Wednesday, February 3, 2010

सोचता हूँ कि ये आखिरी मुलाकात हो तो बेहतर है


पहली मुलाकात
सजला से मेरी पहली मुलाकात बाल स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम के तहत संचालित केंद्र पर हुए थी. वह क्रीम कलर की साड़ी पहने हुए दो अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्तानुमा महिलाओं से बातें कर रही थी. मैंने कई जगहों पर पता करने के बाद उसका सेल नंबर लिया था और विटामिन पोषण कार्यक्रम के बारे में एक डोक्यूमेंट्री के लिए विषय विशेषज्ञ से साक्षात्कार के सिलसिले में उससे मिलने की सहमती ली थी. मेरा नाम सुनते ही उसने बरामदे में दो कुर्सियां मंगवाई और बैठ जाने का आदर पूर्वक संकेत करते हुए कहा "कहिये मैं क्या मदद कर सकती हूँ"
"कैसा चल रहा है आपका प्रोग्रेम ?"
"बहुत बढ़िया, हमने अपने बेहतरीन प्रयास किये हैं. बच्चों के स्वास्थ्य में आशातीत सफलता मिल रही है. जिन बच्चों के पेट मिट्टी खाने और कुपोषण से बाहर और लटक गए थे वे अब नोर्मल हो रहे हैं. बच्चों ने सीखने में रूचि दिखानी आरम्भ की है. हमारे यहाँ उपस्थिति में भी बढ़ोतरी दर्ज हो रही है. हाँ... ये जो विटामिन्स का नया अप्रूवल मिला है इससे बच्चियों के स्वास्थ्य में क्रांति जाएगी.... "
मैं देख रहा था. वह देखने में बहुत सुंदर नहीं थी किन्तु भरी पूरी देह, नाम अनुरूप सजल आँखें और भूरे बाल उसे विशिष्ट बनाते थे और वह बोले जा रही थी. कुछ अन्तराल से जब उसने, मुझे मुस्कुराते हुए देखा तो थोड़ा रुकी और फिर बोली.
"हमारे पास मासिक आंकड़े भी हैं और आप चाहें तो मैं उनकी कॉपी करने की अनुमति दे सकती हूँ. ओफिसियल चाहिए तो फिर आर टी आई लगाईये. वैसे तो हम सिर्फ ये ध्यान देते हैं कि जवाब चाहे जैसा हो उसका डिस्पेच तीस दिन में हो जाये पर आपको चूँकि अपनी रिपोर्ट के लिए चाहिए और आप यहाँ तक आये हैं तो मैं आपको ये तीन दिन में उपलब्ध करवा दूंगी."
मैंने कहा "सजला जी, मुझे फोर्मल जानकारी नहीं चाहिए. आपसे मिलने का खास मकसद था आपका विचार जानना कि खाने के बाद विटामिन जरूरी है या विटामिन के बाद खाना ? यानि भोजन नसीब है या नहीं ? " लेकिन वह उसी अंदाज में बात करती रही. मैंने कई सारे प्रश्न किये "इस सब महत्वपूर्ण काम में भी घपले हैं. मंत्री और अफसरशाह हर स्तर पर समझौता करते हुए अपने घर भर रहे हैं. एक मंत्री के बेटे की फ़र्म ने विटामिन की गोलियां सप्लाई की है अब इसकी जांच के लिए विपक्षी जोर लगा रहे हैं."
"ये सब राजनीति में चलता रहता है सबकी खाने खिलाने की बारी आती है तो रोने रुलाने की भी आएगी लेकिन हमारा मकसद है योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, आप हमारे बच्चों का स्वास्थ्य देखिये और उनकी फुटेज लीजिये."
मैं फिर मुस्कुराया और कहा शुक्रिया आपसे सरकारी संवाद पूर्ण हुआ. सरकारी संवाद शब्द पर वह भी मुस्कुराई. चाय और बच्चों के शोर के बीच कुछ समस्याओं के बारे में हमने बात की थी. मुझे पंद्रह सैकेंड का बिट चाहिए था. वह इस अनौपचारिक संवाद में मैंने चतुराई से निकाल लिया था. मेरा केमरामैन दाहिने हाथ का अंगूठा ऊपर कर गाड़ी की ओर चला गया. एक अनुभवी सरकारी सेवक आपको कोई आत्मीय अभिवादन दे तो हिंदुस्तान में आप उसे भूल नहीं सकते तो मुझे भी याद रहा कि उसका नाम सजला है. पोषण विशेषज्ञ का काम देखती है और उसके वेतन का सारा जिम्मा यूनिसेफ का है.

दूसरी मुलाकात
मैं उस दिन कुछ और जगहों पर अपने काम की चीजें देख कर लौट आया था महीने भर बाद एक दिन अचानक मेरे फोन पर अपरिचित स्वर सुनाई दिया. " नमस्ते... मैं सजला, यूनिसेफ से, पोषण कार्यक्रम के सिलसिले में आपसे एक बार बात हुई थी." मुझसे आश्चर्य हुआ किन्तु जिज्ञासा थी कि कैसे याद किया है मुझे "सजला जी पहचान लिया आपको."
मेरी ख़ामोशी के बाद, उसने कहा. "कल आपके शहर में रही हूँ, सोचा एक मुलाकात करती चलूँ." वह एक अनौपचारिक स्वर था. मैंने कहा कि "मैं आपकी प्रतीक्षा करता हूँ जरूर आईयेगा." अगले दिन एक सहज मुलाकात हुई. चाय का कर्ज उतारने जैसे हलके हास्य के बाद मालूम हुआ कि शादीशुदा हैं... हबी पेट्रो केमिकल कंपनी में है और एक बिटिया है. जो अभी स्कूल जाना सीख रही है और हाँ साहब अक्सर टूर पे रहते हैं पर इसका मतलब यही है कि मुझे भी अपने काम से फुरसत उतनी ही मिलती है जितने समय वे घर पर होते हैं. उस मुलाकात में और ख़ास कुछ नहीं था लेकिन उसके जाने के तीन चार दिन बाद मुझे याद आया कि हम कोई तीन घंटे साथ रहे. है ना खास बात दूसरी मुलाकात में ऐसा कम ही होता है, वह भी किसी स्त्री की पहल पर.


तीसरी मुलाकात
मैंने चाय पीते ही कहा कि आज मेरे पास डबिंग का बहुत सारा काम है, आपको अधिक समय नहीं दे पाऊंगा. वह चली गयी और मैं दिन भर बेवजह इधर उधर टहलता रहा. मैं इतना खाली था कि पान की दुकान पर भी भीड़ दिखाई देती रही.

चौथी मुलाकात
हमने चाय पी और उसने बताया कि आज किसी बैठक में जाना है, कलेक्टर भी रहेंगे इसलिए जरूरी है. वह चली गयी मगर उसके जाते हुए कदमों की आवृति से मुझे जो धोखा हुआ, वह था कि उसे आज कोई काम नहीं है.


पांचवी मुलाकात
यानि अब हम फोन पर बहुत देर बात किया करते थे और मुलाकातें सुनियोजित तरीके से हो जाया करती थी. पांचवी मुलाकात में मुझे मालूम हुआ कि वह वर्षों तक बुने गए प्रेम के अकस्मात ध्वस्त हो जाने के पश्चात आंसुओं से धुले हुए गालों को पोंछती हुई दस साल पहले कई महीनों तक बागीचों और सुनसान जगहों पर घूमती रही. फिर उसने विज्ञान में स्नातक होने के लिए महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया.
कॉलेज से बाहर निकलते ही एक आईसक्रीम पार्लर था. उसका नाम था रिवाइव. क्या फर्क पड़ता है नाम से ? आपको तो आईसक्रीम से मतलब होना चाहिए ना, लेकिन वह इस नाम को देखते ही महसूस करती कि उसकी सांस कुछ धीमे हो गयी है, रक्त थमने लगा है. क्योंकि ऋषि नाम भी आर से ही शुरू होता है. यह क़स्बे के प्रेम की दास्तान थी. जिसे उसने कहा कि इसे प्रेम मत कहो, इससे बढ़ कर कोई संज्ञा हो तो बताओ. खैर पास में ही था ऋषि का घर. उसके घर से कुछ ही दूर यानि एक दूसरे से सटे खड़े, दो नीम की टहनियां पकड़ कर आप अगर एक दूसरे पर जा सकें तो उसकी बालकनी तक पहुँचने में सिर्फ ऋषि के हाथ आगे करने जितनी दूरी रहेगी.
ऋषि से उसे क्या लगावट थी, उसे मैं सिर्फ एक पंक्ति में कहूँ तो कुछ ऐसा होगा कि "कुछ स्थितियां आपको ढंग से रोने भी नहीं देती."
ऋषि के लिए एक सुंदर सा कमरा था. उसमे उन दिनों उपलब्ध हो सकने वाली सब आधुनिक सुविधाएँ थी. उसके लिए मम्मी और पापा बेहतरीन व्यवस्था रखने को कृतसंकल्प थे. घर में आते ही उसे हाथ धोने होते थे यानि मामला बच्चे के अच्छे संस्कारों का था. ऋषि की इन सब सुविधाओं से सजला को कोई लगावट ना थी किन्तु वह दसवीं में पढ़ते समय ही ग़ज़लें सुनने लग गया था, कुछ गहरी नज़्में भी. सजला को उसी ने बताया कि ग़ज़ल का पॉवर क्या होता है.
मैंने कहा कि ग़ज़ल या गीत सुनना अपनी अपनी समझ पर निर्भर करता है. मैं भी सुनता हूँ हालाँकि मुझे भी ग़ज़ल अधिक पसंद है. मैंने जब ऐसा कहा तब सजला चाय के कप में देख रही थी, फिर उसने स्लोमोशन में अपनी नज़रें ऊपर उठाई जैसे कोई सिद्धहस्त केमरामैन किसी लॉन्ग शोट से क्लोज अप पर आता हो.
"तुमको क्या दुख है जो ग़ज़लों से दोस्ती हो गयी ?"
"तो क्या जिनको दुःख होता है वे ही ग़ज़लें सुनते हैं ? ग़ज़ल तो खुदा की नेमत है..."
"तो दुःख ..."
ये दो शब्द बोल कर वह चुप हो गयी किन्तु उसने आँखें स्थिर ही रखी. बाद इसके जो मालूम हुआ वह काफी सीलन से भरा था. ऋषि के मम्मी पापा वास्तव में उसके चाचा चाची थे. अपने कोई संतान ना होने के कारण उन्होंने बड़े भाई साहब से ऋषि को मांग लिया था. ऋषि आराम से ही बड़ा होता किन्तु दस साल बाद चाची की गोद भी हरी हो गयी. एक बार नहीं दो बार. ऋषि के लिए सब रास्ते बंद हो गए. वह जिनके साथ रहना चाहता था, वे उसके रहे नहीं और जिस झोली में सौंप दिया गया था वहां उससे अधिक चहेते गए थे.

अव्यक्त चुप्पी के बाद मैंने कहा "तुम शायद इसीलिए उससे प्यार करती थी." उसकी आँखों में एक स्वीकृति कौंधी और बुझ गयी पर वह मुझ से बात करके खुश थी उस दिन.


छठी मुलाकात
मैंने उसे पूछा कि फिर क्या हुआ ? कुछ खास नहीं हम रोज स्कूल से साथ घर लौटते थे वह ग़ज़लों की बातें करता और मुझे ऑडियो केसेट्स दिया करता था. हमने कभी प्रेम जैसे किसी शब्द के बारे कोई बात नहीं की थी मगर वह था हमारे बीच. एक दिन मैंने, उसको पकड़ लिया यानि वह बहुत शरमाता था तो एक सहेली को राजी किया और उसके घर पर उसको बाँहों में भर के खूब देर चिपकाए रखा. पता है उस दिन वह रो पड़ा.... जबकि चाचा चाची से मिली उपेक्षा पर उसने कभी आंसू नहीं बहाया था और अपने मम्मी पापा की याद आने पर अपना चेहरा आसमान की तरफ कर लिया करता ताकि सब आंसू गले में ही उतरें.

सजला को कुछ भी कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे. मैंने अपना नीम्बू पानी का ग्लास होठों से लगा लिया.

सजला ने अपने पर्स से क्रिकेट वर्ल्ड कप की ओफिसियल चुइंगम निकाली और मुझे दी, इस प्रकार उसने अपने और मेरे चेहरे पर ठहर गए पानी में एक कंकड़ फेंका.
"...फिर मेरे पापा का स्थानांतरण हो गया हम उस क़स्बे को छोड़ कर उदयपुर चले आये, वहां भी तीन साल बाद वह मिलने आया पर तब उससे मेरी मुलाकात नहीं हुई."
सजला चली गयी, मैं कभी हमारी दो साल पुरानी दोस्ती के बारे में सोचता, कभी मेरे मस्तिष्क में सिर्फ ऋषि के हालात खड़े होते और कभी एक लड़की का उन स्थितियों से उपजा समर्पण.


सातवीं मुलाकात
तीन सप्ताह बाद
रात ग्यारह बजे के बाद सजला का फोन आया. "मुझे बहुत जरूरी बात करनी है, मैं बहुत परेशान हूँ." मुझे भी उसकी आवाज़ में बहुत अनिश्चितता सुनाई दी. मैं पूछता उससे पहले, सजला ने कल मिलने पर ही सब बताने का कह कर गुड़ नाईट कहते हुए फोन रख दिया.

टेबल, कुर्सियां, कारपेट, टेडी, वाल हेंगिंग और कॉफी हाउस सभी चुप
खामोशी में किसी मग में एक्स्ट्रा चीनी घोले जाने से आती आवाज़ में जो सुनाई देता था वह था कि ...
उसने प्यार किया था यानि अंदर का इन्द्रधनुष अमिट रूप से खिला हुआ था. मन किसी के नाम कर दिया तो उससे बड़ा कोई दानी भी ना था. उसने देह को सौंपा था, क्योंकि मन के बाद देह का मूल्य नाशवान हो चला था. कुदरत की बनाई काम - कारीगरी से अनजान ना थी, देह की ऊष्मा और चंचल मन के आचरण, उससे छुपे ना थे और उनका दमन कैसे किया जाये इस हुनर में पारंगत थी.

यू आर मेरिड
हेप्पिली मेरिड
मोम
ए गुड मोम
देन
नथिंग
सो
... चुप्पी दीवारों से टकरा कर लौटती रही और सजला सच में इतनी खामोश बैठी थी कि एक समंदर जितना दुःख आँखों से उतार कर, उसे अपने पहलू में रखे कोई सदियों की एक सांस लेता हो.

अचानक उसने मेरे हाथ पर तेजी से अपना हाथ रखा और बोली कि मैंने तुममें एक अच्छा दोस्त देखा है इसलिए प्लीज मेरा फेवर करो और फिर पर्स से एक फोटो निकाल कर टेबल पर औंधा रख दिया.

अब नहीं संभाला जाता मुझसे ...कहती हुई वह झटके से उठी और केफेटेरिया के बाहर भीड़ में खो गयी

[Painting Dreaming Horses : Courtesy -www.oceansbridge.com ]

54 comments:

"Darshan" said...

मुझे खुशी इस बात की है कि मैं आपका ब्लॉग ढूंढ़ पाया और दुःख इस बात का कि काफी देर के बाद !!
लेखनी में काफी बारीकियां हैं ,कहीं से मौक़ा नहीं देती की कोई पाठक दूर जाने की कोशिश भी करे ,इन भावनाओं और विचारों से दूर !

"खामोशी में किसी मग में एक्स्ट्रा चीनी घोले जाने से आती आवाज़ में जो सुनाई देता था वह था कि ..."

मैं पुरे समय इस कहानी से बंधा हुआ सा महसूस करता रहा ! सोचो कि दिन की शुरूआत वो भे आफिस में आपके इस लेख से हुई !!
मन हर्षित हो उठा है !!
धन्यवाद

प्रथमा कि कहानी भी इतनी ही संवेदनशील थी !! .....

निर्मला कपिला said...

बहुत संवेदनशील कहानी है प्रवाहमय एक सांस मे पढ गयी । धन्यवाद

कुश said...

दाहिने हाथ का अंगूठा ऊपर कर रहा हूँ..

मुलाकातों के माध्यम से कथा की प्रस्तुति उम्दा बन पड़ी है.. मजे की बात है की आपने कैरेक्टर बिल्ड करने में ज्यादा समय नहीं लिया और बड़ी ही चतुराई से किरदार खड़े कर दिए.. यहाँ तक की ऋषि की कशमकश तक विज्युलाईज की मैंने.. यही होना चाहिए एक पूर्ण कथा में..

कुछ लाईन्स तो कमाल थी सचमुच.. जैसे "प्रेम से बढ़कर कोई संज्ञा" "आसमान की ओर मुंह करके रोना.." "वर्ल्ड कप की ओफिसियल चूईंगम" और "मग में एक्स्ट्रा चीनी घोले जाने की आवाज़" वाकई एक से बढ़कर एक पंक्तिया है..

यदि नंबर दस में से देने हो तो आठ तो दूँगा ही..

रचना दीक्षित said...

ऐ भैया ये एक्स्ट्रा खोपड़ी कहाँ से लाये हो हमें ही तो पता बता दो. कितनी सुलभता से कितनी भी गंभीर बात कह जाते हो. जाने कितने ही नए फ्रेज़ लिख देते हो कुछ पता भी है, जैसे दाहिने हाथ का अंगूठा, ओफिशियेल चुइंगम क्या क्या लिखूं !!!!!!!!!!!!!
बहुत बढ़िया आपकी कलम और बेहतर होगा की आपका की बोर्ड यूँ ही चलता रहे
बधाई

Sanjeet Tripathi said...

शानदार,
शब्दों की बुनावट बेहतरीन है कि उनसे भटक जाने का समय ही नहीं मिलता।

Arvind Mishra said...

नायिका को मैंने भी कहीं देखा है ऐसा लगता है -तुरंत मन हुआ की सम्पर्क सूत्र वगैरह ढूंढें जायं मगर फिर सोचा छोडो आखिर इमेज से ज्यादा समझौते नहीं किये जाने चाहिए !दोस्ती मुबारक !

डॉ .अनुराग said...

बहुत कुछ मिला मुझे......कुछ जाना पहचाना .कुछ अनजाना ....कुछ दरिया अपनी गहराई उतरने के बाद बताते है ......करेक्टर्स मुझे कहानी के किरदार नहीं लगते ...असल जिंदगी के है ...बस उन्हें कहानी में बिठाया गया है .....


अगेन एक "किशोराना अंदाज"......

अनिल कान्त : said...

aap aur aapke kahne ka andaaz !

रंजना said...

कहानी का ताना बना आप ऐसा बुनते हैं कि पाठक के लिए संभव ही नहीं कि उसकी गहराई में पूर्णतः डूब उसके प्रवाह संग बहने से स्वयं को रोक सके....
इसी प्रवाह में डूबी बही जा रही थी कि अचानक उसके अंत ने झटका सा दिया....पता नहीं क्यों पूरी तरह समझ न पायी अंत को...

हो सके तो थोड़ी मदद कीजिये....

dimple said...

हर इंसान की अपनी कहानी होती है पर हर कहानी को कोई लेखक भी मिले जरूरी नहीं.
वो लोग जाने कैसे होते है जिनके ज़िन्दगी के लम्हों को कोई लफ्ज़ दे देता है.
सजला से पहली मुलाकात यूँ लगती है कि पोस्ट कोई interview है शायद.मगर आगे बढ़ने पे कोहरा झड़ता जाता है.ऐसे लगता है किसी सपने को पढ़ रहे है.
हर मुलाकात यूँ लगती है...
हर बार बिछड़ने पे सोचता हूँ अक्सर.
कही इतफाक से मिलना तेरी आदत तो नहीं.

मगर सजला कई महीनों तक बागीचों और सुनसान जगहों पर घूमती रही. तीन साल बाद वह मिलने आया पर तब उससे मेरी मुलाकात नहीं हुई.किस्मत की बात है वरना चांदनी नागवार किसको है,
हेमिंग्वे का उपन्यास old man and the sea मे८४ दिनों की भूख और प्यास के बाद मछेरा कहता है कि क्या ८५ वे दिन थोड़ी सी किस्मत नहीं खरीद सकता.मेरा ख्याल है कि किस्मत को खरीद लेना अब मेरा हक बनता है.८४ दिनों की भूख और प्यास से मैं उसकी कीमत चूका चुका हूँ.
"चुप्पी दीवारों से टकरा कर लौटती रही और सजला सच में इतनी खामोश बैठी थी कि एक समंदर जितना दुःख आँखों से उतार कर, उसे अपने पहलू में रखे कोई सदियों की एक सांस लेता हो.इन पंकतियो में सजला की बेचैनी नज़र आती है जो उसकी इक उम्र जितनी लम्बी या उससे भी.
बेवजह इधर उधर
मैं इतना खाली था कि पान की दुकान पर भी भीड़ दिखाई देती रही.
"कुछ स्थितियां आपको ढंग से रोने भी नहीं देती."टेबल, कुर्सियां, कारपेट, टेडी, वाल हेंगिंग और कॉफी हाउस सभी चुप
खामोशी में किसी मग में एक्स्ट्रा चीनी घोले जाने से आती आवाज़ में जो सुनाई देता था वह था कि..
किस किस बात का जिक्र करे.
@डॉ .अनुराग किशोराना अंदाज"

Parul said...

aapke blog par aana sarthak hua...
bahut hi umda tarike se pesh karte hnai aap...

pukhraaj said...

यू आर मेरिड
हेप्पिली मेरिड
मोम
ए गुड मोम
देन
नथिंग
सो
... चुप्पी दीवारों से टकरा कर लौटती रही और सजला सच में इतनी खामोश बैठी थी कि एक समंदर जितना दुःख आँखों से उतार कर, उसे अपने पहलू में रखे कोई सदियों की एक सांस लेता हो.
और अचानक कहानी ने करवट ली ... सजला से मुलाकात के सिलसिले में इतना खो गए कि अगले दिन का इंतज़ार था .. पर सजला आई और ख़ामोशी के साथ अपना बोझ दोस्ती के नाम कर गयी ... कितना विश्वास था इस छोटी सी दोस्ती में .. दोस्ती छोटी बड़ी हो सकती है पर विश्वास बड़ा था ...
कहानी इतनी यथार्थ लगती है कि लगता है कि लिखते लिखते आपके पात्र भी आपसे बात करने लगने लगते होंगे और वही बता देते होंगे कि आगे उन्हें क्या कहना है ....

Sunita Sharma said...

भावुकता से भरी हुई .......

sanjay vyas said...

दूसरी बार पढ़ रहा हूँ,टिप्पणियों सहित.

वाइरल ने दो दिन से पस्त कर रखा है.

जो कहना चाहता था वो उक्त दोनों पंक्तियों के बीच में है. काफी बड़े अवकाश को घेरता.

Udan Tashtari said...

पढ़ना शुरु किया और बहते चले गये. गजब की प्रभावी लेखनी है और मुलाकातों का समा तो बड़ी देर छाया रहेगा. वाह!

"अर्श" said...

बस आधी पढ़ पाया हूँ इस कहानी को पूरी होने तक के लिए फिर से आता हूँ ... इंतज़ार करोगे ना ..?


अर्श

गौतम राजरिशी said...

हमेशा की तरह...संवादों, शब्दों के जरिये खड़े किये गये किरदार, कथा को आगे बढ़ाते हैं और कहानीकार के अद्‍भुत शिल्प और भाषाई पकड़ से पाठकों को अचम्भित करते जाते हैं।

हमेशा की तरह कई जुमले सहेजे जाने लायक, डायरी में नोट करके रखे जाने लायक।

हमेशा की तरह प्रेम अपने विचित्र रंग-रूप में।

हमेशा की तरह सब कुछ प्रेडिक्टेबल होते हुये भी एक कौतुहल बना रहता है।

हमेशा की तरह हम किशोर के तिलिस्म में उलझे जाते हैं... :-)

आनन्द वर्धन ओझा said...

किशोरजी,
मुलाक़ात की चंद किस्तों में पूरा अफ़साना उठ खड़ा हुआ है. शब्दों की जादूगरी का हुनर तो बस आपकी कलम को हासिल है. कहानी का ग्राफ्ट खूब प्रभावित करता है. शब्दों की सुई में जो बारीक सुराख है, उसमे भावनाओं की कीमती डोर डालकर एक अनूठी कथा-माला तैयार कर देते हैं आप, जिसमे नए जुमलों और लेखन के नए तेवर का मोती-मानिक भी पिरो देते हैं !
आपकी इस मार्मिक अभिव्यक्ति, कथा-शैली और अधुनातन प्रयोगों का कायल हुआ जाता हूँ ! वाह ! क्या सलीके से कह गए आप एक अदद ज़िन्दगी की पूरी दास्ताँ !
साधुवाद बन्धु !
सप्रीत--आ.

ज्योति सिंह said...

अभी तो मैं सिर्फ मुलाकातों की गिनती करती रही और चकरा के लौट आई ,सोची कही इसी ब्लॉग पर na कई रोज का सिलसला चलता रहे ,इसलिए सब जगह अवकाश की अर्जी लगाकर आना पड़ेगा .

अपूर्व said...

पिछली कुछ ’भारी-भरकम’ और जटिल शिल्प वाली गूढ़ कहानियों के बाद एक सहजतापूर्ण पोस्ट को देखना सुखद रहा, हालाँकि कहानी का ’किशोर-पन’ पूरी तरह झलकता है..समय के साथ बदलती नारी-मन की मनोदशा की मनोवैज्ञानिक पड़ताल के साथ ही एक पुरुष मनोस्थिति द्वारा उसका ’व्यू’ एवं उतना ही ’काम्प्लीकेटेड रिस्पॉन्स’ इसको कई बार पढ़ने को बाध्य करता है...
..एक चीज जो आकर्षित करती है आपकी कथाओं मे.. जो गठन होता है कहानियों का..तराशा हुआ..कि पाठक बस बैकसीट पर ही होता है..और स्टेयरिंग लेखक कभी अपनी कलम की पकड़ से छूटने नही देता है..और फिर जिन एक-लाइना तंतुओं से आप जो शिल्प बुनते हैंे..उसका जादू बस बार-बार पढ़ने पर ही समझ आता है..जैसे कि चेहरे के ठहरे पानी मे च्यूइंगम का कंकड़ या आसमान की ओर मुँह कर गले से आँसू उतारने की कोशिश या एक अव्यक्त चुप्पी या समंदर की सदियों की एक सांस....हाँ अपनी कहानियों मे जिस तरह आप ’बाइपास’ कर जाते हैं कुछ चीजों को..इसे और मजेदार बना देती है..
वैसे यूनिसेफ़ की औपचारिक ’सरकारी’ बातचीत से शुरू हुआ परिचय का सफ़र कितनी जल्दी छाया-चित्र मे छुपी असहज स्मृतियों के बोझ से मुक्ति का माध्यम बन जाता है..पता चलता है कि एक कहानी मे कितनी कहानियाँ छुपा कर सुरक्षित रखी जा सकती हैं..
एक बात और कि क्या यहाँ पात्रों के नाम भी कुछ इंगित करते हैं क्या..?

दीपक 'मशाल' said...

किशोर जी, लगा कि एक उपन्यास को एक पेज में सिमेट दिया आपने कुछ ही क्षणों में कितनी भावनाएं, संवेदनाएं औए जिंदगियां जी गए...
बहुत कुछ मिलेगा इस ब्लॉग पर सीखने को समझने को...
जय हिंद... जय बुंदेलखंड...

neera said...

प्रेम को इतनी निश्छलता और महीनता से कोई पानी कि सतह पर कैसे बुन लेता है!!
आखरी मुलाक़ात हो या नहीं क्या फर्क पड़ता है..

वाणी गीत said...

सजला की सजल कहानी ... संवादों में ही पूरी ...वही ख़तम ...!!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

यूं ही लिखते रहो. पढ़ना अच्छा लगा. ध्यान आया कि बोझ की विशेषता है कि वह कम-बढ़ नहीं होता, सिर्फ एक कंधे से चलकर दूसरे पर आ जाता है. हाँ कुछ कन्धों पर विशेष मेहरबान होता है.

Anil Pusadkar said...

बेहतरीन शब्द चित्रावली।शब्दों को पढने की जगह दिखाने मे सफ़ल रहे हैं आप्।शब्द विन्यास भी ऐसा कि शुरूआत से लेकर अंत तक भटकने का कंही कोई मौका नही।शानदार,जितनी तारीफ़ की जाये कम ही होगी।

कंचन सिंह चौहान said...

हम्म्म्म्म....! मुझे जितना आश्चर्य आपकी कहानी बुनने की कला पर होता है, उससे कम आश्चर्य उन पर नही होता, जो इस पर कमेंट दे लेते हैं।

अब देखिये ना कल ही पढ़ लिया था कहानी को, मगर आज तक कमेंट के लिये शब्द नही ढूँढ़ पाई।

एक साधारण कथानक , जिसे आप अपने कथ्यों से असाधारण बना देते हैं।

एक ऐसी कहानी जो असाधारण तो नही मगर साधारण भी नही......!!!

इससे अधिक शब्द मुझ बातूनी के पास नही....!!!!

monali said...

Aur main sochti hu ye mulaaqat shuruwaat ho...

Tripat "Prerna" said...

bahut bahut khoob :)
badi hi manmohak rahi aapki sabhi mulakaatien :)

http://sparkledaroma.blogspot.com/
http://liberalflorence.blogspot.com/

Apanatva said...

der aae durust aae.......
aapkee lekhan shailee ko naman.......

ओम आर्य said...

आप रेगिस्तान के करीब के हैं सो आपको भली-भांति पता है कि हवाएं कैसे रेत पर निशाँ छोड़ जाती है...शायद उसी अनुभव और ज्ञान से आप कहानी के कथ्य और शिल्प से पाठक के मस्तिष्क पे इतने गहरे निशाँ बना देने में समर्थ होते हैं...

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

.....और मुझे खुशी है कि मैं आपके ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ ....कभी खुला तो कभी साइलेंट!

अनामिका की सदाये...... said...

khani shilp bilkul adbhut hai...samwado mulakato k jariye kahani ko itni safalta se aage badhana aur pathak ko ant tak bandhe rakhna wakeyi kabile tareef hai..lekin ant ko bar bar padh kar bhi purnteh sapasht nahi ho paya...lekin jin shabdo ko chayan kiya hai..bahut behtareen hai..kuchh aise shabd bhi hai jo bhule nahi bhulengi..kamal ka lekhan hai apka.badhayi is kahani ki safalta par.

usha rai said...

क्योंकि मन के बाद देह का मूल्य नाशवान हो चला था. कुदरत की बनाई काम - कारीगरी से अनजान ना थी, देह की ऊष्मा और चंचल मन के आचरण, उससे छुपे ना थे और उनका दमन कैसे किया जाये इस हुनर में पारंगत थी. !!!
आपकी कहानियों में बाहरी और भीतरी घटनाओ का गज़ब का संयोजन होता है !कहानी सहज और सुंदर है ! कहानी का अंत कहानी के शीर्षक में है !बहुत बहुत बधाई

अल्पना वर्मा said...

'मन किसी के नाम कर दिया तो उससे बड़ा कोई दानी भी ना था..... देह की ऊष्मा और चंचल मन के आचरण, उससे छुपे ना थे और उनका दमन कैसे किया जाये इस हुनर में पारंगत थी.'
कितनी कुशलता से भावों को शब्दों में ढाल लेते हैं आप!
कहानी कल्पना ना हो कर हमारे बीच में से ही kisi एक चरित्र की गाथा लिख दी है जैसे..सब कुछ चल चित्र बन गया है जैसे...
अक्सर जीवन में दोस्ती की अहमियत रिश्तों से कितनी अधिक हो जाती है..और उस पर बँधा विश्वास भी....
बहुत अच्छी कहानी..

प्रकाश पाखी said...

अनुराग जी,अपूर्व जी,और गौतम जी,की सटीक टिप्पणियों से सहमत हूँ...किशोरान अंदाज और जादू बरकरार है...अंत में थोड़ी उलझन होती है कहानी को समझने के लिए..थोडा और खुलासे की उम्मीद पाठक करने का हकदार है..जैसे सजल लेखक से क्या चाहती थी,क्या औंधा रखा फोटो ऋषि का था...मेरिड...हेप्पिली मेरिड...संवाद किसके लिए थे...इत्यादि...शायद मैं कम समझ पाया हूँ...पर किशोर की कहानी का जादू शुरू से अंत तक सर चढ़ कर बोलता है...संवाद मानो मुग्ध ही कर देते है...

सुशीला पुरी said...

संवेदना से लबरेज ..........कथ्य की नवीनता के साथ ही आपकी कहानी शिल्प का अनोखा सौन्दर्य रचती है .

मुनीश ( munish ) said...

why are all calling it 'story' ? can't it be ur memoir' perhaps ! I have seen ur profile and i can day that we have SAME , absolutely same hobby !

shikha varshney said...

.किशोर जी ! बहुत ही प्रभावी लेखनी है आपकी...और धरा प्रवाह शैली..पूरी कहानी मुलाकातों के जरिये अपने साथ बहती चलती है...किरदार जाने पहचाने से लगे

neelam said...

सजला जी का पूरा वृत्त चित्र पर ऋषि और कथावाचक का सम्बन्ध पाठकों को ............................ऊपर से तुर्र्र्रर्र्र्रर्रा ये की वो फोटो भी औंधे मुंह रखवा दी किशोर जी ये पब्लिक है सब जानती है
कुल मिलाकर बेहतरीन कहानी या रिपोतार्ज जो भी कहें ,आगे भी आपसे कुछ ऐसी ही उम्मीदें हैं गिने -चुने लोग ही हैं जिन्हें जहां होना चाहिए वो वहाँ पर हैं संभवतः आप भी उनमे से एक हैं .

सागर said...

मुझे जितना आश्चर्य आपकी कहानी बुनने की कला पर होता है, उससे कम आश्चर्य उन पर नही होता, जो इस पर कमेंट दे लेते हैं।

कहानी को, मगर आज तक कमेंट के लिये शब्द नही ढूँढ़ paya.

udhar ke comment .) same feeling.

varsha said...

kanchanji ki baat se sahmat hote hue sagar ka tareeka apnakar prakaashji ke comment par apna thumb print kar rahi hoon थोड़ी उलझन होती है कहानी को समझने के लिए..थोडा और खुलासे की उम्मीद पाठक करने का हकदार है..जैसे सजला लेखक से क्या चाहती थी,क्या औंधा रखा फोटो ऋषि का था...मेरिड...हेप्पिली मेरिड...संवाद किसके लिए थे...इत्यादि...शायद मैं कम समझ....khair ulia.. parmindar..sajla...intzaar bana rahega.

Babli said...

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया लगा ! बधाई!

पारूल said...

ये नाम कित्ते अच्छे हैं-सजला,कमली

INDRADHANUSH said...

शुकि्या अपने ब्लाग तक लाने के लिए,बहुत ही प्रवाहमयी कहानी है, एक सांस में बिना रूके पढ़ गई।

manu said...

written very brilliantly...........
with a profound thought . many thanks to visit my blog

Vinod Kumar Nath said...

What else to say about this. Awesome as always, thanks for providing us such classic stories, keep writing...

M.A.Sharma "सेहर" said...

hmmmm....soft..silk kee tarah smoothly chalti rahee ant tak...vahee aapka andaaz !!

sarkari samvaad ..:))"bahut dino baad fir se aapko padhna achcha laga "

वन्दना अवस्थी दुबे said...

किशोर जी, इतनी देर से आने के लिये क्षमा चाहती हूं.
नई कहानी की विधा में आप इतनी सुन्दर और सहज कथा कह देते हैं कि कई बार अचरज होता है, आपके वाक्य-विन्यास पर. माहौल को जीवन्त कर देते हैं आप. इतना सजीव चित्रण कम ही मिलता है. बधाई.

Apanatva said...

Happy holi

दीपक 'मशाल' said...

इस बार रंग लगाना तो.. ऐसा रंग लगाना.. के ताउम्र ना छूटे..
ना हिन्दू पहिचाना जाये ना मुसलमाँ.. ऐसा रंग लगाना..
लहू का रंग तो अन्दर ही रह जाता है.. जब तक पहचाना जाये सड़कों पे बह जाता है..
कोई बाहर का पक्का रंग लगाना..
के बस इंसां पहचाना जाये.. ना हिन्दू पहचाना जाये..
ना मुसलमाँ पहचाना जाये.. बस इंसां पहचाना जाये..
इस बार.. ऐसा रंग लगाना...
(और आज पहली बार ब्लॉग पर बुला रहा हूँ.. शायद आपकी भी टांग खींची हो मैंने होली में..)

होली की उतनी शुभ कामनाएं जितनी मैंने और आपने मिलके भी ना बांटी हों...

अल्पना वर्मा said...

आपको सपरिवार होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं

वन्दना अवस्थी दुबे said...

होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आपके लिखे में जो बांधे रखने की क्षमता है वह बहुत कम लोगों में दिखाई पढ़ती है ..सजला आपका बुना चरित्र है या सच्चाई पर ज़िन्दगी की सचाई के बहुत करीब है ...आप में जो खूबी है वही सबको अपनी बात कहलवा देती है ...बहुत बहुत पसंद आई यह पोस्ट

indu puri said...

कुछ नही लिख पाऊँगी...सजला मुझ में सांस लेने लगी है और....उन साँसों को महसूस कर रही हूँ.प्यार इश्वर से कम नही ...और उसमे डूबने वाले उसके बंदे मेरे लिए 'उसके' बंदे से कम नही.और.........एक मुकाम पर दोनों एक हो जाते हैं खुदा और उसके बंदे.
तस्वीर अपने से अलग कर दी..अच्छा किया.यही होना चाहिए....उसके फेसले को मान देती हूँ.क्या करू?
ऐसिच हूँ मैं तो. उदास नही होऊंगी इसे पढ़ने के बाद.

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