Tuesday, July 27, 2010

दश्त की वीरानियों में - चौथा भाग

मौसम में उष्णता थी. पिछले दो महीने से वह नित्य कर्म करती, झाड़ू पौचा लगाती, खाना बनाती, अपने दादा के लिए कुछ छोटे मोटे काम करने के बाद दो घंटे किताबों में उलझी हुई दिखती फिर शाम चार से पांच बजे के बीच सामने वाली गली में अपने ताऊ के घर चली जाया करती. ये जाना अनियमित था. जब भी उसकी हमउम्र बहन उसके घर आती ठीक उसी दिन जाना हो पाता था. बाकी दिनों में वह अपने कमरे में बैठ कर क्या किया करती थी इसके बारे में कह पाना मुश्किल है जैसे ठहरे हुए पानी में काई का बढ़ता हुआ आकार नहीं दिखता वैसे ही उसके मनोभावों का क्या हाल था. ये उसकी माँ और अन्य किसी को समझ आना जरूर टेढ़ा रहा होगा. उसने घर की सब बातों के यथासंभव सकारात्मक उत्तर पहली ही बार में दे दिये थे. दादा परेशान थे और जगदीश प्रसाद को कोसते थे कि बहू और पोती कितने आराम से रहते हैं और वह इस तरह का वहम पाले हुए है. उन्होंने कई बार अपनी पोती को पास बिठाया और अपने ज़माने में पसंद से शादी करने वालों के हाल बताये. उनको पूरा विश्वास था कि जो भी स्त्री या पुरुष में भेद करता है. उसे ईश्वर कड़ी सजा देते हैं.

एक दिन दोपहर ऐसी ही एक बैठक में वह दादा की बातें सुन रही थी. दादा उसको गजा काका की बात बता रहे थे कि ताऊ की बेटी भी आ गई. उसे भी उन्होंने अपने पास बिठा लिया. गजा काका का किस्सा माँ को बड़ा सुकून भरा लगता था इसलिए वह भी दरवाजे की ओट से घूंघट काढ़े हुए बड़े चाव से ध्यान लगाये हुए थी. दादा ने बताया कि एक दिन गजा काका रूठे और अपने पिताजी के सामने बोलने लगे "मुझे मालूम हुआ है कि वह लड़की बहुत मोटी और काले रंग की है. जिससे अपने मेरी सगाई कर रखी है. मैं उससे हरगिज शादी नहीं करूँगा." इस पर दादा ने अपना जूता उतारा और चारपाई से आधे खड़े होते - होते ही गजा काका के सिर पर दे मारा. दोनों लड़कियाँ आश्चर्य से देखने लगी. दादा ने बताया कि फिर गजा काका ने अपनी पसंद से स्कूल के माड़साब की बेटी से शादी की. खुद भी बाबू हो गए थे और पंचायत समिति में काम करते हुए सरकारी क्वाटर में रहते थे. समय ने अपनी गठरिया कुछ ऐसे खोली की मुसाफिर चौंक उठा. वह आये दिन झगडा करती. एक बार उसने भी जूता उठा कर मार दिया. मरद के सामने स्त्री लपड़ - चपड़ करे, उसी में उसकी बेइज्जती है .फिर ये तो जूता उठा कर मारना... दादा ने कुछ तच्च तच्च... की सी आवाज़ें निकाली और आगे बताने लगे. उसके ताऊ की बेटी लगातार उसको पांव और अँगुलियों से इशारे करती रही कि उठो यहाँ से मगर वह असमंजस में थी.

एक बार गाँव का एक रिश्तेदार किसी काम से पंचायत आया तो सोचा अभी खुला नहीं है इसलिए चलो गजा भाई के यहाँ हो आयें. वह उनके सरकारी क्वाटर चला गया. उसने लौट कर गजा काका की मट्टी पलीद कर दी. सीधा करती औरतों से लेकर चौपाल में ताश खेल रहे बड़े बूढों तक सबको बताया कि भाई कभी ज़िन्दगी में बाबू मत बनना. खिलखिलाता हुआ हँसता "रे... भाभी सो रही पलंग, अर उल्टी होके और गजा भाई झाड़ू लिए लेट्रीन साफ़ करे, आप देखो तो शरम से मर जाओ, सफ़ेद हांडे को चमकाते जावे और खुश होकर बोले. तुम बैठो कुर्सी पर, मैं हाथ धोकर आऊँ... भाई मैं तो भाग आया. भाभी को उठना नहीं था और गजा भाई अपने उन्हीं हाथों से पानी का लोटा भर के लावेंगे, मैं तो भाग आया." ऐसे किस्से सुनाते हुए दादा मुस्कुराते गए. दरवाजे की ओट से माँ हल्की होती गई कि भले ही पति से सालों साल दूर रही मगर गजा काका की तरह उनकी हंसी ठिठोली नहीं होने दी. ताऊ की लड़की बुलाने आई थी और वह जा नहीं पा रही थी इसलिए वह बहुत बेचैन होती गई. आखिर हिम्मत कर के बोली "चल मैं देती हूँ तेरे को किताब." कमरे में गई और बाहर आते हुए बोली दादा मैं ताऊ के यहाँ जाकर आती हूँ. माँ ने जरूर हाथ उठाया किन्तु बात दादा को संबोधित थी. उसने बीच में बोलने को दादा का अपमान जान कर खुद को रोक लिया. वे लड़कियाँ चली गई. माँ जब चाय लेकर आई तो दादा ने कहा "ये मालिये की छोरी कुछ ठीक नहीं लगती है, आज बैठी - बैठी कुचरणी कर रही थी. इसका ध्यान रखा करो." बहुएं ससुर से बात नहीं करती सिर्फ टिचकारियां भर कर उत्तर देती है. माँ ने भी सिर हिला कर सहमति जता दी.

मोहल्ले की मेन रोड पर किराणे की बड़ी पुरानी दुकान थी. सारा मोहल्ला जैसे सम्बंधों में बंधा हुआ था. दूसरी दुकान पर चढ़ते ही संभव था कि हर समय झुके रहने वाले दरबान सिंह चाचा कह ही दें कि हमसे क्या नाराजगी हो गई है ? लेकिन धीरे धीरे ये बात खटकनी कम हो गई थी. उनका मंझला बेटा दुकान संभालने लगा था. वह ज्यादातर दुकान पर नौकर को छोड़ कर लड़कियों की खोज में निकल जाया करता. बड़ा ही हंसमुख और मुंहफट भी था. किस लड़की का चक्कर किधर चल रहा है, तुरंत बता देता. इन दिनों एक खत्रियों की लड़की उसके साथ फंसी हुई है. ये बताने में संकोच नहीं करता था मगर कहने का तरीका कुछ यों होता कि "चले है..." इसका साफ़ आशय था कि जब तक राजी है, ठीक है. तब तक किसी और को देखते हैं. उन कुंवर के पास अल्ताफ का भी आना जाना था. कुंवर की खुद की निगाहें उस लड़की पर थी जिसे अल्ताफ ने फांस रखा था. एक सुबह बातों ही बातों में कुंवर ने कहा " अल्ताफिये तूं यों ही बरबाद हो रहा है, उस लड़की को मैंने कई बार एक काले रंग की स्कार्पियो में जाते हुए देखा है. लड़की ड्राईवर के पास बैठती है और पीछे उसकी बहन बैठी रहती है." बात तो सच्ची थी मगर कही सिर्फ इसलिए गई थी कि अल्ताफ फूट जाये. लड़का चाय ले आया. अल्ताफ ने कप उठाया और दुकान के अंदर आ गया सिगरेट पीने के लिए. पता नहीं कौन देख ले, लड़की साथ हो तो गुनाह मुआफ है मगर सिगरेट तो खाल ही खिंचवा दे. गल्ले के पास रखे स्टूल पर बैठ कर हाथ में छुपाई हुई सिगरेट को खींचता और तुरंत हाथ नीचे कर लेता. "तूं क्या समझता है मैं चूतिया हूँ, मेरे पास उसके जैसी बीस आती है." कहता हुआ सिगरेट खींचने लगा. कुंवर ने बात की हँसी बनाई "तुझे कुछ देगी थोड़े ही..."

सुबह की ताजगी में अफ़सोस घुले नहीं होते हैं रिश्ते और बातें भी नए खिले हुए सूरज की तरह दम ताजा लगती है. अल्ताफ भी फ्रेश मूड में था तो कुंवर ने बातों बातों में पता लगा लिया कि उस लड़की के लिखे कुछ पत्र उसके पास हैं. ज्यादा मसखरी हुई तो अल्ताफ ने एक मुड़ी तुडी चिट्ठी अपने पर्स से निकाल कर दिखा भी दी. कुंवर को अपने ऊपर हंसी आई कि साली फंसती भी कैसे वह तो आल रेड्डी ही एवरेड्डी थी. नंबर नौ के अंदर फंसने को कूद चुकी बिल्ली. "तेरा कितना बिल लगाया है उसने ?" कुंवर ने अल्ताफ से पूछा. इस सवाल पर अल्ताफ संजीदा हो गया. उसे वह सब याद आया जो उसे कई बार बोना बना गया था. वह आती थी और बिना कोई तोहफा लिए जाया करती. उसने एक भी आईटम मुफ्त में उसके शो रूम से कभी नहीं लिया. खरीददारी करती तो पूरे पैसे चुका कर बिल सहित कपड़े ले जाया करती थी. अल्ताफ इस दम ताजा सुबह में एक उदासी से घिरने लगा. उसने इस संबन्ध को केज्यूअली ही लिया था मगर उस लड़की की डूबी हुई आँखें, उसे हमेशा अपनी ओर खींचती थी. उसने जब भी उसे छुआ वह बिना किसी प्रतिरोध के खड़ी रहा करती और फिर अचानक से कुछ देर बाद उसकी बाहें अल्ताफ को कसने लगती थी. इस अहसास से अल्ताफ के अंदर सुकून और मुहब्बत दोनों भरती हुई जान पड़ती. ऐसे बयान करना भी मुश्किल है कि एक नया स्पर्श जो आपको इतना करीब से छू जाये और काली घटाओं की तरह घेरता ही जाये कैसा है ? वह सम्पूर्ण देहिक निकटता की चरम उत्तेजना में उसे हर जगह से छूता था. वह चुप बनी रहती और सिर्फ जाते हुए उसकी आँखों में कुछ सवाल छोड़ जाया करती थी. वे बहुत अजनबी और डराने वाले हुआ करते थे.

अल्ताफ जब चाय पी कर चला गया तो कुंवर ने तय किया कि आज रात को इसकी खैर नहीं. उस लड़की के सजातीय लड़के कुंवर के हम प्याला थे.


रात को पीने की दैनिक महफ़िल में किस्सा चल पड़ा. चला क्या कुंवर ने ही चलाया था. सुबह प्रकाशित हुए किस्से को कुंवर ने सुना दिया. तय हुआ कि अल्ताफ को उठा कर लाया जाये. साले की इतनी हिम्मत ? अर्थात जब तक हम बैठे हैं, तूं कौन है का भाव था. अल्ताफ को तीन मुस्टंडे कार में डाल कर ले आये. कुंवर साथ था तो वह भी विश्वास से बंधा हुआ चला आया. गली के कोने के उस बदनाम कमरे से पहले भी कई बार लड़ने झगड़ने के स्वर आते थे किन्तु पड़ौस के तीन चार घरों में लड़कियाँ नहीं थी औरतें अधेड़ हो चली थी इसलिए आपत्तियां कम ही होती थी. अल्ताफ से कहा पेग लो और शराब से भरा ग्लास उसकी ओर बढ़ा दिया. उसने ना नुकुर की, बोला कुछ ख़ास नहीं. कमरे में मौजूद लोगों में से अधिकतर अल्ताफ के लिए अजनबी थे. उनमे से एक ने कहा. "भाई इसको मत कहो, इसके धर्म में शराब हराम है." थोड़ी सी चुप्पी में अल्ताफ ने पाया कि आज वह बुरी तरह से फंस चुका है कि एक थप्पड़ नीम अँधेरे में उसकी कनपटी पर पड़ा और चीखती हुई आवाज़ आई "बेहनचोद और क्या क्या हराम है तेरे यहाँ ?"

रात की मार पीट के बाद में वे समाज हितेषी उस लड़की की लिखी हुई कुछ चिट्ठियां ले गए. शुक्र ये रहा कि अल्ताफ पिछले दो महीनों से उससे मिला ही नहीं था ये बात सब जानते थे. अल्ताफ ने मुंह धोने के लिए पानी के छींटे दिये और हाथ फेरते ही उसे अपने सूजे हुए चेहरे का आभास हो गया. वह थक कर बैठ गया. उसे लगा कि जिस रात वह उस लड़की को छोड़ कर आया था. वह भी उसके आने के बाद शायद इतनी दर्द भरी थकान से हार कर ऐसे ही आँगन में बैठ गयी होगी. उसने उस रात हाँ क्यों नहीं भरी इसका एकमात्र कारण था कि उसकी छुअन में वह रोहित को किया जा रहा प्यार महसूसता था. ये शायद इसलिए भी था कि वह इसे कभी मंजूर नहीं कर सका कि उस लड़की को किसी और के साथ सोना चाहिये था. भले ही वह खुद बहुत बार इस नियम को तोड़ चुका था. रात को भागते समय उसने एक बार भी नहीं सोचा था कि एक लड़की कैसे किसी को अपने घर में बुला सकती है वो भी रात को, वो भी अपने बाप के घर में होते हुए. उसे अब ख़याल आया कि उसको उसके पापा ने बहुत पीटा होगा... किसके लिए रोहित के लिए ? नहीं अल्ताफ के लिए. उसने कभी जो बातें नहीं सोची वह उसे आज क्यों याद आ रही है ? अल्ताफ उठा और खिड़की के सामने खड़े होकर चाहा कि उसे आवाज़ दे. वह आज इस दुःख को उसके साथ बांटना चाह रहा था. आज कमरा खाली था, बहुत ही अधिक खाली. कमरे की सब चीजें शक्ल बदल कर खुद तन्हाई में ढल गई थी. वह गलत था या सही था .उसे पता नहीं चल पाया. ऐसे सवालों से घिरे रहने के बाद भी उसकी स्मृतियों में दसियों लड़कियाँ जो उसकी मित्र थी उनमे से उसे सिर्फ एक की ही याद आ रही थी. एक तनहा गहरी खामोश आँखों वाली लड़की जो रोती रही और उसे मनाती रही कि मुझे अपने साथ ले चलो. उसने हमेशा अपना सब कुछ दिया था और माँगा था सिर्फ उस एक रात... वह दे नहीं पाया. कई सारे अफ़सोस घुल मिल गए तो वह रोने लगा. उसकी भरी हुई आँखों से बीते दिनों का स्पर्श बहने लगा. उसने घंटे भर में न्यूनतम जरूरी सामान पेक किया और निकल गया.

गरमी के दिन जा चुके थे. जगदीश प्रसाद को छुट्टी से लौट कर आये हुए तीन महीने बीत चुके थे. वे रोज घर पर पत्नी से बात करते थे और आश्वस्त हो जाया करते थे. वैसे भी आज के दुःख कल कम हो जाते हैं और अभी असम्भव दिखने वला जीवन आगे सहजता से बीतता जाता है. इसकी जानकारी उनको थी फिर भी वे उन दिनों खुद को संयमित नहीं रख पाए थे. माँ को जब बताया तो उन्होंने कहा था. "बेटा, वो तो भोली बच्ची है ,गलती हो गई होगी... वो छोरा गाँव का होता तो उसकी नाक काट देते पर अब तूं जाने कैसी कैसी जात के लोग के बीच जाकर बस गया है... चिंता से शरीर और मन दोनों कटेंगे इसलिए जल्दी से उसकी शादी कर दे." जगदीश प्रसाद ने सोचा कि बातें वही हैं. जो उन्होंने सोची थी मगर जाने क्यों माँ के मुंह से सुनी तो लगा कि वे वजनदार है. बाबा कभी बरसात के दिनों में गाँव को छोड़ कर नहीं गए. उन्होंने इसी धरती को हरियाते हुए देखा और उसी से नया जीवन पाया था. खेजड़ी के ताल में भरे पानी को देखते, परकी नाडी का चक्कर लगाते, खेतों की मेड़ पर बने रास्तों को फिर से काँटों से भरते और लौटते हुए काचर लेकर आते. उनमे से मीठे - मीठे छांट कर छोटे बच्चों को खिलाते. दादी पास होती तो हंसते थे कि मेरी तरह तूने भी टाबरों को अपने खट मिटियों में फंसा रखा है. ये काचरों की तरफ देखते ही नहीं. दादी मुलकती और बात को उड़ा देती. इसी बंधन के कारण बाबा गाँव से शहर आने को तैयार हुए थे. जगदीश प्रसाद को पूरा विश्वास था कि अगर माँ नहीं कहती तो बाबा उनकी बात कभी नहीं सुनते.

ऐसे ही ख़यालों में जगदीश प्रसाद के दिन और रातें कट जाती. दुनिया में कितना विकास हुआ है कि अब हर पल घर की ख़बर मिल जाती है. इसे उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा सुख माना था. एक शाम चार बजे वे जहाज पर चढ़ने को ही थे कि ख़बर मिली. बेटी भाग गई है. सुबह निकली थी और शाम होने को आई है, कहीं पता नहीं चल रहा. उनको लगा कि वे ऐसी नाव पर सवार है जो समुंद्री तूफ़ान में अनिश्चितकाल के लिए भटक कर अब डूबने को ही है. उन्होंने आखिरी प्रार्थना करनी चाही, होठ और आँखें अधखुली ही रह गई.


...बात अभी बाकी है.

28 comments:

रचना दीक्षित said...

"भाभी सो रही पलंग अर उल्टी होके और गजा भाई झाड़ू लिए लेट्रीन साफ़ करे, आप देखो तो शरम से मर जाओ, सफ़ेद हांडे को चमकाते जावे और खुश होकर बोले तुम बैठो कुर्सी पर मैं हाथ धोकर आऊँ... भाई मैं तो भाग आया. भाभी को उठना नहीं था और गजा भाई अपने उन्हीं हाथों से पानी का लोटा भर के लावेंगे, मैं तो भाग आया."

"भाई इसको मत कहो, इसके धर्म में शराब हराम है."
बहुत अच्छी लग रही है आपकी कहानी बीच बीच में व्यंग का पुट उसमे और रंग भर रहा है. ये सच है की विकास हो रहा है पर कुछ जगहों पर ये विकास भरी पड़ रहा है

वन्दना said...

कहानी धाराप्रवाह चल रही है और शुरु से अंत तक बाँध कर रखा हुआ है………अब अगली कडी का इंतज़ार है।

Kishore Choudhary said...

गाँव का मन ऐसा ही होता है ना एक दम हल्का और चीजों को बारीकी से देखने वाला फिर रचना जी मुझे कई बार लगता है कि उनका हास्य बोध उन्होंने बचा कर रखा हुआ है. आपका आभार.
वंदना जी, इतना त्वरित कमेन्ट आया कि लगा आप मेरी इस कहानी के हर पल साथ ही हैं, शुक्रिया कहने की जरुरत है ?

कंचन सिंह चौहान said...

इतना तो पढ़ लिया.. आगे..??

Kishore Choudhary said...

आगे भी बात जारी है कंचन जी, अच्छा लग रहा है कि आप पढ़ रही हैं.

Parul said...

kishor ji..jaldi puri kijiye :)

Kishore Choudhary said...

पारुल जी, एक समापन किश्त लिखनी है और वह भी इसी महीने में... मैंने बहुत सरदर्द दिया है. सोचता हूँ कि कैसी कैसी गालियां पड़ेंगी इसलिए वक़्त लगा रहा हूँ.
:)

रंजना said...

आज लग रहा है,अच्छा ही हुआ जो इतने दिन नेट से संपर्क नहीं रहा...एकसाथ चार भाग पढने का मौका मिला...क्या करूँ,मुझे किस्तों में कहानियां पढना पसंद नहीं.....

प्लीज ,जितनी जल्दी हो सके बाकी भाग पढ़वाइए ...
अब कहानी की क्या कहूँ....

Kishore Choudhary said...

सच !
मैं भी पिछले दो महीने में कुछ पढ़ लिख नहीं पाया
तो कहानी के बारे सोचता रहा, इसी सोच में कहानी बढ़ती गई,
लिखनी तो कुछ और किश्तें थी लेकिन पारुल जी कहती है जल्दी पूरी करो तो सोचा है कि अगली कड़ी में सम्पन्न कर दूं.
रंजना जी, आपको तो बिल्कुल भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

पढ रही हूं किशोर जी. चुपचाप पढना अच्छा लग रहा है- इस सूत्र-वाक्य
ने ध्यान खींच लिया, लगा, सचमुच लोग बेकार ही परेशान होते हैं, कल का इन्तज़ार कर लें तो बेहतर हो-
"वैसे भी आज के दुःख कल कम हो जाते हैं और अभी असम्भव दिखने वला जीवन आगे सहजता से बीतता जाता है."

neera said...

कहानी का प्रवाह और पात्रों की सजीवता पाठकों को बांधे हुए है... कहानी हर बार क्लाइमेक्स पर ही क्यों रूक जाती है?

"वैसे भी आज के दुःख कल कम हो जाते हैं और अभी असम्भव दिखने वला जीवन आगे सहजता से बीतता जाता है."

वंदना जी की तरह इन शब्दों पर मेरी भी द्रष्टि कुछः देर को अटक गई...

Kishore Choudhary said...

ज़िन्दगी के अनुभव ऐसे ही होते हैं कि पढ़ने वाले को खुद की याद दिला देते हैं. वंदना अवस्थी जी, बहुत आभार.
नीरा जी, परसों मैं इसी पर बात कर रहा था कि ये कहानी अगर कोई अलग अलग शीर्षक से पढ़े तो क्या चार अलग कहानियां नहीं लगेगी ? ठीक जगह से शुरू होती और ठीक जगह पर एक सूत्र को छोड़ कर जाती हुई ?

Avinash Chandra said...

आज कुछ चुनने को नहीं है, जैसे कोई दृश्य चल रहा हो और अचानक से सम्मोहन टूट जाए...बताने को कुछ ना रहे, पर सब कुछ बसा रहे.
महसूसने और बयान करने में फर्क यही होता होगा किशोर जी.
लिखिए, इन्तजार है...

Kishore Choudhary said...

आभार अविनाश, कहानी बोझिल तो नहीं हो रही ना ? कल एक मित्र हंस रही थी किशोर कहानी है या उपन्यास ?

डॉ .अनुराग said...

तीसरा हिस्सा पहले सोचता था सबसे बेहतर था .चौथा हिस्सा बोल्ड भी है ओर कहानी के सभी भागो की मांग को पूरा करता है ...शायद तीसरे से ज्यादा मार्क्स ले गया है .....गंवई ओर एक समाज के हिस्से पे आपकी पकड़ बहुत अच्छी है ...कहानी लिखने के लिए एक कंसिस्टेंट मूड का फ्लो चाहिए .....ओर हर हिस्सा उतनी ही एनेर्जी की मांग करता है .इस भागदौड़ भरी जिंदगी में उस मूड को बचाए रखना ज्यादा साहसिक है .....अच्छा है साहित्य की तरह हिंदी ब्लॉग थोडा ओर खुलेगे तो कंप्यूटर का आसमान ओर विस्तृत होगा



बस एक बात से नाइत्तिफाकी है
सुबह की ताजगी में अफ़सोस घुले नहीं होते हैं.........

varsha said...

subah ki tazgee main hi afsos zyada ghule hote hain...mano ek taza subah poori oorja se afsos aur dard ko aawaz dena chahti ho...
is baar kahani vahan pahunch chuki hai ki ab kya hoga....

Kishore Choudhary said...

आपकी नाइत्तिफाकी से मैं पूरी तरह सहमत हूँ. डॉ अनुराग, ये सच है कि फर्स्ट ड्राफ्ट में बहुत सी चीजें इग्नोर की जा सकती है किन्तु ठीक कर पाना शायद एक सिटिंग में संभव नहीं होता. ये मुझे भी कुछ अखर रहा था, सोचा कई बार लेकिन जिस मूड को मैं लिखना चाह रहा था उसके लिए शब्द मिले नहीं और मुझसे वाक्य बने ही नहीं.
वर्षा जी, सुबह के उस मूड में, मैं भी बहुत देर उलझा रहा था कि कैसे लिखूं उसको पर नहीं बना. अब जहाँ कहानी पहुंची है उसके आगे का रास्ता छोटा करने को मजबूर हूँ. मित्र थकने लगे हैं और मुझे भी अब बाहर आना ही चाहिए.

Avinash Chandra said...

किशोर जी,
मैंने बहुत कम पढ़ा है. सो शिल्प क्या होता है मैं नहीं जानता, कहानी की लम्बाई कहाँ ख़त्म हो और उपन्यास कहाँ से शुरू ये भी नहीं पता.
लेकिन बोझिल होने पर बात कर सकता हूँ, ये कतई बोझिल नहीं है. जब पढने वाला सम्मोहन में हो तो इतंजार सुखद ही होता है.
एक साथ महीने का जेब खर्च मिल जाए तो सोचना बंद हो जाता है, कल्पना इन्तजार और उम्मीद दोनों माँगती है....मैं दोनों देने को तैयार हूँ.

Kishore Choudhary said...

बहुत अच्छा लगा सुन कर कि कहानी कहीं से बोझ नहीं बन रही है.
कहानी को सब शीघ्र पूरा करना इस लिए भी चाहते होंगे कि जिज्ञासा शांत हो कि आगे क्या हुआ.
शुक्रिया अविनाश भाई.

Manoj K said...

कल रात यह किस्त मोबाइल पर पढ़ी , घर और लैपटॉप से कोई ६०० की.मी. दूर था. कमेन्ट किया लेकिन पब्लिश नहीं हुआ, अब लगता है अच्छा ही हुआ, यहाँ कुछ और लोगों की टिप्पणियाँ भी दिख रही है और आपके रेस्पोंसेस भी देखे.

पहले बात कहानी की इस किस्त के बारे में. किशोर जी जैसे की आप कई बार कहते हैं - ज़िन्दगी कई बार हमे चौंकती है, इस बार मुझे कहानी के इस भाग ने चौंकाया, कहानी में इतने ट्विस्ट हैं की ऐसा लग रहा है के मैं ई.पी. (जयपुर का सबसे बड़ा मल्टीप्लेक्स) में कोई नई फिल्म देख रहा हूँ.

१. पहले मुझे अल्ताफ इस कहानी में सबसे कनिंग करक्टर लगा लेकिन आज उसकी आँख में भी आंसूं हैं, कुंवर सबसे कनिंग निकला, २. दादाजी का करक्टर स्केच ऐसा था मनो वोह कुछ बोलते ही न हो, लेकिन इस कड़ी में वे बोले भी और बिलकुल ठीक ठीक बोले.
३. गजा काका की कहानी बिलकुल ठीक ठीक पिरोयी गयी है इस किस्त में, ब्लेन्डिंग अद्भुत है.

अब बात करता हूँ यहाँ आई कुछ टिप्पणियोँ पर आपके रेपोंसेस पर -
१. पहले किसी भी पोस्ट के लिए आये कमेन्ट पर आपके रेसपोंस कम ही होते थे, यहाँ आप बहुत एक्टिवली अपने पाठकों से इंटरएक्ट कर रहे हैं, यह मुझे बहुत अच्छा लगा, इस कड़ी में आपके रेस्पोंसेस पिछली तीन कड़ियों के मुकाबले सबसे ज्यादा हैं.
२. आप जिस मूड में यह कहानी लिख रहे हैं, वह मूड बना रहे और हम वोह देखें जो आप दिखाना चाह रहे हैं, न की वोह जो हम देखना चाह रहे हैं.

अंत में सिर्फ इतना कहूँगा, अगली कड़ी का इंतज़ार है.

रिगार्डस्
मनोज खत्री

PS : आपकी परम साहित्यक कहानी की तुलना आजकल की फिल्मों से कर रहा हूँ, क्षमा चाहूँगा, पर मुझे और कुछ सूझा नहीं. आभार!

Kishore Choudhary said...

मनोज जी, बढ़िया संवाद
मैंने अपनी पिछली कहानियों पर कभी संवाद नहीं किया. मैं उन्हें छापता था और भूल जाया करता था क्योंकि उन पर कहने के लिए मेरे पास कुछ होता नहीं था फिर उनमे आगे की कोई गुंजाईश होती तो उसे मुझे नई कहानी में ही उपयोग लेना पड़ता था. उन सभी कहानियों पर मिले समर्थन और सुझाव से मैंने अपने शब्दों को ठीक किया है.
इस बार कहानी की लम्बाई एक पूर्ण कहानी जितनी थी जिसे ब्लॉग के जरिये प्रकाशित करने में मुझे इसके कई पार्ट करने थे फिर मेरे पास ये सुविधा थी कि मैं बात करता जाऊं और कहानी के इम्प्रेशन के बारे में जान सकूं.

कहानी के पात्र आम जीवन के हैं, अल्ताफ़ एक उलझा हुआ पात्र है जो खेलता तो जाता है मगर इससे होने वाली समस्याओं से अनजान है. कुंवर उसी के रास्ते पर है. दादा जी बोलते हैं तो वे अपने समय की स्थापनाओं को जाहिर करते हैं. इससे समाज के भीतर का छोटा सा दृश्य समझने का अवसर बनता है. गजा काका से एक दूरी क्रियेट करने की कोशिश की है कि किस तरह से गांव से टूटते ही सब कैसे बदल जाया करता है.

बाकी आप जो सम्मान दे रहे हैं उसके लिये आभार.

sanjay vyas said...

तीसरा और चौथा भाग इस कथानक में एक बड़ा आयाम जोड़ता है कि कस्बाई वर्ग में जीवन के दाह में सिर्फ प्रेम ही जिम्मेदार नहीं होता बल्कि उनके दुःख पहले से ही इतने बड़े होते हैं कि वे छोटी खुशियों की तलाश भी बड़ी हसरतों से किया करते हैं.और इन लोगों के घर में बुज़ुर्ग का वास कितना मायने रखता है.

कहानी के साथ ये एक दस्तावेज़ भी है.

Kishore Choudhary said...

"कस्बाई वर्ग में जीवन के दाह में सिर्फ प्रेम ही जिम्मेदार नहीं होता बल्कि उनके दुःख पहले से ही इतने बड़े होते हैं कि वे छोटी खुशियों की तलाश भी बड़ी हसरतों से किया करते हैं." संजय भाई ठीक इसी बात को रेखांकित करना चाह रहा था, लगता है कहानी का सम्प्रेषण भी कमजोर नहीं है. आभार

Tripat "Prerna" said...

intezaar rahega...

अपूर्व said...

कहानी का अब तक का सबसे बेहतर भाग लगा..कथानक के आयाम विस्तृत होते हैं..जो डर, शर्म जैसे अहसास जेहन की त्वचा के अंदर छिपकली से रेंग रहे थे..वे अब खुली धूप मे दिखायी देने लगे हैं..कथानक के पात्रों का परिवेश और उसमे जुड़ा समाज कैसे उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बनता चला जाता है..कैसे इतनी जिंदगियाँ आपस मे गुँथी होती हैं..कैसे सबके सुखदुख सब एक साथ घुले होते हैं..कि हम तमाम रिश्तों की नसें काट कर भी खुद से उनको अलग नही कर पाते हैं..
कथानक के घर से निकल कर सड़क, बाजार मे आने के साथ शैली और भाषा भी पात्रानुकूल स्वयं को बदलती है..और पात्रों के असल किरदार को उघाड़ने का काम करती है..अल्ताफ, कुँअर, गजा काका, दादा जी सब उसी मिट्टी की पैदाइश है..जिसकी नमकीन गंध हमारे मटमैले जिस्मों से आती है..
सबंधों का एक मोहल्ला हमारे अंदर भी साँस लेता है..हम अक्सर बेखबर ही रहते हैं..तभी कहा भी है कि ’हर एक आदमी मे हैं दस-बीस आदमी’..

Kishore Choudhary said...

मैं सोच रहा था कि कहानी कुछ इस तरह खुले कि ज़िन्दगी के साथ और भी जरूरी चीजें नत्थी है मुहब्बत के सिवा. अपूर्व जी, कहानी के तत्वों में परिवेश और किरदार नकली न हों ये मैंने चाहा और आपने पुष्टि की "कथानक के घर से निकल कर सड़क, बाजार मे आने के साथ शैली और भाषा भी पात्रानुकूल स्वयं को बदलती है..और पात्रों के असल किरदार को उघाड़ने का काम करती है..अल्ताफ, कुँअर, गजा काका, दादा जी सब उसी मिट्टी की पैदाइश है..जिसकी नमकीन गंध हमारे मटमैले जिस्मों से आती है.." बहुत आभार.

गौतम राजरिशी said...

कुछ अजीब-से भाव उभरे हैं इस किश्त के बाद। टिप्पणियाँ पढ़ी तो लगा कि जैसे मुझ अकेले में उपजे ऐसे भाव। यहाँ अनुराग जी से मैं सहमत नहीं। इस कथित रूप से ’बोल्डनेस’ वाली बात पर। मेरे ख्याल से परिवेश और माहौल का बयान बगैर इस बोल्डनेस के भी किया जा सकता है और किशोर जी की लेखनी तो वैसे भी बड़ी समर्थ है। दो जगह उकेरे गये अप-शब्द यकीनन अभी तक कहानी में फैले सन्नाटे या वीरानी,जो कि इस कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा है, को एक शाक-सा देते हैं।

नहीं, मुझे ये हिस्सा नहीं भाया।...और तनिक अफसोस हुआ कि कहानी की खूबसूरती को यूं बिखरते देखकर।

शायद अगली किश्त कुछ भरपायी करे।

Kishore Choudhary said...

यहाँ तक आते ही कीर्ति बाहर की दुनिया में विलय होने लगती है. एक ठहरा हुआ प्रेम सार्वजनिक होकर घृणा की ओर बढ़ने लगता है. मेजर साहब, समाज का बड़ा तबका गलतियाँ करता है और उससे भी बड़ा तबका अपनी गलतियों को छिपाता ही नहीं वरन उन पर सभ्यता का भाषण भी करता है. इस निष्क्रमण में जाना पहचाना भाव छूटने लगता है तो लेखक भी पात्रों की भीड़ को संभालने में असमर्थ हो जाया करता है.

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