अब पढ़िए पहले भाग से आगे की कहानी.
इंडियन नेवी में डाईवर भर्ती हुए उसके पिता अपने जीवन के पच्चीस साल काली चाय और बिना फ़िल्टर वाली चार्म्स सिगरेट के सहारे बिताते रहे. समंदर के खारे पानी के ठहरे हुए दृश्यों में कभी पागलपन छाने लगता था और नमक सनी हवाओं से लड़ने में सिगरेट का कसैला स्वाद हमेशा कारगर नहीं होता था. जहाज, डाईविंग, चौकसी, दूरबीन, अकड़े हुए जूते, सीले कोट, और ऐसी ही चुनिन्दा चीजों से घर गायब ही रहता तो वह और शिद्दत से याद आने लगता है. आज फिर वे आठ महीने बाद घर आये है. चाय के घूँट नहीं भरते, उसे कटोरी में डाल कर पीना पसंद करते हैं. नौसेना में काम करने वाला आदमी घर आते ही सारे कायदे भूल जाता है या फिर उसके अवचेतन में बैठे पीढ़ियों के संस्कारों से मिले कायदे लौट कर आ जाते हैं. ये तय करना मुश्किल है. माँ अपने कप को घुटने के पास रखे हुए एक तार सीती और एक घूँट भरती जाती. खिड़कियों का रंग कहीं से उतरने लगा है. सात आठ साल हो गए हैं इस घर को बनाये.
एक धोती और पूंठिये में जीवन बिता देने वाले बाबा साल भर में कभी न कभी कह दिया करते कि बेटा तेरा बाप तो हर महीने सरकारी तीन हज़ार रुपये पाता है. उससे कहो अपने साथ ले जाये तुम्हें. यहाँ साल भर खाने लायक दाने भी नहीं होते हैं. बरसात भी कम ही होती थी लेकिन असल बात थी कि छोटे चाचा के पास काम धंधा नहीं था. उससे भी असल बात थी कि चाची और माँ की बनती नहीं थी. पंद्रह साल तक इन बातों को अनसुनी करते जब जगदीश प्रसाद थक गए तो उन्होंने शहर में घर बनाना शुरू किया. आदमी जब घर बनाता है तो खुद बिखरता जाता है. कहते हैं कि ये भौतिकी का नियम है कि कुछ भी क्षय नहीं होता रूपांतरित हो जाया करता है. इसी नियम से जगदीश प्रसाद एक नौजवान से घर में तब्दील हो गए. तीन कमरे, रसोई और शौच-स्नान के स्थान बन गए. एक कमरे को छोड़ कर बाकी के दरवाजे पूरे नहीं बन पाए. अगली छुट्टी आने तक सात आठ महीने चौखटें ही दरवाजों का आभास देती रही. पिछले तरफ बने कमरे की अधूरी खिड़की से रोहित का घर दिखता था.
गरमी की एक दोपहर रोहित इन अधूरी खिड़कियों को देखते हुए कहता था. "देखो ये खिड़कियाँ कितनी अच्छी लगती है ? हमेशा खुली रहती हैं " वह रोष प्रकट करती "तुम मेरे पिताजी का मजाक बनाते हो..."
"ऐसा मत सोचो, देखो खिड़कियाँ बिना शर्त के रिश्तों जैसी लग रही हैं. इनमे आने जाने वालों को खुद ही नियम बनाने होंगे. ये खुद किसी को नहीं रोकेगी." रोहित ये कहता हुआ अपने घर की दसियों खिड़कियों को देखने लगा.
वह पूछती "क्या तुम्हारे घर की सब खिड़कियाँ बंद कर लें तो दिन में भी अँधेरा हो जाता है.?" "क्यों ?" रोहित ने पूछा. उसने हल्की निगाह से देखा और रोहित को कहा "मुझे अँधेरा पसंद है. अँधेरा मुझे आराम देता है. अँधेरे में मेरे डर गायब हो जाते हैं. उजाला सब चीजों को अलग करता है और सब दूर होते जाते हैं. जब मैं कमरे में बंद होती हूँ तब सब चीजों के भेद मिट जाते हैं." यह कह कर वह उठी और अंदर चली गई. एक ग्लास में पानी लेकर आई. रोहित खिड़की के पार सूनी गली को देख रहा था.
"बहुत मुश्किल होगी."
"कैसी मुश्किल ?"
"मुझे अँधेरा पसंद नहीं है, मैं उजाले में लम्बी यात्राएं करना चाहता हूँ."
"मुझे चलना पसंद नहीं, मैं एक जगह ठहर जाना चाहती हूँ ..."
"मुझे लगता है कि तुम डरी हुई हो इसलिए अपने आस पास की चीजों से बाहर नहीं निकलना चाहती."
"तुम जो दूर दूर भाग जाने की ख्वाहिशें रखते हो वास्तव में ये है डर."
"हम इस पर बहस क्यों कर रहे हैं ?"
"पता नहीं परन्तु कुछ ऐसा तो है जो हमारे बीच कॉमन है."
रोहित ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया. थोड़ा और पास सरक आया. मौसम भी स्पर्श के अहसास से बदल गया. वह उठी और कोने की तरफ सरक गई. यात्री को चलने की होड़ थी वह उसके और पास हो गया. वह और दूर खिड़की से आती रोशनी से दूर होने लगी. कमरे के सबसे कम रोशन कोने में पहुंचते ही दीवार ने थाम लिया. उसने अपनी हथेलियाँ दीवार पर रखी, लगा कि दीवार उसे अपने अंदर भर लेना चाह रही है. इसी ख़ुशी भरे विचार से वह पुलकित हो उठी. रोहित की गरम साँसें और दीवार की हल्की तपन की छुअन आपस में घुल गई. सब कुछ घुल मिल गया. हवा और पानी, धूप और छाया, तूं और मैं कुछ भी नहीं बचा. वह दीवार और रोहित के बीच का घना अँधेरा हो गई, रोहित रोशनी बन गया.
मामा का घर पचास किलोमीटर दूर है. माँ दो एक महीने में जाया करती है. सुबह जाना और शाम को लौट आना जैसे उनकी आदत बन गई थी. रोहित और उसके बीच सर्वाधिक बातें उसी दिन होती थी. वह पिछली गली से ही आता. बिना दरवाजे के चौखट के आगे रखे लकड़ी के पट्टे को फांदता और उसके पास चारपाई पर आकर बैठ जाता. वह उस दिन खिड़की पर बोरिया टांग कर रखती. खुला सा रहने वाला कमरा पेड़ की घनी छाँव में बदल जाता. वे दोनों आँगन पर बैठे रहते. रोहित उसे छेड़ना चाहता रहता और वह पालथी मार कर बैठती फिर उसका सर अपनी गोद में रख लेती. रोहित कहता तुम्हारे कर्ली हेयर्स मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. उनमे अपनी अंगुलियाँ घुमाते हुए इस तरह का प्रदर्शन करता जैसे कोई ब्यूटीशियन अपने काम में निपुणता से व्यस्त हो. वह उसके हाथों को रोक कर मरोड़ देती तो दोनों के चेहरे करीब आ जाते. वह तुरंत छिटक कर दूर हो जाती. ऐसे ही दौड़ भाग भरे मिलन के क्षणों में रोहित ने उसे अपने करीब किया और कानों में कहने लगा.
मैं जब दस साल का था तब हमारे पड़ौस से एक अल्पबुद्धि किशोरवय बालक एक दिन गायब हो गया. उसकी माँ के रोने की आवाज़ अपने घर की छत से सुनाई देती थी और मैं डर कर वहीं बैठ जाया करता था. ऐसा लगता था कि मैं खो गया हूँ और मेरी माँ रो रही है. उसके जाने ने पूरे मोहल्ले को उदास कर दिया था. औरतें उसकी माँ से कुछ दिनों तक नियमित मिलने आती रही और फिर ये क्रम धीरे धीरे कम हो गया. लोग कहते थे कि इस तहर किसी के चले जाने से बेहतर है कि उसकी बुरी ख़बर सुन ली जाये. सिर्फ चार गलियों में जहाँ वह खेला करता था सूनापन झाँका करता था. कई दिनों तक हर कोई डरता रहता. कुछ लोग सोये सोये ही अपने खो जाने के डर में समा जाते और रात बिरात चौंक कर उठ बैठते. सुनों ऐसे ही कभी मैं भी खो गया तो ...? उस अट्ठारह साल की लड़की ने एक खीच कर चांटा लगाया. रोहित विस्मय भरी आँखों से देखने लगा. उसका गुस्सा क्षण भर में ही रोने में बदल गया. रोहित चुप सा बैठा रहा. वह कोने में हिचकियाँ भरती रही. एक चुप्पी के बाद उठ कर रोहित ने उसकी बाँह पर हाथ रखा तो वह उठ खड़ी हुई और रोते हुए उससे चिपक गई. सिसकियों में जो शब्द थे वे रोहित को जान से मार देने की धमकियों भरे थे अगर फिर से उसने इस तरह खो जाने की बात की तो.
एक दिन रोहित सच में चला गया. कॉलेज जाने को निकला था लौट कर ना आ सका. उस दिन से अँधेरा और गहरा गया. घर में दरवाजे तब तक लग चुके थे. एक से दूसरे कमरे में किसी का जाना होता तो दरवाजा बजता जैसे कोई ठहरे हुए कुंए में रहट उतारता हो. ये गहरे विरह गीत के आगाज़ से पहले के सुर से मिलता जुलता स्वर जान पड़ता था. उसने जरूर दरवाजों को लिपट लिपट कर अपनी व्यथा सुनाई होगी. डूबे हुए मन से उसने कितनी ही बार बंद खिड़कियों को खोला लेकिन उन खुली खिड़कियों की तारीफ करने रोहित नहीं आया. ये कैसा जाना था कि कोई लौटने की उम्मीद भी न थी. अब वह कहीं दिखती नहीं थी. एक दस फीट की गली जो बीस घरों के बीच एक सीधी रेखा जैसी दिखाई देती थी, जिस पर ऊँचे मकानों की छाया पसरी रहती थी. उसमें से रोहित आया करता था.उसने उस गली को देखना भी छोड़ दिया. दो साल में सिर्फ तीन या चार बार वह उस गली से निकली थी. सफ़ेद सलवार पर अज़रक प्रिंट का कुरता पहनती थी जिसके सफ़ेद बेल - बूटे उम्र दराज हो चुके थे.
उसे दरवाजे की आवाज़ सुनाई दी, वही गहरा राग. ख़यालों से बाहर आई तो देखा पिताजी सामने वाले कमरे के दरवाजे पर खड़े कुछ सोच रहे थे और रात का रंग स्याह होता जा रहा था. रसोई में बत्ती जल चुकी थी. वह उठ कर रसोई की ओर चल दी बीच में खड़े जगदीश प्रसाद ने पास से जाती हुई बेटी के सिर पर हाथ फेरा. माँ को सुनाने लगे "गुड़िया ससुराल गई तो घर खाली सा हो गया था. मुकेश पढ़ने कोटा चला गया है और ये भी कल अपने घर चली जाएगी तो कितना सूना होगा... " बात कहते हुए वे आँगन के बीच बने टाँके के पास रखे स्टूल पर बैठ गए. उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की. माँ ने मुड़ कर एक बार जगदीश प्रसाद को देखा और आधे मन की हंसी के साथ तवे पर रोटी पलटने लगी. वह खड़ी रही जैसे माँ से अभी कुछ कहना चाहती हो. माँ ने उसकी नज़रों को अनसुना कर दिया. एक थाली में दो रोटियां, कटोरी में सब्जी और अचार रख कर उसे पकड़ा दिया. घर में फिर से चुप्पी हो गई. पिताजी के हाथ धोने की आवाज़, थाली को आँगन पर रखे जाने की आवाज़ और रसोई में लंगड़े चकले की खट खट बजने लगी.
माँ अपने कमरे में सोने चली गई. पिताजी घर के आगे खड़े होकर सिगरेट पीने लगे. आज उनको दूर दूर तक इंसानी वजूद दिख रहा था. समंदर की लहरों के थपेड़ों से बहुत अलग एक सजीव दुनिया का दृश्य. उन्हें इस तरह खड़ा देख कर वह अपने कमरे में चली आई और उसे अंदर से बंद कर लिया. अल्ताफ को फोन लगाया. "तुम मुझसे प्रेम करते हो ?" उधर से एक मादक आवाज़ उसे हर तरह से आश्वस्त करती रही. प्रेम जैसे विषय के लफ्फाजी भरे रेग्युलर संवाद सुन कर थोड़ा शांत हुई. उसने एक लम्बी सांस ली और चुप हो गई. हेलो हेलो दो तीन बार बोलने के बाद अल्ताफ ने कहा "स्वीट गर्ल, क्या हुक्म है ?" वह अँधेरे का साथ पाकर अब तक बहुत कांफीडेंट हो चुकी थी. "मुझे तुमसे मिलना है... अभी और ठीक अभी" अल्ताफ उससे कई बार मिल चुका था. आज उसे पता था कि पिताजी आये हैं तो चौंक उठा "पागल, आज क्यों... आज तो पापा आये हुए हैं?" ...अगर तुम आना चाहते हो तो दरवाजा खुला है, मेरे रूम वाली गली से आ जाना नहीं तो कभी मत आना... " कहते हुए उसने फोन रख दिया. रखा भी तो स्विच ऑफ़ कर के.
ये कैसा अँधेरा, सब कुछ प्रिय, अति प्रिय
अल्ताफ के कानों में कहती है, मुझे यहाँ से ले चलो. पिताजी ने रिश्ता तय कर दिया है. मैं किसी अनजाने के साथ नहीं जाउंगी. तुम मुझे चाहते हो ना... ले चलो यहाँ से. अल्ताफ का व्यवहार कुछ ही देर में उसे केंचुए जैसा लगने लगा. एकदम लिजलिजा. वह उसे चूमते हुए कहता "हम कहाँ जाएंगे कुछ महीने दूर रहने के बाद वापस यही आना पड़ेगा. लोग हमारे दुश्मन हो जाएंगे. फिर भी ठीक है तुम्हारे लिए मैं अपना बिजनेस बदल भी लूं तो वक़्त तो लगेगा." उसने चूमना चाहा तो रोक दिया गया. वह उठ बैठी. "मैं जानना चाहती हूँ कि तुम मुझसे शादी कर रहे हो या नहीं ?" अल्ताफ समझाने लगा "आहिस्ता बोलो. हम तुम्हारे घर में हैं ये कोई फिटिंग रूम नहीं है." उसको कंधे से पकड़ कर बिठाया "मैं बहुत प्यार करता हूँ तुमसे लेकिन ये आसान नहीं है कि ऐसे अभी हम कोई फैसला कर लें , साल भर रुक जाओ... " ऐसे ही बातें करते हुए अल्ताफ ने अपने हाथ को कुछ और आगे बढ़ाया तो उसने झिड़क दिया. थोड़ी देर में उसने फिर से कहा "अल्ताफ, मुझे आज की रात और तुम्हारे जाने से पहले जवाब चाहिए. तुम ही तो कहते थे कि मेरा नसीब जाग उठा है. आज वही नसीब कहता है उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले जाओ." उसका स्वर उदास था वाक्य मिन्नतों से भरे. अल्ताफ मुकर गया उसने एक साल से पहले कुछ न होने की मजबूरी को बीच में रख दिया तो कमरे की आवाज़ें थोड़ी तेज हो गई.
अंदर के दरवाजे पर दस्तक हुई. पिताजी ने आवाज़ लगाई. वे शायद जाग ही रहे थे या उनकी बातचीत कमरे से बाहर तक पहुँच रही होगी. उसने दरवाजा खोला. पिताजी अंदर आये और आते ही एक ही थप्पड़ से उसे ढेर कर दिया. अल्ताफ अँधेरे में जा चुका था पास खड़ी माँ बोली मैंने कहा था न कि बच्चे मेरी मानते ही नहीं... जगदीश प्रसाद उलटे घूमे और एक थप्पड़ माँ के भी रख दी. आँगन में सुबह चार बजे तक जगदीश प्रसाद सर झुकाए सिगरेट पीते रहे. दो आमने सामने के कमरों में माँ बेटी अकेली बैठी हुई जागती रही. उम्मीदों का चाँद बुझ गया था. भोर की पहली किरण फूटने को थी. वे सोच रहे थे कि आज की दोपहर कितनी सख्त होगी ?
बात अभी बाकी है...
26 comments:
U described ugly truths of life, very beautifully....
no word to say...just amazing!
आदमी जब घर बनाता है तो खुद बिखरता जाता है. कहते हैं कि ये भौतिकी का नियम है कि कुछ भी क्षय नहीं होता रूपांतरित हो जाया करता है
"ऐसा मत सोचो, देखो खिड़कियाँ बिना शर्त के रिश्तों जैसी लग रही हैं. इनमे आने जाने वालों को खुद ही नियम बनाने होंगे. ये खुद किसी को नहीं रोकेगी."
bahut khoob ,aesi kitni hi baate man ko chhooti hui gujarati gayi ,aaj bahut dino baad itminaan ke saath aapki kahani padhi ,abhi 11 din ke baad nagpur w pune se lauti hoon aur blog kholte hi aapki nai rachna dekh sidhe aa gayi .
padhkar man prasnn ho gaya ,adbhut hai aapki lekhni .
"ऐसा मत सोचो, देखो खिड़कियाँ बिना शर्त के रिश्तों जैसी लग रही हैं. इनमे आने जाने वालों को खुद ही नियम बनाने होंगे. ये खुद किसी को नहीं रोकेगी."
"खामोश कि
दीवारों के भी कान होते हैं
दरवाजे मेहमान होते हैं
खिड़कियाँ तो यूँ ही बदनाम होती हैं
मुखबिर तो रौशनदान होते हैं"
हम सम्बंधों को नियमों में जीने वाले समाज के हिस्से हैं तो हमसे अपेक्षा भी यही रखी जाती है किन्तु मोनाली सत्य तो यही है कि कमजोर क्षणों या असामान्य स्थितियों में हम ऐसे रिश्ते बनाते हैं जो उचित नहीं होते.
पारुल, आप पढ़ते रहिये... मुझे इससे हौसला मिलता है कि कोई भाव विभोर होकर पढ़ रहा है.
नागपुर और पुणे के सफ़र में जरूर कुछ नए अनुभव दर्ज हुए होंगे, ज्योति जी मैं भी सोचता हूँ कि सफ़र पर निकलूं मगर मेरा मन भी इस नायिका सा ही है कि कहीं चुप बैठो. देखो अँधेरे को घिरते हुए, छोड़ दो वक़्त की असंवेदन कलाई...
रचना जी आपने जो पंक्तियाँ लिखी वे कितनी सुंदर है जैसे सारी कहानी को चंद शब्दों में समेट दिया है. आभार.
स्तब्ध हूँ ...
रिश्तों के अँधेरे उजालों को कितनी खूबसूरती से बयान करते हैं आप ...हद है ...!
"आज फिर वे आठ महीने बाद घर आये है. चाय के घूँट नहीं भरते, उसे कटोरी में डाल कर पीना पसंद करते हैं."
यों बहुत साधारण बात है, लेकिन किस्सागोई इन साधारण बातों को करीने से रखने की ही अदा है शायद....आसान नहीं होता वो लिखना जिसमे चाय सुड़कते एक व्यक्ति सामने दिखे, चारपाई पर बैठा, मानो कई दिन बाद चाय पी हो.... यों चाय पी तो रोज ही जाती है.
"आदमी जब घर बनाता है तो खुद बिखरता जाता है."
कितना बड़ा सच है, सच में घर में इनत-गारे के साथ इंसानी रेशे भी बुनते जाते हैं..टूटते-निकलते.
"रोहित रोशनी बन गया"
इसपर मौन के सिवा कुछ नहीं दे सकता.... टिप्पणी का बक्सा खाली रखना अभी संभव नहीं बनाया गूगल वालों ने..आप मौन में जो चाहें भर लें..
"माँ ने उसकी नज़रों को अनसुना कर दिया."
फिर से मौन...
"वे सोच रहे थे कि आज की दोपहर कितनी सख्त होगी ?"
लो... कहाँ ला कर रोक दिया आपने..
खैर अच्छा है, आपके कथ्य-शिल्प का इन्तजार करना अच्छा है.
Sirf Ehsaas Hai YE Rooh Se Mehsoos Karo......Pyaar Ko Pyaar Hi Rehne Do......Koi Naam Naa Do......
accha laga padhkar
एक रोचक मोड पर कहानी को लाकर रोकना तो पढने वालों जुल्म है………………धाराप्रवाह चल रही है और बाँध कर रखा हुआ है कहानी ने।
एक ही प्रार्थना.लेखक की ये समाधिस्थ सी मुद्रा जल्द भंग न हो.
एक पल को यूँ लगा कि कहानी की नायिका बहुत पहले से मुझ से मिलती रही हो .....कहाँ ये याद नहीं ....लेकिन शायद
Hi Kishore :)
It has been so long, good to see you still active. I did not read the post. Will read it in peace and quiet. Just messaged you to say hello :) Hope all is well your side!
Take Care
खिड़कियाँ बिना शर्त के रिश्तों जैसी लग रही हैं......... खूब परिभाषित किया है रिश्तों को. पूरी कहानी देह के रिश्तों पर उलझी, और फिर दिल के रिश्तों पर सुलझती दिखाई दी...
सब किरदारों के साथ कहानीकार ने न्याय किया है तभी वो इतने ज़िंदा और वास्तविक लगते हैं और दराजों में पड़ी अल्बम, गली- मोहल्ले से निकल कर .. आँखों के सामने खड़े हो जाते हैं.... कई पंक्तियाँ हैं दिल पर कदमो के निशा छोड़ती... the one liner at its best!!!
the
कभी अपने आस पास की चीजों को फिर से देखता हूँ तो पाता हूँ कि वे मेरे डैली ओबजर्वेशन में दर्ज नहीं होती है और फिर उनके बिना कुछ कमी सी भी लगती है. ऐसे ही तेरी मेरी उसकी बात करूं तो इनका होना जरूरी समझता हूँ. कहानी के बहुत सारे तत्वों में ये भौतिक वस्तुएं और उनके प्रति हमारे आग्रह और अनुभव कई बार ज़बरदस्त तरीके से बातों को प्रभावी बना देते हैं. मित्रों आप सबका आभार व्यक्त करता हूँ. जिस गति से कहानी लिख पा रहा हूँ उससे तीव्र आप तक पहुँचाने की इच्छा मन में बसी हुई है.
मैं जब दस साल का था तब हमारे पड़ौस से एक अल्पबुद्धि किशोरवय बालक एक दिन गायब हो गया. उसकी माँ के रोने की आवाज़ अपने घर की छत से सुनाई देती थी और मैं डर कर वहीं बैठ जाया करता था. ऐसा लगता था कि मैं खो गया हूँ और मेरी माँ रो रही है.....filhaal aapke is observation ko darz kar rahi hoon.likhne ki raftaar bani rahe aur viraam itne lambe na ho.
इन लम्बे विरामों से बचने की पूरी कोशिश है किन्तु वर्षा जी कहानी लिखने की प्रक्रिया जारी है. आपने पसंद किया, बहुत आभार.
सच कहूँ तो इस पूरी कहानी में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा अपील किया ...वो वही बात है जो वर्षा ने कहा ....उस अल्प बुद्दि किशोर वय बालक की बात .....जाने क्यों अस्पताल में घूमता एक लड़का याद आ गया जिसे न जाने कौन छोड़ गया था .....हम तो पास होकर निकल आये पर वो आज भी वही है.....स्ट्रेचर खीचता
सच कहते हैं डॉ. अनुराग, जीवन के खरे अनुभव कभी धुंधले नहीं होते, कठिन से कठिन हालातों में भी कुछ हादसे दिल को छू जाने वाले होते हैं वे कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ते.
कहानी अपने प्रवाह में पाठकों को बहा ले चली है ! कथा-विस्तार के साथ पात्र स्वयं स्वरूप धारण कर रहे हैं...अति सुन्दर ! आप समाधि में बने रहें और यह प्रवाहमयी कथा-यात्रा चलती रहे... पाठक उत्सुक-अधीरता से पढ़ने को व्याकुल रहेंगे; आप आश्वस्त रहें !
अज्ञेयजी वाले संस्मरण में आपने अवश्य मेरी छोटी बहन के बारे में पढ़ा होगा ! वह अविकसित मस्तिष्क की कन्या थी और महीने में एक बार ज़रूर खो जाती थी, जिसे हम सभी भाई-बहन पूरे मोहल्ले ढूंढ़ते फिरते थे... आपकी कहानी के इस प्रसंग ने विकलता से भरे उन दिनों की याद दिला दी. ये बात और है की मेरी विदुषी माता रोती नहीं थीं !...
खुली खिड़कियाँ और उलझते-सुलझते रिश्तों का विवरण आपकी मौलिक चिन्तना से पाठकों को आश्चर्यचकित करता है...
दो थप्पड़ों की गूँज के साथ कथा ने जहां अल्प विराम लिया है, वह अधीरता बढ़ानेवाला है. अगली कड़ी मेरे लिए तो उपलब्ध है, लेकिन जिन्होंने उसकी प्रतीक्षा की होगी, उनकी उत्कंठा वे ही जानते होंगे !...
सप्रीत-आ.
तल्लीनता से पढ रहा हूँ और सब्र से इंतज़ार कर रहा हूँ। टिप्पणी करना चाहता भी हूँ तो यह सोचकर रुक जाता हूँ कि कहीँ उससे किशोर के लेखन में खलल न पडे।
खिड़कियों का रंग कहीं से उतरने लगते है पर आदतें रंगों की तरह नहीं छूट पाती (चाहे कप की बजाय प्लेट में चाय पीना ही क्यूँ न हो) खिड़कियाँ भले अधूरी हो मगर नज़र सब आता है.मुझे अँधेरा पसंद है. अँधेरा मुझे आराम देता है. अँधेरे में मेरे डर गायब हो जाते हैं. उजाला सब चीजों को अलग करता है और सब दूर होते जाते हैं. जब मैं कमरे में बंद होती हूँ तब सब चीजों के भेद मिट जाते हैं." हम अंधेरों से भी इसलिए डरते हैं....
...क्यूंकि,
अँधेरे भी दिखते है.
भले उम्मीद का चाँद बुझ गया मगर भोर अभी बाकी है क्यूंकि बात अभी बाकी है...
इस किश्त की पहली पंक्ति ने एकदम से विल्स क्लासिक की एक डंडी सुलगवा दी और अब जब मैं ये टिप्पणी लिख रहा हूं, वो डंडी अपने आखिरी कश के लिये बेताब है। खैर...
दूसरी किश्त में बड़े प्रभावकारी ढ़ंग से लेखक ने हर करेक्टर को खोला अपनी स्वभाविक गति से। कुछ भी आर्टिफिशियल नहीं लगा...हाँ, कहीं-कहीं शिल्प टूटता जरूर नजर आया लेकिन सतर्क लेखनी ने उसे फिर से पकड़ लिया। जगदीश प्रसाद का एक नौजवान से घर में तब्दील हो जाने वाला जुमला जमाने के एक कड़वे सच को कितनी आसानी से कह गया...
रोहित के गुजरने के बाद का खालिपन और सन्नाटा, वो वाला पैरा इतनी खूबसूरती से बयान करता है कि उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़...
...और हमारी क्लासिक की डंडी भी खत्म हुई। कैसा संयोग है।
बिखराव का कारण मूलतः उद्वेग रहे. कहानी का खाका साफ़ सुथरा था. मैं दूसरा भाग लिखते हुए इस उलझन में था कि कहानी की लम्बाई क्या हो फिर एक गलत तरह की आश्वस्ति भी मेरे साथ बनी रही कि ये फर्स्ट ड्राफ्ट है इसलिए इसमें छूट का हक़ है.
रोहित का चला जाना... वह खालीपन मेरे ऊपर किसी खाली की तरह नहीं वरन भरे हुए की तरह बना रहा.. एक दम ठोस यादें, यादें कि आपकी जुबां को तालों में रख दे, आपके आंसुओं को बेमानी कर दें कि रोने से भी कुछ नहीं होगा, कड़ी यादें...
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