परमिंदर के इंतजार में ठहरा हुआ समय
किसकी कहानी
ये किस्सा विकास देव और परमिंदर कौर नामक क्रमशः साढ़े सोलह और सोलह साल के ग्यारहवीं के एक छात्र और छात्रा का ना हो कर उनके आस पास के परिवेश और समय का है। विकास स्थानीय था जबकि परमिंदर इस शहर के लिए नवीन थी। शहर में नवीनता पर रोक नहीं थी वरन उसको उकसाया जाता था और अधिक नवीन हो कर आश्चर्य रचने के लिए। ये हवा चारों तरफ़ थी, अलीगढ से ताला बेचने कोटा आने वालों को यहीं पर ज्ञान प्राप्त हुआ कि भांग उनके कुओं ही नहीं, सबमें पड़ी है। यहाँ तो इसके आचमन पर उंगली उठाना राष्ट्रद्रोह घोषित किया जा चुका था, स्त्रियाँ ताले में लगने वाली चाबियों की संख्या पूछ कर ठिठोली करती दीख पड़ती थी तो अन्य बेशर्मी से ताला कब तक मजबूत रहेगा का प्रश्न किया करते थे।
उदघोषणा
स्कूल खुलने के पंद्रहवें दिन संस्कृत के व्याख्याता देवदत्त बजरंगी ने पूरी कक्षा को चेताया कि जिस महाकाल की आशंका व्यक्त की जा रही थी वह अब क्षण भर की दूरी पर है, स्काईलेप के गिरने के समय स्कूल के ठीक सामने स्थित गायत्री मन्दिर में श्लोक उच्चारण से टली बाधा अब नए रूप में कभी भी आ सकती है। सृष्टि के सभी तत्वों से मिल कर जिस श्रेष्ठ तत्व का निर्माण होता है वह चरित्र है। चरित्र के बल से ही पृथ्वी करोड़ों सालों से बची हुई है। प्यारे विद्यार्थियों इस निकटस्थ काल से बचाव का एक मात्र उपाय है चरित्र किंतु आपने इसे गंभीरता से नहीं लिया तो आपका ये गुरु आगे घोर अन्धकार ही देख पा रहा है। मेरी ये चेतावनी आपके कानों में गूंजती रहे और माँ सरस्वती की आशीष आप पर सदा बनी रहे।
परियों का अवतरण
जुलाई महीने के आखिरी सप्ताह के पहले सोमवार को दो लड़कियां कक्षा में दाखिल हुई सबको लगा कि नई हैं भूल से आ गई है लेकिन क्लास टीचर ने जब पूछ कर दोनों का नाम आखिर में लिखा तो उमस भरे कक्ष में शीतल हवा बहने लगी। स्कूल के इतिहास में दसवीं पास करने के बाद विज्ञान में गणित विषय लेने वाले छात्रों का दारुण दुःख हुआ करता था लड़कियों का अभाव, सब लड़कियां डॉक्टर बनने बनने की इच्छा के अधीन होकर बायो में चली जाया करती थी। लेकिन इस साल चमत्कार हो चुका था परिपाटी टूट चुकी थी अब इस कक्षा के कायाकल्प के दिन आ गए थे। गोरी लड़की का नाम था परमिंदर कौर जो सबको याद रहा और काले रंग वाली का नाम याद करने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ा किंतु कुछ उत्साही और रंगभेद से नफरत करने वालों ने जोर से बोल कर सबको याद करावा दिया मरियम डिसूजा।
आखिरी सीट
हर रौशन दिल में एक अँधेरा कोना होता है जिसमे कुछ छिपा के रखा जाता है और कुछ ऐसा भी होता है जो बेवक्त मुस्कुराने को मजबूर करता है जिसे किसी को बताना भी आसान नहीं होता बस एक ही उत्तर बन पड़ता है 'कुछ नहीं' ऐसे ही आखिरी सीट पर विकास बैठता था और बैठने का कारण था 'कुछ नहीं'। उस बैंच पर बैठने वालों के लिए शिक्षकों का मूल्यांकन और जरूरत तय थी जब भी उन्हें अपनी ऊब मिटानी होती वे सवाल को वहीं उछाल देते थे स्कूप की तरह। उस दिन फिजिक्स वाले सर ने ऐसा सवाल उछाला कि वह स्कूल और कक्षा ग्यारहवीं जी की तवारीख में दर्ज हो गया। पूरी कक्षा में पहले मुर्दनगी और बाद में हँसी की किलोल छा गई। ये सवाल कम और अनुभव ज्यादा था, खत्री जी ने कक्षा के सम्मुख दोहराया जो पिछली सीट पर बैठते हैं उनकी किताबों और लड़कियों दोनों से फटती है।
बचपन से विद्रोह
अपमान से तिलमिलाए विकास और बेंच के सदस्यों ने तय किया कि किताबों को गोली मारो और लड़की से डर को दूर भगाओ, सफ़ेद रंग की लड़की को चुना गया ताकि कोई ये ना समझे कि आसान शिकार किया है फ़िर रेसेस के दौरान पहली बार परमिंदर से बात की गई। बातचीत के दौरान सब ने बड़े हौसले के साथ परमिंदर की ओर अपनी आँखें रखी ताकि उसको ये जताया जा सके कि वे अब बच्चे नहीं हैं और सब समझते हैं। अपने नाम से शुरू हुआ परिचय किसी प्याज से ज्यादा असर नहीं डाल पाया छिलके उतरते रहे और प्याज में कुछ नहीं निकला। विकास ने पूछा आपके पिताजी क्या करते हैं ? इस पर साथी मुस्कुराये कि कितना निष्प्रभावी प्रश्न पूछा है इस नासमझ ने पर ये बात परमिंदर के दिल को छू गई। उसने मेहरबां निगाहों से विकास को देखा।
बूँद से सागर
नाले झरनों की तरफ़, झरने नदियों और नदियाँ सागर में समाहित हो जाने को आँखें मूँद कर प्रवाहित हो रहीं थी। वे अपनी राह में आने वाले सजीव और जड़ सबको बहा ले जाने को आतुर थी। चारों तरफ़ परमिंदर...परमिंदर, हाय वो श्वेत फेन सी, वो उजली किरण सी, वो धूप में गहरी छाँव सी। उसकी पलकों के गिरते ही कक्षा में अँधियारा छा जाता, होठों का खुलना हज़ार किसलय के कली में बदलने की प्राकृतिक सुन्दरता को मात कर जाता और गोरे रंग पर स्कूल यूनिफॉर्म भी गजब ढाती थी। उस पे भी वे सफ़ेद रंग के लोटो के जूते जिस तरफ़ का रुख करते हवा भी उधर ही मुड़ जाती। वो ऐसा समय था जब रेसेस थी भी और नहीं भी, परमिंदर खिड़की के पीछे वाली सीट पर बैठे विकास के पास जाकर बैठ गई। किताब के नीचे से धीरे से हाथ को छुआ और उस अद्वितीय पल में विकास के कानों ने सुना फज़ा भी है जवां जवां...
शैतान को जगाया जाना
एक लोकतान्त्रिक देश में किसी एक पर मेहरबानी के विरुद्ध स्वतः स्फूर्त जनआन्दोलन की सुगबुगाहट होने लगी, विकास को प्राप्त सुख से उपजी ईर्ष्या ने संगठित रूप ले लिया। कक्षा में एक राजेश नामक स्मार्ट छात्र को नेता चुन कर उस राजपाट का दावेदार बना कर पेश किया गया। वैसे कौन नहीं था जो उस स्वर्ग से उतरी अप्सरा की मेहरबानियों की चाह लिए हुए ना था। दसवीं का टॉपर भी अब इस परिवेश के मजे लेने लगा था उसने घोषणा की बरसात के मौसम में जो नहाने का इरादा आगे सरका देगा उसे फ़िर बाल्टी भर के ही नहाना होगा। लेकिन ये बादल केन्द्रीय विद्यालय से उठे थे तो उनको बरसने को मजबूर करना शायद इन्द्र देव के भी ज्यूरीडिक्शन में नहीं था। एक दिन टेबल के नीचे से रास्ते में पाँव फैला कर छेड़ने की कोशिश पर बिजलियाँ कड़क उठी, परमिंदर ने उसे घटिया घोषित कर दिया जबकि राजेश ने इसे वो लड़ाई बताया जो प्यार की नींव बनती है।
अनुभवी चिंतन
स्कूल के मैन गेट पर चिंतामण दास मांगीलाल ने अपनी स्मृति को स्थायी रखने और पुण्य कमाने के लोभ में पानी पीने की प्याऊ बनवा रखी थी जिसके आगे पत्थर की पट्टियाँ लगा कर उसपे सीमेंट की हुई थी ताकि प्यासा विद्यार्थी कुछ पल वहां बैठ कर आराम कर सके। इस स्थान पर एक ही कक्षा में दो तीन साल का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ छात्र चिंतन किया करते थे। ये जगह स्वर्ग और नरक के बीच के किसी स्थान जैसी थी कि आप स्कूल में उपस्थित भी हैं और अनुपस्थित भी। चिंतकों को किसी दूत ने सूचित किया कि परमिंदर के शर्ट की बाहें छोटी और फिल्मी स्टाईल में कटी हुई है, वह अपना ऊपर का बटन बंद नहीं करती और दो लड़के उसके पीछे पड़े हुए हैं। लड़कों के बारे में सुन कर सबसे अनुभवी चिन्तक मुस्कुराया "ये क्लास की दोस्ती है इसका रिजल्ट अपने वार्षिक परिणाम जैसा ही होता है फ़िर एक दिन वे दोनों लड़के अपने ही घर में पिटेंगे और उसके बाद कोई इंदर-परमिंदर याद नहीं आएगी।"
मजा तो तब है, जिगर के पार उतरे
बीमारी के कारण विकास स्कूल नहीं आया, राजेश को अनुभवी चिंतकों ने स्कूल गेट पर रोक कर भारतीय सभ्यता को कलुषित करने और विद्यालय के माहौल में गन्दगी फैलाने के अपराध में कॉलर पकड़ कर ऊपर नीचे किया फ़िर उसके लंबे बालों पर माँ बाप को संबोधित कर फब्तियां कसी आख़िर में राजेश के प्रतिरोध करने पर दो थप्पड़ और तीन लात के दंड के साथ ये कहते हुए रवाना कर दिया गया कि माँ बाप की मेहनत की कमाई को उड़ाओ मत, पढाई में ध्यान दो। परमिंदर को उन्होंने अभय दान दिया साथ ही कोई आवश्यकता हो तो दरवाजा खुला समझो का निमंत्रण भी। इस पर उस पंजाबी कुड़ी ने बताया कि उसके जूते बहुत मजबूत हैं और उसके पापा के जूतों की साईज उससे भी बड़ी है अपना दरवाजा बंद रखना।
आसमानी करिश्मा
दो दिन से ज्वर पीड़ित विकास अपने कमरे में लेटा हुआ था, समय था सवेरे के सात से आठ के बीच का । बाहर कोई लड़की उसकी माँ से उसके बारे में पूछ रही थी और यकायक वह भीतर चली आई बिना रुके उसने विकास के माथे को चूमा हाथ पकड़ कर बुखार का पता किया फ़िर उसके जल्द ही ठीक होने की कामना करते हुए प्यार भरी नज़रों से देखा। पलक झपकते ही वह जा चुकी थी, दौड़ कर बाहर आने के बावजूद उसे गली के छोर पर मुड़ती हुई दो साईकल सवार लड़कियों की धुंधली छवि ही दिखाई दे सकी। ये सुख अकेले सिपाही की तरह आया और पीछे छोड़ गया यादों कि फौज। परमिंदर के कुछ पल पूर्व यहाँ होने के अहसास से विकास के कमरे का तापमान शीतल हो जाता और फ़िर कुछ न कह पाने के कारण कमरे में पसरी उदासी, उष्ण कटीबंधीय रेगिस्तान जैसा आभास कराने लगती। इस कमरे के मौसम की भविष्यवाणी असंभव थी।
नीली पगड़ी का रहस्य
एक पूरे हेक्टिक महीने के बीत जाने के बाद एक दिन एक सरदार स्कूल में दाखिल हुआ पहली हलचल प्याऊ पर हुई दूसरी ग्यारहवीं "जी" कक्षा में। सरदार जी के पीछे जासूस लगाये गए सूचनाएं देर से आ रही थी और उस पर कोई नई जानकारी का ना मिल पाना संशय को बढ़ा रहा था। चिंतकों के समूह में संख्या बल कम होता जा रहा था कि स्कूल से बाहर जाते हुए विक्रम सर ने प्याऊ की तरफ़ जिस आँख से देखा उसने कईयों का पानी उतार दिया नमस्ते सर के कई उदबोधन नियमित अन्तराल से हवा में बिखरे फ़िर भी उन्होंने एक नए चिन्तक को अपने पास बुलाया और आईंदा यहाँ दिखाई देने पर खाल खींच लेने की चेतावनी दे दी। इतने में तीन फौजी एक साथ स्कूल में प्रविष्ट हुए तो बचे खुचे तमाशाई छात्र भी हवा हो लिए। एक घंटे बाद सरदार जी और उनके सहयोगी चिंतित मुद्रा में स्कूल से चले गए।
लागे न जीया
विकास अब "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए..." गीत का तीव्र विरोधी हो चुका था। ये उसे निहायत सस्ता और सड़क छाप गीत लगने लगा था। परमिंदर की कोई ख़बर ना थी स्कूल से गायब हुए बीस दिन हो चुके थे उसके इंतजार में एक दोपहर आकशवाणी से बेग़म अख्तर की आवाज़ में ठुमरी सुन ली थी उसकी दो पंक्तियाँ याद रही अब वे ही उसे पसंद थी। सुबहो शाम वे ही चार आखर गुनगुनाता। जुदाई के इस आलम में बुरी खबरों से ही उसका सामना होता, परमिंदर के घर जाना सम्भव नहीं था, दूजी कोई सूरत ना थी जिससे सच्चाई उजागर हो। अफवाहों पर यकीन करने को जी करने लगा। एक ख़बर ने ठुमरी से पीछा छुड़वा दिया वैसे भी उसे गाने में बहुत कष्ट होता था। संगीत की कक्षा में उसने हारमोनियम पर सिर्फ़ गाड़ियों के हार्न बजाने का ही हुनर सीखा था। ख़बर जितनी चौंकाने वाली नहीं थी उससे ज्यादा दिल तोड़ने वाली थी, धुर प्रतिद्वंदी राजेश ने कक्षा में बताया कि मैंने पता लगा लिया है परमिंदर एक वायुसैनिक के साथ भाग गयी है।
कफ़स की तीलियों से छन रहे सवाल
विकास ने पढाई जारी रखी, पाईथोगोरस प्रमेय को पढ़ते हुए सवाल के उत्तर में सवाल लिखता जाता उन दिनों क्रोस चेक किए गए प्रश्नों से उसका रजिस्टर भरता गया।
डायगनल स्क्वायर इज इक्वल टू ... रहने दो, ये सब कहने सुनने की बातें हैं
परपेंडीकूलर स्क्वायर.... भला बिना बताये गए हुए कभी लौट के आते हैं
प्लस बेस स्क्वायर... वो पाक साफ़ होती तो मरियम अपना मुंह बंद नहीं रखती
पाईथोगोरस इज फेल्ड ... उस दिन सरदार जी आए उसके बाद से ही नहीं दिखी क्यों
उदाहरण... दिल में प्यार जैसा कुछ होता तो क्या वह मेरा घर नहीं जानती
सिद्ध हुआ ... मेरे मरने के दिन भी उसको मेरी याद नहीं आएगी...
अर्द्ध वार्षिक परीक्षा के नतीजे स्काईलेप के गिरने से होने वाले संभावित विनाश से भी बड़े भयानक निकले, देवदत्त बजरंगी सर ने सब को धिक्कारा और याद दिलाया चरित्रहीन के पास विद्या निवास नहीं करती इसीलिए चरित्र सबसे बड़ा गुण है और इसका सबसे बड़ा शत्रु है चंचल मन। कुछ लड़के किताबों में मुंह डाल कर खीं खीं करने लगे उनको नजरअंदाज करते हुए बजरंगी जी ने देखा पीछे की बैंच पर खामोशी छाई है। एक जड़वत्त निशब्द समय ... परमिंदर के इंतजार में ठहरा हुआ समय ।
[Painting courtesy - Charmagne Coe. The web page is http://charmagnecoe.com ]
ये किस्सा विकास देव और परमिंदर कौर नामक क्रमशः साढ़े सोलह और सोलह साल के ग्यारहवीं के एक छात्र और छात्रा का ना हो कर उनके आस पास के परिवेश और समय का है। विकास स्थानीय था जबकि परमिंदर इस शहर के लिए नवीन थी। शहर में नवीनता पर रोक नहीं थी वरन उसको उकसाया जाता था और अधिक नवीन हो कर आश्चर्य रचने के लिए। ये हवा चारों तरफ़ थी, अलीगढ से ताला बेचने कोटा आने वालों को यहीं पर ज्ञान प्राप्त हुआ कि भांग उनके कुओं ही नहीं, सबमें पड़ी है। यहाँ तो इसके आचमन पर उंगली उठाना राष्ट्रद्रोह घोषित किया जा चुका था, स्त्रियाँ ताले में लगने वाली चाबियों की संख्या पूछ कर ठिठोली करती दीख पड़ती थी तो अन्य बेशर्मी से ताला कब तक मजबूत रहेगा का प्रश्न किया करते थे।
उदघोषणा
स्कूल खुलने के पंद्रहवें दिन संस्कृत के व्याख्याता देवदत्त बजरंगी ने पूरी कक्षा को चेताया कि जिस महाकाल की आशंका व्यक्त की जा रही थी वह अब क्षण भर की दूरी पर है, स्काईलेप के गिरने के समय स्कूल के ठीक सामने स्थित गायत्री मन्दिर में श्लोक उच्चारण से टली बाधा अब नए रूप में कभी भी आ सकती है। सृष्टि के सभी तत्वों से मिल कर जिस श्रेष्ठ तत्व का निर्माण होता है वह चरित्र है। चरित्र के बल से ही पृथ्वी करोड़ों सालों से बची हुई है। प्यारे विद्यार्थियों इस निकटस्थ काल से बचाव का एक मात्र उपाय है चरित्र किंतु आपने इसे गंभीरता से नहीं लिया तो आपका ये गुरु आगे घोर अन्धकार ही देख पा रहा है। मेरी ये चेतावनी आपके कानों में गूंजती रहे और माँ सरस्वती की आशीष आप पर सदा बनी रहे।
परियों का अवतरण
जुलाई महीने के आखिरी सप्ताह के पहले सोमवार को दो लड़कियां कक्षा में दाखिल हुई सबको लगा कि नई हैं भूल से आ गई है लेकिन क्लास टीचर ने जब पूछ कर दोनों का नाम आखिर में लिखा तो उमस भरे कक्ष में शीतल हवा बहने लगी। स्कूल के इतिहास में दसवीं पास करने के बाद विज्ञान में गणित विषय लेने वाले छात्रों का दारुण दुःख हुआ करता था लड़कियों का अभाव, सब लड़कियां डॉक्टर बनने बनने की इच्छा के अधीन होकर बायो में चली जाया करती थी। लेकिन इस साल चमत्कार हो चुका था परिपाटी टूट चुकी थी अब इस कक्षा के कायाकल्प के दिन आ गए थे। गोरी लड़की का नाम था परमिंदर कौर जो सबको याद रहा और काले रंग वाली का नाम याद करने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ा किंतु कुछ उत्साही और रंगभेद से नफरत करने वालों ने जोर से बोल कर सबको याद करावा दिया मरियम डिसूजा।
आखिरी सीट
हर रौशन दिल में एक अँधेरा कोना होता है जिसमे कुछ छिपा के रखा जाता है और कुछ ऐसा भी होता है जो बेवक्त मुस्कुराने को मजबूर करता है जिसे किसी को बताना भी आसान नहीं होता बस एक ही उत्तर बन पड़ता है 'कुछ नहीं' ऐसे ही आखिरी सीट पर विकास बैठता था और बैठने का कारण था 'कुछ नहीं'। उस बैंच पर बैठने वालों के लिए शिक्षकों का मूल्यांकन और जरूरत तय थी जब भी उन्हें अपनी ऊब मिटानी होती वे सवाल को वहीं उछाल देते थे स्कूप की तरह। उस दिन फिजिक्स वाले सर ने ऐसा सवाल उछाला कि वह स्कूल और कक्षा ग्यारहवीं जी की तवारीख में दर्ज हो गया। पूरी कक्षा में पहले मुर्दनगी और बाद में हँसी की किलोल छा गई। ये सवाल कम और अनुभव ज्यादा था, खत्री जी ने कक्षा के सम्मुख दोहराया जो पिछली सीट पर बैठते हैं उनकी किताबों और लड़कियों दोनों से फटती है।
बचपन से विद्रोह
अपमान से तिलमिलाए विकास और बेंच के सदस्यों ने तय किया कि किताबों को गोली मारो और लड़की से डर को दूर भगाओ, सफ़ेद रंग की लड़की को चुना गया ताकि कोई ये ना समझे कि आसान शिकार किया है फ़िर रेसेस के दौरान पहली बार परमिंदर से बात की गई। बातचीत के दौरान सब ने बड़े हौसले के साथ परमिंदर की ओर अपनी आँखें रखी ताकि उसको ये जताया जा सके कि वे अब बच्चे नहीं हैं और सब समझते हैं। अपने नाम से शुरू हुआ परिचय किसी प्याज से ज्यादा असर नहीं डाल पाया छिलके उतरते रहे और प्याज में कुछ नहीं निकला। विकास ने पूछा आपके पिताजी क्या करते हैं ? इस पर साथी मुस्कुराये कि कितना निष्प्रभावी प्रश्न पूछा है इस नासमझ ने पर ये बात परमिंदर के दिल को छू गई। उसने मेहरबां निगाहों से विकास को देखा।
बूँद से सागर
नाले झरनों की तरफ़, झरने नदियों और नदियाँ सागर में समाहित हो जाने को आँखें मूँद कर प्रवाहित हो रहीं थी। वे अपनी राह में आने वाले सजीव और जड़ सबको बहा ले जाने को आतुर थी। चारों तरफ़ परमिंदर...परमिंदर, हाय वो श्वेत फेन सी, वो उजली किरण सी, वो धूप में गहरी छाँव सी। उसकी पलकों के गिरते ही कक्षा में अँधियारा छा जाता, होठों का खुलना हज़ार किसलय के कली में बदलने की प्राकृतिक सुन्दरता को मात कर जाता और गोरे रंग पर स्कूल यूनिफॉर्म भी गजब ढाती थी। उस पे भी वे सफ़ेद रंग के लोटो के जूते जिस तरफ़ का रुख करते हवा भी उधर ही मुड़ जाती। वो ऐसा समय था जब रेसेस थी भी और नहीं भी, परमिंदर खिड़की के पीछे वाली सीट पर बैठे विकास के पास जाकर बैठ गई। किताब के नीचे से धीरे से हाथ को छुआ और उस अद्वितीय पल में विकास के कानों ने सुना फज़ा भी है जवां जवां...
शैतान को जगाया जाना
एक लोकतान्त्रिक देश में किसी एक पर मेहरबानी के विरुद्ध स्वतः स्फूर्त जनआन्दोलन की सुगबुगाहट होने लगी, विकास को प्राप्त सुख से उपजी ईर्ष्या ने संगठित रूप ले लिया। कक्षा में एक राजेश नामक स्मार्ट छात्र को नेता चुन कर उस राजपाट का दावेदार बना कर पेश किया गया। वैसे कौन नहीं था जो उस स्वर्ग से उतरी अप्सरा की मेहरबानियों की चाह लिए हुए ना था। दसवीं का टॉपर भी अब इस परिवेश के मजे लेने लगा था उसने घोषणा की बरसात के मौसम में जो नहाने का इरादा आगे सरका देगा उसे फ़िर बाल्टी भर के ही नहाना होगा। लेकिन ये बादल केन्द्रीय विद्यालय से उठे थे तो उनको बरसने को मजबूर करना शायद इन्द्र देव के भी ज्यूरीडिक्शन में नहीं था। एक दिन टेबल के नीचे से रास्ते में पाँव फैला कर छेड़ने की कोशिश पर बिजलियाँ कड़क उठी, परमिंदर ने उसे घटिया घोषित कर दिया जबकि राजेश ने इसे वो लड़ाई बताया जो प्यार की नींव बनती है।
अनुभवी चिंतन
स्कूल के मैन गेट पर चिंतामण दास मांगीलाल ने अपनी स्मृति को स्थायी रखने और पुण्य कमाने के लोभ में पानी पीने की प्याऊ बनवा रखी थी जिसके आगे पत्थर की पट्टियाँ लगा कर उसपे सीमेंट की हुई थी ताकि प्यासा विद्यार्थी कुछ पल वहां बैठ कर आराम कर सके। इस स्थान पर एक ही कक्षा में दो तीन साल का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ छात्र चिंतन किया करते थे। ये जगह स्वर्ग और नरक के बीच के किसी स्थान जैसी थी कि आप स्कूल में उपस्थित भी हैं और अनुपस्थित भी। चिंतकों को किसी दूत ने सूचित किया कि परमिंदर के शर्ट की बाहें छोटी और फिल्मी स्टाईल में कटी हुई है, वह अपना ऊपर का बटन बंद नहीं करती और दो लड़के उसके पीछे पड़े हुए हैं। लड़कों के बारे में सुन कर सबसे अनुभवी चिन्तक मुस्कुराया "ये क्लास की दोस्ती है इसका रिजल्ट अपने वार्षिक परिणाम जैसा ही होता है फ़िर एक दिन वे दोनों लड़के अपने ही घर में पिटेंगे और उसके बाद कोई इंदर-परमिंदर याद नहीं आएगी।"
मजा तो तब है, जिगर के पार उतरे
बीमारी के कारण विकास स्कूल नहीं आया, राजेश को अनुभवी चिंतकों ने स्कूल गेट पर रोक कर भारतीय सभ्यता को कलुषित करने और विद्यालय के माहौल में गन्दगी फैलाने के अपराध में कॉलर पकड़ कर ऊपर नीचे किया फ़िर उसके लंबे बालों पर माँ बाप को संबोधित कर फब्तियां कसी आख़िर में राजेश के प्रतिरोध करने पर दो थप्पड़ और तीन लात के दंड के साथ ये कहते हुए रवाना कर दिया गया कि माँ बाप की मेहनत की कमाई को उड़ाओ मत, पढाई में ध्यान दो। परमिंदर को उन्होंने अभय दान दिया साथ ही कोई आवश्यकता हो तो दरवाजा खुला समझो का निमंत्रण भी। इस पर उस पंजाबी कुड़ी ने बताया कि उसके जूते बहुत मजबूत हैं और उसके पापा के जूतों की साईज उससे भी बड़ी है अपना दरवाजा बंद रखना।
आसमानी करिश्मा
दो दिन से ज्वर पीड़ित विकास अपने कमरे में लेटा हुआ था, समय था सवेरे के सात से आठ के बीच का । बाहर कोई लड़की उसकी माँ से उसके बारे में पूछ रही थी और यकायक वह भीतर चली आई बिना रुके उसने विकास के माथे को चूमा हाथ पकड़ कर बुखार का पता किया फ़िर उसके जल्द ही ठीक होने की कामना करते हुए प्यार भरी नज़रों से देखा। पलक झपकते ही वह जा चुकी थी, दौड़ कर बाहर आने के बावजूद उसे गली के छोर पर मुड़ती हुई दो साईकल सवार लड़कियों की धुंधली छवि ही दिखाई दे सकी। ये सुख अकेले सिपाही की तरह आया और पीछे छोड़ गया यादों कि फौज। परमिंदर के कुछ पल पूर्व यहाँ होने के अहसास से विकास के कमरे का तापमान शीतल हो जाता और फ़िर कुछ न कह पाने के कारण कमरे में पसरी उदासी, उष्ण कटीबंधीय रेगिस्तान जैसा आभास कराने लगती। इस कमरे के मौसम की भविष्यवाणी असंभव थी।
नीली पगड़ी का रहस्य
एक पूरे हेक्टिक महीने के बीत जाने के बाद एक दिन एक सरदार स्कूल में दाखिल हुआ पहली हलचल प्याऊ पर हुई दूसरी ग्यारहवीं "जी" कक्षा में। सरदार जी के पीछे जासूस लगाये गए सूचनाएं देर से आ रही थी और उस पर कोई नई जानकारी का ना मिल पाना संशय को बढ़ा रहा था। चिंतकों के समूह में संख्या बल कम होता जा रहा था कि स्कूल से बाहर जाते हुए विक्रम सर ने प्याऊ की तरफ़ जिस आँख से देखा उसने कईयों का पानी उतार दिया नमस्ते सर के कई उदबोधन नियमित अन्तराल से हवा में बिखरे फ़िर भी उन्होंने एक नए चिन्तक को अपने पास बुलाया और आईंदा यहाँ दिखाई देने पर खाल खींच लेने की चेतावनी दे दी। इतने में तीन फौजी एक साथ स्कूल में प्रविष्ट हुए तो बचे खुचे तमाशाई छात्र भी हवा हो लिए। एक घंटे बाद सरदार जी और उनके सहयोगी चिंतित मुद्रा में स्कूल से चले गए।
लागे न जीया
विकास अब "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए..." गीत का तीव्र विरोधी हो चुका था। ये उसे निहायत सस्ता और सड़क छाप गीत लगने लगा था। परमिंदर की कोई ख़बर ना थी स्कूल से गायब हुए बीस दिन हो चुके थे उसके इंतजार में एक दोपहर आकशवाणी से बेग़म अख्तर की आवाज़ में ठुमरी सुन ली थी उसकी दो पंक्तियाँ याद रही अब वे ही उसे पसंद थी। सुबहो शाम वे ही चार आखर गुनगुनाता। जुदाई के इस आलम में बुरी खबरों से ही उसका सामना होता, परमिंदर के घर जाना सम्भव नहीं था, दूजी कोई सूरत ना थी जिससे सच्चाई उजागर हो। अफवाहों पर यकीन करने को जी करने लगा। एक ख़बर ने ठुमरी से पीछा छुड़वा दिया वैसे भी उसे गाने में बहुत कष्ट होता था। संगीत की कक्षा में उसने हारमोनियम पर सिर्फ़ गाड़ियों के हार्न बजाने का ही हुनर सीखा था। ख़बर जितनी चौंकाने वाली नहीं थी उससे ज्यादा दिल तोड़ने वाली थी, धुर प्रतिद्वंदी राजेश ने कक्षा में बताया कि मैंने पता लगा लिया है परमिंदर एक वायुसैनिक के साथ भाग गयी है।
कफ़स की तीलियों से छन रहे सवाल
विकास ने पढाई जारी रखी, पाईथोगोरस प्रमेय को पढ़ते हुए सवाल के उत्तर में सवाल लिखता जाता उन दिनों क्रोस चेक किए गए प्रश्नों से उसका रजिस्टर भरता गया।
डायगनल स्क्वायर इज इक्वल टू ... रहने दो, ये सब कहने सुनने की बातें हैं
परपेंडीकूलर स्क्वायर.... भला बिना बताये गए हुए कभी लौट के आते हैं
प्लस बेस स्क्वायर... वो पाक साफ़ होती तो मरियम अपना मुंह बंद नहीं रखती
पाईथोगोरस इज फेल्ड ... उस दिन सरदार जी आए उसके बाद से ही नहीं दिखी क्यों
उदाहरण... दिल में प्यार जैसा कुछ होता तो क्या वह मेरा घर नहीं जानती
सिद्ध हुआ ... मेरे मरने के दिन भी उसको मेरी याद नहीं आएगी...
अर्द्ध वार्षिक परीक्षा के नतीजे स्काईलेप के गिरने से होने वाले संभावित विनाश से भी बड़े भयानक निकले, देवदत्त बजरंगी सर ने सब को धिक्कारा और याद दिलाया चरित्रहीन के पास विद्या निवास नहीं करती इसीलिए चरित्र सबसे बड़ा गुण है और इसका सबसे बड़ा शत्रु है चंचल मन। कुछ लड़के किताबों में मुंह डाल कर खीं खीं करने लगे उनको नजरअंदाज करते हुए बजरंगी जी ने देखा पीछे की बैंच पर खामोशी छाई है। एक जड़वत्त निशब्द समय ... परमिंदर के इंतजार में ठहरा हुआ समय ।
[Painting courtesy - Charmagne Coe. The web page is http://charmagnecoe.com ]


54 comments:
Kishore jee ....mera hindi gyan aur hindi shabdo ka bhandar seemet hai.....shayad mere tippani apke is outstanding kahani ke liye wo udgaar aur bhawnaye prakat na kar paayen jo ki main is samay mahsoos kar rahe hun,sirf itna hi kahungi.....vikas aur parmindar sajeev ho uthe ,unki classroom ka har kona dikhne laga....wow...outstanding.
किशोरवय का आकर्षण जो उन्हें प्रेम लगता है,बहुत शिद्दत के साथ उभर कर आया है.एकदम नये प्रारूप पर रची गयी इस कहानी के तमाम पात्र और स्थान जीवन्त हो उठे हैं. आपकी अपनी सशक्त और विशिष्ट भाषा शैली पाठक को पूरी कहानी पढने के लिये मजबूर करती है.बधाई.
क्या लाजवाब कहानी है........कथ्य शिल्प प्रवाह ...सब बेजोड़....
किशोर जी मुझे लगता है आपको उपन्यास लिखना चाहिए......बड़ा ही सफल उपन्यास लिखेंगे आप...
बहुत बहुत आनंद आया पढ़कर....आभार आपका..
आपकी कहानी का शिल्प साधारण कथा को भी विशिष्ट बना देता है..इस कहानी को सूत्र में बाँढ़ने वाले शब्दो का गठन मन को भाया..!
"हर रौशन दिल में एक अँधेरा कोना होता है जिसमे कुछ छिपा के रखा जाता है और कुछ ऐसा भी होता है जो बेवक्त मुस्कुराने को मजबूर करता है जिसे किसी को बताना भी आसान नहीं होता बस एक ही उत्तर बन पड़ता ही 'कुछ नहीं' ऐसे ही आखिरी सीट पर विकास बैठता था और बैठने का कारण था 'कुछ नहीं'।"
Every story of yours is worth every praise. But apart from the story, what I like about the posts are certain lines that are so well expressed. One such line is the above one. It is for such lines that I follow your blog!!
kishore ji ,
kahani to padh li magar aapko comment karne ke liye shabd nahi mil rahe .ek baar aur padhkar phir bhejungi itni achchhi rachana ke liye sochana bhi achchha hi padhata hai abhi jaldi me hoon kahi jaana hai .nayi rachana dekhi likhe bina raha nahi gaya .umda .
रंजना जी ने सही कहा आपको उपन्यास लिखना चाहिए , आपने इस छोटी सी प्रेम कहानी का जो वर्णन किया है , उसे पढ़कर मज़ा आया ....
कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ करता था ....हम ठहरे साइंस के स्टूडेंट, वहाँ काफ़ी लड़कियाँ थी ...जब की कौमेर्स मे एक भी नहीं , तब वहाँ के सारे लड़के हमारी कक्षा के स्टूडेंट से गिला करते थे .....खैर ये सब पुरानी बातें याद करना अच्छा तो लगता ही है......बधाई....
वाह..... इसे कहते हैं शब्दचित्र... क्या बात है किशोर जी........................ भाई बहुत-बहुत बधाई...
एक अलग शिल्प में ढाली गयी कहानी में कुछ पात्रों के बहाने बदलते समय को बखूबी चिन्हित किया है किशोर भाई आपने.और साथ ही जो चीज़ें आज भी वैसी ही है उन्हें भी रेखांकित किया है आपने.एक रचनाकार अपने समय को दर्ज करता है, और ये कहानी उसी दायित्व का निर्वाह करती है.
so well written! I'm waiting for ur book!
hey kishore...thanks for boosting my morale up by being there on my list...i will definitely come back to read your posts....and the unique part...i am so much looking forward to read posts written in "Hindi"...really excited...
ऐसा लगा किसी पुराने समय को खींचकर ....लफ्जों का लिबास पहनाकर कागज पे उतारा गया है......समय अपने कुछ कतरे छोड़ता दिखायी देता है ....
लाजवाब कहानी है.
"हिन्दीकुंज"
किशोर जी,
सत्य है या भ्रम ..!
आपकी कहानी में चरित्रों के नाम अपरिचित नजर आरहें है...
पर कहानी पहचानी सी लग रही है...
मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि सरदारजी ...पमिंदर...डिसूजा ....
हम्म्म्म्म !
कुछ पहचाने से लग रहे है...
अरे! ऐसा कुछ तो तब हुआ था जब मैं ग्यारहवीं में पढता था..!
खैर,
पर आपने जो सजीव वर्णन किया है ..वह तो अद्वितीय है...
पढ़ कर बहुत मजा आया..
बधाई!
प्रकाश सिंह
सत्य है या भ्रम
जड़ है या चेतन
शाश्वत है या नश्वर
प्रकाश जी
ऐसी सब स्थितियों में ठीक बीच वाली स्थिति मुझे बहुत पसंद है, प्यार है भी और नहीं भी वाले अंदाज में. मुझे आपका कमेन्ट पढ़के बहुत अच्छा लगा वो इसलिए कि आपने कितनी शिद्दत से ग्यारहवीं के दिनों को याद किया होगा इस कहानी को पढ़ कर. संजय जी से भी कहानी पूर्ण होने से पहले और उसके बाद भी इस बारे में चर्चा हुई थी, इस सार्वजानिक मंच पर भी मुझे ये कहने से एतराज़ नहीं कि संजय जी और आप जैसे दोस्तों के मार्गदर्शन से ही सब आबाद है.
अब मैं आपको याद दिलाता हूँ जिन सरदार जी को आप याद कर रहे हैं वे एयरफोर्स बस के ड्राईवर थे जो अक्सर नए एडमिशन के फोरम्स लेने स्कूल आया करते थे, जिस लड़की को आप याद कर रहे हैं उसका नाम था परवीन बक्षी जो दुर्भाग्य से मेथ्स में नहीं पढ़ती थी और सौभाग्य से संजय जी के साथ थी, रही बात डिसूजा की तो ये नाम पढ़ कर आपको मर्सी वायला की याद हो आई होगी जिसको देवासी जी पर्चियां देने को स्कूल के ऑफ होने के एक घंटे बाद तक रुके रहते थे. गर्ल्स रूम के जाली लगे झरोखे पर किसी चमत्कार होने की प्रतीक्षा में आँखें लगाए रहते थे.
कहानी में जो परमिंदर है वह कभी इसको पढेगी नहीं और पढेगी तो समय उसके इंतजार में रुका ना रह कर चल पड़ेगा.
सच कहना क्या कहीं से भी लगता है ये कोई कहानी है ? जिसने पढ़ा है उसने इसे अपने स्कूल का एक छोटा सा समय बताया है जिसमे पात्रों के नाम बदल गए हैं.
किशोर भाई,
आपकी इसी अदा के तो हम दीवाने है..
मेरी टिप्पणी पर आपकी प्रतिक्रिया पर मैं बस हंसता ही चला गया ....
सच कहूं तो आपने बहुत प्यारा लिखा....
आपकी पमिंदर के दीवानों में कई लोग शामिल थे....
हम भी...
पर सरदारजी और फौजी पिता से बहुत डरते थे....
पर आपने किशोरावस्था की यादों को सहलाकर जो अहसास जिन्दा किये है उनके लिए आपके आभारी है...
शुक्रिया प्यारे दोस्त...!
ऐसे ही लिखते रहें....
सरस्वती आपकी कलम में सदा विराजे.
प्रकाश सिंह
वे दिन हवा हुए पर उस हवा की महक अभी बाकी है मेरे दोस्त, दो दिन में आभा लौट के आने वाली है और कहानी पढने के बाद आपका कमेन्ट पढ़ते ही मैं कोई स्पष्टीकरण देने लायक बचूंगा इसकी उम्मीद कम ही है. बेटी ब्लॉग पढ़ती है और कंचन भृकुटियाँ तन जाती हैं, जबकि संजय मुस्काते रहते हैं इसलिए पहले ही बहुत काटा पीटी कर चुका हूँ अतः मैं बाहोश ये घोषित कर देता हूँ कि ये एक कल्पना मात्र है. चरित्र, नाम और घटनाओं का किसी से साम्य होना महज इत्तेफाक है, हो सकता है आप इसे खूबसूरत इत्तेफाक कहें.
छोटे भाई ने इस कहानी को खारिज कर दिया [इतिहास के प्रोफेसर को क्या पता, तारीख और तवारीख बदलती रहती है दिल नहीं बदलते सिर्फ टूटते हैं ] फिर भी आपसे लिखित और संजय भाई से अलिखित संवाद करके मजा आ रहा है हाय वो दिन... कहना तो सिर्फ इतना ही था कि वो मेरी परमिंदर नहीं थी ....
संशोधन--
टिप्पणी संख्या १६
जून २५,९:५६ पी एम्
'निरसन'
इस पोस्ट पर अभिव्यक्ति ब्लॉग से की गई टिप्पणी में छठी पंक्ति के प्रथम शब्द 'आपकी' को एतद द्वारा निरसित किया जाता है.
आज्ञा से
अभिव्यक्ति ब्लॉग
अब तो खुश?
बहुत सुंदर... लाजवाब कहानी.
कहानी की भाषा प्रभावी है और आपका ही लिखा हुआ है ऐसा लगता रहता है . स्कूल के दिनों की यादें बिलकुल सजीव हो गयी गईं जैसे खिड़की के पास बैठना और टीचर्स के कहे गए वाक्य. लिखते रहने की शुभकामनाएं.
किशोर जी
सभी का यौवन काल कुछ कुछ एक जैसा क्यूँ होता है भला ...??
पर बीता भूला टकराता कोई कम ही है ..:))
अब आपकी कहानी ने सब कुछ जीवंत ज़रूर कर दिया
सशक्त वर्णन !!!!
ऐसे परमिंदर और विकास तो कई देखे किन्तु आपके शब्दों के जादू में टिमटिमाते पहली बार देखे... वाह! हर पेराग्राफ नये शीर्षक के साथ... आप इसे पेटेंट करवा लें इससे पहले की सब इसकी नक़ल करें :-)
भैये ...भैये .....छा गए ...छा गए
मस्त कहानी.....बेहतरीन लेखनी
परिवेश और समय को परिभाषित करती कहानी... विकास और परमिंदर के बहाने बच्चों में आकर्षण और उससे उपजे छोटे किन्तु गंभीर सवालों की कहानी. पढ़ कर अच्छा लगा.
स्कूल के दिन ताजा हो गए ,आपकी रचना जिन्दा होकर हर शब्द के साथ बोलने लगती है ,कुछ लाइन मन को स्पर्श करते हुए गुज़रती जा रही है ,
इसे पढ़ते हुए एक गाने की कुछ लाइन याद आ गयी ,
जलते है अरमान मेरा दिल रोता है ,
किस्मत का दस्तूर निराला होता है ,
आई ऐसी मौज की साहिल डूब गया ,
वरना अपनी कश्ती कौन डूबोता है .
किशोर जी ,
आपकी कहानी जबतक दो -तीन बार नहीं पढ़ती तब तक मन नहीं भरता .वंदना की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ ,उम्र का यह दौर ही ऐसा है जहाँ सपने जन्म लेते है और मन पे जोड़ नहीं चलता ,इस रचना को पढ़ते हुए स्कूल के दिन ताजा हो गए ,आपकी रचना जिन्दा होकर हर शब्द के साथ बोलने लगती है ,कुछ लाइन मन को स्पर्श करते हुए गुज़रती जा रही है ,
इसे पढ़ते हुए एक गाने की कुछ लाइन याद आ गयी ,
जलते है अरमान मेरा दिल रोता है ,
किस्मत का दस्तूर निराला होता है ,
आई ऐसी मौज की साहिल डूब गया ,
वरना अपनी कश्ती कौन डूबोता है
कहानी बहुत पसंद आई. कुछ स्मृतियाँ और कुछ मुस्कुराने की वजहें...
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किशोर जी आप की इस कहानी को बहुत तसलली से पढ़ा और अब सोच रही हूँ की क्या टिपण्णी लिखूं??
यह एक काल्पनिक कहानी लगती तो नहीं..ऐसा लगता है इस के कई पलों को आप ने जिया हो जैसे!
ख़ास कर प्रस्तुति बहुत ही प्रभावशाली है...
-सारी कहानी चल चित्र की तरह आँखों के आगे घूम रही है..
हंसी व्यंग्य का पुट कहीं कहीं होने के कारण कथा को बोझिल होने से बचा रहा है.
कुछ पंक्तियाँ बेहद प्रभावी लगीं--
*शहर में नवीनता पर रोक नहीं थी वरन उसको उकसाया जाता था और अधिक नवीन हो कर आश्चर्य रचने के लिए।
*कुछ ऐसा भी होता है जो बेवक्त मुस्कुराने को मजबूर करता है जिसे किसी को बताना भी आसान नहीं होता बस एक ही उत्तर बन पड़ता है 'कुछ नहीं
*ये क्लास की दोस्ती है इसका रिजल्ट अपने वार्षिक परिणाम जैसा ही होता है
*कफस की तीलियों से झांकती...
बहुत ही अच्छी कहानी लिखी है...
[इंतज़ार में ठहरा हुआ समय!इंतजार का एक यह भी ढंग है!
अल्पना जी, ये कथा प्लाट स्कूल दिनों की कुछ धुंधली स्मृतियों पर आधारित है जहाँ जानकारी के अभाव में बच्चों के लिए सामान्य सा व्यक्ति रहस्य बन जाया करता है और सहज स्पर्श किसी बड़े लगाव का कारण.
आपने बड़ी खूबसूरती से अपना कमेन्ट किया है तो आपको बताना चाहूँगा कि इस कहानी सहित सभी कहानियों का फलक व्यापक है जैसा रंजना जी, पुखराज, शिवांगी जी और अन्य ने कहा भी है, विस्तार की पर्याप्त संभावनाएं हैं इसलिए मैं समय के सामने घुटने टेक कर उसका हाथ चूमना चाहता हूँ कि मुझे ये सब पूर्ण करने का अवसर मिले.
किशोर जी
सशक्त कथा और उसके प्रवाह को बनाय रखने के लिए
एक टिप्पणी जवाब मैं सच कहा है आपने ..समय के आगे घुटने टेक कर माफी मांगने के बाद बस इतना ही की
गुलजार की एक नज्म लिखे बिना अधूरा सा होगा...सब कुछ
कसैली रात के हाथों पर रख दी चाँद की मिश्री
ये दिन रूठा हुआ था ,तेरे आँचल से पोंछ कर बहला लिया
मैं अपने ही गले से लग गया ,नाराज था ख़ुद से ॥
तिरे गम का नमक चख कर बड़ी मीठी सी लगी है जिन्दगी जानम
ये सुख अकेले सिपाही की तरह आया और पीछे छोड़ गया यादों कि फौज
ये तो हमारे परिवेश की कहानी है। हर काल में घटती है। बेहतरीन प्रस्तुतिकरण....
माफ़ कीजिये किशोर हमेशा देर से आती हूँ आपके ब्लॉग पे!
बहुत ही लाजवाब कहानी है ये, पता नहीं कैसे लिख पाते हैं आप इतनी सरलता से!
ये तो मेरे मन को भा गया किशोर जी!
आपने जिस तरह से शुरुवात से अंत तक कहानी का वर्णन किया है, वाकई में आप प्रशंशा के हकदार हैं!
ऐसे ही लिखते रहिये!
बधाई!
छुट्टी पे हूँ...और विगत नौ दिनों में पहली बार बैठा हूँ ब्लौग-जगत को पढ़ने। परमिंदर के इंतजार में ठहरे समय पर आकर ठिठक गया हूँ। पहले तो किस्से की अद्भुत किस्सागोई और फिर प्रकाश भाई के साथ आपकी टिप्पणियों का आदान-प्रदान, कहानी के बयान को और सजीव बना गया।
...और ऐसे हरेक ’विकास’ और हरेक ’परमिंदरों’ के चित्र को इस खूबी से उकेरने के लिये आपके नाम अपनी समस्त दुआयें कर रहा हूँ।
जाने क्या जादूगरी करते हो आप कि शब्द-सारे-शब्द जुड़ कर शायरी-सी करते हुये अपनी ही कहानी कहते नजर आते हैं।
"होठों का खुलना हज़ार किसलय के कली में बदलने की प्राकृतिक सुन्दरता को मात कर जाता "
एक उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़.....बस !
Wow! very nuce!
"हर रौशन दिल में एक अँधेरा कोना होता है जिसमे कुछ छिपा के रखा जाता है और कुछ ऐसा भी होता है जो बेवक्त मुस्कुराने को मजबूर करता है जिसे किसी को बताना भी आसान नहीं होता बस एक ही उत्तर बन पड़ता ही 'कुछ नहीं' ऐसे ही आखिरी सीट पर विकास बैठता था और बैठने का कारण था 'कुछ नहीं'।"
बहुत खूब!
क्षमा चाहूंगी इस बार देर से कमेंट करने के लिये।
आपकि कहानी हमेशा कि तरह हमें बहुत ही अछी लगी। यह कहानी भी दिल को छू सी जाती है।
kishore g kahani boht hi sunder hai..shabd chayan bhi boht khubsurat hai....
Badiya bahut badiya :)
वो नहीं है मेरी ,
मगर उससे मुहब्बत है तो है .....
ये अगर रस्मो रिवाजो से बगावत है तो है......
सच को मैंने सच कहा ,
जब कह दिया तो कह दिया
अब ज़माने की नजरो में ये हिमाकत है तो है ..
दोस्त बनकर दुश्मनों सा सताती है मुझे ,
फिर भी उसपे मरना,अपनी फितरत है तो है.....
कब कहा मैंने के वो मिल जाये मुझको ,
उसकी बाहों में दम निकले
इतनी हसरत है तो है......
वो साथ है तो जिन्दा हु ,
मेरी सांसो को उसकी जरुरत है तो है........
सुन्दर रचना ... बधाई
श्वेत फेन सी, वो उजली किरण सी, वो धूप में गहरी छाँव सी। उसकी पलकों के गिरते ही कक्षा में अँधियारा छा जाता, होठों का खुलना हज़ार किसलय के कली में बदलने की प्राकृतिक सुन्दरता को मात कर जाता और गोरे रंग पर स्कूल यूनिफॉर्म भी गजब ढाती थी। उस पे भी वे सफ़ेद रंग के लोटो के जूते जिस तरफ़ का रुख करते हवा भी उधर ही मुड़ जाती।
वाह...वाह....सुन्दरता का गजब वर्णन........!!
विकास अब "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए..." गीत का तीव्र विरोधी हो चुका था। ये उसे निहायत सस्ता और सड़क छाप गीत लगने लगा था। परमिंदर की कोई ख़बर ना थी स्कूल से गायब हुए बीस दिन हो चुके थे उसके इंतजार में एक दोपहर आकशवाणी से बेग़म अख्तर की आवाज़ में ठुमरी सुन ली थी उसकी दो पंक्तियाँ याद रही अब वे ही उसे पसंद थी। सुबहो शाम वे ही चार आखर गुनगुनाता।
कुछ टिप्पणियों से पता चला ये आपके स्कूली दिनों के कुछ अंश हैं ....आपकी याददास्त की दाद देनी पड़ेगी यहाँ ......
बहुत खूब.....पूरी कहानी जिज्ञासा बनाये रखने में कामयाब ...और इस एक पंक्ति ने काफी देर निशब्द कर दिया ........
" परमिंदर के इंतजार में ठहरा हुआ समय । "
mai agar aapki taaref karu to kam hogi..mujhe samajh nahi aa raha ki mai kis shabdo me aapki taaref karu...... bahut hi badhiya likha hai aapnee
किशोर जी,
मैं तो सच-मुच बहुत ही देर से आई हूँ, माफ़ी चाहूंगी, सबने इतनी सारी बातें कहीं हैं आपके तारीफ में, जिसके आप पूरे हक़दार हैं,
आपकी लेखनी हमें अपने पाश में यूँ बांधती है की हम निकल ही नहीं पाते, बस शब्दों और भावो के प्रवाह में बहते ही चले जाते हैं, सबकुछ चलचित्र सा लगता जाता है और एक बार फिर हम वो सब कुछ जी लेते हैं, जिनकी यादें मन के किसी कोने में दुबक चुकी होतीं हैं, यह सब कुछ बार-बार होता है जब भी आपकी कोई कहानी/संस्मरण हम पढ़ते हैं,और एक बार फिर आपकी कलम का जादू चल ही गया, हमेशा की तरह....
आज फिर से ये कहानी और इसकी टिप्पणिया पढ़ने आई..! देखा वो एक आध लोग जिनके कारण आपके शब्द उड़ान नही पा रहे उनमें मैं भी हूँ...! तो श्रीमान मैने तो आपको मुक्त किया....! मैं नही चाहती कि एक बहुत बड़ा संभावित कहानीकार कल को मुझ पर आक्षेप लगाये कि कंचन अगर मेरे पाठक वर्ग में ना होती तो शायद मैं बहुत बड़ा कथाकार होता :) :)
अब रही बात भाभी जी की तो जिस तरह आपने याचना की है कोई भी पत्नी अपनी अनुमति द्वारा शहादत देने को तैयार हो जायेगी।
तो आप लिखिये सर..! कथासंसार का बहुत बड़ा फ़लक आपका इंतज़ार कर रहा है। हाँ जब प्रतिष्ठित कहानीकार हो जाइयेगा तब आत्मकथा लिखते समय ये टिप्पणी जरूर लगा दीजियेगा मेरी, थोड़ा यश इसी बहाने पा जाएंगे हम भी...!
हा हा हा...! आप बहुत अच्छा लिखते हैं किशोर जी...! कहानियों को नये सिरे से जानने का मौका मिला आपसे मित्रता के पश्चात..!
kal fir se aata hun kishore ji... puri nahi padh paya hun light chali gayee hai .....
arsh
Must confess..visited your blog twice after finding u in my follow list...but in either of situation cldn't read it.....BUT......then:its tooo good..so different from many recent blogs i read..and definately reminded me of those Hindi textbooks stories of school time ......one word to eulogize your writing UNIQUE
Must confess..visited your blog twice after finding u in my follow list...but in either of situation cldn't read it.....BUT......then:its tooo good..so different from many recent blogs i read..and definately reminded me of those Hindi textbooks stories of school time ......one word to eulogize your writing UNIQUE
कंचन जी - मैं जो लिख रहा हूँ वे सम्पूर्ण कहानियां नहीं हैं वे मात्र उद्धरण हैं जिन पर मैं फुरसत में कभी बड़ी कहानी लिख पाउँगा ऐसा सोचता हूँ, हाँ ये आप जैसे कुछ परिवार तुल्य मित्रों का स्नेह ही है जो मुझे शालीन बने रहने को प्रेरित करता है, मैं बना भी रहना चाहता हूँ.
अर्श - जरूर पढ़ना और लिखना भी. मैंने आपकी कुछ गज़लें देखी हैं उनमे दीखता है कि वे आपकी ओरिजनल हैं और मुझे पसंद भी.
किशोर जी - शब्दो का जो समुच्चय और प्रवास और साथ हि साथ शैली ----- अति उत्तम
लिखते रहे
आज एक बार फिर चली आई,
मुस्कुराने की वजह ढूंढने....
और मुस्कुरा कर ही लौट रही हूँ....
जी नहीं भरा आपकी तारीफ करके...
लेकिन सच्ची बात यह है की आपके comments का अर्धशतक मैं मरना चाहती थी, सिर्फ एक ही रन की कमी थी...
प्रिय किशोरजी,
प. के लिए ध. स्याही तो दरअसल वही है, जिससे आप 'परमिंदर की प्रतीक्षा में ठहरे हुए वक़्त' को रूपायित करते हैं. यह भोगे हुए यथार्थ, पहचानी हुयी पीड़ा की स्याही है.
'जुलहा कपड़े बुनता है, जाने क्या क्या गुनता है.
नयी चदरिया उससे बनती, जो कपास को धुनता है.'
जान चूका हूँ कि आप भी धुनने में लगे हुए हैं, मैं भी. आपको साधुवाद इसलिए कि परमिंदर ने मुझे भी भावुक किया; कुछ धुंधली यादें सजीव होकर सम्मुख आ खड़ी हुयीं. सोये को जगाने का शुक्रिया !
प्रेम भरे भावों की सुन्दरतम प्रस्तुति....कमोबेश ये हर जगह होता है.....पर ये कहानी है या हकीकत..ये आप ने बताया ही नहीं...
इस सुन्दर रचना के लिये बहुत बहुत धन्यवाद...
nice...........nice..........nice....
Hi,
Thank You Very Much for sharing this interesting article here.
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