे आलाप सा वांछित धैर्य उसकी मुंदती आँखों में खो गया. सांसों के ज्वार में कस्तूरी गंध हिचकोले खाती खो गई. इस दिशाभ्रम में लहरों पर उछलती किस्मत कभी डूबती कभी तैरती हुई होठों को कम्पास बनाये हुए भटकती रही.
कुंआरे पसीने की गंध और पलकों के पास नम रोयों पर ठहर आई भीनी गंध के सिवा कुछ नहीं था. देह में सैंकड़ों नदियाँ बहते हुए सीने के ठीक पास से फूट पड़ने को दस्तक देने लगी. आदमी होने से पहले एक ज्वालामुखी में बदलने लगा था. एक किताब में ये भी लिखा था कि ये माँ बनने जैसा अनुभव है. अपने भीतर खिलता हुआ सा कुछ आहिस्ता से सरक कर पहलू में आ जाये इससे पहले हज़ार तूफानों में उड़ते हुए नश्तर आते हैं. देह की पहचान ख़त्म होने के कगार पर पहुँचती हुई सब नसों के एक साथ फूट पड़ने जैसा कोहराम मचाती है. कभी समझ नहीं आया कि सिमट रहा था या बिखरने लगा था. स्मृतियां जवाब देने लगी, जो याद आ सका वह नाकाफी था कि उस किताब के पीले पन्नों पर कई गुलाबी फूल थे.
बाँहों से फिसली लड़की उसी दिन सपनों के ससुराल वाले देश की दिशा का अंदाजा करते हुए न लौटने के लिए दूर खो गई.
टूटे ज़र्द पत्ते, हर जगह, हर पल... सांस घुटती हुई
* * *
आज घनी अँधेरी रात है. हाकिमों के हरकारों का कहना है कि सब आदमी बुत की तरह जम जाएंगे. खानाबदोशों को अभी सही जगहों पर इमदाद के लिए पहुँच जाना चाहिए. सब अपनी अपनी आग को चूल्हों में सहेज लें. कल दुनिया बरफ हो जाएगी. बढ़ते आ रहे घने कोहरे में वह सीढियों तक पहुँचने में कामयाब हो जाना चाह रहा था. एक होड़ में दुनिया हांफती हुई भाग रही थी. वह एक अरसे से मुक्त होने के लिए चढ़ता जा रहा था. सीढियों पार वाले इस घर में एक औरत अपने बाजूबंद से आग को बाँध कर रखती है.
अग्नि... अग्नि... रहम करो.
सुखा दो इस छलकते हुए कुंए को सोख लो इस नाभि का अमृत, तोड़ दो ये पानी का आईना कि आईनों से टकरा कर सवाल असंख्य हो जाते हैं. वायु जबकि थाम रखा है तुमने बावजूद इसके एक लम्हें में टूट कर ज़मीन पर गिर जाने को क्यों जी चाहता है. जल उठो अमावस के दीयों, जाने क्यों ये अँधेरा घिरा चला आता है. पर्वतों लुढका दो सब पत्थरों को कि उनके शोर में खो जाये सब आवाजें कि अब भी सवाल सुनाई देते है... उस फूल की उम्र क्या होगी ? वो रास्ता किस देश को जाता था.
32 comments:
नसीब और धैर्य का करीब का रिश्ता है. एक लम्बे आलाप सा वांछित धैर्य उसकी मुंदती आँखों में खो गया. सांसों के ज्वार में कस्तूरी गंध हिचकोले खाती खो गई. इस दिशाभ्रम में लहरों पर उछलती किस्मत कभी डूबती कभी तैरती हुई होठों को कम्पास बनाये हुए भटकती रही.oof kya likhte hai aap!!
lajawab.......
ओह आज की एक बढ़िया खुराक मिल गयी......शुक्रिया किशोर के तुम जैसे लोग आलस छोड़कर कंप्यूटर में कुछ बाँट देते है......सो इस नेटी- दुनिया में बने रहने की ख्वाहिश बनी रहती है ......संजय तो लगता है दुनिया की मसरूफियत में ....कही अलहदा गुम है .....लम्बा लिखने वाले जिन लोगो को मै तल्लीनता से ...ओर उम्मीद से पढता हूँ ....उनमे आप है जहाँ कभी नाउम्मीदी नहीं होती .....
लिखते रहो....यूँ ही .....like this....
ढिबरी के बुझने के बाद रौशनी सिमट कर सो जाती और घास तेल की गंध फेरे लगाती रहती.
वाह!!!!!क्या कमाल करते हैं आप. कुछ तो हमारे लिखने के लिए भी छोड़ा करो. एक भी शब्द नहीं बचा मेरे पास तारीफ में कहने के लिए. बस अद्भुत ही कहूँगी. मैं तो कस्तूरी की गंध में खो सी गयी हूँ.
बहुत इंतज़ार के बाद आपकी पोस्ट आई. उम्मीद से ज़्यादा दे गयी. बहुत कुछ समेटकर रख दिया आपने इसमें...
फूल की उम्र तो वैसे भी कम होती है, रास्ते कहाँ जाते हैं दूर आपस में मिलकर गम हो जाते हैं .
मनोज खत्री
गढ़ने में धैर्य और पढ़ने में प्रवाह।
रुक रुक कर पढ़ा और फिर उसी मौहोल में रम गई ..बहुत खूब ,इंतज़ार बहुत करवाते है आप
kisi tilism k jaisa tha jisme khote chale gye .....aur saans b shayd padhne k bad hi li
u r blessed wd good writing
भागते दरिया को कहा, पल भर ठहरो, जिन्दगी का अक्स देखना है. दरिया इधर आपकी पोस्ट में बस गया.
मैंने छु कर देखा, अपनी जिंदगी की परछाई को, हाथ में बस खिलखिलाता पानी ही आया पर जिंदगी उस चुल्लू में भी मुस्कुराती दिखी.
आपके लिखे की तारीफ़ शब्दों में समेटना नामुमकिन है
किशोर जी,
गनीमत है कि आप जल्दी जल्दी नहीं लिखते। ऐसी एक पोस्ट पढ़ने के बाद अपन तो कई दिन के लिये गुम हो जाते हैं, सारी दुनिया नीम अंधेरे में डूबी दिखती है।
गज़ब अंदाज है आपका।
कमाल का शाब्दिक चयन और प्रवाह.... और बात हो किस्मत
और धैर्य की तो को बस नज़रें टिकी रहती हैं हर आगे आने वाली पंक्ति पर..... अच्छा लगा कहना तो कम ही होगा.... :)
office ke mahaul me taartamya tut jaata hai baar baar...raat ki shanti me fir padhungi...
ढिबरी के बुझने के बाद रौशनी सिमट कर सो जाती
Accha Laga
पहले सोचा ,डांट लगाऊं इतने दिन गायब रहने के लिए .........
लेकिन पढ़ कर लग रहा है,ऐसा लिखने के लिए कितना पकाना पड़ता है शब्दों और भावों को मन मस्तिष्क की आंच पर...तब ही न ऐसी कृतियाँ बन पाती हैं...
जियो !!!!
एक ही शब्द में लाजवाब ...वाकई आपका लिखा बहुत दिनों तक खुद के एहसास में डुबोये रखता है . तब कुछ हद तक इन्तजार शिकायत को खत्म कर देता है ....
भई किशोर जी, आज ही आपके ब्लॉग पर आना हुवा....... सरसरी तौर पर हर पोस्ट चेक की है और इतवार को ही पढ़ पाऊंगा और फिर कह सकते हो इतवार को ही अपने को खोजूंगा.....
पता नहीं यहीं कहीं मेरा भी वजूद दफन है........
सब कुछ ही तो खो गया है..
मरते हुए दिनों में, आपके लिखे को पढ़कर, एक सुकून हासिल होता है....अलबत्ता प्रतीक्षा की घड़ियाँ धाँय-धाँय करती सी, मन के कलेजे पर रेंगती हैं
फिलहाल रंजना जा कहना हमारा भी माना जाये... लेकिन मैं आपको डांट तो नहीं सकता
अपने अक्स को खो देना ही दोज़ख है. जिस वक्त रास्ता मुड़ जाता है, उसी पल बीते लम्हे का वजूद खोने लगता है.
चिड़ियाएँ उडती ही आती और उडती चली जाया करती थी. किसके भाग का चुग्गा होता था और जाने कौन चुगता फिरता था.
आशाएं नर्म फरों सी नाजुक और आसमान से अधिक चौड़ी थी
" एक जगह एक छलकता हुआ कुआ देखा था, बेटी उसमें से पानी आप बाहर को उछलता था... कुदरत... कुदरत "उसके कदमों की आवाज़ भी नहीं सुनाई दी. समय की एक फांक नियम से कट कर एक तरफ गिर गई.
बंद मुट्ठी को उल्टा कर के एक फूंक से कोई नाजुक बाल उड़ाते हुए निशब्द अर्जियां आसमान की ओर जाती कि ऐसी सूनी जगहें बची रहें.
एक किताब में लिखा था, नसीब और धैर्य का करीब का रिश्ता है. एक लम्बे आलाप सा वांछित धैर्य उसकी मुंदती आँखों में खो गया. सांसों के ज्वार में कस्तूरी गंध हिचकोले खाती खो गई. इस दिशाभ्रम में लहरों पर उछलती किस्मत कभी डूबती कभी तैरती हुई होठों को कम्पास बनाये हुए भटकती रही.
कभी समझ नहीं आया कि सिमट रहा था या बिखरने लगा था.
तोड़ दो ये पानी का आईना कि आईनों से टकरा कर सवाल असंख्य हो जाते हैं.
इन जगहों पर ठिठकने के अलावा और कहा भी क्या जा सकता है आपकी पोस्ट को पपढ़ कर ......
चुन-चुनकर ऐसे शब्द, ऐसे भाव कहां से लाते हैं आप? मुझे होमपेज पर एक लंबा-सा बहता-गिरता हुआ लिखा हुआ-सा देखकर बड़ी उलझन होती थी। सोचती थी, इतना कैसे पढ़ सकूंगी कंप्यूटर में आंखें गड़ाए हुए। इसके लिए तो शब्दों को हाथों में थामना होता है, किताब के मानिंद। लेकिन आपने मेरी धारणा बदल दी। अब मैं कंप्यूटर पर भी रुक-रुककर पढ़ती हूं, पन्ने ऊपर नीचे करती हूं। जल्दी ही अपनी पसंद की लाइनों को अंडरलाइन करने का भी जुगाड़ लगा लूंगी शायद। :)
समय और स्म्रति की तहों से गुजरते हुए एक चलचित्र की तरह आँखों से गुजरता है वह सब कुछः जो सदियों पहले कभी पास से होकर गुजरा था... आत्मा के तहखानों में उस पर से धूल हटा दी इस पोस्ट ने...
"याद के धुंधले चश्मों पर आलिंगनों की केंचुलियाँ समय की कतरनों को चूमती हुई चमकती रहती है."
किशोर जी, कहाँ से उतार लाये ये बिम्ब?
वैसे नहीं बताएँगे तो भी चलेगा, ये शब्द आपके हाथों में जा कर ही जादू पाते हैं...
"उन सालों में खपरैलों के उड़ जाने जितनी आंधियां नहीं आया करती थी."........जादू!!!!
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सोच रहा था आगे भी जोड़ता जाऊँगा पसंद की पंक्तियाँ......लेकिन संभव न हुआ, स्तब्धता नहीं टूटी, रोम सिहरता रहा, सोचता रहा...
शिकायत करनी थी...पर अब बदल रहा हूँ शब्द........ऐसे शब्द ले कर इतनी जल्दी कैसे आए आप?
आपको पढना, खासकर इस रूप में, दुआ मांगना है, दिन के ठीक उस पल जब हर दुआ क़ुबूल होती है.
"बंद मुट्ठी को उल्टा कर के एक फूंक से कोई नाजुक बाल उड़ाते हुए निशब्द अर्जियां आसमान की ओर जाती कि ऐसी सूनी जगहें बची रहें."....इसकी तासीर लिए जा रहा हूँ....
kishore ji..imaandari se kehoon to aap..anuraag ji..jis tarah se likhte hai..usko samjhne ke liye kabhi kabhi kain baar padhti hoon..abhi itni pakki nahi hoon..albatta ..log aap logo ko kayal yun hi nahi hai :)
उस फूल की उम्र क्या होगी ? वो रास्ता किस देश को जाता था??????????????????????isko kai baar padha aur mahsoos kiya aapke is dard ko bhi टूटे ज़र्द पत्ते, हर जगह, हर पल... सांस घुटती हुई............thoda klisht hai ,par kamaal ka hai (bhoot ki baaton me hum to vishwaas karte nahi)apni aap jaane.
dimaag ko poora hila dete ho ............badhiya dard -e -jubaani hai .
कई सारे चटख रंगों वाले बिम्बों के कोलाज में कहानी महल्ले की किसी लड़की की तरह आइ स्पाई का खेल खेलती अपने को कहती है.सही लगा मुझे भी कि रचना एक माहौल रचती है जिसका असर अवचेतन में देर तक रहता है.
deewali ke avasar par itna sundar tohfa ,bahut hi badhiya likha hai ,aapko is pavan parv par bahut saari badhaiyaan .
एक एक शब्द की आत्मा को महसूस करने के लिए मेहनत तो लगी लेकिन बेकार नहीं गई, बधाई !
der se aane ko mafi chahti hu
itna achha hai ki kahne ko koi sabd hi nhi hai
mai mon prasansa hi karna chahugi
kabhi yaha bhi aaiye
www.deepti09sharma.blogspot.com
गाढा नास्टाल्जिया..जैसे ढेर सारे गुलाब अपनी कातिल सुर्खी और मदहोश खुशबू की मिलीजुली साजिश से अपने बदन के काँटों की चुभन छिपाने मे कामयाब हो जायें..आपकी कलम का जादू आश्विन माह की चाँदनी भरी रातों की ओस सा होता है..जो देखती नही मगर कुछ देर मे ही हमारे जेहन तक को ठंडी नमी से सराबोर कर देती है..या किसी सरकश दरिया के तेज बहाव की तरह..कि खुद को जिसके हवाले कर देने के बाद पता नही चलता कि कहाँ जा के किस किनारे पटकेगा..और किस हाल मे..
यहाँ उदासी आलसी अजगर की तरह जकड़े रहती है ताउम्र..कोई मासूम सी मगर उत्कट प्यास उस गुनगुनी लड़की के खयालों के रुपहले पंख लगा कर उडना चाहती है..मगर उस बैरंग उड़ान की पेशानी पर कोई पता नही लिखा है..किसी पंखकटी चिड़िया की तरह यह उड़ान घर के सूनेपन के दायरों मे कैद रहने को अभिशप्त है..जैसे कि रात भर कितनी भी बीड़ी न पिये..मगर सुबह होते ही स्मृतियों के भूत चमगादड़ो की तरह गोदाम मे उलटा लटकने को ही अभिशप्त हैं..यहाँ सारी मधुर स्मृतियों के फूल अपनी क्षणिक खुशबू और ढेर सारे अधूरेपन के साथ जिंदगी की दुखभरी किताब के बीच सूख कर पीले पड़ने को अभिशप्त हैं..जहाँ आपकी तमाम चाहतें किसी पल मे आपका हाथ छुड़ा के किसी सपनों सी ससुराल वाले देश की दिशा मे हमेशा के लिये चले जाने को अभिशप्त हैं..और जहाँ आस की धूप शाम को जाते वक्त आइने से आपका अक्स भी चुरा कर चली जाय..बिना जाने कि अभी भी कोई रसोई की आग को तवे से ढ़क के पास बैठ कर आँगन के पक्षियों के वापस लौट आने की बाट जोह रहा है..मगर उन पक्षियों के परों पर वापसी का पता लिखा है क्या? बस जिंदगी एक पागलपन है..और उन ठहरी हुए स्मृतियों मे खुद को देखना किसी चिड़िया के मरते हुए नवजात बच्चे की कातर आँखों मे खुद को देखते रहने जैसा मारक है..शायद यही वह दोजख है!! मगर फिर आपकी कहानी का फकीर ही दुआ देता है ना .."कैसे भी कटे ज़िन्दगी कट ही जाएगी"..
वैसे कोलतार की गंध कही जोड़ती है आपको कुछ से..ऐसा लगता है..!
और यह पंक्ति आप भी नही जानते होंगे कि कैसे लिख गये होंगे- ’सीढियों पार वाले इस घर में एक औरत अपने बाजूबंद से आग को बाँध कर रखती है’..
..और क्या कहूँ..
sach kahu, mei aapki post poori kabhi nhi pad pata..........ajib se avsaad me ghr jata hoo.
Aatm-anubhoot ko aise likhna ki aatm-ghatit lage. Internet ke madhyam se aap tak pahuncha aur bahut optimism se bhar gaya hoon Hindi sahitya ke bhavishya ke liye.
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