Monday, March 1, 2010

गली के छोर पर अँधेरे में डूबी खिड़की



[ मेरी ये छोटी सी कहानी, जापान के साहित्यिक आकाश के अमिट नक्षत्र रियुनोसुके अकूतागावा को आज उनके जन्म दिवस पर समर्पित है. यह असंभव है कि मैं राशोमोन जैसी कहानी लिख सकूँगा मगर आपकी प्रेरणा मेरे भीतर हमेशा ज़िन्दा रहेगी ]

गली के आर - पार अँधेरा और रोशनी अपने वजूद की लड़ाई लड़ चुकने के बाद सुस्ता रहे थे. पचास फीट दूर खड़ी सरकारी पानी की हौदी विशालकाय भूत के पेट की तरह दिखाई दे रही थी. पानी की खेली में किसी प्यासे जानवर के पानी पीने की आवाज़ आती और बिना किसी आहट के अँधेरे में खो जाती. इन्हीं टुकड़ा - टुकड़ा आवाजों से उसमें विश्वास लौटता कि दुनिया अभी बची हुई है. घड़ी में देखा तो समय ठीक हो चला था. रात के एक बजने को थे. क्षितिज पर पसरे अँधेरे में पहाड़ी पर बना देवी का मंदिर ओझल हो चुका था किन्तु अपने दिशाज्ञान से मनोकामना उस ओर उछाल दी. क़ातिल सरीखे सधे पांव से अपने घर के पिछवाड़े का दरवाजा खोला फिर उसी अभ्यस्त तरीके से उसे उढ़का दिया.

उसने कायरता से सामने देखा और सोचा कि कभी अदम्य साहस से इस गली के बीसियों चक्कर लगाये थे. आज एक स्मृति से वह बुत हो कर रह गया. समझ की घटाओं से बीते सालों का हिसाब उसके सम्मुख बिखरता गया.

उसे वही पुरानी रेशम गली से गुजरती दिखाई दी. चटक नीले रंग का सलवार कुरता पहने हुए. उसके उन्नत ललाट के बायीं ओर निकली हुई मांग बालों को विभाजित करती हुई चोटी में खोयी जा रही थी. दसवीं जमात में भी इतना ऊंचा कद कि वह अगर उसके पास खड़ी होती तो ठीक उसके कांधे से लगती. वह घर के बाहर बनी सीढ़ीयों पर बैठा इस जिद से घिरा था कि आज वह अपनी आँखें नहीं हटाएगा. वह आई , ठीक सामने. रेशम ने अपनी दोनों भोहों को ऊपर किया और निर्विकार मुख को स्थिर रखा. रेशम पल भर को उसके सामने रुकी होगी मगर उस पल के सम्मोहन का किस्सा सुनाने योग्य दोनों में से किसी के पास कभी कोई स्मृति शेष ना थी.

बेहद लम्बे और उबाऊ दिनों को काटने का तरीका उन दोनों को नहीं मिला. रेशम का कभी कभार ही दरवाजे के आगे से गुजरना संभव हो पाता था. जबकि वह रात को एक बजे अपने घर के पिछवाड़े से निकलता और सौ कदम दूर रेशम की खिड़की के पास पहुँच जाता. कुंवारी लड़कियों की चुन्नी से आने वाली खुशबू, इस खिड़की से फूटती रहती थी. वह इस खुशबू में पागल था लेकिन रेशम को लेकर उसकी हसरतें बहुत छोटी थी कि वह उसे अपने सामने बैठ कर बात करते हुए देखना भर चाहता था. दो महीने निरंतर साप्ताहिक मुलाकातों के बाद अप्रेल महीने की दूसरी तारीख़ को रेशम ने वादा किया था, वह खिड़की में उसके सामने बैठ कर बात करेगी. चाँद निकलने को आया यानि रात के तीन बजने को होंगे मगर वह सामने नहीं आई. खिड़की की ओट से कोई दबी दबी सी हंसी में हँसता रहा. चांदनी में उसका खिड़की पर रुकना मुनासिब नहीं था तो उसने वहां से हट जाने से पहले दूर तक झाँका. लोहे के एक सरिये को पकडे हुए वह आश्वस्त होना चाह रहा था तभी एक नर्म नाजुक स्पर्श ने उसके संवेदी तंतुओं को पागल कर दिया. वह ख़ुशी से झूमना चाह रहा था किन्तु इस नाजुक और प्रतीक्षित स्पर्श से उपजी उत्तेजना के अतिरेक में जड़वत्त हो गया. किसी के खांसने और चारपाई को सरकाए जाने की आवाज़ से उसे खिड़की छोड़नी पड़ी.

अब चाँद की परवाह कौन करता. एक नए किस्म का दुस्साहस उसमे भर गया था. वह पगलाया हुआ दूधिया रौशनी के बिछावन पर खड़ा, खिड़की को चूमता रहता था. कुछ नयी खुशबुएँ भी उसी खिड़की में पहली बार मिली. एक अनूठी देह गंध, बिस्तर के पसीने और सलवटों से भरी हुई. उसके बदन के पास मंडराती रहती. खिड़की में लगे लोहे के सरियों का अस्तित्व बचा ही था. बदन का हर स्पर्श वर्जनाओं की सीमा लांघ चुका था. वह एक रात इसी उन्माद में अपने साथ रेशम की चुन्नी ले आया. अगली मुलाक़ात में रेशम रोती रही. क्या जवाब दूंगी मैं, कहाँ गयी चुन्नी ? किन्तु उसने लौटाई नहीं. वह रेशम के वजूद को टुकड़ों में काट कर अपने भीतर समा लेना चाहता था, इसी एवज में एक हो जाने के लिए अपनी एक शर्ट छोड़ आया. अगली बार रेशम उसे वही शर्ट पहने खिड़की में बैठी हुई मिली. जब हम एक दो लोगों के हिस्से में बंटे होते हैं तो ज़िन्दगी के रास्ते आश्चर्यजनक रूप से सीधे दिखाई देते हैं. वह भी एक के बारे में ही सोचता था किन्तु अगली एक रात जब वह मोहपाश में बंधा हुआ खिड़की की ओर चला तो उसने देखा कि कोई मर्द साया उस खिड़की से सट के खड़ा बातें कर रहा है. रात के एक बजे यह दृश्य वज्रपात था. उसके सपने दलदल में बदल गए. कुंवारी खुशबुएँ पिशाच की आठ भुजाओं की तरह उसकी तरफ बढ़ने लगी. वह धम्म से गिरा. चारपाई के आस पास सब कुछ बहुत भारी होता गया. उसकी सांस ही उसका गला घोंटने लगी. उसकी सही हालात के बारे लिखने के लिए अलौकिक सामर्थ्य की जरूरत होगी.

वह इसे क्षुद्र धोखा कहते हुए घंटों खोया हुआ रहता था. वह ऐसा कैसे कर सकती है ? किन्तु फिर मन कहता कि वे अफवाहें सच है. जो इस लड़की के भोलेपन के इतर मोहल्ले भर में जुबाने बदल बदल कर घूमती रही है. उसे अपने प्रति घृणा हुई. अवसाद का कसैलापन मस्तिष्क में बैठ गया. सच ही तो है पुरुष का भाग्य और स्त्री का चरित्र देवता भी नहीं जानते मनुष्य क्या करेगा ? मनुष्य जान सकता हो मगर जानने के बाद किसी की हत्या तो कर ही सकता है. अब तो ये अनिवार्य हो गया है. प्रेम पर एक अमिट लांछन है. जिसे किसी के रक्त से धोना होगा. किसके रक्त से ? स्वयं आत्मघात कर ले या फिर उसे मार डाले. अबूझ प्रश्न उसके दिमाग में घूमते रहे. वह अब भी उसे खोना नहीं चाहता था इसलिए उसके बारे में सोच रहा था कितु इस पाप के पश्चात उसे अपने साथ भी नहीं रखना चाह रहा था. तो कौन मरेगा ? इस घृणित कार्य का दंड किसे मिलेगा ? प्रश्नों की इस धमाचौकड़ी से वह हार गया. एक चुप उसके कमरे में आकर बैठ गयी. वह मन ही मन भौतिक और चेतन जगत के बारे में गूढ़ प्रश्न करता मगर खिड़की पर खड़ा अजनबी साया उसके शरीर को झुलसा देता. बदला लेने की भावना जाग उठती. वह इसे अपमान समझता और किसी बेशकीमती चीज के लूट लिए जाने के बोध से पीड़ित हो जाता. दुःख का पारावार था. आँखें फटी रह गयी, एकांत प्रिय हो गया.

माँ ने जादू टोने सुझाये, पडौसियों ने उसे कहीं दूर भेज कर पढ़ाने की सलाह दी ताकि उस लड़की से पीछा छूटे, बचपन का रंग है छूटेगा नहीं और छूट गया तो समझो गंगा नहाये. वह बोलता था, ना ही कोई विरोध करता. पिता जी ने शहर के डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने परीक्षा के दवाब में नींद लेने से उपजे अवसाद को चिन्हित कर चिकित्सा आरम्भ कर दी. शिथिल कर देने वाली दवाओं के असर में वह सोता रहा. दस दिन बाद बोलने लगा सिर्फ अपनी माँ से बात करता. उसके पास बैठ कर रोटी खाता और फिर किताबें लेकर आँगन में पढ़ने बैठ जाया करता. पिताजी देखेते तो उनकी आँखें भर आती. पता नहीं क्या रिश्ता है कि एक बाप हमेशा अपने बेटे के लिए मर जाने को तैयार रहता है. वे उसे निगाह भर देखते और फिर नम आँखों से अपने कमरे में अकेले सो जाते. पढ़ते हुए जब भी रेशम का चेहरा याद आता वह तुरंत नींद की गोली खा लेता. यही एक तरीका बचा था छुटकारे का. उसने बहुत आत्मपीड़ित दिन बिताये. दुःख प्रकट करने लायक नहीं था, कोई ऐसा भी नहीं था जिससे वह अपने मन की बात कह सके. दिन बीतते गए और वह दो महीने तक वार्षिक परीक्षाओं में व्यस्त रहते हुए थोड़ा बहुत भूल पाया था कि रेशम की शादी की ख़बर मिली. इस बार किसी अतीन्द्रीय शक्ति ने उसका हौसला बनाये रखा.

रेशम चली गयी. उसके बाद वह भी स्नातकोत्तर की पढाई के लिए शहर चला गया. .

आज फिर गली में खड़े हुए, उसने इन बीत चुके दिनों के दृश्यों से जरा सा छुटकारा पाया तो फिर से अपनी जेब पर हाथ रख कर उस कागज को टटोला जिसे सुबह पड़ौस की एक छोटी बच्ची देकर गयी थी. आदमी जिन बातों को भूला हुआ मान लेता है वे पल भर में उसके ख़यालों के महल को चूर कर देती है. अतीत के भोगे हुए क्षण वर्तमान में अजित हो जाया करते हैं. चारों तरफ मंडराते हुए फिर से नष्ट जीवन में बिसरा दिए गए सम्बंधों का उदघोष करते हैं. लिखावट वही थी जिससे उसे नफ़रत थी. ऐसी नफ़रत जिसमे वह हत्या जैसा अमानुषिक कार्य भी करने को कभी तैयार हो गया था. लिखावट पहचानते ही पहला विचार आया कि वह इसे बिना पढ़े फाड़ दे. इसको आग के हवाले कर दे किन्तु कर ना सका क्योंकि वह भी विश्वविध्यालय में अध्ययन के दौरान बाजारू स्त्रियों से कई बार समागम कर चुका था. वह उन्हीं खुशबुओं को महसूस करने के लिए यही सब करने को तैयार हो जाया करता था किन्तु हर बार एक पश्चाताप उसे घेर लेता था. उसके पास अब अपने प्यार की पवित्रता जैसा कोई बखान था तो उसने पत्र को पढ़ा.

कुछ चीजों की कभी जरुरत नहीं होती मगर वे होती हैं लेकिन इस पत्र में नहीं थी, कि कोई संबोधन ना था और किसी लिखने वाले का नाम भी नहीं.
"... मैंने कई बार मर जाने के प्रयास किये मगर हाय रे मेरे दुर्भाग्य, मैं अभी जीवित हूँ.
कई दिनों से सुन रही थी कि तुम आये हुए हो तो एक बात तुमसे कहना चाहती थी. ये तुम्हारी शिकायत या मेरी कोई सफाई नहीं है फिर भी जरूरी है. उस रात के बाद मुझे पता था कि तुम अब कभी नहीं आओगे. तुम्हारे हठी स्वभाव से मैं परिचित हूँ कि अब भी मेरी एक चुन्नी तुम्हारे पास है जो तुमने लौटाई नहीं है लेकिन मैं उन दिनों की याद नहीं दिलाना चाहती हूँ सिर्फ इतना बताना चाहती हूँ कि ज़िन्दगी का व्यवहार समझने की भी कोई स्कूल होनी चाहिए. लोग कहते थे तुम पागल हो गए हो किन्तु मुझे विश्वास था कि तुम सिर्फ नफ़रत से भरे हो खैर जाने दो... जिस वक्त मेरी विदाई हो रही थी तब तुम छत पर खड़े थे और तुमने एक बार भी मेरी कार की ओर नहीं देखा लेकिन तुम छत पर आये तो मुझे लगा कि मैं अभी मर जाउंगी. मेरे ससुराल में सब सामान्य था. मेरी सास मुझे बहुत प्यार करती थी. ससुर थे नहीं और मेरी ननदें उतनी सहृदय थी जितना कोई सोचता नहीं है. मेरे पति एक नेक आदमी, उन्होंने मुझे एक महीने तक छुआ ही नहीं. मैं जिस विरोध का सोच कर गयी थी वह दिखाने का अवसर ही नहीं मिला. अपने भाग्य की बात है कि वे आते और चुप से सो जाते. इस बीच मैं कई बार यहाँ वापस आई मगर तुम कहीं और जा चुके थे. सच तो ये है कि उनके व्यवहार से मेरे मन में तुमसे मिलने की इच्छा होती भी नहीं थी. मैं वापस ससुराल चली जाया करती.
मैं तुम्हें भूल गयी थी. शादी के लगभग तीन महीने बाद हमारे घर पर पति के साथ एक अतिथि आये. उन्होंने अतिथि को शराब पिलाई, खाना खिलाया और फिर रात ग्यारह बजे मेरे कमरे में लेकर आये. कहने लगे कि वे उनके दोस्त हैं और आज रात मेरे बेडरूम में सोयेंगे... मैं उसी पल झटके से कमरे से बाहर निकली और सासू माँ के कमरे की ओर भागी लेकिन वहां कोई नहीं था. घबराई हुई सी मैं उनके कमरे में रात भर बंद रही. सच में इस बार मैं पगला गयी थी. मेरे पति ने मुझसे ये सब कहा. ऐसा कैसे हो सकता है जानवर भी अपने जीवन साथी के लिए लड़ मरते हैं और ये ? स्त्री अथवा पुरुष का इससे बढ़ कर दुर्भाग्य क्या होगा ?
सुबह दस बजे जब डरते हुए दरवाजा खोला तो सामने कुर्सी पर पति बैठे थे. मैं चुप सर झुकाए खड़ी रही. कुछ ही पलों में वे उठे और ये कहते हुए बाहर चले गए कि मैंने उनके दोस्त का अपमान किया है... कोई इंसान कितना गिरा हुआ हो सकता है अब ये मेरी सोच से परे है. इसी सोच में, मैं मर चुकी थी देह को त्यागना शेष था तो मैंने कोशिशें की मगर....
फिर मेरी इन हरकतों से उकता कर वे मुझे पीहर छोड़ गए हैं. मेरे परिजनों से कहा कि मेरा चरित्र ठीक नहीं है, इसे समझाओ. मैं ससुराल जाकर उनकी बात मानूं इस बात के लिए मेरे परिवारवाले मुझे हर दिन पीटते हैं. तुम समझते हो ना कि मिर्च की जलन क्या होती है, मेरी ही भाभी ने मेरे... खैर स्त्री का भाग्य यही है. मुझे दर्द इसलिए नहीं होता क्योंकि मर तो मैं उसी दिन गयी थी.
आज फिर एक कोशिश करना चाहती हूँ कि देह से आजाद हो जाऊं, सुना है कि इस दुनिया में अंतिम इच्छा पूरी करने की रस्म है तो मेरी भी ख्वाहिश है कि तुम एक बार उसी खिड़की पर जाओ. "

इस पत्र को पढ़ने के बाद उसे एक अजीब किस्म का संतोष मिला और बेचैन कर देने वाली दास्ताँ भी. उसमे कई उलझनों का संचार हो गया. रेशम ने पहले कभी बात क्यों नहीं की ? उसकी ख़ामोशी ने क्या कुछ छीन लिया है. ज़िन्दगी अजब गलतफहमियों का एक पिटारा है चाहे आप खुश हैं या दुखी. वह सोचने लगा कि हरे भरे जंगलों में आग लगती और वे राख में बदल जाया करते हैं, उसी राख से नयी कोंपलें फूटती है. स्याह हुआ क्षितिज सवेरे की लाली से दमकने लगता है. संबन्ध घास फूस से बने घरोंदे होते हैं उनमें तभी तक सुख भरा जीवन होता है जब तक कि धोखे की चिंगारियां उससे दूर रहे. कठोर से कठोर पर्वत के नीचे एक सुप्त दरिया होता है और हर दरिया के भीतर सर्द दिनों में पानी गर्म रहा करता है. एक शक भरे साये को मगर पहचाना नहीं जाता, उसे निकाल बाहर भी नहीं किया जा सकता, स्त्री-पुरुष के भीतर की पहचान इतनी मुश्किल क्यों होती है, लेकिन इतनी खूबियों और इतनी मुश्किलों के बाद भी जीवन रूमानी है. सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद, उसने मुझे लिखा हैं और उसके शब्दों को पढ़ने के लिए मैं हूँ.
खट - खट... खटाक खटाक खटाक... कुछ आवाजें नजदीक आती हुई बड़े शोर गुल में बदल गयी. गायें और गोधे दौड़ रहे थे. उनके पीछे गली के कुत्तों का झुण्ड था. यह शोर अगली गली के अंतिम छोर पर जाकर विलोपित हो गया.

ख़त की स्याही अभी चमक रही थी जैसे ज़िन्दगी के बुझने के बाद भी कुछ देर तक शरीर गरम बना रहता है. उसके पास एक ख़त और एक मरे हुए सवाल की लाश थी कि उस रात खिड़की पर कौन था ?
गली में वही पुराना अँधेरा पसरा था और खिड़की अभी अस्सी कदम दूर थी .


[ Image courtesy : hulubei.net ]

51 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएं, किशोर!
कहानी पढने के लिए फिर से आऊँगा!

Udan Tashtari said...

कहानी कल पढ़ेंगे..मार्क कर लिया है.



ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

Apanatva said...

होली की हार्दिक शुभकामनाएं,
kahanee choo gayee dil ko.Vidarak ant .
Ab ye sawal hamare dimag me ghoomega ki vo kaun tha .

हरकीरत ' हीर' said...

कुंवारी लड़कियों की चुन्नी से आने वाली खुशबू, इस खिड़की से फूटती रहती थी. वह इस खुशबू में पागल था....

वह पगलाया हुआ दूधिया रौशनी के बिछावन पर खड़ा, खिड़की को चूमता रहता था. ....

मुहब्बत की इतनी गहरी पहुच....?? जैसे कोई आग है आपके भीतर .......हर कहानी में वही आग नज़र आती रही है .....!!

कठोर से कठोर पर्वत के नीचे एक सुप्त दरिया होता है और हर दरिया के भीतर सर्द दिनों में पानी गर्म रहा करता है. एक शक भरे साये को मगर पहचाना नहीं जाता, उसे निकाल बाहर भी नहीं किया जा सकता, स्त्री-पुरुष के भीतर की पहचान इतनी मुश्किल क्यों होती है,

आह ......कैसे सह लेते है ये बज्रपात......जब हमारा पढ़ते-पढ़ते सब कुछ तार- तार हो जाता है .....आप कैसे रख लेते हैं अपने भीतर ......!!

आई तो थी होली की शुभकामनाएं देने पर इस कहानी को पढ़ ये हिम्मत भी जाती रही .....अभी समय लगेगा निकलने में .....!!

राजकुमार ग्वालानी said...

होली में डाले प्यार के ऐसे रंग
देख के सारी दुनिया हो जाए दंग
रहे हम सभी भाई-चारे के संग
करें न कभी किसी बात पर जंग
आओ मिलकर खाएं प्यार की भंग
और खेले सबके साथ प्यार के रंग

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी लगी कहानी। आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएं

प्रकाश पाखी said...

''कुंवारी खुशबुएँ पिशाच की आठ भुजाओं की तरह उसकी तरफ बढ़ने लगी.''

''कुंवारी लड़कियों की चुन्नी से आने वाली खुशबू, इस खिड़की से फूटती रहती थी.''

''क्षितिज पर पसरे अँधेरे में पहाड़ी पर बना देवी का मंदिर ओझल हो चुका था किन्तु अपने दिशाज्ञान से मनोकामना उस ओर उछाल दी.''

अगर कोई कहानी एक सांस में पढ़ ली जाए और फिर सोचें कि सांस लेना कैसे भूल गए तो वह किशोर की कहानी ही होगी.बहुत तरसाया किशोरजी ,पर जब आये तो जादू तैयार था.आपकी पहली शानदार पुस्तक का इन्तजार है.आपके लेखन की उस्तादी का कायल हूँ.
होली की शुभकामनाएं!

sanjay vyas said...

पचास फीट दूर खड़ी सरकारी पानी की हौदी विशालकाय भूत के पेट की तरह दिखाई दे रही थी.

क्षितिज पर पसरे अँधेरे में पहाड़ी पर बना देवी का मंदिर ओझल हो चुका था किन्तु अपने दिशाज्ञान से मनोकामना उस ओर उछाल दी.

वह सोचने लगा कि हरे भरे जंगलों में आग लगती और वे राख में बदल जाया करते हैं, उसी राख से नयी कोंपलें फूटती है. स्याह हुआ क्षितिज सवेरे की लाली से दमकने लगता है.


किशोर भाई पूरी कहानी में पाठक अभिव्यक्ति के ऐसे विलक्षण शब्द- पुंजो से चमत्कृत होता है.

कहानी ये असल में मनो-दार्शनिक ज्यादा है बजाय के कि एक सीधी सरल सी प्रेम कथा के.

दीपक 'मशाल' said...

इस बार रंग लगाना तो.. ऐसा रंग लगाना.. के ताउम्र ना छूटे..
ना हिन्दू पहिचाना जाये ना मुसलमाँ.. ऐसा रंग लगाना..
लहू का रंग तो अन्दर ही रह जाता है.. जब तक पहचाना जाये सड़कों पे बह जाता है..
कोई बाहर का पक्का रंग लगाना..
के बस इंसां पहचाना जाये.. ना हिन्दू पहचाना जाये..
ना मुसलमाँ पहचाना जाये.. बस इंसां पहचाना जाये..
इस बार.. ऐसा रंग लगाना...

होली की उतनी शुभ कामनाएं जितनी मैंने और आपने मिलके भी ना बांटी हों...

varsha said...

akhbaar ke daftar ki chutti hai...aise avsar kam hi aate hain poori kahani itminaan se pdhi...kahani chunni aur shirt se judi insaani bhavnaon ka unmaad to hai hi saath hi yah apne ant mein bhi behtarrn hai.
संबन्ध घास फूस से बने घरोंदे होते हैं उनमें तभी तक सुख भरा जीवन होता है जब तक कि धोखे की चिंगारियां उससे दूर रहे...bahut sadharan sa funda bahut maheenta se buna gaya hai. maine रियुनोसुके अकूतागावा ko nahin padha hai lekin yah zaroor ek sarthak shradhdhanjali hogi.

आनन्द वर्धन ओझा said...

किशोरजी,
रंगों के इस मौसम में गंधों की याद ... ! लगता है, बहुत पहले कोई चुन्नी हाथ से छूटी ज़रूर है, लेकिन अपनी गंध हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ गई है ! और, अगर ये सारा ताना-बाना ख्यालों में बुना गया है, तो भी कहना चाहूँगा कि ज़िन्दगी के अक्स और भावनाओं के तूफ़ान को कैसी निपुणता से शब्दों में बाँध लेते हैं आप ! हैरत होती है, सच में !
लेकिन मन नहीं मानता कि ये खाम-खयाली है ! जीवन के घने बियाबान से हम सभी गुज़र रहे हैं; लेकिन कोई काँटा आपको चुभा ज़रूर है भाई ! अद्भुत कथा-रचना और उसमे अनुस्यूत कई पंक्तियाँ गहरा प्रभाव पाठकों पर छोड़ती हुई ! असर में हूँ अभी; वक़्त लगेगा बाहर आने में !
बहरहाल, होली के रंग और अबीर का टीका मेरे हाथों से ले लें !
सप्रीत--आ.

neera said...

पात्रों को रेखांकित करना एक विशेषता है और पात्रों की आत्मा में जान डालना शब्दों का जादू ...
वह कहानी में मौजूद ही नहीं ... देर तलक गूंजता भी हैं ....

Parul said...

jehan mein kuch kalpanaayen ubhar gayi..dhir-gambhir si...!

monali said...

I nvr knew dat an imagination can b a murderer...

अपूर्व said...

कहानी पढ़ तो ली है मगर अभी सिर्फ़ रंगों वाले खयाल हैं..सो आपको होली की ढेरों मुबारकबाद.. आभाजी तान्या और दुष्यंत सहित सब को जलेबी सी मीठी शुभकामनाएँ!!!

अल्पना वर्मा said...

जब हम एक दो लोगों के हिस्से में बंटे होते हैं तो ज़िन्दगी के रास्ते आश्चर्यजनक रूप से सीधे दिखाई देते हैं.

**उसे एक अजीब किस्म का संतोष मिला[--ओह!कितनी नफ़रत थी..!!!!!!!!!!!]
***ख़ामोशी ने क्या कुछ छीन लिया है. ज़िन्दगी अजब गलतफहमियों का एक पिटारा है .
***संबन्ध घास फूस से बने घरोंदे होते हैं'----सच ...रिश्ते बहुत ही नाज़ुक भी होते हैं!

ग़लतफहमियों की सूली पर चढ़ी एक प्रेम कहानी जिसका अंत दुखद रहा.:(
- दुख इस बात का bhi है कि अंत तक भी उसके दिमाग़ में वह शंका बनी रही ..
-खामोशियाँ कितना नुकसान भी कर जाती हैं... यहाँ दो जीवन नष्ट कर दिए...दर्दनाक किस्सा!
--काश उस ने रेशम से पहले बात की होती और अपना शक दूसरे दिन ही दूर कर लिया होता...!
--मन को व्यथित कर गयी..सफल और सशक्त लेखन.

Sonal Rastogi said...

बहुत खूब ,कमाल का रेखांकन ...पढ़ते पढ़ते लगा की मन को कही गहरे तक स्पर्श कर गए पात्र और घटनाक्रम

रचना दीक्षित said...

बहुत अच्छी कहानी हर एक पात्र जिवंत और कहानी को सही दिशा देता हुआ भाषा लयबद्धता उपमा सभी कुछ कुछ तो है.बहुत कमाल की चलती है आप की लेखनी

neelam said...

ज़िन्दगी अजब गलतफहमियों का एक पिटारा है चाहे आप खुश हैं या दुखी. वह सोचने लगा कि हरे भरे जंगलों में आग लगती और वे राख में बदल जाया करते हैं, उसी राख से नयी कोंपलें फूटती है. स्याह हुआ क्षितिज सवेरे की लाली से दमकने लगता है. संबन्ध घास फूस से बने घरोंदे होते हैं उनमें तभी तक सुख भरा जीवन होता है जब तक कि धोखे की चिंगारियां उससे दूर रहे. कठोर से कठोर पर्वत के नीचे एक सुप्त दरिया होता है और हर दरिया के भीतर सर्द दिनों में पानी गर्म रहा करता है. एक शक भरे साये को मगर पहचाना नहीं जाता, उसे निकाल बाहर भी नहीं किया जा सकता, स्त्री-पुरुष के भीतर की पहचान इतनी मुश्किल क्यों होती है, लेकिन इतनी खूबियों और इतनी मुश्किलों के बाद भी जीवन रूमानी है. सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद, उसने मुझे लिखा हैं और उसके शब्दों को पढ़ने के लिए मैं हूँ.

kahaani achchi hai ,kuch kathya jeevan ka sach lagte hain.iska doosra bhaag bhi hai ?????????????

डॉ .अनुराग said...

तकरीबन एक डेड साल पहले इसी ख्याल पर एक नज़्म लिखी थी ....चुप्पिया कभी कभी जिंदगी में आखिर तक खलल डालती रहती है ....अबोला भी एक विलेन है ....अद्रश्य ....

dimple said...

.अँधेरा और रोशनी हमेशा ही अपने वजूद की लड़ाई लड़ते रहे है.इक बार में इक जीत भी जाता है.हसरतें बहुत छोटी होती है उनसे मिलने वाली ख़ुशी क्षणिक नहीं बड़ी देर तक हृदय पट पे धुंधली सी परछाई बन के चिपकी रहती है.जैसे रेशम नफरत के बावजूद स्मृति से मिट नहीं पाती.कोई अजनबी साया रेशम की खिड़की पे नहीं शक की किसी चोर दरवाजे से ज़िन्दगी में दाखिल होता है.कहानी अंत में हमारे लिए सवाल छोड़ जाती है.
(home work) दया का पात्र कौन है?क्या हुआ होगा कहानी ख़तम होने के बाद. यही कहानी की सफलता है के अपने पीछे सवाल छोड़ जाती है.

कंचन सिंह चौहान said...

"उस रात खिड़की पर कौन था ?"

ये सवाल तो मेरे ज़ेहन में भी है। अगर कोई नही या कोई वैसा नही जैसा वो था तो ये खत पहले क्यों नही लिखा गया ?

अगर नही लिखा गया तो पति से विरोध की पहले से वो सोच क्यों रखी गई, जो अज्ञात कारणों से पूरी ना हो सकी ?

विरोध का कारण पति तीन माह तक स्वयं नही बना और जब दूसरे को बनाया तो आक्रोश से, क्रोध से ही सही अपनी असमर्थता का या को कारण क्यों नही बताया ?

सवाल कई हैं मेरे भी ज़ेहन में कथ्यों मे कथा इस बार भी अच्छी है.....!!

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

सवाल तो अब भी कई हैं,

पर टीन एज हार्मोन ऐसी ही हरकतें कराते हैं,

शायद इसीलिए कहते हैं प्‍यार अंधा होता है

लॉजिक के बारे में अधिक सोचने की जरूरत नहीं रहती

फिर भी खिड़की पर साये वाला सवाल लाश नहीं बेताल है कहानी का... ऐसा मुझे लगता है...

M.A.Sharma "सेहर" said...

Kishore ye aapne hee likhii na??

dubara padhti hun !

दर्पण साह 'दर्शन' said...

कहानी पढ़ते पढ़ते दिल भारी और भारी होता चला गया, और चूंकि इस कहानी को पढ़ते वक्त जी रहा था, इसलिए मानने का मन ही नहीं हुआ की ये कहानी है और इसलिए:
"इस पत्र को पढ़ने के बाद उसे एक अजीब किस्म का संतोष मिला"
इस वाक्यांश से मैं विरोध के स्तर तक असहमत हूँ, इसका कारण है की आप विश्वास करें या न करें ये कहानी सांस ले रही थी...
ठीक उतनी जितनी मेरी बढ़ रही थी.
सच!!
इसलिए ही (बड़ा मुंह छोटी बात कर रहा हूँ) इस वाक्यांश को पढ़ के ऐसा लगा, भावनाओं को पढने वाला और इतना सटीक मनोवैज्ञानिक विश्लेषक इतनी बड़ी भूल कैसे कर सकता है?
यकीन कीजिये पत्र को पढ़ के किसी भी किस्म का संतोष नहीं मिल सकता. एक पाठक के नज़रिए से नहीं एक जिये हुए लम्हे कि वजह से ऐसा कहने पर बाध्य हुआ हूँ.
तब लगा कि कहानी पढ़ते वक्त पूर्वाग्रह को फैंक देना चाहिए.कहानी को बेहतरीन कहना इस एहसास के एहसान से उऋण होना होगा.

मुनीश ( munish ) said...

Padha, Ye sab to theek hai magar apki aur meri 'ruchi' ekdam samaan hai bhai ,kamaal hai !khoob likhaa !

Tripat "Prerna" said...

acchi kahani hai... :)

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ओम आर्य said...

maun ka khali ghar is kahani ko padh kar jyada khali ho gaya hai...

कंचन सिंह चौहान said...

@Darpan..! Duniya me sirf ek tarah ke log nahi hote... tumhara sach duniya ka akhiri sach nahi mere bhai....!

सुशीला पुरी said...

वाह !!!!!!! शैली मोहक ,कथ्य मे जान .

सुशीला पुरी said...

वाह !!!!!!! शैली मोहक ,कथ्य मे जान .

रंजना said...

कथा ने कुछ भी कहने की मनोवस्था में अभी नहीं छोड़ा है...इसलिए बस यह सूचित कर जा रही हूँ कि पढ़ लिया है....

ह्रदय से आशीर्वाद.....लेखनी की धार दिन प्रतिदिन तेज से तेज होती रहे,मंजती रहे और पाठक को आत्मविस्मृत करती रहे...यही ईश्वर से प्रार्थना है...

पूजा अनिल said...

"आपकी कहानी पढ़कर मन में यही सवाल उठा कि क्यों इंसान खुद पर भी विश्वास नहीं कर पाता, जिस से इतना लगाव उसी पर शक करना और अंततः दुःख और आंसुओं से दिल लगाना,,,, यह भी कोई जीवन हुआ!!!! छी.....!!! " आपकी लेखन शैली के हम भी कायल हो गये हैं. अगली कहानी की प्रतीक्षा रहेगी. शुभकामनाएं . पूजा

Amitraghat said...

"मनोवैज्ञानिक कहानी है इसलिये ग़लतफहमियाँ तो हो ही जाती हैं फिर चाहे वह एक दिन की हो या फिर कई जन्मों की ... अच्छी लगी
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

pallavi trivedi said...

पहली बार आपका ब्लोंग पढ़ा....बहुत अच्छी कहानी लिखते हैं आप!

गौतम राजरिशी said...

जब कथाकार-त्रयी, राजेन्द्र-मोहन-कमलेश्वर, ने कहानी की प्रचलित तमाम परंपराओं को ध्वस्त करते हुये नयी कहानी आंदोलन का आगाज किया...तो कई नये द्वार खुले। मिस्टिक...रहस्य..अबूझा...पाठकों की कल्पना पे कहानी का कुछ हिस्सा, विशेष कर अंत छोड़ते हुये।

कई द्वार खुले हैं तब से और ये किशोर चौधरी वाला द्वार बड़ा भाता है कमबख्त इन तमाम द्वारों में।

रविवार की इस सुबाह की शुरुआत इससे अच्छी और क्या हो सकती थी कि चुन्नी और टी-शर्ट की अदला-बदली वाला प्रकरण मुझे भी कई सालों पहले ले गया।

आपका लिखा तो हमेशा से विस्मित करता रहा है, कहानी के ऊपर भूमिका-स्वरुप उद्‍घोषणा आपके पढ़े पे भी विस्मित करा रहा है।

ज्योति सिंह said...

boonde nahi sitaare tapke hai kahkasha se .aksar aapki kahani alag andaaj aur alag alag sthano se judi hoti hai ,saath me bahut hi gahri jahan hame gotakhor banna padta hai aur is samundar se bahar aane me waqt bhi lagta hai .
गली के आर - पार अँधेरा और रोशनी अपने वजूद की लड़ाई लड़ चुकने के बाद सुस्ता रहे थे,aesi kai baat chhoo gayi .aapki kahani ko samjhkar padhna hota hai isi karan waqt lekar aati hoon jisse imaandaari se tippani kar sakoon .

प्रियदर्शिनी तिवारी said...

IS TARAH KA KUCHH PADHHNE KO MILE TO ACHCHHA LAGTA HAI..

shikha varshney said...

मुझे समझ नहीं आ रहा की मैं कहानी से कैसे निकलूं और उसके बारे में कुछ कहूँ....निशब्द हूँ..

manav vikash vigyan aur adytam said...

bahoot hee achhi kahanee hai

अपूर्व said...

कहानी पर पहले भी कुछ कहना चाहता था..मगर बार-बार पढ़ने के बाद भी कुछ अनपढ़ा सा रह जाता था..पकड़ मे नही आता था..और यह तब है जब कि आपकी इससे भी श्रेष्ठ कहानियाँ पहले पढ़ चुका हूँ...
सवाल पहले मेरे भी जेहन मे गूंजता रहा कि खिड़की पर कौन था उस रात..मगर फिर समझ आया कि किसी साये की पहचान की तलाश कहानी का उद्देश्य था ही नही कभी..कहानी उस शख्स को मिथ की तरह इस्तमाल करती है...बल्कि कहानी प्रेम के एक अलग रूप को ले कर चलती है..बहुत जाना पहचाना हुआ..कच्ची उम्र का यह प्रेम जिसकी परिभाषा भी उस उम्र को नही पता होती है..बस इतना पता होता है कि यह होता है..और उसी उम्र की किसी तह मे छुपा हुआ..ज्यादा महत्वाकांक्षी नही बस उसे सामने बैठ कर बातें करते देखने की ख्वाहिश भर..मगर बेहद आवेगमय..कि चुन्नी की कँवारी खुशबू भर उसे पागल कर देती है..दिन-रात जलता हुआ...और बस छूने से जड़वत्‌..प्रस्तरखंड सा जम जाता है!..लेकिन यही प्रेम किसी कांच सा नाजुक और भंगुर भी होता है...जो शक की एक दरार भर पड़ने से पल भर मे छनछना कर टूटता है..और फिर यह टूटी किरचें पूरी जिंदगी के पैरहन मे चुभती रहती हैं..हमेशा!!!उस उम्र के प्रेम की जड़े आपसी समझदारी और तर्कों पर आधारित नही होती वरन एक गहन जुनून, एक बंदिश, एक खुशबू, एक आग मे पेवस्त होती हैं...!! कुछ लम्हों के आवेग की कीमत हम सारी जिंदगी चुकाने को अभिशप्त होते हैं..मगर फिर भी किसी खुली खिड़की की तलाश जारी रहती है..हाँ एक सवाल यह भी आता है कि अगर रेशम को अपनी ससुराल मे कोई समस्या नही होती और वह अपने वर्तमान से खुश होती क्या तब भी वह खत उसको लिख पाती? मगर ऐसे सवाल ही तो कथा को जिंदगी से जोड़ते हैं..या जिंदगी मे कथा तलाशते हैं..यहाँ सूरज का सातवाँ घोड़ा याद आती है और देवदास भी!!!
और अकूतागावा के जिक्र के लिये शुक्रिया..इससे पहले राशोमोन को बस कुरोसावा के नाम से जानता था..
आपकी अगली कहानी की प्रतीक्षा भी जारी है..!!

सागर said...

कुछ सवाल मेरे मन में भी हैं... आपकी कहानियों को लेकर पर इसे शायद विमर्श कहना उचित होगा... कभी मिलूँगा तो इस पर बात करेंगे.

Sunita Sharma said...

नारी की मना स्थिति बयान करती बहुत कहानियां पढी पर पुरूष की मनोदशा पर कहानी भीतर तक उदेलित करती है उम्मीद है आपकी भाव पूर्ण कथायें इसी तरह आगे भी पढने को मिलती रहेगी आपके लेखन में कशिश है..........

pratibha said...

कहानी बहुत अच्छी लगी। नई कहानी का इंतजार है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

उस रात खिड़की पर कौन था?
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी...

usha rai said...

स्त्री-पुरुष के भीतर की पहचान इतनी मुश्किल क्यों होती है, लेकिन इतनी खूबियों और इतनी मुश्किलों के बाद भी जीवन रूमानी है.!!!
कहानी का शीर्षक ही बड़ा रोमानी है !किशोर जी ! उपर्युक्त प्रकार की पंक्तियाँ बहुत आकर्षित करती है !जिन्दगी रहस्यों से भरपूर है !
उस रात खिड़की पर कौन था ?ऐसे न जाने कितने सवाल होते हैं जिनका जवाब ताउम्र नही मिलता !बाकि जिन्दगी में जो होना होता है ,
वही होता है ! तारीफ क्या करूँ आपकी कहानी और कहानी कला की मै कायल हूँ ! अगली कहानी के इन्तजार में ,बधाइयों के साथ !

poonam said...

ek raat ki tarah
bisari yad ki tarah
avishvasi ho tum
na vishvas karate ho kisi par
na kisi ko apane upar karane dete ho


nice story .

Shekhar Suman said...

bahut hi sundar kahani hai.....
phir wapas aaunga...
umeed hai aap bhi mere blog ki taraf ka rookh karenge....

devyani said...

aapki kahaniyon ki tareef ke liye shabd nahi mil paate hain aksar, jab bhi jo kahani padhi usne bahut prabhavit kiya, sambandhon ki gahari samajh aur sateek bhasha,
badhai.. ki aap is tarah likhna sadh paate hain.

Manoj K said...

first class.. maza aagaya..

kishore ji ab to bata dijiye woh us rat kidhki par mardana awaz kiski thi??

rangoli said...

किशोर, भावनाएँ व्यक्त करने की सुन्दर भाषा है तुम्हारी जो पाठक को बाँध लेती है । कहानी की बुनावट ऐसी कि किसी को भी अपना कोई भूला बिसरा क़िस्सा याद आ जाए । शाबाश ।
बस एक जगह औरत को बाज़ारू कहना खटका । अगर औरत बाज़ारू है तो बाज़ार के उस ख़रीदार को भी किसी विशेषण से विभूषित किया जाना ज़रूरी है ।

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