Saturday, May 29, 2010

पक्की जमानत




कौशल बाबू कम बोलते हैं मगर पक्की बात करते है. हम रोज शाम को टेनिस कोर्ट में मिलते हैं. अब उम्र इतनी हो चुकी है कि मैच की जगह गेम से ही हार जीत तय कर लेते हैं और कोर्ट के सामने करीने से रखी हुई कुर्सियों का क्रम बिगाड़ कर अपनी पंचायत आरम्भ कर लिया करते हैं. बाल बॉय से पहले फलों का रस मंगवाते और फिर आदतन चाय और कॉफ़ी हमारे सामने की टेबल पर रखी होती है. जिला स्तर के अर्ध सरकारी आयोजन इसी क्लब में हुआ करते हैं. उस रोज भी एक जन्मदिन पार्टी थी और हम बूढ़े, घर का चक्कर लगाने से बचाने के लिए वहीं रुके हुए थे. गुप्ता ने सुंदर कांड की बात छेड़ दी तो कौशल बाबू बोले कि गवैया वही था जिसकी बीवी उसको छोड़ कर किसी और के साथ भाग गयी थी.

गुप्ता को इसमें कुछ बुरा लगा तो उसने तुरंत कहा कि ये तो बीवियां ही जानती है कि उन्हें रहना है या भागना है. इसमें आदमी को क्या दोष देना ? स्त्री और पुरुष के रिश्ते पर हर आदमी की अपनी राय होती है तो वीरानी साहब को चुप रहना जायज नहीं लगा. उनका मानना था कि आदमी फ्लर्ट होता है और स्त्रियों को अपने इसी हुनर से बिगाड़ दिया करता है. जबकि स्त्री जन्मजात दब्बू हुआ करती है.
कौशल बाबू बोले कि ये आपने कैसे तय कर लिया ? बीच में गुप्ता जी ने अपने तर्क रखे कि औरतों को प्रकृति ने कोमल और पुरुष की छाया स्वरूप ही बनाया है और उनको ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए. कौशल बाबू ने फिर वीरानी जी से ही सवाल किया कि बताओ किस तरह स्त्रियाँ दब्बू हुआ करती है ?

वीरानी को लगा कि कौशल बाबू जानबूझ कर उनकी बात को गिराना चाहते हैं. उन्होंने भी थोड़ा आवेश में आते हुए कह दिया आप बताओ कैसे दब्बू नहीं होती ?

कौशल बाबू बोले कि पीथल हॉउस का नाम सुना है ? हम सबके लिए या सारे क़स्बे के लिए ये एक परिचित नाम था. वह हवेली जैसा घर कई सालों से सूना पड़ा हुआ है. वहां शराबी और जुआरी अपना अड्डा जमाये रहते हैं. हमने कहा, हाँ सुना है. कौशल बाबू ने बताया कि पीथल हॉउस का मालिक था ठेकेदार वीरेंदर. उसका उत्थान बड़ी तेज गति से हुआ था. पहले वह खलासी था फिर मुनीम और फिर कुछ ही सालों में बड़ा ठेकेदार बन गया. उसके यहाँ मजदूर रहते थे. उनमे एक बिहार का जोड़ा था रामखेर और उसकी घरवाली बजरिया. इतना कह कर आगे उन्होंने पूरी कहानी सुनाई जिसे हमने बिना किसी रूकावट और प्रश्न के सुना.

हवेली के पिछवाड़े में बने टीन के छत वाले एक कमरे के घर में कभी ज्यादा ख़ुशी होती तो आलू की जगह पकौड़े तले जाते और कभी रामखेर शाम को घर लौटते ही अपनी बजरिया के हाथ पकड़ कर बोलता आज इन सुंदर हाथों को सिर्फ आराम करना है और अपनी सायकिल से पोलिथीन की थैली में बाँध कर लाया हुआ गरम खाना बजरिया के हाथों में रख देता. वह सोचती कितना प्यार करता है, भाग की बात है. वे बहुत खुश थे, जवानी के दिनों में यूं भी नई शादी के बाद के दिन अवर्णनीय हुआ करते हैं. घर से बहुत दूर थे पर एक दूसरे में दोनों की दुनिया सिमटी हुई थी.

एक रात को खाना खाने के बाद बजरिया ने बरतन धोने शुरू किये ही थे कि जीप के रुकने की आवाज़ आई. पदचाप घनी होती हुई ठेकेदार साहब के बंगले की तरफ बढती ही गयी. नयी बात नहीं, गाड़ी - मशीनों का आना जाना लगा ही रहता है. उसने एक नज़र रामखेर पर डाली. वह अपनी हथेली में तम्बाकू मसलता हुआ उसे ही देख रहा था. उसी तरफ देखेते हुए बजरिया ने सधे हाथ तीसरा बर्तन उठाया तो कमरे की सांकल खड़कने लगी. अपनी चौकड़ीदार लुंगी को कसते हुए रामखेर ने दरवाजा खोला. बाहर गाड़ी से उतरे मुस्टंडों ने बजरिया की आँखों के आगे रामखेर को किसी मुर्गे की तरह उल्टा टांग कर जीप में डाला और अपने साथ ले गए. वह चीखती हुई गाड़ी के पीछे भागी पर सब बेमतलब रहा. बदहवास बजरिया को कुछ सूझा ही नहीं फिर याद आया तो नंगे पांव ठेकेदार की हवेली की तरफ भागी.

हवेली का दरवाजा बजरिया के कद से चार गुणा ऊँचा था, बीच में आने जाने के लिए एक छोटा सा खिड़की जैसा फाटक बना था. वह सर झुका कर हवेली के भीतर चली गयी. खेल के मैदान से भी बड़े आँगन के ठीक बीच में ठेकेदार चारपाई पर अधलेटा था. सामने दो तीन लोग मुड्डों पर जमे थे. बजरिया ने ठेकेदार के पांवों को पकड़ लिया और अपनी फटी आँखों से देखते हुए मुंह से कुछ कहने की हिम्मत जुटाने लगी. उसका भयाक्रांत चेहरा दयनीय था और किसी संभावित असहनीय मुसीबत की सोच में वह कुछ बोल नहीं पा रही थी. ठेकेदार ने अपने पांव से उसे दूर करते हुए ठीक से बैठने का कहा और पूछा "क्या बात हुई ?"
रामखेर को लोग उठा ले गए
कौन थे ?
पता नहीं
कब ले गए ?
अभी
सिसकियों के बीच ऐसे सवालों का उत्तर देते हुए बजरिया बार - बार कहती रही, साहब कुछ करो, पता नहीं कौन लोग थे और क्यों ले गए हैं ? ठेकेदार ने अपने पास स्टूल पर रखा हुआ फोन उठाया और नजदीक के थाने के इंचार्ज को वाकया कह सुनाया. इस बातचीत के हर शब्द पर बजरिया के चेहरे पर आस जागती किन्तु हर पल कोई आशंका उसे मिटा देती. कोई तीन चार मिनट की बातचीत के अंत में ठेकेदार ने फोन पर कहा जरा अपना समझ कर पता लगवाईये, हमारे यहीं काम करता है और हवेली के पिछवाड़े में बने मजदूर कमरों में ही रहता है.

बजरिया को ठेकेदार ने हिम्मत बंधाते हुए कहा कि ऐसे कोई जंगल राज थोड़े ही है कि कोई किसी को उठा ले जायंगे. मैंने थाना में सूचना दी है. वे अभी गाड़ी - गाड़ी जांच कर पता लगा लेंगे कि कौन लोग थे. तुम चिंता मत करो घर जाओ, हम कोशिश करते हैं. बजरिया भारी पैरों से हवेली का दरवाजा लांघ कर सोचती चली जा रही थी कि अब किसको सुनाये अपनी व्यथा ? इस परदेस में यही एक मालिक जान पहचान के हैं. उसे याद आया कि जब केबल बिछाने के काम के समय वे यहाँ आये थे कितना अच्छा था. दिन भर परिवार के पंद्रह लोग एक साथ काम करते और रात को एक थकी हुई मीठी नींद सो जाया करते थे. किसी बात का डर नहीं था और जब रामखेर ने यहीं ठेकेदार के पास रुक कर काम करने की बात की तो बड़े भैया बिगड़ पड़े थे. किस के भरोसे यहाँ रहोगे ? सच आज वह दिन आ ही गया, कोई है नहीं जिस पर भरोसा बने. संकट में किसके कांधे पर अपना सर रख कर दो आंसू बहा लूं. कमरे के आगे पहुँचते ही उसकी रुकी हुई हिचकी फूट पड़ी. ओ माँ मैं क्या करूं.... वह सोचती रही क्या गुनाह किया था और कौन लोग थे ? जो मेरे आदमी को यूं रात के अँधेरे में उठा कर ले गए. उसके साथ जाने क्या करेंगे. इसी सोच में उलझी हुई रात सिसकियों से भीग कर भारी होती गयी.

एक और रात बीत गयी. दिन में दो बार ठेकेदार के यहाँ चक्कर लगा आई. उससे कहा गाँव में किसी से बात कर दो तो ठेकेदार ने समझाया कि ये सब सुन कर उनको और तकलीफ होगी. कौन तुम्हारा बाबा - चाचा कोई नेता - अफसर है जो हुकुम चला कर पता लगवा लेगा. हम कोशिश कर रहे हैं. वह हार कर लौट आई. पानी के दो घूँट भरे हों तो याद नहीं पर उस घड़ी के बाद से बर्तन झूठे ही पड़े हैं. दो ही दिन में फफूंद लग आई है. मिट्टी के तेल की गंध जो हर सुबह शाम कमरे में घुल जाया करती थी, अब कही नहीं थी. खूँटी पर टंगे हुए रामखेर के कुरते को देख कर और हिया तड़प उठता. अपने आंसुओं से उस कुरते की बाँहें भिगोती हुई वह जाने कैसी मूर्छा में खो जाती कि डर के मारे टीन की छत नीले धब्बों में बदल जाती . दरवाजे के पार से कोई उसे आवाज़ देता, बजरिया अरी ओ बजरिया... फिर से आवाज़ सुनाई दी तो हिम्मत कर के अपने पावों पर खड़ी हुई दरवाजा खोल दिया. उसके शरीर में जान नहीं थी लगा कि वह अभी गिर जाएगी. सामने मुनीम खड़ा था. सुना कि ठेकेदार बुलावा रहे हैं, रामखेर का पता चल गया. एक बिजली सी उसके बदन में जागी और वह हवेली की तरफ दौड़ पड़ी. इस शुभ समाचार के लिए उसने देवताओं को माना कि तुम्हारे होने से ही ये दुनिया और दीन बचे हुए हैं.

मुनीम दरवाजा बंद करके चला गया.
हवेली में आज बड़ा सन्नाटा था. बैत के सोफे खाली पड़े थे और कोठरियों की रोशनियाँ बुझ चुकी थी. एक ठेकेदार का ही चेहरा चाँद की रौशनी से चमक रहा था. उसने बजरिया को बैठने का कहा. उसने खड़े खड़े ही जल्दी में पूछा "सरकार, सही सलामती की ख़बर है ना ..." ठेकेदार ने कहा ख़बर का क्या करेंगे, हमें तो रामखेर मिले से मतलब है. अभी थानेदार का फोन आया. उसने बताया कि कोई तार चोरों का गेंग है. वही ले गया है रामखेर को उठा कर. अब उन तक पहुँचने के लिए पुलिस के पास भाड़ा - टका नहीं है. सरकार से मंजूरी मिलेगी तब जायंगे, उनको खोज कर लाने के लिए. यह सुन कर बजरिया को जिस बिजली के पंख लगे थे, वे झड गए. ठेकेदार ने कहा मामला गंभीर है जरा नीचे बैठ जाओ, विचारते हैं कि क्या किया जाये ?
हुक्के को मुंह में लगा कर एक बड़ी राहत की सांस लेकर ठेकेदार ने कहा "उन्होंने बताया है कि अगर हमारे आने जाने का बंदोबस्त कर दो तो हम रामखेर को ले आयेंगे, करीब दस हज़ार रुपये में गाड़ी हो जाएगी." बजरिया ने अपने पांव में पहने हुए चांदी के कड़ों की ओर देखा फिर हाथ से कान को टटोला और फिर रो पड़ी. उसके आंसुओं के आँगन में गिरने की आवाज़ नहीं थी मगर ठेकेदार ने जान लिया कि अकेली जान पर क्या बीत रही है. "रोओ नहीं, मुसीबत है तो समय आने पर टल भी जाएगी. सरकार आदमी के लिए है ना, जरूर उसकी रक्षा करेगी."
"आप कुछ दया कर दो" डूबी हुई सिसकियों को चीर कर ये शब्द ठेकेदार के कानों में पड़े तो बोला "जरूर करूँगा... तुम्हारे पास कुछ है नहीं बस जो है वो ये गुलाबी पांव है इन्हें हमारे पलंग पर रख दो."

काली अंधियारी रात, भयानक और अपमान से भरी रात, मौत से मुहब्बत करा देने वाली रात, जैसी भी थी बीत गयी.

दो दिन बाद ठेकेदार उसे अपनी जीप में बिठा कर थाने ले गया. लोहे की मजबूत तीलियों के पीछे कच्छा पहने हुए रामखेर पड़ा था. उसने बजरिया को देखा तो सब लोगों के सामने खुद को इतना नंगा और अपनी घरवाली को देखते हुए पा कर जड़ हो गया. उसने खुद को दीवार की ओट में खड़ा किया और चेहरे को खिड़की तरफ कर असहाय आँखों से बजरिया को देखने लगा. धरती फट जाये और उनके बीच के ये सींखचे उसमे समा जाये. दोनों की आँखों की कोर पर अटके आंसू मुखर होते उससे पहले ही ठेकेदार की आवाज़ आई. "चिंता ना कर रामखेर कल तेरी जमानत करवा देंगे, अब चलो बजरिया."
बजरिया को जैसे काठ मार गया था, वह हिली नहीं. ठेकेदार ने फिर से कहा तो पांवों में गिर पड़ी "हमें यही रहने दो इसके पास में, हम कोठरी के बाहर बैठे रहेंगे और ये अंदर, कल जब जमानत होगा तब साथ ही जाएंगे."
थाने की लाल फीत वाला मुंशी बोला "इसने तो ठेकेदार साहब के ही तार चुराए हैं इसलिए अंदर है. ये भले आदमी है जो अब ज्यादा जोर नहीं दे रहे हैं वरना कभी जमानत ना होती. तुमको यहाँ नहीं रख सकते, कानून की बात है बिना वजह किसी को कैसे रखें ? " बजरिया कभी मुंशी और कभी ठेकेदार का मुंह देखती रही. उसको विश्वास नहीं हुआ कि जो हमारा हितेषी बन कर मदद कर रहा था सारा कुछ उसी ने किया है. उसको इस तरह अवाक देख कर रामखेर ने हिम्मत बधाई " तुम चलो घर कल हम आ जाएंगे, कोई खा थोड़े ही रहा है हमको" पथरीली सख्त ज़मीन से बजरिया उठी और जीप में पीछे जा कर बैठ गयी.

ठेकेदार के मुनीम ने जमानत दे दी. अब हर रात को रामखेर ठेकेदार की सेवा करता. उसके लिए चारपाई बिछाना और फिर शराब के ग्लास बनाना और हुक्का भरना. एक दिन नशे में उकताए हुए ठेकेदार ने रामखेर को ठोकर मार कर गिरा दिया. थाने में उधेड़ी हुई पीठ के घाव हरे हो गए. वह पेट में अपने घुटनों को फंसाए हुए रिरियाता रहा. ठेकेदार को इसमें बड़ा आनंद आया. उसने जहाँ जहाँ कच्ची चमड़ी थी वही रोज एक ठोकर मारने का नियम बना लिया. कहता था भगवान की बनाई हुई कोई चीज बेकार नहीं होती देखो साला ये रामखेर भी लात खा कैसा कलाकार कुत्ता बन जाता है. क्या मस्त कू कू करता है और वह फिर एक लात जामा देता. जब मुक़दमा छूटेगा तब जा कर ये कुत्ते की वाणी बंद होगी.
मुनीम ने जमानत दी थी तो उसने अपने दो आदमी रामखेर के पहरे पर लगा रखे थे कि ये कहीं भाग ना जाये. और वह भाग नहीं सका.

कौशल बाबू ने एक गहरी सांस ली और चुप हो गए. कहानी में कुछ भी नया नहीं था. ठेकेदार, मजदूर, शोषण और धन बल के सहारे अन्याय जैसा सब मसाला था. हम दो बार चाय पी चुके थे किन्तु कौशल बाबू के आँखों में चमक सी आई और उन्होंने बाल बॉय को फिर आवाज़ दी जल्दी से चार चाय और लाओ.
वे वीरानी की तरफ मुड़े और कहने लगे आगे तुम ध्यान से सुनना.
विवशता में प्रेम नहीं पनपता. उन दोनों के बीच एक अबोला पसरता गया. साथ में रहते हुए भी अनजान से हो गए. कोई भी अपना दुःख नहीं बांटता था. टीन की छत से जो आग बरसती थी, उससे ज्यादा एक में अपमान और दूसरे में लाचारी की आग दहकती रहती थी. एक रात बजरिया रामखेर की पीठ पर बन आये घाव पर नीम की छाल को घिस कर बनाया लेप लगा रही थी. रामखेर ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा "तुम उदास मत रहा करो, जो हुआ वह बुरा हुआ. हमारे को किसी की नज़र लग गयी है. ईश्वर सब ठीक ही करता है, अब ठेकेदार को हमारी पीठ पर लात मारने में मजा आना कम हो गया है और दो दिन में तुम्हारा भी शरीर ढल जायेगा तब आप ही हमारी पक्की जमानत हो जाएगी..."

खेलने वाले बच्चे जा चुके थे और कोर्ट पर फ़ैल रहे नीम अँधेरे के बीच कौशल बाबू का ये संवाद हमारे भीतर लकवे की तरह उतर गया. रामकथा सुनने की मुद्रा में बैठे हुए गुप्ता का चेहरा डूबते दिन में भी अधिक सफ़ेद होता गया. वीरानी चुप था मगर मेरे लिए इस तरह के किस्से सहज नहीं होते, लगा कि आज के दौर में दास प्रथा की कहानी सुना रहे हैं कौशल बाबू और मैं किसी ग्लेडिएटर के कैदी जीवन को देख रहा हूँ. कौशल बाबू ने बात आगे जारी रखी.

बजरिया ने जब अपने पति की घोर विवशता देख कर इन हालातों के लिए स्वीकृति जैसी बातें सुनी तो उसके चेहरे पर ठहरी हुई उदासी का रंग और गाढ़ा हो गया. अगली रात वह शौच जाने का कह कर कमरे से निकली और हवेली के भीतर पहुँच गयी. ठेकेदार भी इस दिन के इंतजार में था कि सब आप ही मान जाये और रोज का डराना न पड़े तो बेहतर हो. बजरिया बोली मैं आज खुश होकर आपकी सेवा करना चाहती हूँ. उस रात क्या क्या हुआ ये सब अंदाजा लगाने की बातें हैं लेकिन सुबह होते ही मालूम हुआ कि ठेकेदार वीरेंदर का पेट बल्लम से फाड़ कर उसे मार दिया गया था. बजरिया भागी नहीं थी, वह आकर रामखेर के पास सो गयी थी. सुबह जब पुलिस ने उन दोनों को जगाया तब रामखेर ने सोचा मुझे लेने आये हैं तो आगे हो गया मगर बजरिया ने ये कहते हुए रोक लिया कि तुम कहाँ जा रहे हो ? तुम्हारी तो पक्की जमानत मैंने रात को करा दी थी.

मुक़दमा चला, बजरिया जेल में थी और रामखेर बाहर. उसे कभी कभी शायद दुःख भी होता होगा कि जो काम मरद का था वह नहीं कर पाया. पुलिस ने पैंतरा बदल लिया था वह रामखेर के पक्ष में खड़ी हो गयी और उसने मृतक के विरुद्ध रामखेर से ही मुक़दमा दायर करवा लिया कि ठेकेदार में झूठी रपट लिखवा कर रामखेर को हानि पहुंचाई खैर एक साल बाद बजरिया की जमानत हुई. पीथल हॉउस उजड़ गया, बजरिया अपने गाँव से पेशी भुगतने के लिए आती - जाती रही. धीरे - धीरे लोग उसे भूल गए.

क्लब में लोग जुटने शुरू हो गए थे और कुछ शोर भी बढ़ता जा रहा था. इसी बीच कौशल बाबू ने वीरानी की ओर देखते हुए थोड़ा नजदीक आकर कहा कि स्त्री को कमजोर या बलवान कहने से अधिक जरूरी है कि हमें परिस्थितियों और मनोस्थिति को समझना चाहिए. वही बजरिया और रामखेर एक बार ट्रेन में दिखे. एक आदमी सीट को लेकर रामखेर से उलझ रहा था और बजरिया रामखेर से कह रही थी जाने दो अपन कहीं और बैठ जाएंगे.

[Painting Image Courtesy : Sohan Jakhar www.sohanjakhar.com ]

53 comments:

मो सम कौन ? said...

गज़ब का लिखते हैं किशोर जी आप।
आभार।

आनन्द वर्धन ओझा said...

बन्धु, कथा में इतना करुण रस है कि मैं अन्दर तक भीग गया ! क्लब में तफरीह करते लोगों के मुंह से जो कुछ कहलवाया गया है, वह आज के हालात का तर्जुमाँ है ! प्रभावी कथा-रचना ! बधाई !!
सप्रीत--आ.

माधव said...

fine

Manoj K said...

ultimate एक अंग्रेजी का शब्द है, मतलब सब जानते हैं, मेरे मन में पढ़ते वक़्त यही ख्याल आया, पर पूरा पढने के बाद कहूँगा अनंतिम.

एक और नगीना जड़ दिया है आपने अपने ब्लॉग रूपी मुकुट में. जितना ज्यादा पढ़ रहा हूँ, उतना ही मन में आपके लिए श्रद्धा बढ़ रही है.

मनोज खत्री

अनामिका की सदाये...... said...

aapki kahani padh kar ek baar to munshi prem chand ke samay jo gareeb kisano ki dasha hua karti thi vo yaad aa gayi. kahani pathak ko puri tareh apne me duba dene me saksham rahi. aur end padhne k baad srarting ek baar fir se padhni padi...aadi aur ant acchha kiya hai. is safal lekhan k liye bahut bahut badhayi.

दीपक 'मशाल' said...

गरीबों के शोषण पर लिखी गई इस बेहतरीन कहानी के लिए आभारी हूँ किशोर भाई..

devyani said...

ek aur behtar kahani ke liye badhai.
insaani rishton ki uddaattata aur kroorta dono ek saath ek kahani me maujood hain, lekin ek doosare se alag apne hone ka ehsaas karate hue.

'अदा' said...

चलिए सबकी प्रतीक्षा आज समाप्त हुई...
इसमें क्या शक जब स्त्री 'करने पर आ जाती है' तो कुछ भी कर जाती है...प्रेम के लिए गिरने और उठने की नपाई मर्द करते रहें ....वो तो सिर्फ प्रेम जानती है....उसे तब तक गिरना मंज़ूर है जबतक वो अपनी नज़र में खड़ी है...अडिग...!!
हम अकिंचन क्या तुझे उपहार दें ..वाली बात है यहाँ..तारीफ करने के लिए तारीफ करने योग्य होना चाहिए...
आपकी कलम की तारीफ करने योग्य हम स्वयं को फिलहाल नहीं पाते हैं...फिर भी कहने की धृष्टता करते हैं...गज़ब लिखते हैं आप....!!
ह्रदय से शुक्रिया आपका...

Apanatva said...

स्त्री को कमजोर या बलवान कहने से अधिक जरूरी है कि हमें परिस्थितियों और मनोस्थिति को समझना चाहिए.

ye vaky aapkee samajh kee gahraee ko ujagar kar kahanee me jaan dal gaya........

aapkee samajh aur lekhan pratibha ko naman.

बेचैन आत्मा said...

.. कहानी में कुछ भी नया नहीं था. ठेकेदार, मजदूर, शोषण और धन बल के सहारे अन्याय जैसा सब मसाला था....
..कहानी पढ़ते-पढ़ते ऐसा ही लगता है फिर लेखक के कहने के अंदाज को पढ़कर पूरी कहानी पढ़ गया.
वस्तुतः कहानी में कुछ भी नया नहीं हैं. जो नया है वह इस कहानी को लिखने की शैली और मार्मिक चित्रण. एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद पूरा पढ़े बिना..या एक पंक्ति भी छोड़कर आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती.
..ग़रीबों का शोषण, एक नारी का प्रेम के लिए समर्पण और अंत में प्रतिशोध लेने की क्षमता का वर्णन सबकुछ इतना सटीक है कि पढ़कर कोई भी कहेगा ..वाह क्या कहानी है..!
..आभार.

डॉ .अनुराग said...

लम्बी कहानियो को कहने का एक हुनर शायद आपके भीतर कुदरत ने दिया है ........ओर किसी खास तबके को देखने की दृष्टि भी ....कमलेश्वर की एक कहानी याद आ गयी....कहानियो को ब्लॉग पे लाने की परम्परा का गर इमानदारी से किसी ने निर्वाह किया है तो आप है....कहानी कहना भी एक कौशल है ....ओर उसे दिलचस्प बनाना भी

sheetal said...

ek baar phir man par gehri chhap chodne waali prastuti.

hem pandey said...

'स्त्री को कमजोर या बलवान कहने से अधिक जरूरी है कि हमें परिस्थितियों और मनोस्थिति को समझना चाहिए'

-नारी के अलग अलग रूप होते हैं.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अलग-अलग परिवेश को आत्मसात करना और फिर उस माहौल और मानसिकता में उतर जाना आपकी खूबी है. आमतौर पर एक कहानीकार अपने परिवेश, जीवन शैली और अपने वर्ग से जुड़ी कहानियां ही अधिकारपूर्वक लिख पाता है, लेकिन आपने इन सीमाओं को तोड़ा है.

Shobhna Choudhary said...

ये कहानी बहुत ही अच्छी लगी, पढते पढते खो गयी, ख़तम हुई तो लगा ये ख़तम क्यों हो गयी, काश थोड़ी और लम्बी होती. ये कहानी मैंने दो बार तो पढ़ ली है, जब भी दुबारा पढूंगी तो लगेगा कि पहली बार पढ़ रही हूँ

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन कहानी..शुरु से अंत तक निभाया..बांधे रखा. बधाई.

रचना दीक्षित said...

एक साँस में सब पढ़ गयी जीवन के सत्य का एक पहलू. बेहतरीन अभिव्यक्ति

Parul said...

kishore ji bahut dino baad dastak hui hai man par...

varsha said...

अब कोई अवतार नहीं होने वाला है। सब अवतार हो गए। महात्मा बुद्ध हो गए। कृष्णावतार हो गए। दशावतार हो गए। जीसस क्राइस्ट को सलीब ठोक दी। सुकरात को जहर पिला दिया। अब कुछ होने वाला नहीं है। अगर यह दुनिया खराब बन रही है तो यह हमारे कारण बन रही है। और अच्छी सुन्दर और रहने लायक सहनशील और सरस बनेगी, तो भी हमारे कारण ही बनेगी। gr8 quote

बजरिया ने जब अपने पति की घोर विवशता देख कर इन हालातों के लिए स्वीकृति जैसी बातें सुनी तो उसके चेहरे पर ठहरी हुई उदासी का रंग और गाढ़ा हो गया gr8 character

aur beshak pakki jamanat ek gr8 post bhi hai.

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

औरतें जन्मजात दब्बू ही होतींहैं,यदि परिस्थति का तकाज़ा न हो तो बाथरूम में काक्रोच को देख चीखते और शराबी पतियों की मार खाते हुए ,उनकी करतूतें छिपाते हुए उम्र गुजार दें .कथा का विषय बेशक नयानहीं है परन्तु हमेशा की तरह आपकी अनूठीअभिव्यक्ति ने उसे मर्मभेदी बनाया है .

monali said...

Shayad nari bhi naari ko utna na samajhti jitna Kaushal babu ne samjha...

Behad hridayasparshi kahaani...

Sonal Rastogi said...

कभी कभी सोचती हूँ नारी मन को इतनी अच्छी तरह कैसे बांच लेते है आप .. पिछली कहानी हो या ये एक एक भावना इतनी स्पष्ट की आँखों के सामने तैर जाए ...

neera said...

साधारण लोगों के बीच ...असाधारण औरत की सशक्त कहानी... लगता है लेखक बजरिया के माध्यम से औरत की विवशता के साथ - साथ उसके हौसले और ताकत का परिचय दे रहा है...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

कुछ कहू क्या...
अज़ी खुमारी है बस आपके कैरेक्टर्स की.. डूब जाता हू उनमे.. देखते है ये हैन्गओवर कब तक रहेगा... वैसे अभी तक तो अन्जलि ही चढी हुयी है.. बजरिया का नम्बर भी आयेगा..

ज्योति सिंह said...

main ek mahine se bahar rahi ,is karan aapki pichhali kahani bhi chuk gayi ,padhna to hai hi kyonki aapki kahani ko chhodna waise hi hai jaise kimati vastu ko kho dena ,wo to sabko priya hoti hai isliye aese afsos ko paal nahi sakti ,abhi aadhi raat hai pahli fursat me dono padhti hoon ,yadi haath lag jaati to bistar par hi padh leti kyonki aapki kahani padhna mujhe behad pasand hai ,likhne ka adbhut andaaz ....man ko sparsh karta hai .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

"अब ठेकेदार को हमारी पीठ पर लात मारने में मजा आना कम हो गया है और दो दिन में तुम्हारा भी शरीर ढल जायेगा तब आप ही हमारी पक्की जमानत हो जाएगी..."
मार्मिक कथा!

हिमांशु । Himanshu said...

अद्भुत ! कुछ कहने का सामान जुटा रहा हूँ !

dimple said...

शुरू में पढने पे नहीं लगता कि कहानी इस कदर बाँध लेगी कि आप इक साँस में पढ़ जाओगे.लगता है कि कौशल बाबु या फिर गुप्ता जी की कहानी है पर कहानी में तो ट्विस्ट निकलता है.कहानी की विशेषता ये है कि सिर्फ बजरिया की पीड़ा ही नहीं बल्कि रामखेर के चरित्र पे भी उतना ही प्रकाश डाला है.इंसानी कमजोरिया ,जीवन के कटु अनुभवो का वर्णन बाखूबी किया है.

कहानी के पात्र इर्द गिर्द नज़र आने वाले लोग है."उन्होंने बताया है कि अगर हमारे आने जाने का बंदोबस्त कर दो तो हम रामखेर को ले आयेंगे, करीब दस हज़ार रुपये में गाड़ी हो जाएगी." बजरिया ने अपने पांव में पहने हुए चांदी के कड़ों की ओर देखा फिर हाथ से कान को टटोला और फिर रो पड़ी. कितनी बेबसी है अपने गहनों को टटोलने में.

कहानी अपने अंत में(वही बजरिया और रामखेर एक बार ट्रेन में दिखे. एक आदमी सीट को लेकर रामखेर से उलझ रहा था और बजरिया रामखेर से कह रही थी जाने दो अपन कहीं और बैठ जाएंगे.) जिस शिखर को छूती है वो सिर्फ आप के बस की ही बात है.

sanjay vyas said...

कहानी लिखने के लिए शिल्प का एक बढ़िया ट्यूटोरियल भी है इसमें.बढ़िया,महत्वपूर्ण और सरस भी.

हिमान्शु मोहन said...

नया कुछ नहीं है। कहानी में नया होता भी क्या?
मगर जो दम है, सब आपके अंदाज़े-बयाँ की है, आपके शिल्प की, कहन की कसावट और बुनावट की।
मौलिक अंदाज़ लगता है, किसी से तुलना नहीं कर सकता, मगर अच्छा लगा और आगे भी पढ़ने की इच्छा और पक्की हुई।
जमानत तो ख़ैर पक्की हो ही गई।
बधाई, फिर से अच्छे और पिछुआते हुए - हॉण्ट करते हुए लेखन के लिए।

रंजना said...

क्या कहूँ........कुछ भी कहते नहीं बन रहा....

माता आपके कलम की प्रखरता यूँ ही बनाये रखें....
बहुत बहुत शुभकामनाएं और आशीष इस अद्भुत लेखन के लिए...

M.A.Sharma "सेहर" said...

Jai ho aapke kamal lekhan kee Kishore!!

Avinash Chandra said...

Saahab,
ek shabd, ek bhi shabd nahi hain......
kuchh bhi nahi kah sakta.

Bas, ye surya sa lekhan, dipt hai..sadaiv.

Aabhar

अनिल कान्त : said...

आपकी लेखनी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है ...

Vivek VK Jain said...

u r very much skilled....ur 'about me' is impressive.

Sunita Sharma said...

मजदूरों की जिन्दगी शायद एक कडवा सच आपने इस कहानी के माध्यम से बयान किया है कहानियां जो कुछ कह जाती है वह किसी अन्य माध्यम से नही जाना जा सकता आपकी लेखनी काबिले तारीफ है उम्मीद है इसी तरह आगे भी पढने को मिलेगा करूणा से भरा हुआ......

Servesh Dubey said...

हमेशा की तरह अति उत्तम
आप्के शब्द श्रृखला पाठको को इस कदर जकड लेते है कि बस
आगे के लिये शब्द नही है
मित्र ऐसे ही लिखते रहे सफ़लता आपका राह देख रही है
हम सब की शुभ कामनाये अपने भविष्य के कलम के सिपाही के लिये
सस्नेह सहित ।

राजेश चड्ढ़ा said...

किशोर जी..... ऊपर,प्रतिक्रियाओं मे सब ठीक कहते हैं...बहुत बढिया...गद्य में पद्य समाहित हो जाता है और वो भी कोक-टेल की तरह..मेरी शुभकामनाएं

अपूर्व said...

कथानक के सूत्र हमारे सामंतवादी समाज की हकीकत से उतने ही जुड़े हैं कि कहानी मे मौजूद कहानी एक कहानी सी नही लगती..बजरिया का चरित्र आकर्षित करता है..तो उलझात्ता भी है..बजरिया हमारे अंतस्‌ की उस अटूट आस्था की प्रतीक लगती है..जो अपने मूल के हित के लिये अगर खुद को ठेकेदार रूपी विपरीत परिस्थितियों पर समर्पित कर देती है..तो उसकी ’पक्की’ जमानत के लिये उस परिस्थितियों का सर्वनाश भी कर सकती है..और उसके भीतर की यह हिंसा स्वभावगत नही वरन्‌ परिस्थितिजन्य है..जैसा की आखिरी पंक्ति से स्पष्ट भी होता है...वहीं रामखेर हमारी आत्मा की उस भीरुता का प्रतीक है..जो चीजों से लड़ने के बजाय बजरिया के शरीर के ढ़ल जाने की प्रतीक्षा करना श्रेयस्कर समझता है..सबसे अश्चर्यचकित करता है ठेकेदार का चरित्र..उसके अंदर का सामंत पैदाइशी नही था..एक खलासी से ठेकेदार बनने वाला वह भी उसी जगह से आया था जहाँ से रामखेर जैसे आते हैं..मगर फिर भी शक्ति और सामर्थ्य पा कर उसका निरीहों का शोषण करना और उनके जख्मों पर लात मारने से जनित दर्द मे इंटरटेनमेंट तलाशने का सैडिज्म यह बताता है..कि यहाँ पर ’क्लास’ पैदाइशी नही वरन्‌ सामाजिक परिस्थितियों से आते हैं..

बढ़िया कहानी!!

Tripat "Prerna" said...

bahut hi pasand aai aapki post...

http://liberalflorence.blogspot.com/
http://sparkledaroma.blogspot.com/

Atmaram Sharma said...

किशोर जी, आपके लिखे को पढ़ना हमेशा ही रोचक होता है. काफी समय बाद आपको पढ़ा. बहुत अच्छा लगा. साधुवाद.

Vinod Kumar Nath said...

thanks a lot for your every post,beautiful

Vivek Jain said...

वाह, वाकई शानदार
vivj2000.blogspot.com

प्रियदर्शिनी तिवारी said...

ek baar fir aapke dvara achchhee kahaani padhne ko mili,gajab ka likhte hai aap..

Divya said...

Soul stirring !

स्वाति said...

बेहतरीन..

Maria Mcclain said...

You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.

हिमान्शु मोहन said...

आज 45 दिन हो गए। अगली कथा?

गौतम राजरिशी said...

देर रात गये इस सशक्त किरदार बजरिया से मिलने का सौभाग्य अद्‍भुत था।

कहानी बुनने की आपकी कला को खूब तारीफ़ मिल चुकी है अब तो, मुझे तो हैरानी इस बात की हो रही है कि इतनी सारी कहानियां कैसे बुन लेते हैं आप। ये भी कोई आस-पास का प्लाट था क्या?

आपकी कल्पनाशीलता और फिर उसे शब्दों में प्रवाह कायम रखते हुये ढ़ालने का जादू अब हतप्रभ से भी ऊपर यदि कुछ होता है तो वो करने लगा है मुझे।

बजरिया का किरदार...एक पल निरीह तो दूसरे पल में रौद्र रूप और फिर वो आखिरी पंक्तियों में ट्रेन में सीट का समर्पण...अद्‍भुत किरदार बुना है आपने। ठेकेदार को बल्लम से चीर डालने का कार्य प्रेडिक्टेबल होते हुये भी एकदम से चौंका जाता है पाठक को और शायद यही तो एक अच्छे कहानीकार का कौशल है, प्रेडिक्टबल में भी अन-प्रेडिक्टिबेलिटी को कायम रखना।

हम्म्म...अब बारी है इस लंबे धारावाहिक में उलझने की।
अलमाइटी सेव मी...

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

वैसे तो आपके कहानी लेखन की तारीफ़ बहुत पहले सुन चुका था, पर आपके ब्लॉग पे पहली बार आज आया और ये कहानी नाम के अनुरूप ही पाया |

मुझे लगता है ये वाक्य - "स्त्री को कमजोर या बलवान कहने से अधिक जरूरी है कि हमें परिस्थितियों और मनोस्थिति को समझना चाहिए." सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि यथार्थ है |

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

वाह


लेकिन यह दलित या स्‍त्री शोषण की कहानी नहीं है...

मुझे इतनी ही बात समझ में आई :)

Arjun Singh Ratnoo said...

कहानी ने आरम्भ से अंत तक बांधे रखा,कहीं कोई झोल नहीं.बहुत बहुत बधाई|

अपूर्ण said...

सारी कहानियों में मुझे यही कहानी समझ आयी|

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