Tuesday, August 10, 2010

दश्त की वीरानियों में - अंतिम भाग

आप सब के स्नेह और आशीर्वाद का नाजायज फायदा उठाते हुए मैंने इस कहानी को किसी बिगड़ैल बच्चे के होमवर्क की तरह पूरा किया है. इस दौरान मुझे ज़िन्दगी के कुछ खास अनुभव भी हुए हैं, जिन्होंने इस कहानी को लिखने में लगने वाले समय को बढ़ाया है. आज ये सातवीं और समापन कड़ी प्रस्तुत है. मैं कहानी पर मिलने वाली प्रतिक्रियाओं पर अपना मत रखने का और आपका आभार व्यक्त करने का हर संभव प्रयास करूँगा. आईये पढ़ें कहानी का अंतिम भाग.

खिड़की से बाहर एक नीम के घने पेड़ की छाँव दिखती थी. उसी छाँव से भीग कर कोई झोंका आता. वह अपने कालर को थोड़ी देर तक उड़ता हुआ महसूस करती फिर कालर कंधे पर थपकी सी देता हुआ शांत हो जाता. उसे एक चारपाई पर बिठाया गया था. जिस पर बिछी दरी के ठीक बीच में पुलिस महकमे का निशान बना हुआ था. रौशनी के लिए लगी हुई एक ट्यूब लाईट आँख मिचौली के बाद भी किसी तरह का उजास न कर पाने के अवसाद में शांत हो गई थी. मकड़ियों के जाले, पानी की मटकी, कोने में कील पर टंगी हुई एक बदरंग टोपी, उस कमरे में बस इतनी ही प्रोपर्टी थी. सफ़र के बीच के तीन दिनों में मंगल पुलिस वालों से घुल मिल गया था और उसने खासी छूट पा ली थी. राह में बता दिया था कि अब उनको क्या करना है. आज सुबह जब वे यहाँ कोतवाली पहुंचे तभी से उसे अलग कमरे में रखा गया. सफ़र के दौरान हिना ने उससे सिर्फ परिवार के बारे में बातें की थी. उन बातों का उत्तर देते हुए वह पाती की टूटन जैसा कुछ उसके भीतर बज रहा है. अब वह सुबह से इस कमरे में अकेली थी और तय था कि शाम चार बजे उसे कोर्ट में पेश किया जायेगा.

कोतवाली में अजब कानाफूसियों का मजमा लगा हुआ था. उसके परिजनों की भीड़ थी. मंगल के दोस्त और चाचा थे और उनमे एक और आदमी भी था. वह सुबह से सबसे अलग अकेला खड़ा था. उसके साथ कोई नहीं आया था. अपने कंधे पर सूती कपड़ा रखे हुए था, ऐसा कपड़ा अक्सर गरीब दिहाड़ी मजदूर रखा करते हैं. भूरे रंग की पेंट और धुंधले सफ़ेद रंग की कमीज वाला वह आदमी मंगल का ससुर था. इन सब लोगों को पुलिस वालों ने ही बुलाया था ताकि लड़के लड़की को समझाया जा सके और वे कोर्ट में सही बयान दे सकें जो समाज और परिवार के हित में हों.

सबसे पहले उसकी माँ और एक नजदीक के रिश्ते की भाभी उस कमरे में दाखिल हुए. वह बैठी रही. उसे समझ ही नहीं आया कि क्या करूं ? उसने देखा कि माँ ने आकर तुरंत उसको अपनी बाँहों में भर लिया. इसकी कोई तैयारी नहीं थी. उसने सोचा ही नहीं था कि माँ इस तरह से बाँहों में भर लेगी. वह बस यही ख़याल कर रही थी कि कमरे में आते ही वह उसी तरह उसे मारेगी, जैसे बचपन में स्कूल न जाने पर पीटते हुए उसे स्कूल छोड़ कर आती थी. वे माँ - बेटी आहिस्ता से अलग हो गए. भाभी चिपक कर पास बैठ गई. उसका बैठना कुछ ऐसा था जैसे शोक जताने पर कोई थक कर बैठता हो. शब्द नहीं थे मगर बातें तैर रही थी. जैसे देखते हुए माँ कहती ये क्या पागलपन किया ? वह उत्तर देती मेरी सुनता कौन था और आप पिताजी से डरती थी... वह फिर पूछती ये क्या हाल बना रखा है ? वह नज़रें नीचे कर लेती तो दोनों की बातें बंद हो जाती. दो पल बाद भाभी ने बाँह पकड़ी और बोली "घर में किसी को तुमसे कोई शिकायत नहीं है, जगदीश जी को भी मना लिया है... कोई कुछ नहीं कहेगा. जो गलती हुई उसे भूल जाओ और चलो हमारे साथ.." वह उत्तर नहीं देती.
भाभी फिर आश्वस्त करते हुए कहती हैं "वकील से बात हो गई है, वह कहता है बता देंगे मामा के पास गई थी फिर बात नहीं हुई... " थोड़ा हिचकिचाती है. "चलो कुछ भी कहना मगर बताना कि मुझे मेरे घर जाना है, माँ और पिताजी के साथ बाकी जो होगा वह बाद में देखेंगे... "
वह फिर कोई उत्तर नहीं देती. माँ रोने लगती है. हिचकियाँ भरती हुई कहती हैं "आज मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ.. तेरे बाप के लिए घर चली आ... वह रोता नहीं मगर तेरे लिए मरता जा रहा है... " आगे उसने सोचा था कि वह कई सारी सौगंध देगी मगर दे नहीं पाई. चुप होकर मुंह देखती जाती. वह कुछ नहीं बोली. भाभी फिर से पीठ पर हाथ फेरती है. "हमसे ही डर है तो फिर तेरा अपना कौन है ?" वह सर झुका लेती है. भाभी फिर से मुंह को पकड़ कर अपनी ओर करती हुई कहती है. कुछ बोल चाची की तरफ देख. वह नहीं देखती.
आधे घंटे बाद एक कांस्टेबल आती है "माजी बहुत हुआ अब चलो."
वे तीनों चुप. थोड़ी देर बाद भाभी फिर बोलती है. "तुझे क्या चाहिए ? हमें भी बता..." कुछ उत्तर नहीं मिलता.

वे जा चुकी हैं.
मंगल का ससुर दरवाजे के बाहर खड़ा हुआ है. अपनी आँखें पौंछता और हाथों को जोड़े हुए. वह कमरे के अंदर नहीं आता. "तुम भी मेरी बेटी जैसी हो.. उसके भाग अब तुमसे जुड़ गए हैं, पंद्रह दिन से सोयी नहीं है. जब से मालूम हुआ कि मंगल उसे छोड़ गया है. उसके लिए उम्र भर की सजा है... कोई गलती नहीं. दो बच्चे और घर...आगे पूरा जीवन अकेले... तुम जरा सोचना मेरी बेटी के बारे में जो पिछले छः साल से जिसे घर मान रही है, वह पराया न हो जाये." इतना कहते हुए बिना किसी जवाब की प्रतीक्षा किये वह बुजुर्ग जो कहीं से उसे अपने पिता सरीखा दिखा, चल देता है.

आहटें हैं, कदमों की, बातों की और गाड़ियों की. कमरे में हिना आती है. "तूने कुछ खाया ?" वह ना में सर हिलाती है." किसी ने पूछा नहीं..?" वह चुप रहती है. "तूं खाएगी कुछ..?" वह नहीं बोलती. हिना का मन कहता है, वह आज कुछ नहीं खाएगी. इसलिए बाहर चली जाती है. कुछ ही देर में एक अधेड़ उम्र की महिला पुलिसवाली अंदर दाखिल होती है. उसके व्यवहार से लगता है कि ये उसका ही कमरा है. आते ही हाथ पकड़ कर खींचती है और उसे खड़ा कर देती है. अपने सामने चारपाई पर बिठाते हुए टिफिन खोलती है. एक रोटी से सब्जी लगा कर जबरन मुंह में ठूंस देती है. खुद से बातें करती है. साथ सोएगी, बच्चे पैदा करेगी, खाना बनाएगी, झाड़ू लगाएगी, नौकरी करेगी, घर चलाएगी और एक मुसाफिर आएगा रात बिता कर चला जायेगा.. साली हम ये सब सह लेंगी पर खाना नहीं मांगेंगी और एक बार फिर से मुंह में रोटी ठूंस देती है. वह मुंह पर हाथ रखे अचरज से उसे देखती है.
"तो क्या सोचा तूने...? इसी भड़वे के साथ रहेगी जो तेरे लिए अपनी बीवी को छोड़ आया... या फिर इसके साथ रह कर धंधा करेगी ?" उसके मुंह से रोटी का पिसा हुआ टुकड़ा बाहर आने को ही था. "इसका ससुरा बेचारा रोता था सुबह कि जंवाई धमकाता है. पांच लाख रुपये दो नहीं तो लड़कियां बहुत है मेरे पास...एक बाबू बिचारा क्या करेगा कहाँ से लायेगा... मगर तूं मिली ना उसे.." ये कह कर उसने अपने हाथ की रोटी का टुकड़ा खुद के मुंह में रख लिया.
रुक कर पूछा "और खाना है ? " वह बोली नहीं. उसने टिफिन बंद किया. " मेरी बात सुन... तूं ज्यादा से ज्यादा दो साल सहन करेगी उसको... फिर उसको लात लगाएगी... दो बच्चे पैदा करेंगे फिर कहेंगे कि चल अपना काम कर... " वह टिफिन लेकर चली गई. उसने खाना नहीं खिलाया.

दिन के तीन बज गए.
सिपाही मंगल को लेकर आये. उसने अंदर आते ही अधिकारपूर्वक उसे अपनी बाँहों में लिया और कहने लगा " घबरा मत.. मैं सब सही कर दूंगा. तेरे रहने को घर हो गया है. तलाक मिलते ही तेरे साथ रहूँगा, तब तक कोई कमी नहीं रहेगी." वह उसे चूमता है सिपाही मुंह फेरे खड़े रहते हैं. वह कुछ नहीं बोलती. मंगल चलते हुए उसकी ओर आशंकित निगाहों से देखता है. वह चुप खड़ी रहती है.

सरकरी जीप में लड़की को माननीय न्यायाधिकारी के सामने पेश करने को लाये जाते समय कचहरी में पढ़े लिखे लोग भी बच्चों के उस समूह में बदल गए जो बन्दर को देख कर उसके पीछे भागता रहता है. सबके चेहरे पर गजब की उत्सुकता, गजब की राय और मशविरे, गजब के आंकलन कि लड़की भोली है, बेचारी को फांस लिया या कि लड़की के कपड़े देखो... जींस और टी शर्ट, गजब के ठहाके यानि बड़ा ही कौतुहल भरा मंज़र था. एक वकील और उसके साथ पिताजी और भाई तेज कदम आये. वकील ने पुलिस वालों के साथ चलते हुए बताया कि क्या कहना है. पिताजी और रिश्तेदारों ने रोनी सूरत बना कर रखी. मुंशियों ने अपने लाल बस्तों को मजबूती से थाम लिया.
थानेदार ने गुमशुदगी और बरामदगी की रिपोर्ट सहित फ़ाइल पेश की. भरे हुए चेहरे वाली महिला न्यायाधिकारी ने एक आँख उठा कर देखते हुए रीडर को देखा. वह एक बड़ा सा रजिस्टर लिए बैठा था और पेशी तारीखें दर्ज कर रहा था.
पांच मिनट तक सर्च वारंट से लेकर पास के शहर के बस स्टेंड पर घूमते हुए पाए जाने और न्यायालय के समक्ष पेश किये जाने तक का विवरण पढ़ा और पूछा. "क्या नाम है तुम्हारा?"
उसने सर ऊपर किया और कहा "कीर्ति सिंह चौधरी..."
"कहाँ गयी थी घर से..."
वह चुप रहती है और नज़रें भी झुका लेती है. उसकी चुप्पी को देख कर न्यायाधिकारी उठती है. उसे उठता देख कर थानेदार अपनी किस्मत को कोसने लगता है कि इसके ही कोर्ट में आना था. कितनी खब्ती औरत है. न्यायाधिकारी ने अपने आसान के मंच से नीचे हाथ बढाया और कहा कि मेरे पास आओ. वकीलों की पेंटें ढीली होने लगी. वे जानते थे कि ये अजब ही है हर बार नए नमूने पेश करती रहती है. इसने तो न्यायालय की इमेज बिगाड़ रखी है. वह धीरे से हाथ पकडे बिना दो फीट ऊँचे न्यायाधिकारी के आसान तक पहुँच जाती है. एक चपरासी कुर्सी रख देता है.
अपने पास बिठा कर पूछती है. "घबराओ नहीं बताओ क्या हुआ और क्या चाहती हो ?"
वह एक आशु भाषण में भाग ले रही छात्रा की तरह दो मिनट में बिना रुके सारी बातें बता देना चाहती है. वह बोलती जाती, अपने परिवार, रिश्तेदारों, अल्ताफ और अपने भागने के किस्से के बारे में और मंगल के बारे में, वह बोलती है रजनी के बारे में, सबके बारे में मगर हर बात में कहती है, मैंने इस पर भी विश्वास किया था. वह जो कहती है उनका आशय होता है कि मैं एक घोड़ी हूँ जिस पर सब अपनी पसंद की जीन कसना चाहते हैं. मैं एक वस्तु हूँ, जिसका सब मोल करना चाहते हैं. मैं एक सौदा हूँ, जिसे सब पटा लेना चाहते हैं... हांफ कर कहती है बस एक ही चीज समझ नहीं आई... न्यायाधिकारी को देखते हुए अपनी जींस की जेब से एक पन्ना निकालती है और पढ़ने लगती है. पढ़ती नहीं गाती है.

आसमा भूल जायेगा झुकना, तो समझना मैं खो गया हूँ
हवाओं में न घुले हों साज़, तो समझना मैं सो गया हूँ

नदी पार खारे समंदर मिलेंगे
कुछ साए भी सायों के अंदर मिलेंगे 
मिलेगी कोड़ियां बिखरी बिखरी,
काली और भूरी, सफ़ेद और चिकनी,
भरी होगी उनमे बीते दिनों की जवानी
ठीक उनसे आगे
एक दश्त मिलेगा और मिलेगी गहरी वीरानी
तो समझाना कि मैं खो गया हूँ
दश्त की वीरानियों में सो गया हूँ
दश्त की वीरानियों में सो गया हूँ...

हिचकियाँ फूटती गई. सब चुप और खामोश. एक आशंका से पहले की चुप्पी को तोड़ते हुए न्यायाधिकारी ने पूछा "ये किसने लिखा है ?" डूबी हुई आवाज़ आई जिसे शायद कहने वाला ही सुन पाया. "रोहित ने..." फिर एक चिल्लाने की आवाज़ आई मुझे किसी के साथ नहीं जाना...

न्यायालय परिसर में शोर था. कमाल है लड़की तो पागल है ही, ये मजिस्ट्रेट भी... जबरन शादी का दवाब बनाने के लिए माँ - बाप और रिश्तेदारों, लड़की को गुमराह करने के लिए रजनी और मंगल, लड़की के साथ छल पूर्वक शारीरिक संबन्ध बनाने के लिए अल्ताफ खान और लड़की को शादी का प्रलोभन देकर उसका देह शोषण करने के लिए मंगल के खिलाफ मुक़दमा दर्ज कर जांच करने के आदेश दिये हैं. और हद है नारी निकेतन भेजना इन स्थितियों में मानवीय नहीं है कहते हुए, वह उसे अगले सात दिन के लिए अपने घर रखेगी. वकीलों का कहना था कि ये कानून की बात नहीं है.
भीड़ छंटने लगी थी. ऐसे बेहूदा किस्से और ऐसा न्याय उन्होंने ना ही सुना था, नहीं देखा.

42 comments:

neera said...

सधी अँगुलियों से अगला भाग पिछले भाग से रोचकता में बढ़ कर निकला ....और अब उनसे यही कहना है ...
दश्त की वीरानियों के अंत ने...वीरान छोड़ दिया है.... यह सोचने के लिए की सात दिन के बाद क्या होगा?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुन्दर!
कहानी के इस अनूठे अंत ने लाजवाब कर दिया! तारीफ़ के लिए शब्द नहीं हैं. यथार्थ, आशा और सोच के सुलझेपन की ऐसी त्रिवेणी साहित्य में कम ही देखने को मिलती है.

sanjay vyas said...

बेहद सधी हुई कहानी.अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ जाती हुई.

सारिका सक्सेना said...

इतने दिनों से आपके ब्लॉग पर आकर कहानी के पूरा होने का इंतज़ार कर रहे थे, आज इंतज़ार पूरा हुआ और पूरी कहानी एक साथ पढ़ी. अब क्या लिखें? निशब्द हैं, आपकी कलम के जादू में खोये हुए हैं........

कंचन सिंह चौहान said...

कितनी कितनी कितनी सारी लड़कियों की कहानी नही है क्या ये ? अपनी एक सखी घूम रही है ज़ेहन में। कितनी ईमानदार और कितनी पाक़ है वो। हर बार कितने मन से, कितनी एकनिष्ठा से जुड़ती है वो किसी बंदे से... मगर... वो हुज़ूर भी कमीने....!!

जब जुड़ती है तो मुझे सुझाव देती है कि ढूँढ़ लो एक तुम भी, जिंदगी खूबसूरत हो जाती है... और जब टूटती है तो कहती है, तुम ही अच्छी हो...!!

उम्र के पड़ाव कुछ चीजें अपने आप कराते हैं। उनके नियम धरम क्या हैं नही पता...!

चाह रही थी एक लंबी सी टिप्पणी देना....! मगर दे नही पा रही...!!

neelam said...

कहानी पढ़ते पढ़ते ,बहुत कुछ भाव और ज्वार पुरानी आस -पास की बातों के उमड़े ,अपने आप को रोकती रही कि, अब जो कुछ भी लिखा जाएगा ,समापन किस्त में ही लिखा जाएगा पर कुछ यूं वीरानिओं में गुम हुई कहानी कि अब कहने को कुछ भी नहीं .........................
लघु उपन्यास के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं ,यूँ ही लिखते रहिये

रंजना said...

ओह...अंततः समापन....पर ऐसे....उफ़ !!!
अभी तो कहानी ने जकड रखा है दिमाग की सारी नसों को...पकड़ कुछ ढीली हो तो कुछ कहूँ न...

रंजना said...

इस असीम रसानुभूति के लिए कोटिशः आभार...

माता लेखनी पर सदा सहाय रहें और ऐसे ही रचवातीं रहें......

वन्दना said...

बहुत ही सुकून भरा निर्णय रहा न्यायाधिकारी का………………जो अन्दर घुमड रहा था शायद उन्होने ही मह्सूस किया ………………कहानी बेहद रोचक ,प्रवाहमयी और सरस रही हर मोड पर एक उत्कंठा बनी रही और कहानी का अंत भी इसी तरह का होना चाहिये था।

Avinash Chandra said...

११ अगस्त, २०१०,

मैं चौथी मजिल पर दफ्तर में बैठा हूँ...बारिश ज्यादा ही तेज है, या खिड़की का काँच साफ़ नहीं. काम कम हो तो बड़ी अकड़न होती है मुझे...
तीन महीनों से घर नहीं गया, राखी आ रही है, और सुबह ५ बजे "The Japanese Wife" भी देख ली...
आंधी का "इस मोड़ से जाते हैं..." बीस-एक दफ़ा सुन लिया... तलब थी की आज आपने आगे लिखा हो. पर नहीं लिखा...

तीसरे भाग पर घूमता हूँ....

"छुट्टी भी बड़े कमाल की चीज होती है. जिस दिन स्वीकृत होती उन्हें लगने लगता कि वे अपने घर पहुच गए हैं,".... बारिश थम रही है काँच लेकिन और धुन्धलाया है...

"दादी पास होती तो हंसते थे कि मेरी तरह तूने भी टाबरों को अपने खट मिटियों में फंसा रखा है. ये काचरों की तरफ देखते ही नहीं. ".... क्यों नहीं देखते...??? नहीं बताना बताने से ज्यादा वजनदार है.

"हिना मुस्कुराई और ऊपर की बर्थ पर सोने चली गई चार घंटे बाद उसे निगरानी करनी थी. "..... किशोर साहब की ट्रेन जाने कहाँ फंसी है, चाय वगैरह की भी तलब नहीं यहाँ...बारिश रुक जाए, साफ़ करदे कोई खिड़की...कोई अपना काम थमा के घर चला जाए...रिफ्रेश!!!

--------दश्त की वीरानियों में-अंतिम भाग---------

मैंने जो माँगा पिछले ५ मिनट में...कुछ ना हो... कम-स-कम अगले १५ मिनट तो ना ही हो...

"मकड़ियों के जाले, पानी की मटकी, कोने में कील पर टंगी हुई एक बदरंग टोपी, उस कमरे में बस इतनी ही प्रोपर्टी थी."... कीबोर्ड के नीच जले से उग आए हैं.
"हमसे ही डर है तो फिर तेरा अपना कौन है ?" वह सर झुका लेती है........ दुःख हो, शर्म हो, अपराधबोध या रोष की पराकाष्ठा..जताने में बहुत अच्छे तो हम इंसान भी नहीं हो पाए हैं.
"मैंने इस पर भी विश्वास किया था".... ऊपर सर उठाया, आसमान काँप रहा है, सूरज है क्या उसपार?

"भीड़ छंटने लगी थी. ऐसे बेहूदा किस्से और ऐसा न्याय उन्होंने ना ही सुना था, नहीं देखा. "

बादल छंट रहे हैं...सूरज तो नहीं, हाँ उस सा कुछ निकल रहा है..रोशनी बाकी है, उसके किस्से भी... गजलें और कविताएँ स्याह ही हैं, पन्ने सफ़ेद हैं..हो रहे हैं.

दूर कहीं सबीना पार्क में, १ जुलाई, २००६ को द्रविड़ ने ६८ रन बनाये हैं, उनकी कीमत ३५ साल है, जो उस इंसान ने कभी नहीं मांगे...
वैसा ही कुछ सुकून चार साल बाद.. "वकीलों का कहना था कि ये कानून की बात नहीं है."...........


कहानी का बहुत शुक्रिया किशोर जी...समापन बहुत वक़्त तक रहता है जेहन में...इस अंत का और भी शुक्रिया..

बादलों फटते हो तो फट जाओ...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर कहानी उकेरी है।

Manoj K said...

'वह अपने कालर को थोड़ी देर तक उड़ता हुआ महसूस करती फिर कालर कंधे पर थपकी सी देता हुआ शांत हो जाता'

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घटने वाले वाकये को किस खूबसूरती से उभारा है आपने.

'गजब की राय और मशविरे, गजब के आंकलन कि लड़की भोली है, बेचारी को फांस लिया या कि लड़की के कपड़े देखो... जींस और टी शर्ट, गजब के ठहाके'
कितना सच, लोगों को मौका मिलना चाहिए अपना निर्णय सुनाने के लिय, बिना कुछ आगा-पीछा सोचे...

'कहती है बस एक ही चीज समझ नहीं आई... न्यायाधिकारी को देखते हुए अपनी जींस की जेब से एक पन्ना निकालती है और पढ़ने लगती है. पढ़ती नहीं गाती है'

अगर यह खत पहले निकल गया होता किशोरजी तो कहानी कुछ और होती,

न्यायाधिकारी का बर्ताव बिलकुल ठीक था, अगर ऐसे ही कुछ और लोग आ जाएँ सिस्टम में तो सबकी दुकानदारी बंद हो जाए..

लेकिन अभी भी एक बात आ रही है मन में, एक कड़ी में हरका बा थे, उनका सीन में आना होगा ऐसा आपने कहा था, लेकिन फिर भी अंतिम कड़ी मन को झिंझोड रही है, हंगोवर काफी दिन रहने वाला है.

एक और कहानी का प्लाट तैयार है... वोह सात दिन... इन्तेज़ार रहेगा

रेगार्ड्स,
मनोज खत्री

PS : आपने रेगार्ड्स के लिए मना किया था पर आज बहुत मन कर रहा था, सो लिख दिया :)

डॉ .अनुराग said...

आदर्श वादी अंत !!! आप भी बेवफा निकले..इतनी हकीक़तो में भटकते शायद उब गए थे ....जिंदगी की लिफ्ट कम्बखत कई फ्लोर पे बेवजह रूकती ओर खुलती है .....

अपूर्व said...

किशोर जी..यदि क्षमा करें तो कहूँगा कि कहानी के अंत से कुछ निराश हुआ..शायद पिछली कड़ी-दर-कड़ी परवान चढ़ती उम्मीदों का असर रहा हो मुझे कि कथा का यह अंत कुछ जबरन व संक्षिप्तीकृत सा लगा..कई महत्वपूर्ण पात्र विकसित होने के बाद भी असमय मौत के शिकार हुए..और कीर्ति की कहानी यथार्थ के जितनी करीबी रंग ओढ़ कर चल रही थी..अंत मे तर्क की वह ओढ़नी कुछ बेरंग सी लगी....शायद यह मेरे अपने पूर्वाग्रह ही हो..जो कहानी के अंत की जटिलताएं पकड़ न सका..
विस्तृत बात आगे कर सकते हैं..मगर कहूँगा कि इतनी तफ़सील और उससे भी बड़े फलकों वाली कहानी को अंत तक गंभीरता से निभाने के वास्ते आप बहुत बधाई के पात्र हैं..

Kishore Choudhary said...

अपूर्व साहब, कहानी का अंत मुझे निराशाजनक नहीं लगता बल्कि इसके मद्धम प्रवाह में एक सुंदर सा एनिकट बना कर इसे रोक दिया जाना निराशाजनक है. आपकी ये बात "कथा का यह अंत कुछ जबरन व संक्षिप्तीकृत सा लगा.." इसी की ओर इशारा कर रही है और सत्य है. इस तथ्य को मुझे दोनों मित्रों में सातों बार बताया था कि कहानी को लिख लो फिर क्रमशः छाप दो. मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि मैं समय पर लिख लूँगा लेकिन उनके लेखन के तवील अनुभवों से उपजी शंका बहुत सही थी कि मैं लिख नहीं पाया, कहीं उलझा उलझा रहने लगा. मेरे लिए कहानी हेतु की पैड पर अंगुलियाँ चलना असंभ हो गया था. मैं बस दिन भर स्क्रीन के सामने बैठ कर कई दूसरे बहानों से समय व्यतीत करने लगा. इस तरह की बेहद निजी बातों के कारण आप सबको अटकाए रखने का अफ़सोस दिन ब दिन बढ़ता ही गया.

कहानी के लिए मेरी जो समझ थी वह भी इस बार मुझे धोखा दे गई, यहाँ कथा अरेबियन नाईट्स की न समाप्त होने वाली कथा के शिल्प में जा घुसी. इसमें से नए पात्र सिर उठाने लगे और उनके पीछे उनका आसमान भी चला आता मगर मैं उन्हें बाहर धकेलता रहा कि जाओ अभी मैं कहीं और हूँ. वे चले गए हैं सिर्फ इन दिनों के ख़याल से परे लेकिन जिनसे आप प्रेम करते हैं वे कभी आपसे अलग नहीं होते तो शायद जिस दिन मैं इस कहानी को फिर से लिखने बैठूँगा तब वे लौट आयेंगे. आपकी शुभकामनाएं हमेशा मेरे साथ हैं. :)

पारूल said...

"एक दश्त मिलेगा और मिलेगी गहरी वीरानी"

ये लड़की वीरान हो गयी ..सब भोग ,भोग लेने के बाद कहीं कोई सन्नाटा घिरता है उसके अंतस में .. ज़रूरी था ज़रा थमे ,ख़ुद को खंगाले ..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कहानी के साथ-साथ पात्र ही नहीं पाठक भी बहते जा रहे थे। मुझे बीच-बीच में ऐसी आशंका हो रही थी कि इतनी सुन्दर कहानी का भी कहीं वही टिपिकल रौन्दू/यथार्थवादी/दुखांत/दुर्दांत अंत न हो। लेकिन मैं अपनी किसी टिप्पणी से लेखक का मार्ग बदलने (या अफेक्ट) करने से बचना चाहता था - सो कुछ स्पष्ट कहा नहीं। मेरे ख्याल से किशोर ने एक अनूठा अंत देकर सभी पाठकों के कयासों को विश्राम दे दिया है, जोकि एक लेखक के लिये आसान बात नहीं है, विशेषकर जब हर कडी के बाद इतना मुखर सम्वाद जारी रहे। हाँ थोडी जल्दबाज़ी पूरी कहानी में आ गयी है, मगर उसका दवाब डालने के लिये तो हम पाठक ही ज़िम्मेदार हैं। नो डाउट, इस ड्राफ्ट में तराशे जाने की काफी गुंजाइश है, फिर भी व्यक्तिगत रूप से मै इस कहानी से बहुत खुश हूँ। एक अच्छा लेखक न सिर्फ परकाया प्रवेश जानता है वह दृष्टा भी होता है। कई बार उसकी दृष्टि हमसे इतनी भिन्न होती है कि हम अगले कदम का आभास नहीं कर पाते हैं। शायद वैसा ही कुछ इस अंक में हो गया है।

Kishore Choudhary said...

@ पारुल जी, न्यायाधिकारी को अपनी कहानी सुनाने के बाद कीर्ति ने पाया कि वह लाखों दर्शकों के सामने एक विशालकाय मंच पर नृत्य नाटिका प्रस्तुत कर रहे कलाकारों के जा चुकने के बाद अकेली रह गई है. नीली रोशनियाँ उसको घेरती चली जा रही है. मंच के नीचे के खोखले हिस्से से साजिशों की सरगोशियाँ सुनाई पड़ती है. एक लाईट बीम उसके चेहरे को अँधेरे में रोशन कर देने को लगातार उसका पीछा कर रही है. वह इतनी तनहा है कि अपनी स्मृतियों से अमृत सींच लाने तक का साहस जुटा कर इस खालीपन को भर लेना चाहती है. वह सोचती है कि चेहरा अब मंच पर रौशनी की उस बीम की ज़द में आ गया है मगर नीला रंग उसे घेरे रखता है. अपने बाएं हाथ की टेक से वह ज़मीन से कुछ ऊपर की ओर उठते हुए दाहिने पैर को लगभग रगड़ती हुई खड़ी हो जाती है. उसके हाथ में दर्द के रंग का कोई पन्ना है और रौशनी उस पर आ टिकी है. जेब से निकाले उस पन्ने पर लिखे गाने से कई दरवाजे खुलते हैं. वे शब्द चाबियाँ है सात दीवारों के पार झांकने की... मंच के आगे लाखों दर्शकों में रोहित भी कहीं बैठा है. लोक गीतों के हिंदी अनुवाद जैसा संगीत बजता हुआ सा नायिका की ओर बढ़ता है कि वह अचानक गाने लगती है. ये रेत और समंदर के बीच का गीत है, किसी सूने तट का गीत है, ये विरह का गीत है और अकेले आदमी का भी क्योंकि हर कोई अकेला होता है और इसी बात को झुठला देना चाहता है.
पारुल जी, मैंने कुछ और भी लिखा था उपरोक्त उसी का एक अंश है. इसमें आपकी पंक्ति भी जोड़ लूं तो कैसा रहे कि "ये लड़की वीरान हो गयी ..सब भोग ,भोग लेने के बाद कहीं कोई सन्नाटा घिरता है उसके अंतस में .. ज़रूरी था ज़रा थमे ,ख़ुद को खंगाले ..उसने इन्हीं आशा भरी निगाहों से न्यायाधिकारी को देखा हालाँकि वे आँखें बहुत खाली थी."

Kishore Choudhary said...

@ आदरणीय अनुराग जी, आप सही कहते हैं. हाँ, कहानी थोड़ी जल्दबाजी में समापन पर आ गई है. मैं आपकी इन बातों को भी जरूरी मानता हूँ कि कहानी में एक अनजाना सा मोड भी हर पन्ने पर बनता रहना चाहिए कि वह पाठक की कल्पना में बन रहे दृश्यों को तोड़ता हुआ आगे बढे. आपने इस बात को अप्रीसियेट किया था. आपकी मेल का हिस्सा यहाँ लगा रहा हूँ हालाँकि ये आपके और मेरे बीच के एक आत्मीय रिश्ते के तहत लिखा गया था और इसे किसी भी रूप में बांटने को मैं कम पसंद करता हूँ लेकिन उसमे स्टोरी की पहचान भी है सिर्फ इसलिए.
Departure of one Rahul changes so many lives forever. Why can't we save these Rahuls?
The judge, she is so strange and unpredictable, why don't we have more judges like her and more police officers, mothers, humans,... like her.

आपके शब्द बने रहें मेरे साथ, इसी कामना के साथ... आभार !

कंचन सिंह चौहान said...

पता नही मुझे कहानी के तत्वों की समझ है भी या नही। फिर भी कहानी का ये अंत मुझे आशानुकूल तो नही लगा मगर असहज भी नही लगा। वरन् आशातीत अवश्य कह सकते हैं इसे।

किशोरावस्था से सच्चे प्रेम की तलाश करती युवती कहीं तो आ के संभलेगी। इतनी कम उम्र के इतने सारे अनुभव क्या उसे अब भी पक्का नही करेंगे ? अनुभवी नही बनायेंगे। न्यायाधीश अधिकांशतः यह निर्णय नही देंगे, जो इस कहानी में दिया। मगर न्यायाधीश का महिला होना भी एक अलग बिंदु है। इस रोशनी में भी उसके निर्णय पर विचार करना होगा।

जाने क्यों कल से मुझे चित्रा मुद्गल की आँवा की याद आ रही है। जिसकी नायिका कितने उतार चढ़ाव देख कर अंत में सभी प्रेमियों को परे रखते हुए अपने पिता की गुप्त दलित प्रेयसी का परिवार संभालने में खुद को लगा देती है।

मोराल आफ द नॉवेल मै नही भूलती कि दूसरों के बताये अनुभव हमें अनुभवी नही बनाते हम खुद गिर,संभल के सीखते हैं। जिंदगी कुम्हार का आँवा है, जिसमें अपने अनुभवों की आग में ही पक कर निकलना होता है।

एक बात ये कि जिस सखी का ज़िक्र कहानी में किया उस का ज़िक्र मेल में नही था।

दूसरी ये कि पिछली बार लंबी टिप्पणी देना चाहती थी, मगर नही दे पायी और इस बार दूसरी टिप्पणी नही देना चागती थी, मगर देनी पड़ गई....!!

Kishore Choudhary said...

कंचन जी कहानी का अंत आशातीत हो ये उपलब्धि है, आपने पुरुस्कार दे दिया है. न्यायाधीश का महिला होना बहुत मायने रखता है. ये किस तरह से होता है और इसके कितने कारक हैं तय करना जरा मुश्किल है. लेकिन एक हताश और निराश लड़की जो कि अपनी भूलों और अपने शोषण पर किसी से बात करना चाहे तो उसमे सुनने वाले का महिला होना भी एक सकारात्मक कारक होता है. बहुत आभार !

Sonal Rastogi said...

रोज़ ब्लॉग रोल में एक शब्द का इंतज़ार कर रही थी "अंतिम किश्त " उससे पहले पढने की हिम्मत नहीं की ...आपकी कहानी हिस्सों में नहीं पढ़ी जा सकती शायद मैं नहीं पढ़ सकती,सब सजीव होता है जैसा इस कहानी में है ..सन्नाटे से भरा खली घर , बड़ी होती लड़की ,अधूरी खिड़की ..मजबूर माँ ..और बेबस पिता.. रसोई की गर्माहट से जो चेहरों ने आकार लेना शुरू किया तो अपने आस पड़ोस के सारे किरदार आकार कहानी से अपनी जान पहचान बताने लगे ....खिड़की फांदते ,सड़क पर खड़े ..दूकान पर देखते प्रेमी शोहदे सब जीवंत हो उठा ... नायिका कीर्ति तो मानो मेरी एक जानने वाली से जा मिली ..आज लगा उनका नज़रिया शायद कीर्ति जैसा हो ?
कई बार लगा आप नारी मन को इतनी सहजता से गहराई के साथ कैसे चित्रित करते है .... कीर्ति का मन तो बहुत उलझा हुआ है ...उसकी माँ ,हिना ,रजनी ,खाना खिलाने वाली सब ...
सात किश्तों का इंतज़ार सार्थक निकला ...पर मन नहीं भरा ..इसको लघु उपन्यास में बदल दीजिये ...रोहित का चरित्र अधूरा सा लगा....

Kishore Choudhary said...

ये टिप्पणी एक संशोधन के साथ पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ

कल रात तक ये तय था कि कहानी के अंतिम भाग पर सबसे संवाद करूँगा और आभार व्यक्त करूँगा. सुबह उठा तो पाया कि ब्रोडबेंड और मेरा ईवीडीओ दोनों ही नाकाम पड़े हैं. दिन भर अपने मोबाइल पर आते हुए कमेंट्स को देखता रहा. मैंने पॉकेट डाटा सब्सक्राईब नहीं किये हुए हैं इसलिए जी मेल को सेल फोन पर अक्सेस नहीं कर पाता हूँ. किसी को धन्यवाद नहीं दे पाया. अभी रात आठ बजे के आस पास इंटरनेट कि सुविधा आरम्भ हुई तो सबसे पहले एक दोस्त की तकलीफ में उलझ गया, जाने कैसा इंसान हूँ कि तकलीफें देने को ही पैदा हुआ हूँ . खैर, आपके स्नेह भरे शब्दों का धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ.
@ नीरा जी, वीरान छोड़ देने का उलाहना या स्नेह उस समय क्या होता जैसा कि अभी तक के आखिरी कमेन्ट में डॉ अनुराग ने कहा है उसके हिसाब से अंत किया होता तो ?
@ अनुराग शर्मा जी, आपके लिए हमेशा ढेर सारा आदर व्यक्त करना चाहता रहा हूँ. आज भी कि आपने इस कहानी के भागों को पढ़ा ही नहीं वरन कमेंट्स से अलग मेल करके मुझे रास्ता दिखाया.
@ संजय व्यास, कल किसी ने पूछा था कि संजय आपके मित्र हैं ? मैंने कहा नहीं मैं उनकी महबूबा हूँ.
@ सारिका जी, मुझे लगता था कि आप नए घर में सेटल हो गई हैं और मुझे जरूर पढ़ रही हैं. जिनके आने किओ उम्मीद मैं समापन करता था उनमे से आप भी एक हैं. कोई आभार व्यक्त करूं ?
@ कंचन सिंह चौहान जी, मैं भी चाह रहा था कि आप एक लम्बी सी टिप्पणी दें. वैसे आपने कितना कुछ तो बता दिया है पहले से ही कहानी लिखने के दौरान. फिर भी कुछ बने तो लिखना कि मैं इस फर्स्ट ड्राफ्ट को कहानी बनाते समय उसका उपयोग करूँगा.
@ नीलम जी, आपका बहुत आभार !
@ रंजना सिंह जी, सच कहूं तो मुझे आपके आशीर्वचनों का ही इंतजार रहता है. खुश हुआ हूँ.
@ वंदना जी, इस बार के कहानी लेखन में आपने सबसे अधिक हौसला बढाया, मैंने हर बार आपको हाथो हाथ पाया कि आप कह रही हैं अच्छी चल रही कहानी लिखते रहो. आभार !
@ अविनाश बंधू, मेरा मानना था कि कुछ भी अच्छा विचारने से अच्छे दोस्त मिलते हैं. इस कहानी ने मुझे अविनाश दिया है.
@ प्रवीण पांडे, बहुत आभार.
@ मनोज खत्री, कहानी के प्लाट को मैंने दो मित्रों के साथ डिस्कस किया था. उस के बाद जब जब वह लिखा गया. वे दोनों मित्र हैरान थे कि जो सोचते थे, उससे अलग पर अच्छा बना है. ऐसे ही हरखा बा एक पात्र थे किन्तु मेरी अपनी वैयक्तिक फीलिंग्स से उपजे मौसम के कारण उन्हें जी नहीं पाया.
@ डॉ अनुराग, आपने नीरा जी की नीली आँखों वाली कहानी पढ़ी होगी, उसका असर था, जो किसी आशावाद के सिर्फ किताबी होने की समझ के बावजूद नहीं उतरा था, एक मित्र का जन्म दिवस था, और मैं जिसे पसंद करता हूँ उससे मैंने जी भर के बातें कि थी. एक ही दिन में इन तीन चीजों ने मिल कर मुझसे ये अंत लिखवाया है. बस इतना ही कन्फेस करने को है.

Kishore Choudhary said...

सोनल जी, बहुत शुक्रिया. रोहित एक 'समथिंग लोस्ट करेक्टर' था उसकी उपस्थिति के बिना उससे बनी वजहों के साथ जीना ही उसे कहानी में उसे खींच कर लाता है. वैसे रोहित के बाद से शुरू करने का विचार इसलिए भी था कि कहीं ये कहानी कोई डायरी न बन जाये. मेरे मन में उपन्यास जैसा कुछ नहीं था हालाँकि मुझे बहुत से मित्रों ने प्रेरित किया है, आपका भी आभार. मैं जरूर इस काम से बचना ही चाहता हूँ फिलहाल क्योंकि एक एमच्योर राईटर मजे करता है प्रोफेशनल को तपस्या करनी पड़ती है. अभी इसी में आनंद है. पुनः आभार.

Archana said...

जिंदगी भी साली कुत्ते की दुम है. लाख कोशिश कर लो पर टेढ़ी की टेढ़ी.
कीर्ति या फिर कोई ओंर हर किसी का इस्तेमाल करती हुई.
सब से भागो पर इससे भाग कर कंहा जा पाओगे .
अभी तो कुछ ठीक हुआ ...पर सात दिन बाद ?
फिलहाल तो कुछ तलब सी हो रही है....
शायद एक कप चाय की...सर भी भारी हो रहा है. ....
कुछ दिनों तक य़ू ही एक बोझ रहेगा.

dimple said...

लगा था कि आपकी बाकी(ज्यादातर) कहानिओं की तरह इसका अंत दुखद होगा.
कहानी टुकडो में मिलने के कारण हम ऐसे अंदाज लगा लेते है.
इक मुश्त कहानी में हम राय अलग से बनाते है.
हम सब अंत अपने मन का सोचने लगते है.
जितना आपने कहानी ज़ी है उतनी ही पाठको ने भी...
कहानी की सफलता के लिए इतना काफी है शायद ..
नहीं क्या?

sanjay vyas said...

शुक्रिया दादा.
ऐसी कहानियां खूब आयें और ऐसे ही संवाद और सघनतर होते जाए.मतलब समां इस टिप्पणी-मंच जैसा रहे.

Kishore Choudhary said...

@ अर्चना जी, मैं कहानी के कुछ हिस्सों को पढ़ता हूँ तो मुझे भी लगता है कि इससे बाहर आना चाहिए और कॉफ़ी के पीने लायक होने का इंतजार करना चाहिए. शुक्रिया.
@ डिम्पल जी, मेरे लिए तो किसी प्रमाण की भी जरुरत नहीं कि इतने सारे लोग मिल कर कहानी को आगे बढा रहे थे. कहानी की उम्र का पता नहीं मगर इससे कितने लोग जुड़े हैं ये सोच कर प्रसन्न होता हूँ. आभार.
@ संजय जी, इस बार बहुत आनंद आया हालाँकि मैं लगनशील और मंजे हुए कथाकार के रूप में काम नहीं कर पाया. हमने जो तय किया था, उसे नहीं लिख पाया. अगली बार कहानी लम्बी हुई तो लिखने के बाद शेड्यूल करूँगा. मुझे अपने चाहने वालों को इंतजार करवाना रास नहीं आया.

योगेन्द्र मौदगिल said...

main aaj bahut dino ke baad aaya...ab poori pad kar hi kuch likh paunga....filhaal shubhkamnaen....

रचना दीक्षित said...

आप की पोस्ट पढ़ कर तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं रहती हूँ पर एहसास बहुत गहरे हैं. कहानी का अंत सोच से परे

Kishore Choudhary said...

@ मौदगिल जी, बहुत आभार, समय मिल पाए तो पढियेगा और आपके मार्गदर्शन की हमेशा जरुरत रहती है.
@ रचना जी, चलो अच्छा कि कहानी कहीं पहुँचती है. एक अहसास भी संप्रेषित हो तो सफल है. आभार.

ज्योति सिंह said...

मैं एक वस्तु हूँ, जिसका सब मोल करना चाहते हैं. मैं एक सौदा हूँ, जिसे सब पटा लेना चाहते हैं... हांफ कर कहती है बस एक ही चीज समझ नहीं आई... न्यायाधिकारी को देखते हुए अपनी जींस की जेब से एक पन्ना निकालती है और पढ़ने लगती है. पढ़ती नहीं गाती है.

आसमा भूल जायेगा झुकना, तो समझना मैं खो गया हूँ
हवाओं में न घुले हों साज़, तो समझना मैं सो गया हूँ

नदी पार खारे समंदर मिलेंगे
कुछ साए भी सायों के अंदर मिलेंगे
मिलेगी कोड़ियां बिखरी बिखरी,
काली और भूरी, सफ़ेद और चिकनी,
भरी होगी उनमे बीते दिनों की जवानी
ठीक उनसे आगे
एक दश्त मिलेगा और मिलेगी गहरी वीरानी
तो समझाना कि मैं खो गया हूँ
दश्त की वीरानियों में सो गया हूँ
दश्त की वीरानियों में सो गया हूँ...
ये तो सच है कि आपकी कलम मे जादू है ,मै लम्बे सफ़र मे बाहर रही इस कारण पिछ्ले कुछ किश्तो को नही पढ पाई जिसका बेहद अफ़सोस है इस मन मे .

डॉ. मोनिका शर्मा said...

किशोरजी आज आपके ब्लॉग पर पहली बार आयी हूँ.....
कहानी की सारी किश्तें तो नहीं पढ़ पाई पर हाँ आपकी भाषाई
पकड़ से बहुत प्रभावित हूँ....... हर शब्द सधा हुआ है.....
आपके बारे में पढ़ा अच्छा लगा....... बाजरे की रोटी और लहसुन की चटनी मुझे भी बहुत भाती है...............:-}

Kishore Choudhary said...

सभी कहानियां पहले ड्राफ्ट ही हैं और हमेशा ब्लॉग पर बने रहें, ये कोशिश करता रहूँगा इसलिए ज्योति जी कोई अफ़सोस ना रखिये और मोनिका जी बहुत आभार.

राजेश चड्ढ़ा said...

किशोर जी,..सब कड़ियां एक साथ पढ़ीं हैं..ज़िंदग़ी की कहानियों को लेकर हो या..कल्पना-मिश्रित कथानक की बात हो.... खूबसूरत मोड़ देनें की कला तो आपके पास है ही..लेकिन...पात्र को सहेज कर लाना..निभाना.. ...दुश्कर कार्य है...आपनें ...निभाया....अध्भुत...शुभकामनाएं.

आनन्द वर्धन ओझा said...

भाई,
मुझे खेद है कि तीन के बाद की कड़ियों के साथ मैं चल नहीं सका हूँ ! मुंबई और हैदराबाद की यात्राओं पर था और अत्यधिक व्यस्त रहा हूँ पिछले पखवारे में ! कल ही दिल्ली आया हूँ ! अब इत्मीनान से पढूंगा और अपनी प्रतिक्रिया लिख भेजूंगा !
सप्रीत-आ.

गौतम राजरिशी said...

रात के ग्यारह बज कर पैंतालिस मिनट पर पढ़ना शुरू किया था। विल्स क्लासिक की बकायदा तीन डंडियों और लगभग दो घंटे पश्चात कीर्ति चौधरी के साथ का ये सफर इस रतजगे के लिये दिलचस्प, रोचक और भावनाओं के अजब-गजब उतार-चढ़ाव लिये रहा।

शायद अंत के बारे में सबकी यही राय है कि कुछ ज्यादा ही आशावादी था। वैसे ये तो नहीं पता कि कोई मजिस्ट्रेट ऐसा निर्णय दे सकता है कि नहीं किंतु जो भी है अपने आप में एक नयापन लिये हुये है अंत और एक लेखक की कोशिश यही रहती है हमेशा।

एक सवाल जो पूछना चाहता हूं कि आखिरी की ये नज़्म "नदी पार खारे समंदर मिलेंगे/कुछ साए भी सायों के अंदर मिलेंगे/मिलेगी कोड़ियां बिखरी बिखरी/काली और भूरी, सफ़ेद और चिकनी/भरी होगी उनमे बीते दिनों की जवानी/ठीक उनसे आगे/एक दश्त मिलेगा और मिलेगी गहरी वीरानी"...ये खूबसूरत नज़्म किसने लिखी है? आपने या आभा भाभी ने? जवाब चाहिये।

and i told you before na, you are one hell of an addictive writer....मेरी कई कहानियों के ड्राफ्ट उफ़्फ़्फ़, उनकी ऐसी की तैसी हो गयी।

समस्त शुभकामनाओं सहित

Kishore Choudhary said...

@ राजेश चड्ढा, कुछ ज़िन्दगी है, कुछ कहानी है. वाकई दुष्कर तो है किन्तु आप कहते हैं कि निभा लिया गया है तो मेरे पास मुस्कुराने के सिवा कोई काम नहीं बचता. आपने एक साथ पढ़ कर लिखा, बड़ा अच्छ लगा. इन शुभकामनाओं के लिए बहुत शुक्रिया.

@ ओझा जी, मैं आपके शब्दों को सुनने की प्रतीक्षा में हूँ. आप अपनी सुविधाओं का ख़याल जरूर रखें. मैं इस ड्राफ्ट पर आपसे व्यक्तिगत रूप से बात करूँगा कि इसमें सम्भावनाएं क्या है ? सादर.

@ मेजर साहब गौतम राजरिशी जी, कहानी के लिए आपने जो समय और स्नेह दिया. उसके लिए मेरे पास, आप तक पहुँचाने को शब्द नहीं है. कहानी का अंत कहीं से आशावादी नहीं है, हाँ उसमे आशा का इम्प्रेशन है. सात दिनों के बाद सब चीजें वापस उसी शक्ल में ढल जाएगी. वह लड़की फिर एक स्त्री देह में बदल जाएगी. उसके सपने मर चुके हैं और मरे हुए सपनों वाले लोग दुनिया में किस तरह जीते हैं या शायद नहीं भी जीते...
मैं भी अच्छी कविताएं लिख सकता हूँ, आपको यकीन नहीं क्या ?
आप कहानियां लिखिए. मुझे यकीन है कि आपकी कहानियां मुझे सब भुला देगी. पुनः आभार.

Tripat "Prerna" said...

wah ji wah .. kya baat hia...bahut khoobsoorat

Babli said...

आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!

गौतम राजरिशी said...

किशोर जी,
शुक्रिया !

सारी प्रति-टिप्पणियां पढ़ कर आ रहा हूँ। आपका धैर्य और आपका इस तरह समय निकाल लेना जितना हतप्रभ करता है उतना ही एक अजबी-सी कसक भी देता है कि काश मैं भी आप जैसा हो पाता...

और आपकी कवित्व-प्रतिभा पर जरा भी शक नहीं। आपकी तमाम कहानियों के कई-कई जुमले किसी छोटी कविता से कम नहीं होते...

अगली प्रविष्टि की प्रतिक्षा कर रहा हूँ।

दीपक 'मशाल' said...

आपके ब्लॉग को आज चर्चामंच पर संकलित किया है.. एक बार देखिएगा जरूर..
http://charchamanch.blogspot.com/

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